आप सभी का स्वागत है. रचनाएं भेजें और पढ़ें.
उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, April 23, 2011

अनुसंधान त्रैमासिक वर्ष : २ अंक : ६ अप्रैल-जून २०११ सम्पादक : डॉ. शगुफ्ता नियाज असि. प्रोफेसर हिन्दी, वीमेन्स कॉलेज, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

Saturday, October 30, 2010

स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप

वेद प्रकाश
नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘ठीकरे की मंगनी’ दो दशक पहले प्रकाशित हुआ था। यह सुखद आश्चर्य है कि आज भी इस उपन्यास में स्त्री-विमर्श का एक विश्वसनीय एवं सार्थक रूप मिलता है। यह उपन्यास स्त्रीवाद के समक्ष कुछ चुनौतीपूर्ण सवाल भी व्यंजित करता है। इसीलिए बहुत से स्त्रीवादी इसके निंदक आलोचक हो सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि नासिरा शर्मा स्त्री की यातना, उसके जीवन की विसंगतियों-विडंबनाओं पर सशक्त ढंग से विचार करती है। वे सामान्य अर्थों में स्त्राीवादी लेखिका नहीं है। वे नारीवाद की एकांगिता, आवेगिता, आवेगात्मकता को पहचानती हैं। नारीवाद की पश्चिमी परंपरा का प्रभाव तथा उसकी सीमाएं नासिरा शर्मा की दृष्टि में हैं, इसलिए बहुत हद तक वे इन सीमाओं से मुक्त होकर लिखती हैं, उनकी स्त्राी संबंधी दृष्टि कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं की दृष्टि के अधिक निकट ठहरती है। ये लेखिकाएं मौलिक, यथार्थवादी ढंग से स्त्राी समस्याओं पर विचार करती हैं। इस संदर्भ में इन लेखिकाओं की रचनाएं द्वंद्वात्मकता से युक्त हैं।
जीवन की अंतःसंबद्धता की उपेक्षा किसी भी प्रकार के लेखन की बहुत बड़ी सीमा हो सकती है। स्त्राीवादी और दलितवादी लेखन को लेकर यह आशंका कम नहीं, अधिक ही है। प्रभावशाली स्त्रीवादी और दलित लेखन वह है जिसमें जीवन की जटिलता और परस्पर संबद्धता की अभिव्यक्ति होती है। बुद्धिजीवी या लेखक, सक्रिय राजनीति के नकारात्मक पहलुओं का चाहे जितना उल्लेख करें लेकिन सक्रिय राजनीति की बड़ी शक्ति यह है कि वह अधिक समावेशी - सबको साथ लेकर चलने वाली होती है। आज की दलित राजनीति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस समावेशिता से लेखन को समृद्ध होना चाहिए। स्त्रीवादी एवं दलित लेखन को भी।
नासिरा शर्मा ने ‘ठीकरे की मंगनी’ के माध्यम से हिन्दी साहित्य को महरुख़ जैसा अद्वितीय एवं मौलिक पात्रा दिया है। महरुख़ का जीवन उन स्त्रिायों के जीवन का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी मुक्ति को अकेले में न ढूँढकर समाज के उपेक्षित, निम्नवर्गीय, संघर्षरत, शोषितों पात्रों की मुक्ति से जोड़कर मुक्ति के प्रश्न को व्यापक बना देती है। वह ‘मुक्ति अकेले में नहीं मिलती’ पंक्ति को चरितार्थ करती है। बहुत बाद में लिखे गए चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आवाँ’ की नमिता पाण्डे, महरुख़ की वंशज पात्रा है। यह स्त्री-विमर्श का व्यापक, समावेशी रूप है इसीलिए अनुकरणीय भी। ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास के फ्लैप में ठीक ही लिखा गया है कि ‘‘औरत को जैसा होना चाहिए, उसी की कहानी यह उपन्यास कहता है।’’ यह वाक्य औरत को परंपरागत आदर्शवाद की ओर न ले जाकर उसके व्यावहारिक एवं सशक्त रूप की ओर संकेत करता है। उसका स्वयं को समाज की सापेक्षता में देखने का समर्थन करता है। साथ ही पुरुष को जैसा होना चाहिए वैसा होने की माँग भी करता है क्योंकि औरत भी तभी वैसी होगी जैसी उसे होना चाहिए। इन्हीं सब बातों को लेकर चलने वाली महरुख़ की जीवन-यात्रा है। वह जहाँ से आरंभ करती है वह बिन्दु अंत में बहुत व्यापक बन जाता है। जैसे किसी नदी का उद्गम तो सीमित हो लेकिन समुद्र में मिलने से पहले उसका संघर्ष भी है, अनुकूल को मिलाने और प्रतिकूल को मिटाने की प्रक्रिया भी।
समृद्ध और जन-संकुल जै़दी खानदान एक विशाल घर में रहता है। जिसके द्वार ऐसे खुलते हैं मानो जहाज़ के दरवाजे खुल रहे हों। चार पुश्तों से इस खानदान में कोई लड़की पैदा नहीं हुई। जब हुई तो सबके दिल खुशी से झूम उठे। उसका नाम रखा गया महरुख़ - ‘चाँद-से चेहरे वाली। सबकी लाड़ली। दादा तो रोज़ सुबह महरुख़ का मुंह देखकर बिस्तर छोड़ते थे। जै़दी खानदान में बाइस बच्चे थे, जिनकी सिपहसालार महरुख़ थी। उसका बचपन कमोबेश ऐसे ही बीता। उसी महरुख़ की मंगनी बचपन में शाहिदा खाला के बेटे रफ़त के साथ कर दी गई, ठीकरे की मंगनी। शाहिदा खाला ने महरुख़ को गोद ले लिया ताकि वह जी जाए। रफ़त, परंपरागत परिवार में पली-बढ़ी, नाजुक महरुख़ को अपनी तरह से ढालना चाहता है। क्रांति और संघर्ष की बड़ी-बड़ी बातें करता है। पुस्तकें लाकर देता है। महरुख़ अपने को बदलती तो है लेकिन उसकी बदलने की राह और उद्देश्य अलग है। वह क्रांति और आधुनिकता की बातें करने वाले लोगों के जीवन में झाँकती है तो काँप उठती है। वहाँ ये मूल्य फैशन अवसरवाद एवं कुण्ठाग्रस्त हैं। रफ़त दिखने को तो रूस का समर्थक है लेकिन पी-एच.डी. करने अमेरिका जाता है। उसका और उसके दोस्तों का अपना तर्क है, ‘‘पूंजीवादी व्यवस्था देखकर आओ, फिर इन साम्राज्यवादियों की ऐसी-तैसी करेंगे।’’
खुलेपन और प्रगतिशीलता के नाम पर रवि जो माँग एकांत में महरुख़ से करता है, उसे वह स्वीकार नहीं कर पाती। वह रवि की दृष्टि में पिछड़ेपन का प्रतीक बनती है लेकिन महरुख़ का तर्क है, ‘‘उसे हैरत होती है कि इस विश्वविद्यालय में भी औरत को देखने वाली नज़रों का वही पुराना दृष्टिकोण है, तो फिर यह किस अर्थ में अपने को स्वतंत्रा, प्रगतिशील और शिक्षित कहते हैं?’’
नासिरा शर्मा कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाले कुछ लोगों की सीमाओं और उपभोक्तावाद के दोगलेपन की आलोचना करती है लेकिन वे कम्युनिस्ट विचारधारा की विरोधी नहीं समर्थक हैं क्यांेकि महरुख़ ने अपने सकर्मक जीवन के माध्यम से इसी विचारधारा को सार्थक बनाया। यह भी कह सकते हैं कि वह इस विचारधारा पर चलकर सार्थक पात्रा बनी। इसके साथ ही लेखिका इस बात की भी अभिव्यक्ति करती है कि परंपरागत, संस्कारी, धर्म को मानने वाले सभी गैरप्रगतिशील तथा जड़ नहीं होते। इस स्तर पर नासिरा शर्मा अनेक रचनाकारों की तरह अग्नीभक्षी या अराजकतावादी नहीं हैं। न ही वे पुराने माने जाने वाले मानवीय मूल्यों की विरोधी लेखिका है। बल्कि वे.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

Wednesday, October 27, 2010

‘आधा गाँव’ के हिन्दू पात्र

डा- रमाकान्त राय
राही मासूम रज़ा का प्रसिद्ध उपन्यास ‘आधा गाँव’ (1966 ई.) हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में एक है। ‘वर्तमान साहित्य’ के ‘शताब्दी कथा साहित्य’ अंक में सदी के दस श्रेष्ठ उपन्यासों में ‘आधा गाँव’ को स्थान मिला था। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर के एक गाँव ‘गंगौली’ को इसका कथा स्थल बनाया गया है। शिया मुसलमानों की ज़िन्दगी का प्रामाणिक दस्तावेज यह उपन्यास स्वतंत्राता प्राप्ति से पूर्व एवं बाद के कुछ वर्षों की कथा कहता है। स्वतंत्राता-प्राप्ति के बाद पाकिस्तान के वजूद में आने एवं जमींदारी उन्मूलन ने मियाँ लोगों की ज़िन्दगी में जो हलचल मचाई, उसकी धमक इस उपन्यास में सुनाई पड़ती है। मुहर्रम का सियापा; जो इस उपन्यास का मूल कथा-सूत्रा है, अपनी मनहूसियत एवं उत्सव के मिले-जुले रूप के साथ पूरे उपन्यास में पाश्र्व संगीत की तरह बजता है और अंततः शोक आख्यान में तब्दील हो जाता है। राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गाँव’ को गंगौली के आधे हिस्से की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके लिए यह उपन्यास कुछ-एक पात्रों की कहानी नहीं बल्कि समय की कहानी है। बहते हुए समय की कहानी। चूँकि समय धार्मिक या राजनीतिक नहीं होता और न ही उसके सामाजिक वर्ग/जाति विभेद किए जा सकते हैं, अतः उसके प्रवाह में आए पात्रों का विभाजन भी संभव नहीं। हिन्दू-मुसलमान के साम्प्रदायिक खाँचे में रखकर देखना तो और भी बेमानी होगा। बावजूद इसके अध्ययन का एक तरीका यह है कि यदि मानव समाज धार्मिक खाँचों में बँटा है, उसकी राजनीतिक चेतना पृथक् है और कालगत, देशगत एवं जातिगत विशिष्टता मूल्य निर्धारण में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करती है तो उन भिन्नताओं में उनको विश्लेषित करना बेमानी हो जाता है।शेष भाग पत्रिका में..............

अनुसंधान aligarh


सहयोग राशि:एक प्रति: 40/- रु., वार्षिक शुल्क: 150/- रु., (डाक खर्च 20/- रु. अतिरिक्त) संस्थाओं के लिए: 200/- रु., (डाक खर्च 20/- रु. अतिरिक्त) द्विवार्षिक शुल्क: 280/- रु., (डाक खर्च 40/- रु. अतिरिक्त) द्विवार्षिक शुल्क संस्थाआंे के लिए: 350/- रु.,(डाक खर्च 40/- रु. अतिरिक्त) विशेष सहयोग: 501/- रु. या 1001/- रु., आजीवन सदस्य: 1500/- रु., संस्थाओं के लिए आजीवन: 2,000/-
अनुक्रम
डा. रमाकान्त राय आधा गांव के हिन्दू पात्र/6
डा. दया दीक्षित शृंखला का द्वन्द्व, कोई उधार न हो/16
लवली शर्मा महानगरीय वर्ग की जीवन त्रासदीः मुर्दाघर/21
सरिता बिश्नोई राजनीतिक धरातल पर कदम बढ़ाती मैत्रेयी पुष्पा की नायिकाएं/26
डा. अशोक व. मर्डेः हिन्दी और मराठी दलित आत्मकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन/32
डा. कृष्णा हुड्डा हिन्दी की बाल एकांकियों में बाल मनोविज्ञान/35
कुलभूषण मौर्य स्त्री मुक्ति का भारतीय संदर्भ और महादेवी वर्मा/41
डा. सुनील कुमार लोकायतन में युग बोध की परिकल्पना/46
सीमा भाटिया कबीर का दार्शनिक तत्त्व-निरूपण/48
डा. सुनील दत्त हरिवंशराय बच्चन के काव्य में विरलन का अध्ययन/55
डा. रजनी सिंह प्रयोगवाद और अज्ञेय/58
कुशम लता पितृसत्तात्मक व्यवस्था का दस्तावेज: तीसरी सत्ता/62
डा. बशीरूद्दीन मुक्तक काव्य/66
एलोक शर्मा सर्वेश्वर के बकरी नाटक में राजनीतिक चेतना/70
बबिता के. : महिला कथा लेखन और नारी संत्रास के विविध रूप/74
शत्रघ्न सिंह स्त्री मुक्ति के बनते-बिगड़ते समीकण में बाज़ारवाद और मीडिया की भूमिका/77
अंजुम फात्मा धर्म की वैदिक अवधारणा/82

नासिरा शर्मा

विशेषांक उपलब्ध (मूल्य-150/ रजि. डाक से)







नासिरा शर्मा विशेषांक


सम्पादकीय


नासिरा शर्मा मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं


सुदेश बत्रा नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना


ललित मंडोरा अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा


अशोक तिवारी तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने


शीबा असलम फहमी नासिरा शर्मा के बहान


अर्चना बंसल अतीत और भविष्य का दस्तावेज: कुंइयाँजान


फज़ल इमाम मल्लिक ज़ीरो रोड में दुनिया की छवियां


मरगूब अली ख़ाक के परदे


अमरीक सिंह दीप ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़


सुरेश पंडित रास्ता इधर से भी जाता है


वेद प्रकाश स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप


नगमा जावेद ज़िन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः ज़िन्दा मुहावरे


आदित्य प्रचण्डिया भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट


एम. हनीफ़ मदार जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में


बन्धु कुशावर्ती ज़ीरो रोड का सिद्धार्थ


अली अहमद फातमी एक नई कर्बला


सगीर अशरफ नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण


प्रत्यक्षा सिंहा संवेदनायें मील का पत्थर हैं


ज्योति सिंह इब्ने मरियम: इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ


अवध बिहारी पाठक इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज़


संजय श्रीवास्तव मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है


हसन जमाल खुदा की वापसी: मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी


प्रताप दीक्षित बुतखाना: नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की कथा यात्रा का पहला पड़ाव


वीरेन्द्र मोहन मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल


रोहिताश्व रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता


मूलचंद सोनकर अफ़गानिस्तान: बुजकशी का मैदान- एक


महा देश की अभिशप्त गाथा


रामकली सराफ स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वरः औरत के लिए औरत


इकरार अहमद राष्ट्रीय एकता का यथार्थ: राष्ट्र और मुसलमान


सिद्धेश्वर सिंह इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात


आलोक सिंह नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम


मेराज अहमद नासिरा शर्मा का बाल साहित्य: परिचयात्मक फलक


बातचीत


नासिरा शर्मा से मेराज अहमद और फ़ीरोज़ अहमद की बातचीत


नासिरा शर्मा से प्रेमकुमार की बातचीत


Sunday, October 24, 2010

vangmaypatrika.blogspot

धर्म की वैदिक अवधारणा

अंजुम फात्मा



‘धर्म’ इस शब्द की आयु ऋग्वेद से लेकर आजतक लगभग चार हज़ार वर्षों की है। प्रथमतः ऋग्वेद में इसका दर्शन एक नवजात शिशु के समान होता है जो अस्तित्त्व में आने के लिये हाथ-पैर फैलाता जान पड़ता है। वहाँ यह ‘ऋत्’ के रूप में दृष्टिगत होता है जो सृष्टि के अखण्ड देशकालव्यापी नियमों हेतु प्रयुक्त हुआ।

वैदिक मन्त्रों का वर्गीकरण चार संहिताओं में करने वाले वेदव्यास के अनुसार प्रकृति के साथ-साथ व्यक्ति, राष्ट्र एवं लोक-परलोक सबको धारण करने का शाश्वत् नियम ‘धर्म’ है- धारणाद्धर्म इत्याहुधर्मों धारयते प्रजाः। /यतस्याद्धारण संयुक्तं स धर्म इति निश्चयः।।१

वैदिक ऋषियों से लेकर वेदव्यास जैसे महाभारतकार एवं चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ भी मानव की उन्नति एवं समाज की सम्यक्गति का कारण धर्म को ही मानते हैं। धर्म२ शब्द ‘धृ’ धातु (ध×ा् धारणे) से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। धर्म सम्पूर्ण जगत् को धारण करता है, सबका पालन-पोषण करता है और सबको अवलम्बन देता है इसलिये सम्पूर्ण जगत् एकमात्रा धर्म के ही बल पर सुस्थिर है। ‘धृ’ धातु से बने धर्म का अर्थ वृष भी है-‘वर्षति अभीष्टान् कामान् इति वृषः।’३ अर्थात् प्राणियों की सुख-शान्ति के लिए, उनके अभिलाषित पदार्थों की जो वृष्टि करे तो दूसरी ओर धर्म का नाम ‘पुण्य’ भी है-‘पुनाति इति पुण्यम्’ यानि जो प्राणियों के मन-बुद्धि-इन्द्रियों एवं कर्म को पवित्रा कर दे। मनु के अनुसार धर्म के दस लक्षण है-धृतिक्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिनिन्द्रिय निग्रहः।/धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।४

आर्य धर्म के मूलाधार वेद, धर्म के प्रमाण स्वरूप सर्वोपरि है। भारतीय आस्तिक दर्शनों ने वेद की प्रामाणिकता स्वीकारी है। धर्मसूत्रों में जहाँ बौधायन५ वेद के पारायण को पवित्राीकरण साधन मानते हैं वहीं आपस्तंब६ के अनुसार धर्म एवं अधर्म का नीरक्षीर विवेक, वेद से ही प्राप्त होता है। धर्मसूत्रा, वेद को धर्म का मूल स्वीकारते हुए उसकी अलौकिक पावनकत्र्तृशक्ति के प्रति आस्थावान भी हैं।

ऋग्वेद संहिता भारतीय धर्म का प्राचीनतम एवं महत्त्वपूर्ण आधार है। ऋग्वेद का धर्म अनेक देवों की पूजा से सम्बन्ध रखता है।७ ऋग्वेद में हमें स्तुतिपरक मंत्रों के दर्शन होते हैं, जिनमें मैक्समूलर का हेनोथीज़्म है,८ जगत् सृष्टा के रूप में परमपुरुष की कल्पना का प्रतीक एकेश्वरवाद भी है एवं सर्वदेवतावाद९ या पैनथीज़्म भी है पर अन्ततः ‘‘एकं सद्धिप्राः बहुधा वदन्ति’’ कहकर ऋषि अद्वैतवाद का प्रतिपादन करते हैं। ऋग्वेद में देवताओं का अनिश्वर रूप में वर्णन है एवं उनके सामथ्र्य को प्रतिपादित करने वाले तीन रूप कहे गये हैं जो क्रमशः आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक है। ऋग्वेद में ‘ऋत’ एक कारण सत्ता का प्रतीक है एवं यह सत्ता सत्यभूत ब्रह्म है। विभिन्न देवता इसी मूलकारण के प्रतिनिधि स्वरूप कार्यरत हैं चाहे वह वृतहंता इन्द्र हों या

धृतव्रत वरूण या हव्यवाहन अग्नि अथवा प्राचीन होकर भी नित्य नवीन रूप में प्रकट होने वाली उषा हो। कुछ भावनात्मक देवताओं की भी कल्पना की गई है। एक सूक्त में ‘श्रद्धा’ व दो सूक्तों में ‘मन्यु’ का भी उल्लेख है। ऋग्वैदिक देवताओं का विकास बाह्य एवं अंतस् दो स्वरूपों में हुआ। आरम्भ में आर्यगण आकाश, पृथ्वी, वृष्टि आदि से आश्चर्य चकित थे, अतएव उन्हीं प्राकृतिक शक्तियों को देवता स्वीकार लिया ताकि उन देवताओं की कुदृष्टि से बचे रहें। बाह्य शक्तियों के साथ-साथ अंतस् शक्तियाँ भी मनुष्य को प्रभावित करती थी। बुद्धि ही ऐसी अंतस् शक्ति थी जो मनुष्य को उचितानुचित का दिग्दर्शन कराती थी अतएव यह सरस्वती रूप में पूजित हुई।10॰ आर्यांे ने देवताओं को मानवरूप में स्वीकार कर उनके मानवीकरण की संयोजना की। साधारणता मानवों की तुलना में देवतागण अवगुणरहित एवं अपार शक्ति सम्पन्न थे, पर ऋत के नियम उनके लिये भी अलंध्य थे।११

यजुर्वेद तथा ऋग्वेद के उपासनान्तर्गत धार्मिक स्वरूप में कोई भी मौलिक अन्तर नहीं हैं। देवसमूह अधिकांशतः वही हैं पर देवताओं की प्रकृति में कुछ अवान्तर परिवर्तन देखे जा सकते हैं। यथा-ऋग्वेद का प्रजापति यजुर्वेद का मुख्य देवता बन जाता है।



शेष भाग पत्रिका में..............



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