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Monday, January 19, 2009

नारेबाजी से कविता कमजोर होती है : डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया



डॉ. राजेश कुमार
आपकी पहली प्रकाशित कविता कौन-सी है?

मेरी पहली प्रकाशित कविता शोणित के नाले है। यह कविता ४३-४४ में हंस में प्रकाशित हुई। इस कविता में मेरे कवि-व्यक्तित्व की व्यंजना है। मेरे प्रथम कविता-संग्रह बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ में यह कविता है। प्रगतिशील आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने मेरी इस कविता की जमकर प्रशंसा की है।
आपकी शोणित के नाले' कविता में दुर्धर्ष अपराजेयता, बीमारी से लड़ने का भाव तथा मानवता का विचार-बोध निहित है। सुना जाता है कि यह कविता आपने बीमारी के दौरान ही लिखी थी। क्या इस कविता को आपके संस्कार-वृक्ष की बीज कविता कहा जा सकता है।
हाँ, आपने एकदम ठीक सोचा है। जरा कविता सुनिए -
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले।
क्यों मेरे ही दरवाजे पर रोगों ने डेरे डाले?
मन ने तन से कहा, साथ दो, पर पाया कोरा उत्तर।
हुए तटस्थ कुटुम्बी साथी कुछ आतंकित-से होकर॥
किन्तु न वे कायर सब मुझको हतोत्साह करने वाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
युग से पिछड़े हुए हितैषी सड़ी सीख देने आते।
मैं अपनी रस्सियाँ तोड़ता, वे अपनी ताने जाते।
वे न साथ मेरा दे सकते, मैं भी खूब समझता हूँ।
चलता अपने पाँव, नियति का टूटा यान न चढ़ता हूँ।
तोल लिया मैंने अपना बल, देखूँ फौलादी ताले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
डट कर लड़ने की शिक्षा ही मिली दूध में माता के।
फिर मैं क्यों परवाह करूँ, क्या अक्षर किसी विधाता के?
मानव का लोहू बहता है मेरी स्फीत शिराओं में।
है प्रहार करने की ताकत अब भी सुदृढ़ भुजाओ में।
शीघ्र समझ लेंगी बाधाएँ पड़ीं कि वे किसके पाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
धरती किसकी, मानव की या दानव की? होता निर्णय।
उसमें मेरा कितना हिस्सा, इसका भी मुझको निश्चय।
इसीलिए मैं आज मौत का पंजा भी मरोड़ दूँगा।
इस्पाती मुक्के से बीमारी की कमर तोड़ दूँगा।
युग-हलचल से देखू मुझको कौन दूर रखने वाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
यह कविता मेरे संस्कारों की बीज कविता ही है। इसमें दुनिया को बेहतर बनाने का माद्दा मिलता है। मेरी यह विचारधारा बाद में कविता-संग्रहों में भी पाई जाती है। इस कविता में तीन प्रमुख बातों पर ध्यान है। पहली बात है- दुनिया के भविष्य की चिन्ता, दूसरी बात है-अपने स्वास्थ्य की चिन्ता तथा तीसरी बात है-युगीन अंधजड़ता के प्रति प्रतिवाद तथा विद्रोह का भाव। मुझे क्रॉनिक मलेरिया था। उन दिनों यह बहुत खतरनाक था, मैं रजाई ओढ़े हुए काँप रहा था। मेरे पिताजी मेरे ऊपर लेटे हुए थे। मैं तब इन पंक्तियों को बुदबुदा रहा था-
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले।
क्यों मेरे ही दरवाजे पर रोगों ने डेरे डाले?

आपके कविता-संग्रह ÷बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ में गाँधी-जिन्ना मिलन पर एक कविता है-देश के दो हाथ मिलकर। गाँधी-जिन्ना मिलन की असफलता पर आप क्या कहेंगे।
जिन्ना की जड़ता तथा हठधर्मिता के कारण यह वार्ता परिणाम हीन रही। एकता स्थापित करने के लिए जितना उद्योग गाँधी कर सकते थे, उन्होंने किया। लेकिन जिन्ना अपनी जिद पर अड़े रहे। अंततः बातचीत बेनतीजा रही।

आपकी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना है। मेरे विचार से राजनैतिक पूर्वग्रहों से कविता की शक्ति कमजोर होती है। इस सम्बन्ध में आपका क्या अभिमत है।

आपका कथन लगभग सही है। आज के जीवन में राजनीति का स्थान बन गया है। आज की राजनीति जीवन परक है। कविताओं में राजनैतिक चेतना नहीं होनी चाहिए। नारेबाजी से कविता कमजोर होती है। प्रगतिशील कविता में जहाँ नारेबाजी है, वहाँ संवेदनात्मकता का अभाव है। सांस्कृतिक चेतना के अभ्युदय से कविता प्राणवान्‌ होती है। मेरी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना होने से कविता की शक्ति कमजोर हुई है। बाद में मैं किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त हो गया हूँ। मैंने कोशिश की है कि कविता नारेबाजी से बचे। लाल सेना की नारेबाजी से बचकर साहित्य लिखा जाता, तो बेहतर होता। त्रिलोचन की कविताएँ इस दृष्टि से बेजोड़ हैं। वे भारतीय जन-संदर्भों से कविता ऊँचाई पर ले जाते हैं।

१९६५ के भारत-पाक युद्ध के संदर्भ में सूली और शांति आपका लोकप्रिय काव्य-ग्रन्थ है। इस काव्य-ग्रन्थ में कश्मीर के प्राकृतिक सौन्दर्य का जैसा चित्रण है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें युद्ध का वर्णन भी अद्भुत है। इस ग्रन्थ के बारे में आपकी क्या राय है।

सूली और शांति भावदशा और मनोदशा की अच्छी कृति है। कश्मीर-सुषमा की प्रशंसा रामविलास जी ने भी की है। १९५९ के आस पास कश्मीर में एक भ्रमणकारी दल के साथ गया। भ्रमणकारी योजना केन्द्र की थी। इसमें करीब सौ लोग गए थे। डलझील के किनारे निशातबाग था। इसमें हम ठहरे थे। सुबह बसों में निकल जाते थे, रात को आते थे। इसलिए इस वर्णन में इतना यथार्थ है। चेकोस्लोवाकिया का एक युवा भी यहीं मिल गया। वह हिन्दी-प्रेमी भी था। युद्ध का वर्णन रेडियो सुनने तथा समाचार-पत्र पढ़ने के आधार पर है। लोगों ने इसे सराहा है।
डाक्टर साहब, क्या आप अपनी साहित्यिक उपलब्धियों से परितुष्ट हैं।

अगर मुझे चार-पाँच वर्ष और मिल जाएँ, तो साहित्य के लिए कुछ विशिष्ट दे सकूँगा। एटा में रहने के कारण वह नहीं दे सका, जो मुझे देना चाहिए था। साहित्यिक क्षेत्र में दो चीजें बाधक बनीं-छोटी जगह, प्रधानाचार्य का पद। मैं अविनाशी सहाय आर्य इण्टर कालेज, एटा का प्रधानाचार्य रहा। यह स्कूल आर.एस.एस. का था। यहाँ दक्षिणपंथी लोग (आर.एस.एस. के लोग) ज्यादा थे। इन लोगों ने साहित्य में बाधा पहुँचाई। मुझे कालेज के प्रबन्धक परेशान करते रहे। मैं ईमानदार था। कोई मेरा बाल बाँका नहीं कर सका। आजकल संपाति-चिन्ता नामक प्रबन्ध-काव्य लिख रहा हूँ। यदि पूरा कर सका, तो ठीक होगा। इसमें मैंने राम के अन्तर-विरोधों को उजागर किया है। मैं संपाति पक्षी प्रकट करता हूँ। वह राम से अन्तर-विरोधों के प्रश्न करता है। राम निरुत्तर भाव से जल समाधि लेते हैं।

आप अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति किसे मानते हैं?

यह बता पाना थोड़ा मुश्किल है। बात की चिड़िया से मैं संतुष्ट हूँ। इसमें बौद्धिक चिन्तन है। यह मुक्त छन्द का संग्रह है। इसमें मेरी विचारधारा का विस्तार है। वैसे अभी हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक कृति बेहतर दुनिया के लिए संघर्षों के सहयात्री लिखकर मुझे सर्वाधिक प्रसन्नता है।

डाक्टर साहब, संस्मरणात्मक लेखन में किन-किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए?
सफल संस्मरण में अपने को सामने नहीं रखना चाहिए। होता क्या है, लोग स्वयं को हाइलाइट करते हैं। मैंने स्वयं को हाइलाइट नहीं किया। संस्मरण जिसके बारे में लिखा जा रहा है, उसी को हाइलाइट किया। किसी भी प्रकार की कुण्ठा को संस्मरण में स्थान नहीं देना चाहिए। संस्मरण में आरोपण की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

डाक्टर साहब, १९४२ के क्विट इण्डिया मूवमेन्ट में आपकी सक्रियता रही है। यद्यपि उस काल में आप बी.ए. के विद्यार्थी रहे, फिर भी आपने अपना योगदान किया है। इस बारे में आप बताइए।
मैं आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन से सम्बद्ध था। यू.पी. ब्रान्च में कार्य करता था। इसका उद्देश्य आजादी के लिए छात्रों को प्रेरित करना था। शिवदान सिंह चौहान भी इसमें थे। प्रगतिशील विचारों को प्रसारित करना भी हमारा ध्येय था। जब बम्बई (आजकल मुम्बई) में भारत छोड़ो आन्दोलन का नारा देने वाले कांग्रेस के सब नेता गिरफ्तार किए गए, तब आगरे में विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला। मैं सेन्ट जोन्स कालेज, आगरा में बी.ए. का छात्रथा। थाना हरीपर्वत पर एस०पी० ने जुलूस को तितर-बितर करना चाहा। मैं नेतृत्व कर रहा था। शाम चार बजे से लेकर रात सात बजे तक पुलिस से पथराव हुआ। दूसरे दिन मेरी गिरफ्तारी का वारण्ट जारी हुआ।

आज की आलोचना-पद्धति पर आपकी क्या राय है। आपकी दृष्टि में हिन्दी में सफल आलोचक कौन हैं?

आज की आलोचनात्मक-पद्धति वैयक्तिक ज्यादा है, साहित्यिक और सैद्धान्तिक उतनी नहीं है। आज की आलोचनात्मक पद्धति उतना प्रभावित नहीं करती है, जितना करना चाहिए। आलोचक या तो स्वयं को हावी कर देता है या आलोच्य को। आलोचना संतुलित होनी चाहिए। हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सबसे सफल आलोचक हैं। उनके बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम भी आदरणीय है। रामविलास जी की आलोचना में कहीं-कहीं वैयक्तिकता है। उनकी सीमाएँ हैं। वे जिससे खुश हों, उसे आसमान पर बिठा देते हैं, जिससे नाराज हों, उसे हीनमान बताते हैं। इसके बावजूद उनकी आलोचना ठीक है। कुछ लोगों ने रामविलास जी की आलोचना से असहमति तो जताई है, लेकिन उनकी मान्यताओं का सप्रमाण खण्डन नहीं किया है।

आपको कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं?

मुझे दो पुरस्कार मिले हैं। बाद में साहित्यिक राजनीतिक का शिकार रहा। सूली और शांति पर उत्तर-प्रदेश हिन्दी समिति का पुरस्कार ६८-६९ में मिला। १९७५-७६ में दीवारों के पार पर बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार मिला। हमारे देश में पुरस्कार भी राजनीति से प्रेरित हैं। मेरी किताबें भी देर से प्रकाशित हुईं। राजनीति भी बदल चुकी थी।

आप किन-किन कवियों से प्रभावित रहे हैं?

मैं आरम्भ में मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत से प्रभावित रहा हूँ। राष्ट्रीयता के मामले में एक सीमा तक दिनकर से भी प्रभावित हूँ। बाद में निराला का प्रभाव मुझ पर है। रचनात्मक प्रवेग मेरा अपने आपका है।

डाक्टर साहब, १९४३ ई. के तार सप्तक के प्रकाशन के बाद अज्ञेय एक नायक के रूप में सामने आते हैं। क्या तथाकथित प्रयोगवाद ने प्रगतिशील हिन्दी-कविता को क्षति पहुँचाई है।
कुछ समय तक अज्ञेय के व्यक्तित्व ने प्रगतिशील हिन्दी-कविता को आच्छादित किया। थोड़े समय तक क्षति भी हुई। लेकिन बाद में हिन्दी-कविता इससे उबर गयी।

कुछ पुराने कम्युनिस्टों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की निन्दा की है। मेरे विचार से नेताजी की देश-भक्ति को प्रश्नचिद्दित नहीं किया जा सकता। नेताजी के बारे में आपकी क्या अवधारणा है।
मैंने १९३९ में नेताजी का फारवर्ड ब्लॉक ज्वाइन किया। मैं इटावा में उपाध्यक्ष भी था। इटावा रेलवे स्टेशन पर मैं उनसे मिला। वे दिल्ली से इलाहाबाद जा रहे थे। वे बहुत आशावादी थे। नेताजी अग्रगामी दल को मजबूत करने पर बल दे रहे थे। उन्होंने कहा-हम अंग्रेजों को तबाह कर देंगे। उनका तबाह शब्द मुझे आज भी याद है। नेताजी सोवियत संघ से ही मदद लेना चाहते थे। लेकिन विश्व की तत्कालीन परिस्थितियों के कारण उन्हें जापान-जर्मनी का आश्रय लेना पड़ा। तब से मैं विचारों में अन्तर मानने लगा। वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी मौत विमान-दुर्घटना में नहीं हुई। वे एटा में रिजोर रियासत में साढे तीन वर्ष संन्यासी के रूप में रहे। वह कई भाषाएँ जानते थे, अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते थे। वह ३०-४० बाल्टियों से नहाते थे। शॉलमारी आश्रम इन्होंने स्थापित किया। जब मैं यहाँ आया, वे रिजोर से जा चुके थे। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभिसीतारमैया को गाँधी जी ने खड़ा किया। बोस स्वंय खड़े हुए। बोस जीते। गाँधी ने स्वयं स्वीकार किया कि यह उनकी हार है। बाद मे बोस ने स्वयं इस्तीफा दे दिया। गाँधी जी के प्रति उनके मन में आदर-भाव तो था, लेकिन वे उनकी नीतियों में विश्वास नहीं रखते थे। समाजवादी विचारधारा नेहरू की ज्यादा थी। विचारधारा में सुभाष नम्बर दो पर थे। लेकिन राष्ट्र के प्रति मर मिटने का भाव सुभाष में सबसे ज्यादा था। उन दिनों सुभाष की लोकप्रियता शिखर पर थी। गाँधी, नेहरू, सुभाष से पीछे थे - लोकप्रियता में। उस समय की नीतियों के कारण नेताजी ने स्वयं को गुप्त रखा।
अभी हाल ही में वन्देमातरम्‌ के गायन को लेकर देश में उठा-पटक हुई है। आप भारतवासियों को इस संबंध में क्या कहेंगे।

इसको लेकर दोनों वर्गों को समझदारी से काम लेना चाहिए। इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ को अतिवादिता की हद तक खींचने की कोशिश की गई है। मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है। मैंने हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद नहीं रखा है

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Sunday, January 18, 2009

मैं कहता आँखिन देखी... : काशीनाथ सिंह

प्रो. रामकली सराफ
आपका ग्रामीण जीवन से गहरा सरोकार रहा है, आपके कहानी लेखन में इसकी क्या भूमिका रही है?

ऐसा है कि मैं गाँव में पैदा हुआ, वहीं पला बढ़ा, खेला-कूदा, खेती में भी साथ देता रहा। कटाई हो, दँवरी हो ये सब कुछ मैंने किया। हाईस्कूल तक गाँव में पढ़ा। उसके बाद इंटरमीडिएट में मैं शहर आया और फिर शहर में ही सारी पढ़ाई लिखायी हुई और वो भी बनारस में। लिखना तो शुरू कर दिया था बी.ए. में मामूली कविताएँ लिखता था जिसका कोई मतलब नहीं था। सन्‌ १९६० ई. के आसपास विधिवत्‌ लिखना शुरू किया।

कविता जब आप लिख रहे थे शुरू में, तो अचानक ये कैसे मोड़ आ गया कि कहानी लिखने लगे?

इसलिए कि मेरे भाई साहब (डॉ. नामवर सिंह) स्तम्भ लिख रहे थे कहानी पत्रिका के लिए और ज्यादातर घर में कहानियों पर बात होती थी। तो कहानी पत्रिका की कहानियों को पढ़ता था और उन कहानियों को पढ़ता था जिनकी तारीफ करते थे भाई साहब। खासतौर से रूसी कहानियाँ, हेमिंग्वे की कहानियाँ, मंटो की कहानियाँ तो इन्हें पढ़ता था तो कहानी की तरफ धीरे-धीरे मुड़ने लगा और कहानी लिखना शुरू किया सन्‌ ६० के बाद से। तो जो पात्र हमारे आते थे, जो जीवन होता था वो गाँव का ही होता था। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं उस आदमी के बारे में लिख रहा हूँ जो गाँव को छोड़ चुका है, लेकिन शहर में रहते हुए शहर का नहीं हो पा रहा है। सन्‌ ६० के आस-पास की स्थितियाँ ऐसी ही थीं भी। मेरी शुरुआत की कहानियों में इस तरह का एक आदमी था।
नयी कहानी का दौर और उसके समाप्ति पर आपने लिखना शुरू किया। लेकिन उस प्रभाव से जो अपने को अलग किया लेकिन मुख्य बात यह है कि उस पूरे प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए कैसे इतना बड़ा परिवर्तन आपके लेखन में आया? क्या बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं इसके मूल में?
देखिए, लगभग ऐसा समय तो शीतयुद्ध का था, कांग्रेसी हुकूमत थी। जनता का मोहभंग हो गया था... ढेर सारी योजनाएँ चालू की गयी थीं और योजनाएँ या तो अधूरी थीं या जैसे बाँध बन रहा था, बने बाँध लेकिन बारिश हो तो बाँध बह जाय। सड़कें टूट जाएं, विकास जैसे होना चाहिए था वैसे नहीं हो रहा था। तो लग रहा था कि यह सत्ता इस लोकतंत्र में जनता के लिए जो काम कर रही है वह काम संतोषजनक नहीं है और इस पर मुहर लगाने का काम किया जनता ने। पूरी तरह से भारत प्रभावित हुआ था। इस परिवर्तन ने हमारी भाषा को भी प्रभावित किया और हमारे कंटेंट को भी।

आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आज जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगड़ा भारी पांडे कौन कुमति तोहे लागि... आदि में जो गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ, वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।

आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं? (संदर्भ-संतों घर में झगड़ा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागि, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं? व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। २०-२५ वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। ९० के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन्‌ १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और...। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इसमें महिलाएँ भी थीं और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मुहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुतः यह है एक मुहल्ला, लेकिन है नहीं मुहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीना महिला जो बनारस पर शोध कर रही है, बनारस के प्रति क्या धारणा है? वह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मुहल्ला मानकर न देखा जाय।

बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, ईसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा.

डॉ. साहब आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हें खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?

जी, साहस किया था उसे लेकर...। प्रेमचंद ने अपनी कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल... (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नहीं किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ,... डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतो-असंतो घोंघा बसंतो हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतो घर में झगड़ा भारी हो... सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन... धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्त्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है जया सिंह, दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।

कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?

कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।

हाँ,... मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में पूछ रही थी।

सड़क के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।

एक बात खास यह लगती है कि दलित लेखन की भाषा पर भी अश्लीलता का आरोप लगा लेकिन वे अपने बचाव के लिए आपके पास क्यों नहीं लौटते हैं? क्यों नहीं कहते कि सवर्ण लेखकों ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया?

दलित लेखन एक आन्दोलन की तरह था - इनके पहले मैंने लिखा है, लेकिन दलित लेखन की भाषा पर हमसे कोई खास बात...। उन्होंने काफी बाद में शुरू किया लेकिन उनकी ओर से कोई तालमेल नहीं कोई सफाई नहीं...।

इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं - इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?

ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। वह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि हैं और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहा करता था।

आप डॉ. धर्मवीर के बारे में क्या कहेंगे जो धर्मवीर कबीर पर और कबीर के आलोचकों पर प्रहार कर रहे हैं?
धर्मवीर कबीर पर ही नहीं प्रेमचंद पर भी (सामंत का मुंशी) प्रहार करते हैं। मैंने पढ़ा नहीं उसे। धर्मवीर को अब उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, वे अनर्थ कर रहे हैं। चीजों को गलत इंटरप्रेट कर रहे हैं। सचमुच धर्मवीर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?

नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढ़ने और पढ़ाने की नहीं। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताजों में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।

महाकवि तुलसीदास में भी तो श्रवणीयता है वे केवल सनातनी और ब्राह्मणवादी ही नहीं थे। तो क्या भविष्य में तुलसीदास पर लिखने के लिए सोचा है आपने?

जी, नाटक लिखने की सोच रहा हूँ दस पन्द्रह वर्षों से। खासतौर से तुलसीदास जब अंतिम दिनों में बाहुशूल से पीड़ित हैं कोई देखने वाला नहीं है। तुलसीदास के उपेक्षित दिनों पर। जिस तरह से इस ब्राह्मण मुहल्ले ने उपेक्षित किया है उन्हें। वैसे इन विषयों पर लिखना इतिहास की ओर लौटना होगा और इतिहास की ओर लौटना एक तरह से भागना होता है। हमें वर्तमान पर लिखना चाहिए। वैसे जो भी नाटक आए जैसे- आषाढ़ का एक दिन हो अंधायुग हो कबिरा खड़ा बाजार में' हो सभी इतिहासाश्रित नाटक हैं। जबकि ऐसा मैं नहीं सोचता इसलिए हम वहाँ आश्रय नहीं चाहते हैं। इसलिए तुलसीदास पर मैंने नहीं लिखा।

संचारतंत्र और मीडिया, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद पर आप लगातार हमले कर रहे हैं। सच ही यह समय का यथार्थ है और यथार्थ की अभिव्यक्ति है लेकिन प्रारंभिक दौर में आपने जिस तरह काम किया है स्त्री-विमर्श पर। कहनी : उपखान में संग्रहित अनेक कहानियाँ इसकी गवाह हैं। अब जब पूरा दौर स्त्री-विमर्श को लेकर सक्रिय है आप मौन क्यों हैं? जबकि सातवें दशक में बड़े बेबाक तरीके से अभिव्यक्त कर रहे थे?
स्त्री-विमर्श पर बातें खूब हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, राजेन्द्र यादव के अनुसार दलित और स्त्री एक हैं। स्त्रियों का शोषण दलित भी अपने घरों में करते हैं। पुरुष वर्चस्व सभी जगह है। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वह लेखन ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, न स्त्रियों द्वारा और न पुरुषों द्वारा। खुद स्त्रीविमर्श पर बात करने वाले लोग अपनी बेटियों और पत्नियों पर दोहरे मानदंड अपनाते हैं, यह सोचने का विषय है।

लेकिन डॉ. साहब यहाँ हावी तो पुंसवादी दृष्टि ही रही है।

हाँ-हाँ, आप ठीक कह रही हैं।

डॉ. साहब, मार्क्सवाद के बारे में बताएँ? पहले आप इस जीवन दर्शन से प्रभावित रहे लेकिन अब ऐसा नहीं लगता कि आप उससे कुछ अलग हटे हैं। इसमें एक और बात कि स्त्री और दलित लेखन में मार्क्सवाद की भूमिका कितनी बनती है?

देखिए, मार्क्सवादी दृष्टि से हम अलग नहीं हैं। अब हम लोकतांत्रिाक हो गए हैं। मार्क्सवाद को हम व्यवहार में लाए और वही हमारे विचार में भी बदलाव लाया। अब मार्क्सवादी कट्टरता नहीं रही है हमारे भीतर। स्त्री, दलित मुद्दे पर मार्क्सवादी दृष्टि हमें बल देती है। दलित जीवन में वर्ण के साथ वर्गान्तरण हो रहा है और दलित लेखक आत्मबद्ध हो रहे हैं। वर्ण एक सामाजिक सच्चाई है लेकिन वर्ग को दरकिनार करके नहीं देखना चाहिए। अम्बेडकर और मार्क्सवाद दोनों मिलकर दलित लेखन को ताकत प्रदान करते हैं।

हाँ, यह तो सही है लेकिन डॉ. साहब आपने भी जाति केन्द्रित कहानियाँ लिखीं हैं, जिसमें जातीय समस्याओं को लेकर गंभीर विमर्श किया गया है, फिर भी इन कहानियों ने दलित लेखकों का ध्यान आकर्षित नहीं किया?

हाँ, जाति केन्द्रित कहानियाँ हैं चोट, सराय मोहन... जाति को ध्यान में रखकर ७१ में चोट लिखी जो आधार पत्रिका में प्रकाशित हुई। वे तीन घर कहानी सराय मोहन की' उन्हें दलित विमर्श की कहानी नहीं कह सकता, क्योंकि दलित विमर्श तब तक आया ही नहीं था। इसमें सवर्ण दृष्टि... यह लेखक की गलती है। चोट कहानी में दलित अन्तर्विरोध भी है - तीन घरों के बारे में टिप्पणी है इसमें। दलित स्त्री है अपने कामरेड मित्र से कहती है कि उन दलित घरों पर ध्यान मत दीजिए। कहानी सराय मोहन' में ठाकुर, ब्राह्मण, हरिजन हैं। हरिजन रोटियाँ बना रहा है और उसकी रोटियाँ सब खा जाते हैं। भूख के सामने जाति का कोई मतलब नहीं रह जाता। लेकिन जैसे ही पता चलता है कि वह दलित है ब्राह्मण तो पचा जाता है और ठाकुर कै कर देता है और उसकी लुटिया भी चुराकर पंडित जी चल देते हैं। जैसे वे तीन घर दलितों के भीतर के अंतर्विरोध को व्यक्त करती हुई कहानी है वैसे ही कहानी सराय मोहन में ब्राह्मण के प्रति उपहास का भाव है दलित का प्रतिकार है। पर कहानीकार ने स्वयं बताया कि ये दलित विमर्श की कहानियाँ नहीं हैं।

भले ही आप कहें, लेकिन दलितों ने उसकी नोटिस क्यों नहीं ली जबकि दलित टोन तो है?
कोई बात नहीं... उधर ध्यान जाना चाहिए था।

ठाकुर का कुआँ, सद्गति, कफन इस पर क्या कहेंगे? जबकि ये भी तो दलित विमर्श से पहले की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ बराबर उनके घेरे में हैं क्यों?

सारनाथ वाली गोष्ठी में मैंने कहा था प्रेमचंद बरगद हैं और हम लोग बरोह हैं, जो उसी की डाल से हम लोग निकले हुए हैं जिसकी जड़े जमीन में हो जाती हैं। प्रेमचंद आज भी अद्वितीय हैं। उनके सामने जातियाँ नहीं थी, पूरा देश था। जाति या दलित उसी स्वाधीनता आन्दोलन के अंग हैं।

आज के दलित लेखन को किस रूप में आप देखते हैं?

प्रेमचंद की दृष्टि गाँधीवादी थी और आज के दलित लेखन की दृष्टि अम्बेडकरवादी है। सुमनाक्षर ने रंगभूमि जलायी। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल पाल चौहान की सहमति है प्रेमचंद से। हाँ, असहमति है तो इसलिए कि प्रेमचंद लेखक हैं दलित नहीं। दलितों की पीड़ा केवल दलित ही लिख सकते हैं, जबकि साहित्य में ऐसा कोई अंकुश नहीं है। वे मानते हैं कि दलितों की समस्या पर अम्बेडकरवादी दृष्टि से विचार करें। लेकिन यदि कोई सवर्ण भी अम्बेडकरवादी दृष्टि से लिखे तो भी वे ऐसा नहीं मानेंगे। इसके लिए वे दलित होना आवश्यक मानते हैं। यह नजरिया एकांगी है।

आपने महत्त्वपूर्ण दलित लेखक सूरजपाल चौहान की संतप्त की भूमिका लिखी है। दो पृष्ठ की भूमिका पाठक को बाध्य कर देती है कृति से होकर गुजरने के लिए। डॉ. साहब एक बात बताना चाहेंगे कि सूरजपाल ने दलित पीड़ा को न सिर्फ बाहरी संघर्ष को अभिव्यक्त किया है अपितु दलित समाज के भीतर की संरचना को एकांकित किया है? दूसरे शब्दों में दलित अंतर्विरोधों का खुलासा किया है उन्होंने इस कृति में। हम देख भी रहे हैं। आज यह स्थिति दलित लेखन में तेजी से घर कर रही है। दो हिस्सों में बँटा दलित लेखन कहीं अपने उत्स तक पहुँचने के पहले चूक तो नहीं रहा है?

मैं ऐसा नहीं मानता। कहानियाँ उतनी अच्छी नहीं लगीं आत्मकथा के बनिस्बत। आत्मकथाएँ मुझे बेहद पसंद हैं। अंतर्विरोध आन्दोलन को अंततः मजबूत करता है। यह एक डेमोक्रेटिक प्रोसेस' है। इससे आन्दोलन मजबूत होगा। मैं देखता हूँ प्रगतिशील आन्दोलन को, शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द गुप्त, अमृत राय, यशपाल एक ही आन्दोलन में थे। लेकिन इनके विचार विरोधी थे और आन्दोलन प्रभावित हुआ, प्रगतिशील लेखन खत्म हुआ। दलित आन्दोलन का भी ऐसा हो सकता है। लेकिन विचारधाराओं में टकराव से जो स्थिति आएगी उसमें से लेखन की एक उर्वर भूमि बनेगी। विघटन के बीच से जो चीज आएगी उसमें एक ताजगी एक नयी ऊर्जा मिलेगी।

हाँ, यह भी एक संभावना बनती है। लेकिन क्या दलित लेखन में खासतौर पर आत्मकथाएँ एक रस नहीं हो रही हैं?

हाँ-हाँ, जो आन्दोलन हुआ था अफ्रीका में ब्लैक लिटरेचर का वह थम गया। आज दलित आन्दोलन की आवाज भी मद्धिम हो रही है। कंट्राडिक्शन का आना शुभ है यहाँ से ऊर्जा मिलेगी। दूसरी बात सभी एक ही दिशा में सोचेंगे-लिखेंगे तो आन्दोलन का क्या होगा?

फिर भी डॉ. साहब आन्दोलन की धार मद्धिम पड़ी है?
हाँ, ऐसा हो रहा है।

दलित लेखन में स्त्रीलेखन की कमी आपको परेशान करती है? मान लीजिए कि विमला चौहान भी अपने सच को लिखें तो कहीं सच का दूसरा रूप तो उभरकर सामने नहीं आयेगा? क्योंकि शुरू से ही सब कुछ का बहुत हद तक एहसास करते हुए सूरजपाल मूक क्यों बने रहे? उनका लेखन तो काफी बोल्ड है। लेकिन इसके मूल में वजह क्या है? उनमें भी कोई कमी तो नहीं है? लेखन में इतनी प्रखरता साफ दृष्टि और जीवन में इतनी चुप्पी?

विमला चौहान का प्रसंग पढ़ा था भूमिका लिखते समय, उस समय मेरी स्थिति थी कि एक तरफ तो सूरजपाल के सामने सिर झुक रहा था और क्रोध भी आ रहा था कि रोका क्यों नहीं? सूरजपाल की कौन-सी मजबूरियाँ थी? सूरजपाल ने क्यों नहीं रोका क्यों चुप थे? विमला आगे बढ़ती जा रही थी। (क्षणभर चुप रहकर) यह तो विमला ही बता सकती हैं।
दलित लेखन में स्त्रियों को लेकर उनकी समस्याओं को लेकर लेखक चुप हैं, लेखन के क्षेत्र में दलित स्त्रिायाँ भी आगे नहीं आ रही हैं। जबकि मराठी में कुछ दलित स्त्रियों ने बड़ी शिद्दत से अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं?

देखिए, मैं तस्लीमा को पढ़ता हूँ भारतीय लेखिकाओं को पढ़ता हूँ। अब लेखन कम हो रहा है, विमर्श ज्यादा हो रहा है। यहाँ वह तेजस्विता नहीं है। स्त्रीविमर्श का मतलब हिन्दी के लेखक के लिए देहमुक्ति है।

जी डाक्टर साहब, कुछ लेखकों के लिए हो सकता है, पर स्त्रीविमर्श यहीं तक सिमटा हुआ नहीं है। स्थितियाँ तो विपरीत हैं, एक साथ स्त्री पर भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद मिलकर हमला कर रहे हैं, स्त्री आन्दोलन आज भी साहित्य के धरातल पर ही ज्यादा दीख रहा है। सामाजिक धरातल पर बहुत कम, तो ऐसे में किस प्रकार यह सामाजिक धरातल पर आएगा क्योंकि स्त्रीआन्दोलन और स्त्री साहित्य अस्मत और अस्मिता का साहित्य है?

देखिए, जो हजारों साल से हमारे संस्कार बने हैं, उसे न तो पुरुष लेखक तोड़ रहे हैं और न स्त्रियाँ। स्त्रियाँ तो तोड़ रही हैं बहुत हद तक पुरुष लेखक नहीं तोड़ पा रहे हैं। उनकी फ्यूडल मानसिकता स्त्री शोषण से बाज नहीं आ रही है।

वर्तमान कथा लेखन पर आपकी क्या टिप्पणी है?
संभावनाओं से भरा अच्छा लेखन हो रहा है। हाँ, युवा लेखकों में प्रसिद्धि पाने की बेचैनी है जो घातक है उनके लिए।

पहले लेखन में जो प्रतिरोधी स्वर था जो धार थी, वह धार आज के लेखन में क्या कम हुई है?
(थोड़ा गंभीर होकर) इसे पॉजिटिव ढंग से लेना चाहिए। ये कम अधिक होते रहते हैं। आज के युवा लेखकों में कम लिखकर प्रसिद्धि पाने का जो उतावलापन है, उसी बाजारवाद के कारण है। बाजारवाद के विरोध में लिखते भी हैं और उसी से स्वीकृति भी पाना चाहते हैं। धार तो कमजोर हुई ही है।

अपना रास्ता लो बाबा' में एक छटपटाहट है उस युवक के मन में। उसे लगता है कि उसके अंदर जो लगाव है वह टूटेगा तो कोई बड़ी चीज बिखर जायेगी। लेकिन आज सम्बन्धों के भीतर वह गहराई नहीं रह गयी है, वह उष्मा भी नहीं बची है। उससे रिक्त हो रहा है युवा लेखन। कहीं अपनी आत्मबद्धता के कारण है। इसे पीढ़ियों का गैप ही कहा जा सकता है? इनका लेखन आपको चुनौती नहीं दे पा रहा है। आपको इरीलिवेन्ट साबित नहीं कर पा रहा है। यही कारण है कि आज भी पाठक आपके लेखन को बड़ी शिद्दत के साथ पसंद कर रहे हैं।

इस टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद दे रहा हूँ। आप बहुत सही कह रही हैं। हाँ, यह पीढ़ी हमें हाशिए पर नहीं डाल पा रही है, जबकि इनसे पहले की पीढ़ी में एक ऊर्जा थी, चुनौती थी।
क्या व्यवस्था के साथ उनकी सहमतियाँ ज्यादा बन रही है?

हाँ, ऐसा है। लिखने के साथ जितना श्रम किया जाना चाहिए उतना श्रम नहीं कर रहे हैं। साथ ही लेखक का जो संबंध जनजीवन से होना चाहिए, लोक जीवन से होना चाहिए, अब ऐसा कम है।

सही है जब सुरेश कांटक, अखिलेश, उदय प्रकाश, सृंजय, देवेन्द्र आदि लिख रहे हैं तो उनमें तो एक धार है, कथा लेखन में एक ऊँचाई है।
आपसे मैं सहमत हूँ।

लेकिन आज?

आज निश्चित ही वह बात नहीं रह गयी है जो व्यवस्था को चुनौती दे सके या पाठक को व्यग्र और बेचैन बना सके और उद्वेलित कर सके।

वैसे आज आपको कथा लेखन के क्षेत्र में कौन से नये लेखक आकृष्ट कर रहे हैं?

चंदन पाण्डेय, कुणाल सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार मिश्र अच्छा लिख रहे हैं। इनके भीतर वह बेचैनी नहीं है जिसे हम लोग महसूस कर रहे हैं अपने लेखन के दौरान। चंदन पांडेय की दो कहानियाँ तो ठीक आयीं लेकिन तीसरी कहानी ऐसी लिखी जिस पर हम उम्मीद रखें या न रखें। देखिए न, आज ही एक लड़के ने फोन किया और कहा कि यह पुरस्कार मुझे मिल जाता तो ठीक रहता। स्वयं के लिए कहा था।


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Friday, January 16, 2009

हर इंसान के अन्दर साहित्यकार छिपा होता हैः प्रो. जमाल अहमद

डॉ. मेराज अहमद एवं डॉ. फ़ीरोज अहमद
डाक्टर साहब, संक्षेप में पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए?


जन्म फैजाबाद (वर्तमान में अम्बेडकर नगर) जिले में स्थित एक गाँव के संभ्रान्त परिवार में हुआ। खेती बाड़ी थी लेकिन की नहीं, करायी जाती थी। परिवार में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। अधिकांश लोग शिक्षक थे। एक चचा ने वकालत शुरू कर दी थी। हाईस्कूल गाँव से करके गर्वमेन्ट कालेज फैजाबाद से इंटरमीडिएट किया। इसी बीच मेरे बड़े भाई अलीगढ़ में पढ़ने आ गये थे। मैं इंटर के बाद इलाहाबाद जाने के लिए तैयार था, लेकिन बड़े भाई ने अलीगढ़ की ऐसी तस्वीर खींची कि मैंने इलाहाबाद के बजाए अलीगढ़ आ गया। बी.ए., एम.ए. यहीं से किया। शोध के लिए दिल्ली के स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स में गया ही था कि मेरी नियुक्ति आगरा विश्वविद्यालय के एक कालेज में हो गयी। थोड़े दिन के बाद मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आ गया। तब से यहीं हूँ।

अपने अध्ययन काल में क्या कभी आपका विषय के रूप में साहित्य से सम्बन्ध रहा है?

नहीं, हाईस्कूल और इंटर में हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी विषय के रूप में जरूर पढ़ा लेकिन बाद में छूट गया। हाँ! साहित्य से दिलचस्पी जरूर रही। परिवार से थोड़े-बहुत साहित्यिक संस्कार मिले। शुरुआती दिनों में प्रेमचन्द के उपन्यास, कहानियों ने भी साहित्य में रुचि बढ़ायी लेकिन साहित्य से मेरा कोई प्रोफेशनल सम्बन्ध नहीं था इसलिए जो अच्छा लगा वही पढ़ा। यही कारण है कि साहित्य का मेरा ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है।

फिर भी दिलचस्पी के लिए ही सही, साहित्य आपने पढ़ा ही, तो निश्चित रूप से कुछ न कुछ उसकी समझ आपके मन में बनी ही होगी। विशुद्ध रूप से आपके अपने दृष्टिकोण से साहित्य क्या है?

यकीनन बनी ही नहीं मुझे लगता है कि साफ भी है। एक खास बात यहाँ यह जरूर है कि जब मैंने समाजशास्त्र पढ़ा तब यह दृष्टि साफ हुई। साहित्य अपने समाज को निरूपित करता है और उससे प्रभावित भी होता है। मध्ययुगीन समाज को लेकर लिखे गये साहित्य में उस युग की बड़ी साफ झलक दिखाई पड़ती है और आधुनिक युग का परिवर्तन भी साहित्य में साफ-साफ दिखाई देता है। परिवर्तन सभी विधाओं में दिखाई देता है। मैं इसे तीन तरीके से देखता हूँ-आजादी के पहले के साहित्य को अगर देखिए तो तत्कालीन समाज और उसकी विसंगतियाँ, गरीबी, अन्याय और शोषण, जातीय विभाजन आदि को ले करके साहित्य की रचना हुई। आजादी की जंग के समानान्तर बहुत से साहित्यकारों ने आजादी को लेकर विविध स्तरों पर रचना की। प्रगतिशील लेखन की शुरुआत हो गयी थी। उसी समय यूरोप के इंडीविजुअल की चिन्ता ने भी यहाँ के साहित्य को प्रभावित किया। फलस्वरूप तमाम तरह के आन्दोलन या मूवमेन्ट पनपने लगे। आजादी के बाद जो साहित्य आया उसकी समस्यायें अलग तरीके की थीं। आजादी को लेकर के जो अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ थीं उनको ले करके साहित्य रचा गया इसी तरीके से राजनीतिक परिवर्तन और समाज के विभिन्न समुदायों में जो बिखराव और अलगाव पनपने लगा उसको साहित्य ने केन्द्र में स्थान दिया। उदाहरण के तौर पर राजनीति के जाति व्यवस्था पर पड़े प्रभाव की प्रस्तुति को हम साहित्य में देख सकते हैं। इधर के साहित्य को जो मैंने देखा उसे देखकर लगता है कि साहित्य अब भावात्मक हो रहा है। इसी के साथ-साथ मुख्तलिफ तबके जैसे महिलाएँ, दलित और अल्पसंख्यक तथा कमजोर वर्ग है उसकी अन्तःपीड़ा को भी साहित्य टटोल रहा है।

तो क्या जिनकी समस्याओं को खंगाला और टटोला जा रहा है उनके लिए वह साहित्य किसी स्तर पर कारगर हो रहा है? इसका उनको लाभ मिल रहा है?

भारतीय सन्दर्भों में देखा जाए तो ऐसा नहीं है, जैसा कि यूरोप में। यह बात सिर्फ साहित्य में ही नहीं, चाहे राजनीति हो या शिक्षण संस्थाएँ। वैचारिक रूप से तो समस्याओं को उजागर किया जाता है वास्तविकता के धरातल पर जिसको हम व्यवहारिक रूप कहते हैं, यह कहिए कि ऐक्शन के लेबल पर वह हमको नहीं दिखाई देता है। नतीजे के तौर पर साहित्य के माध्यम से सामाजिक रूपान्तर की जो प्रक्रिया होनी चाहिए थी वह दिखाई नहीं देती है। दरअसल जिनकी समस्या है लोग उनसे दूर रहकर उन्हें समझना और उठाना चाहते हैं इसलिए तालमेल नहीं बैठ पाता है।

आखिर फिर कैसा प्रयास किया जाए कि जिसके ऊपर साहित्य लिखा जा रहा है उससे साहित्य का सम्बन्ध स्थापित हो सके? इस संदर्भ में आप समाजशास्त्री की हैसियत से क्या सोचते हैं?

मेराज साहब, किसी शायर का एक मिसरा याद आ रहा है - 'खूने शहीद से भी कीमत के सिवा फनकार की कलम की सिहायी की बूंद' माना यह जाता है कि साहित्य किसी समय या समाज के आन्दोलन को अभिव्यक्त करने का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन २० वीं सदी के औद्योगिक समाज में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से रचना जरूर हुई लेकिन यह रचनाएँ परिवर्तन का साधन नहीं बन पायी। २० वीं शताब्दी की आखिरी दहाई और उसके बाद साहित्य की वह हैसियत नहीं कि वो समाज को कोई ठोस आधार दे सके। एक बात और है कि समाज को प्रभावित करने वाली ताकत अब साहित्य और साहित्यकारों के हाथ से निकल कर कुछ हद तक पापुलर क्षेत्रों में चली गयी है। इसमें मीडिया का बड़ा अहम्‌ स्थान है। सिनेमा है। यह समाज के बड़े अहम्‌ हिस्से हो गए हैं। कुछ तो साहित्यकारों की रचना और उसके पाठक सीमित होते जा रहे हैं इसलिए भी अब साहित्य समाज को बहुत गहराई से प्रभावित नहीं कर पा रहा है।

इसका मतलब यह है कि आप कहना चाह रहे हैं कि साहित्यकारों को अगर आवाम से जुड़ना है जिनके लिए वह बात कर रहे हैं जिनके लिए लिख रहे हैं उनके लिए लिखने के लिए वह मीडिया इत्यादि से जो पापुलर मीडिया है, उनसे जुड़ें?

ऐसा ही हो रहा है साहित्यकार संचार माध्यम से पहले भी जुड़े थे। जुड़ भी रहे हैं। अगर नहीं जुड़े हैं तो उनके परिणाम दूरगामी नहीं हो सकते हैं। लेकिन यह भी है कि पॉपुलर इश्यू जो भी उठाये जायेंगे अगर उनमें गंभीरता नहीं है तो वह बहुत आगे तक नहीं जा पायेंगे। किसी भी इश्यू को टिकाऊ होने के लिए जब तक उसमें साहित्यिक पुट नहीं होगा उसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं होगा तब तक वह इश्यू उपयोग की वस्तु नहीं बन सकता है न ही उसके माध्यम से किसी खास बदलाव की कल्पना ही की जा सकती है।
आप अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे बड़े शिक्षण संस्थान से जुड़े हैं विश्वविद्यालय में साहित्यिक गतिविधियों की जो स्थिति है उसे किस स्तर की मानते हैं? उससे संतुष्ट हैं कि नहीं?
कोई भी विश्वविद्यालय हो, चाहे अलीगढ़ या दूसरा, बुनियादी तौर पर यह ज्ञान के केन्द्र होते हैं यहां पर नई पीढ़ी के जेहन तैयार होते हैं। विचार गढ़े जाते हैं। साहित्य विचारों को स्वरूप देने का बहुत सशक्त माध्यम है। विडम्बना की बात यह है कि हमारे विश्वविद्यालय के साथ-साथ दूसरे विश्वविद्यालयों में भी साहित्यिक संस्कृति कमजोर पड़ी है। यहां पर भी पॉपुलर मीडिया का दखल बढ़ा है। एक सच्चाई यह भी है कि उच्च शिक्षा विशिष्ट वर्ग के दायरे से निकलकर साधारण वर्ग के दायरे में आ गयी है और साधारण वर्ग में प्रोफेशनलिज्+म का जोर इतना बढ़ा है कि अब लोगों के पास समय ही नहीं बचा है कि वह इस क्षेत्र में जा करके समय गुजार सकें। इसे हम व्यवहारिकता का असर भी कह सकते हैं।

यानी की बाजारवाद का प्रभाव?

बिल्कुल, मार्केट ने पिछले १५ वर्षों में यानी कि ९० के बाद का जो दशक है उसमें उपभोक्ता संस्कृति को बहुत ज्यादा पनपाया है। ज्ञान का भी वस्तु के रूप में इस्तेमाल होने लगा है। उसकी मर्यादा, गरिमा उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाती है इसलिए आप भी जानते हैं कि पॉपुलर साहित्य का प्र्रभाव पड़ा है। आज साहित्य की यह मजबूरी है कि उससे किसी न किसी स्तर पर मार्केट की जरूरत से मैचिंग करनी पड़ती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य के सामाजिक सन्दर्भों में साहित्य की कोई विशिष्ट भूमिका हो सकती है?
शायद आप जो समसामयिक साम्प्रदायिकता है, नगरीकरण है, आपाधापी है, गतिशीलता आदि के
संदर्भ में बात कर रहे हैं?

जी?

देखिए, पिछले २५-३० वर्षों में बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है। नई ह्‌यूमन एक्टिविटीज, नये-नये काम और नये-नये वर्ग उभरे हैं। खासतौर से प्रोफेशनलिज्म का हर क्षेत्र में जैसा असर दिखाई दे रहा है, पहले कभी नहीं था। पहले सम्बन्धों में टिकाऊपन था अब गतिशीलता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि साहित्य की भूमिका कम हुई है। दरअसल साहित्य इंसान की बड़ी मौलिक एक्टिविटी है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि प्रत्येक इंसान मूलतः साहित्यिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर यह गुण छुपा होता है। बात असल में यह है कि कुछ लोग अभिव्यक्त कर ले जाते हैं, बहुत सारे नहीं। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मैं यह कहना चाहूँगा कि साहित्यकार जब कुछ सम्प्रेषित करता है तो बहुत बड़ी संख्या में जब लोगों को यह लगता है कि ऐसा तो मैं भी सोच रहा था लेकिन उसके पास भाषा नहीं थी। इसलिए ऐसा कह नहीं पाया। जहाँ तक साहित्य के मूल या उसकी भूमिका की बात है, उसके स्कोप की बात है, फैलाव की बात है, वह कभी कम होने वाली नहीं। हाँ, टाइम का एक टेम्परामेंट होता है। आधुनिक समय का मिजाज बहुत तेज है। साहित्य गरिमामय होता है इसलिए साहित्य को समझने के लिए ठहराव की जरूरत होती है। चूँकि समय की कमी है इसलिए साहित्य उनका शिकार हो रहा है।

डाक्टर साहब, आपका सम्बन्ध समाजशास्त्र से है इसके अध्ययन में साहित्य कहा तक मदद करता है?

यह बड़ा मशहूर कथन है कि साहित्य समाज का दर्पण है और समाजषास्त्र समाज का अध्ययन। लिहाजा मद्द तो करेगा ही। समाज के अध्ययन की जो विभिन्न प्रविधियाँ हैं उनमें एक है ऐतिहासिक प्रविधि। इसके अन्तर्गत वर्तमान को प्रभावित करने वाले अतीत की वास्तविकता को समझने में साहित्य की मदद ली जाती है। हालांकि साहित्य में सामाजिक वास्तविकता की सम्पूर्णता नहीं होती है क्योंकि उसमें साहित्यकार का मर्म उसका अपना सच उसकी प्रतिबद्धता कुंठाएं और व्यक्तिगत प्रक्रियाएँ होती हैं, लेकिन समाजशास्त्री उसको पढ़कर अपने काम की चीज ले लेते हैं। उदाहरण के लिए मैं बताऊँ कि किसी साहित्य में मान लीजिए कि चित्रण है अस्पृश्यता का, हो सकता है कि जिस स्तर का चित्रण किया गया है वैसी अस्पृश्यता न हो लेकिन यह तो यक़ीनी बात है कि अस्पृश्यता का अस्तित्व रहा होगा तभी तो यह चित्रण किया गया होगा? साहित्य हमेशा से ही समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण साधन रहा है।

साहित्यिक हल्के में यह बात आमतौर पर कही जाती रही है कि २० वीं शताब्दी उत्तरार्ध के सामाजिक इतिहास के अध्ययन में प्रेमचन्द के साहित्य का बड़ा अहम्‌ रोल है। इस संदर्भ में आपकी क्या टिप्पणी है?

देखिए, जितना प्रेमचंद को मैंने पढ़ा है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि उन्होंने साहित्य के माध्यम से अपने समय की सच्चाई, कुंठाओं, अन्दरूनी कन्ट्रीडिक्शन को बड़ी हिम्मत के साथ उठाया है। समाज में धर्म और नैतिकता, वर्ग वैभिन्य इत्यादि के साथ-साथ गरीबों के दुख-दर्द, उच्च वर्ग के द्वन्द्व इन सारी सामाजिक स्थितियों का प्रेमचन्द जी ने बड़ी गहराई के साथ चित्रण किया है। इससे आप समझ सकते हैं कि उनकी क्या भूमिका हो सकती है।
आपका सबसे प्रिय साहित्यकार कौन है?

यह सवाल जरा मुश्किल है क्योंकि मैंने साहित्य को किसी खास नजरिये से पढ़ा नहीं है। हाँ, जो प्रगतिशील लेखक हैं या उनसे संबंधित साहित्यकार हैं वह मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। उनको मैं महत्त्वपूर्ण इसलिए मानता हूँ क्योंकि वे परिवर्तन के हामी है परिवर्तन से मेरा अर्थ विकास करने वाली शक्तियों के उद्घाटन से है, नारे से नहीं। प्रेमचंद उनमें से हैं जो परिवर्तन के हामी है। उर्दू में अल्लामा इकबाल का दर्शन भी मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनके केन्द्र में व्यक्ति। वह अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्ति की अहमियत को सामने लाते है। ऐसा व्यक्ति जिसका किसी वर्ग से कोई सम्बन्ध नहीं है। दरअसल इकबाल के दर्शन को किसी समय, समुदाय या वर्ग से बाँधकर नहीं रख सकते हैं। इसलिए वह मुझे बेहद पसंद है।

वर्तमान में ऐसे कुछ साहित्यकार हैं जिनसे आप मिलते-जुलते रहते हैं?
देखिए, साहित्य मेरा विषय नहीं बल्कि दिलचस्पी है। इसलिए बहुत व्यवस्थित तरीके से नहीं लेकिन यदाकदा जैसे नामवर सिंह या अलीगढ़ में के.पी. सिंह, नमिता सिंह, ये मुलाकातें अचानक ही होती हैं।

कैसा लगता है उस समय आपको?

किसी दार्शनिक ने कहा है कि - साहित्यकार बौद्धिक होता है इसलिए विचारों की बात करता है। इसलिए उससे मिलकर अच्छा लगता है।
आपके नजरिए से कोई ऐसा विषय है जिस पर आपको लगता है कि लिखा जाना चाहिए?
देखिए, मैं साहित्यकार नहीं समाजशास्त्री हूँ इस दृष्टि से कहूँगा कि इधर २०-२५ वर्षों में बड़ा परिवर्तन हुआ है। उसे साहित्यकार केन्द्र में रखे हैं, अह्‌म बात यह है कि अल्पसंख्यक एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। जो कि कमजोर है। संविधान इत्यादि के माध्यम से इनको ऊपर लाने का काम तो किया ही जा रहा है दूसरे और भी कमजोर वर्ग हैं। उनके साथ भी यही स्थिति है लेकिन उससे बात बनती नहीं है। इनको दो नजरिये से देखना होगा मुस्लिम की हैसियत से विशेष रूप से मुसलमानों के बारे में बात करना चाहूँगा। दरअसल उसकी जो कमजोर हालत है उसका एक कारण बाह्य भी है लेकिन उसके कारक उनकी अपनी सामाजिक रचना के अन्दर भी मौजूद हैं। कमोवेश दूसरे कमजोर वर्गों के लिए कहीं जा सकती है। जैसे अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजातियाँ आदि। कानून बना करके इनको आगे लाना एक हद तक ही मुमकिन है। उसे अपने आप भी सोचना होगा दरअसल जब तक उनके अंदर ही मंथन नहीं होगा, इसके लिए इस समाज के बुद्धिजीवी, राजनीतिक नेतृत्व और धार्मिक नेतृत्व को आगे आ करके संजीदगी और ईमानदारी से अपने अंदर झाँकना होगा। समय के साथ बदलना होगा यानी कि खुद ही कोशिश करनी होगी। बाहर से मदद आने के बाद वह बदलाव आ ही नहीं सकता। जिसकी वह अपेक्षा करता है। इधर दंगे-फसाद, बाबरी मस्जिद की शहादत आदि से लोगों को बड़ी तकलीफें हुई। काफी कुछ इस पर लिखा भी गया। धर्म निरपेक्षता की बहुत बात हुई लेकिन धर्म निरपेक्षता एकपक्षीय नहीं होनी चाहिए। अल्पसंख्यक ये सोचता है कि बहुसंख्यक हमारे लिए सेकुलर हों भारत का संविधान भी यही कहता है। लेकिन जब उससे धर्म निरपेक्ष होने की बात कही जाती है तो कहता है कि हम अल्पसंख्यक हैं तो उसे भी सेकुलर होने की जरूरत है।

कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि दबे-कुचले और अल्पसंख्यक वर्ग की अपनी जिम्मेदारी भी है?



बिल्कुल, उन्हें आत्ममंथन करना होगा, अपनी कमियों और खूबियों को अंडरलाइन करना होगा। परिवर्तन के लिए अन्दर से योजना बनानी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक अपेक्षित परिवर्तन नहीं होगा।

आपका तात्पर्य यह है कि अगर इसी तथ्य को इन्हीं सन्दर्भों को अपनायें तो साहित्य में अच्छी चीज आ सकती है?

बिल्कुल ये साहित्यकार के लिये अच्छा विषय हो सकता है कि चाहे अल्पसंख्यक हो चाहे दलित। वह जैसा अपने लिए सोचते हैं वैसा दूसरे के लिए करना चाहिए और इसी को विषय के रूप में अपनाना चाहिए। मेराज साहब, साम्प्रदायिकता को मैं सिर्फ धर्म के सन्दर्भों में नहीं देखता इसके सामाजिक संदर्भ भी हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि हम जो करते हैं ठीक है लेकिन दूसरे हमारे लिए ऐसा न करें। दरअसल यह है साम्प्रदायिकता । जबकि हकीकत यह है कि वो चीज हमारे लिए बुरी है तो दूसरों के लिये बुरी होनी चाहिए।

एक समाजशास्त्री की हैसियत से नवोदित साहित्यकारों से क्या कहना चाहेंगे? यानी संदेश?

मैं तो संदेश नहीं देना चाहता, साहित्यकार असल में और आमतौर पर बड़ा ईमानदार होता है। इसलिए वह बहुत देर तक मिथ्या को छिपाकर आडियेन्स तक नहीं पहुँच पायेगा। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि आडियेंस को बहुत देर तक भ्रम में नहीं रख पायेगा। इसलिए साहित्यकारों को समाज के लिए सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। उसके विकास में सहयोग दें। जन अपेक्षाओं को ईमानदारी से पेश करें अगर साहित्यकार ऐसा करता है तो शायद सामाजिक संदर्भ में इसका बहुत बड़ा योगदान होगा।


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Wednesday, January 14, 2009

कपिल साहब का कुत्ता


-राजेन्द्र राज

कपिल साहब ने खुदा से
कुत्ते को माँगा है
गब्बर के हाथों में
बसन्ती का ताँगा है।

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Tuesday, January 13, 2009

देह से नहीं दिमाग से होगी स्त्री-मुक्ति : चित्रा मुदगल



श्याम सुशील
चित्रा जी, पिछले दिनों राष्ट्रीय सहारा में मैनेजर पाण्डेय, राजेन्द्र यादव और निर्मला जैन के बीच काफी वाद-विवाद और प्रतिवाद हुआ-स्त्री लेखन को लेकर। लेकिन उनकी बहसों के केन्द्र में, खासकर राजेन्द्र यादव के लिए स्त्रीलेखन का मतलब देह तक सीमित है। जबकि निर्मला जैन देह के साथ स्त्रीके मन की भी बातें करती हैं और इसी संदर्भ में उन्होंने कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और आप सबकी चर्चा की। इन बहसों को लेकर आप क्या सोचती हैं?


सुशील जी, स्त्रीविमर्श पर जिस तरह की साहित्यिक बहसें चल रही हैं, मुझे लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सोच की बात कर रहा है और अपनी सोच को वह स्त्रीविमर्श की परिभाषा के रूप में रेखांकित होते देखना चाहता है। हालांकि यह बहुत स्वस्थ प्रक्रिया है कि स्त्रीविमर्श को लेखक, समीक्षक और विद्वानजन अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर रहे हैं और इससे हमें मुख्य बिन्दुओं तक पहुँचाने का रास्ता भी मिलता है। लेकिन रास्ता तब अवरुद्ध होता लगता है, जब राजेन्द्र यादव जैसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार स्त्रीविमर्श को अपनी सोच से परिभाषित करने की कोशिश में उसे सीमित कर देते हैं। राजेन्द्र की चेष्टा हमें अवाक्‌ करती है कि यह स्त्रीविमर्श को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयत्न है या उसकी आड़ में स्त्रीदेह को ले करके अपनी कुण्ठाओं की अभिव्यक्ति है। यहाँ मुझे मल्लिका सेहरावत और राजेन्द्र यादव के स्त्रीविमर्श में कोई विशेष फर्क नज+र नहीं आता। औचित्य खोजने का पराक्रम-भर है। कुछ लोग समझते हैं कि देह से मुक्ति में ही स्त्रियों की मुक्ति है और उस मुक्ति को वह देह के निचले हिस्से में ही खोजते हैं। उन्हें स्त्रीधड़ के ऊपर एक अदद मस्तिष्क नजर नहीं आता, जो पुरुषों के मुकाबले उतना ही उर्वर है। मुझे उसी मस्तिष्क की सामाजिक पहचान और मान्यता में ही स्त्रीविमर्श की सही परिभाषा नजर आती है। आधी आबादी की पहचान का संघर्ष और विमर्श उसी को अर्जित करने का संघर्ष है। स्त्रीधड़ के निचले हिस्से की बात करने वाला लेखक बड़ी चालाकी से स्त्रीधड़ के ऊपर अवस्थित उसके मस्तिष्क को अनदेखा और उपेक्षित कर उसकी पुरुष सत्तात्मकता को ही जाहिर कर रहा है ताकि वह स्त्रीधड़ के निचले हिस्से का अपने धड़ के ऊपर के मस्तिष्क के माध्यम से जिस तरह चाहे उपयोग कर सके। वह स्त्रियों को बेवकूफ बनाना चाहता है।

मैं समझती हूँ कि मस्तिष्क की पहचान के साथ ही आधी आबादी की समाज में निर्णायक भागीदारी को स्वीकृति हासिल हो जाएगी हासिल हो रही है, लेकिन अभी उसे अपनी धरती, अपना क्षितिज और अपना आकाश जहाँ और जिस सीमा तक उपलब्ध होना चाहिए, नहीं हो रहा, नहीं दिया जा रहा, बल्कि पुरुष वर्चस्व स्त्रीविमर्श के आन्दोलन से अतिरिक्त सतर्क और सावधान हो रहा है और उसे दिग्भ्रमित करने के अनेक मंच सृजित किए जा रहे हैं, जहाँ स्त्रीके परम हितैषी होने के दावे-प्रतिदावे ऊँची आवाज में किए जा रहे हैं। स्त्रीका दैहिक उत्पीड़न और बढ़ गया है, जब से वह अपने स्व की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में डंके की चोट पर उतर आई है, चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो, राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे सेना हो या गाँव। गाँव में हमारी आधी आबादी का बहुत बड़ा प्रतिशत जो अभी भी नाक तक घूँघट को खींच, सूर्य की ओर अपनी आँखें नहीं उठा पाता है, और इक्कीसवीं सदी में भी लोटा लेकर खेतों में जाने को मजबूर है और शोषित होता है इन सबकी लड़ाई चैतन्यशील स्त्रीलड़ रही है और निश्चय ही वो उसे पालतू भेड़-बकरी की परिभाषा से बाहर लाएगी और बताएगी कि तुम्हारे इस घूँघट के भीतर का जो मस्तिष्क है, वह पुरुषों के मस्तिष्क से किसी तरह से कम नहीं है और तुम्हारी देह को अपवित्र करने वाले जब कुएँ और तालाबों में डूबकर नहीं मरते तो तुम्हें भी डूबकर मरने की जरूरत नहीं है। इस बात को महिलाएँ समझ रही हैं, चेतना ग्रहण कर रही हैं और इसी का परिणाम है कि अब शहरों में जिन लड़कियों के साथ देह उत्पीड़न होता है, वो लड़कियाँ बस और टे्रन के नीचे जाकर स्वयं को खत्म नहीं कर रही हैं, बल्कि यह साहस दिखा रही हैं कि पुलिस स्टेशन में जाकर उन बलात्कारियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवा रही हैं। इन लड़कियों की अपने दैहिक शोषण के खिलाफ यह पहल, अपने उनके मस्तिष्क और उनकी चेतना की पहचान है क्योंकि उनके मस्तिष्क ने ही उन्हें यह साहस दिया कि अपने देह के निचले हिस्से के शोषण का प्रतिकार वे बेखौफ होकर करेंगी और उनके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगी। मस्तिष्क की चेतना ने ही उन्हें यह साहस प्रदान किया है कि वे अपने धड़ के नीचे की लड़ाई भी लड़ सकें। जब तक वो अपने मस्तिष्क की चेतना से सम्पन्न नहीं थीं तब तक धड़ के नीचे की लड़ाई लड़ने की वो हिम्मत नहीं जुटा सकती थीं या अपने विषय में निर्णय नहीं ले सकती थीं कि उन्हें क्या करना चाहिए। दूसरे लोग निर्णय लेते थे कि देह के अपवित्र हो जाने के बाद उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह निर्णय भी पुरुषसत्तात्मक समाज ने ही लिया था, क्योंकि वह अपनी स्त्रीमें किसी की साझेदारी नहीं चाहता था, उसके मन की बात तो दूर। इसी तरह से उसके घर में जो उसकी स्त्रीबनकर आने वाली होती, उसकी यौन शुचिता भी उसके लिए जरूरी थी।

अगर समाज में आधी आबादी को अपने मस्तिष्क की पहचान मिल जाएगी तो वह अपनी इच्छा-अनिच्छा की लड़ाई भी लड़ लेगी और अपने तईं होने वाले उत्पीड़नों का प्रतिकार साहस के साथ कर सकेगी। स्त्री विमर्श में स्त्री के मस्तिष्क के पहचान की लड़ाई की बात न करके राजेन्द्र यादव ने यह साबित कर दिया है कि वह स्त्री विरोधी व्यक्ति हैं फ्यूडिस्टिक आचरण वाले व्यक्ति हैं। उनके विषय में मन्नू जी ने भी यह बात स्वीकारी है। राजेन्द्र जी को वही स्त्रियाँ स्वचेतना सम्पन्न लगी हैं जो धड़ के नीचे वाले स्त्री विमर्श के समर्थन में आगे आईं और उनकी रचनाओं में भी, वक्तव्यों में भी यह एकपक्षीय स्त्री विमर्श रेखांकित हुआ है, शायद वह मन से उसकी समर्थक न हों।

आज हिन्दी आलोचना में स्त्री, दलित, आदिवासी आदि जिन मुद्दों पर बहसें हो रही हैं, उसे आप कितना जरूरी समझती हैं। जबकि आप हिन्दी आलोचना की परम्परा को देखें तो वहाँ सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक विकास की प्रक्रिया, मार्क्सवाद आदि बड़े-बड़े मुद्दे रहे हैं। एक लेखिका होने के नाते आपके लिए आलोचना या इस तरह के विमर्श का अर्थ क्या है?

मेरे लिए साहित्यिक आलोचना या विमर्श का अर्थ समाज के सर्वांगीण सरोकारों से है। स्त्रीविमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श को भी उसी परिप्रेक्ष्य में संतुलन और विवेक और विवेच्य दृष्टि के साथ देखा, परखा और मूल्यांकित किया जाना जरूरी है, नहीं तो किसी की भी पक्षधरता का अतिवाद साहित्य के सरोकारों के संतुलन को डगमगाता है। एक तरफ आप पँसेरी चढ़ा दीजिए और दूसरी तरह सेर भी न रखिए तो तराजू असंतुलित हो जाएगा और न्याय नहीं होगा। बल्कि दलित और स्त्रीविमर्श की अतिवादिता ने चाहे वह लेखकों के द्वारा हो या समीक्षकों के विकासशील समाज की किशोर और युवा पीढ़ी की कठिनाइयों और जटिलताओं को लगभग अनदेखा कर रही है; जिनके कंधों पर विकासशील समाज की समृद्धि, संस्कार और एक समतामूलक समाज का सपना टिका हुआ है। आज अगर किसान आत्महत्या कर रहा है तो नई पीढ़ी भी चौंधियाते मॉलों की छठी और सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर रही है। इन गाँठों को आखिर कौन खोलेगा, कौन मूल्यांकित करेगा? समीक्षक को वर्गरहित, जातिरहित तथा गुटबंदी रहित हो कर के रचना को रचनात्मक उसकी समग्रता में मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि लेखकों के साथ वह भी (आलोचक) खेमों में बँटकर और ओछी राजनीति में उलझकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा को विस्मृत कर चुके हैं, बल्कि उससे आगे बढ़कर जो नए प्रतिमान उन्हें स्थापित करने चाहिए थे, मुझे लगता है कि कुछ विद्वान ही ऐसा कर पा रहे हैं।

कुछ ऐसे आलोचकों के बारे में आप बताएँ, जिन्होंने हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किए हैं या कर पा रहे हैं?

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की परम्परा में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. विजय मोहन सिंह, शिवकुमार मिश्र, मैनेजर पाण्डेय, सुधीश पचौरी, मधुरेश, पुष्पपाल सिंह, निर्मला जी हैं। निर्मला जैन जितनी विदुषी हैं, उसका स्वतंत्रउपयोग उन्होंने नहीं किया। निर्मला जी जैसी विदुषी ने अपनी एक स्वतंत्रसत्ता नहीं बनाई। कभी वो नामवर जी की आवाज लगीं, कभी नगेन्द्र जी की आवाज लगीं, कभी राजेन्द्र यादव की। उन्होंने इन लोगों से स्वतंत्रकिसी कृति की स्थापना नहीं की। हाँ, देवीशंकर अवस्थी और मलयज ने आलोचना में जिस स्वस्थ परम्परा की शुरूआत की, दुख इस बात का है कि वे असमय हमसे छिन गए। इन लोगों ने उन लोगों के लेखन की शक्ति को रेखांकित किया। जिनके नाम कुछ दिग्गजों ने कभी नहीं लिये।

हिन्दी के नए आलोचकों से आपकी उम्मीदें क्या हैं? किन लोगों में आपको संभावनाएँ दीखती हैं, जो आलोचना में नई चीजों को लेकर आ रहे हैं?

नए लोगों में अजय तिवारी, महेश दर्पण, देवेन्द्र चौबे, अरविन्द त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, अनामिका, पंकज चतुर्वेदी और इधर साधना अग्रवाल भी एक निष्पक्ष समीक्ष्य दृष्टि विकसित कर रही हैं। अच्छी बात यह है कि ये लोग किसी एक खाँचे से पोषित पल्लवित नहीं हो रहे। इनका मेग्नीफाइन ग्लास सूक्ष्म से सूक्ष्म पक्षों की परिणितियों को भी दृष्टि में रखता है और ये चरित्रों के दबावजन्य प्रभावों और उनसे उपजी मनोवैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन गहरी संवेदना और सरोकारों के साथ जिस तरह चलनी से चाल कर, निथारकर जिस तरह से हमारे सामने रखते हैं, किसी भी रचना या कृति को, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद-उसके निकट से निकटतर होने का पाठकीय अवसर उपलब्ध होता है, जो दुराग्रह जनित नहीं लगता है।


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Monday, January 12, 2009

"विमुखता"

SEEMA GUPTA

खामोशी तेरे रुखसार की
तेज़ाब बन मस्तिष्क पर झरने लगी
जलने लगा धर्य का नभ मेरा
और आश्वाशन की धरा गलने लगी
तुमसे वियोग का घाव दिल में
करुण चीत्कार अनंत करने लगा
सम्भावनाये भी अब मिलन की
आहत हुई और ज़ार ज़ार मरने लगी
था पाप कोई उस जनम का या
कर्म अभिशप्त हो फलिभुत हुआ
अपेक्षा की कलंकित कोख में
विमुखता की वेदना पलने लगी....

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Sunday, January 11, 2009

अन्जना जी हाई-फाई

-राजेन्द्र राज

इतना पाउडर लगाया चेहरे पर
कि आईना भी घबरा गया
मेकअप-मैन मर गया शरम से
कैमरा-मैन गश खा गया

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