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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Wednesday, February 4, 2009

लोक साहित्य का स्वर्णयुग आने वाला है : डॉ. अर्जुनदास केसरी


डॉ. हरेराम पाठक
आप का बाल्यकाल किन परिस्थितियों में बीता? साहित्य के प्रति आकर्षण आपमें कब से पैदा हुआ?
मेरा बाल्यकाल कठिन संघर्षशील परिस्थितियों में बीता। वर्तमान सोनभद्र जनपद के विजयगढ़ परगना में ब्राह्मण बाहुल्य ग्राम भवानीगाँव में (कोरियांग) जो बेलन नदी का उद्गम स्थल है, १९३९ ई. में एक सामान्य शिक्षक परिवार में मेरा जन्म हुआ था। यह गांव साहित्य, संस्कृति, लोक कला की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। मेरी माँ तुलसीदेवी स्वयं सैकड़ों किस्से-कहानियाँ सुनाती थीं, लोकगीत और जगरनाथिया गाती थीं, जो मुझे बड़ा प्रेरक और प्रिय लगता था। पिता श्री भगवान दास गुरु वाणियाँ सुनाया करते थे। गाँव में नाटक और रामलीला होती थी। मुझे याद है, मैंने एक बार उत्तरा का पाठ किया था। गाँव में चमार नथुआ नृत्य करते थे। होली खूब गायी जाती थी। मेरे भीतर लोक साहित्य के प्रति आकर्षण तभी से पैदा हुआ था।
विशेषकर लोक साहित्य के प्रति आपके झुकाव का क्या कारण है? इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से प्राप्त हुई?
इस प्रश्न का उत्तर बहुत कुछ पूर्व प्रश्न के उत्तर में निहित है, तब भी मेरा किशोर काल पकरहट गांव में बीता था जो अभिशप्त कर्मनाशा के तट पर स्थित है और अहीर, आदिवासी बाहुल्य है। वहाँ के लोगों का बहुत कठिन अभावग्रस्त जीवन था। लोक की परख मेरी वहीं से हुई। विरहा, लोरिकी, विजयमल के गीत वहाँ रात-रात भर या कौड़ा पर गाये जाते थे। मैं गाय चराने, महुआ बीनने, घास काटने वन जाया करता था और वहीं गीत की पंक्तियाँ भी गुनगुनाने लगता था। रत्थीनाई, मनीजरी बुदिया, रामदास कुर्मी लोकगाथाएँ लोरिकी, विजयमल सुनाया करते थे। उनको सुनने से लिखने के भाव का बीजांकुरण तभी हो गया था। लोरिकायन, विजयमल गाथाओं को लिखने की प्रथम प्रेरणा मुझे वहीं से मिली थी।
हिन्दी के किस लोक साहित्यकार से आप अधिक प्रभावित हैं? उनसे प्रभावित होने की खास वजह क्या है?
मैं हिन्दी के डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय से सर्वाधिक प्रभावित हूँ। उनसे प्रभावित होने का कारण यह है कि पी-एच.डी. के दौरान सबसे अधिक मदद मुझे उन्हीं से बातचीत के द्वारा और उनके साहित्य से मिली थी। उनकी पुस्तकें लोक साहित्य की विश्व कोश हैं।
लोकवार्ता शोध पत्रिका का प्रकाशन आप कब से करते आ रहे हैं? इस पत्रिका के प्रकाशन में कौन-कौन सी बाधाएँ उपस्थित हुईं थीं?
इसका प्रथम अंक लोकवार्ता नाम से १९८५ ई. में वार्षिकांक के रूप में ६८ पृष्ठों का छपा था। इसकी प्रथम प्रेरणा मुझे अपने गुरु एवं शोध निर्देशक डॉ. श्याम तिवारी से मिली थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. विद्यानिवास मिश्र, भाई ठाकुर प्रसाद सिंह और मोहन लाल गुप्त ने भी हमें इसके लिए प्रेरित किया था। हमें का मतलब है मेरी टीम को जिसमें श्री शेख जैनुल आब्दीन, सुधेंदु पटेल और एस. अतिबल से है। इनमें से सभी समर्पित थे। वे समय के थपेड़े से कट गये तो मैं अकेले बच गया-लगभग। मैं इसे कैसे चला रहा हूँ, अब तक, मैं भी नहीं कह सकता। बस भगवान और मेरा आत्मबल या यों कहें कि मेरी संकल्पशक्ति इसे चला रही है। मैं कभी भी हार नहीं मानता। अर्थ की तो ऐसी बाधाएँ आयीं कि यदा-कदा अपनी तनख्वाह या पेंशन तक लगा देनी पड़ी। आधा पेट खाया-खिलाया, परन्तु उसे प्रकाशित किया। सन्‌ १९९५ से बिना नागा वर्ष में ७५ प्रतिशत तीन अंक तो छप ही रही है।
आज की निरन्तर बदलती हुई अध्ययन की विभिन्न दिशाओं में लोक साहित्य को आप किस जगह पर खड़ा देख रहे हैं?
साहित्य की अन्यान्य विधाओं का विकास हुआ है, परन्तु उनमें लोक साहित्य का दिनों दिन विकास और विस्तार हो रहा है। अब वेद का समय समाप्त प्रायः है, लोक ही बढ़ चढ़ कर रहेगा, लोकतंत्र में। अनेक विश्वविद्यालयों में लोक साहित्य पर बहुत काम हो रहा है। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों में, विदेशों में भी लोक साहित्य स्थान पाने लगा है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में मेरी १३ कृतियों को स्थान मिला है। लोक साहित्य पर बहुत सारी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। शोध कार्य हो रहे हैं। हाँ, संग्रह का कार्य नहीं के बराबर हो रहा है, जो दुःखद है। लोक साहित्य का स्वर्णयुग आने वाला है।
आधुनिक तकनीकी युग में शिष्ट साहित्य भी अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में लोक साहित्य को बचाये रखने में आप कहाँ तक आशान्वित हैं?
भाई, मुझे आप द्वारा प्रयुक्त शिष्ट शब्द पर आपत्ति है, क्या लोक साहित्य अशिष्ट है। उसे तथाकथित अभिजात्य कहिए। ऐसा कहकर लोगों ने दोनों के बीच दीवार खड़ी कर दी, उपेक्षा भी बहुत की, परन्तु आप ही सोचिए वे कहाँ हैं? कविता, नयी कविता, अकविता, नयी कहानी, अकहानी का अब कोई नामलेवा नहीं है? ललित निबंधकार कितने बचे? हाँ, उपन्यास, कहानी, थोड़ा बहुत नाटक अभी है, परन्तु ये विधाएँ भी अब लोकपरक और आंचलिक हो गयी हैं। आंचलिक होने के कारण प्रेमचंद अमर हैं। मैं पूर्ण आशान्वित हूँ कि लोक साहित्य वाचिक परम्परा या मौखिक परंपरा में रहते हुए भी आज तक अपना अस्तित्व बनाये हुए है, आगे भी बनाये रखेगा, क्योंकि अब उसे लिखा या लिपिबद्ध भी किया जाने लगा है। हाँ, मैं फिर कहता हूँ कि हम सब लोग मिलकर इसे लिपिबद्ध भी कर लें, ताकि शोध-कार्य भी तेजी से चले। लोक साहित्य में लोक विज्ञान है, लोक की सदियों पुरानी तकनीक है।
अभिजात्य साहित्य की तरह लोक साहित्य भी कुछ पेशेवर लोगों तक ही सिमट कर रह गया है। इसे जन-सुलभ बनाने के लिए क्या करना चाहिए?
हमारा पकाया अभिजात्य वाले खा रहे हैं, हम मुँह ताक रहे हैं। कोई पैदा करता है, कोई बनाता है, कोई खाता है, यह जगत्‌ की रीति है। यही तो शोषक और शोषित का अंतर है। उन शोषकों से हमें बचना चाहिए।
जहाँ तक जन-सुलभ बनाने की बात है, वह तो पहले ही से है। उसे जनसाहित्य कहते ही हैं। जनता के बीच से ही वह उन तक पहुँचा है। हाँ, संग्रह, संपादन, प्रकाशन करके उसे जन-जन तक पुस्तकालयों के माध्यम से पहुँचाया जा सकता है। इसीलिए मैं गाँव-गाँव में पुस्तकालय बनाने की बात ही नहीं करता, हर घर में पुस्तकालय की बात का पक्षधर हूँ।
अभिजात्य साहित्य के विभिन्न विधाओं के अलग-अलग सुधी समीक्षक हैं। लोक साहित्य में ऐसे समीक्षकों का अभाव खटकता है। इसके कारण क्या हैं?
पूरे देश में कितने सुधी समीक्षक हैं? आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद उस स्तर के किसी एक समीक्षक का नाम बताइए। समीक्षा विधा भी लुप्तप्राय है। प्रकाशक छद्म नाम से समीक्षाएँ लिखते-लिखवाते हैं, बिक्री के लिए लोक साहित्य कम लिखा ही गया है तो समीक्षक तो कम होंगे ही। अभिजात्य साहित्य के समीक्षक लोक साहित्य की समीक्षा लिख भी नहीं सकता। हमें समीक्षक पैदा करना होगा। लोक साहित्य की पत्र-पत्रिकाएँ बढ़ेंगी तो समीक्षाएँ भी लिखी जायेंगी।
आप अपनी किस रचना को सर्वोत्कृष्ट मानते हैं और क्यों?
मैं तो लोरिकायन को ही अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति मानता हूँ, क्योंकि यह भोजपुरी की सबसे लोकप्रिय, लोक विश्रुत लोकगाथा है जिसे पहली बार ७ वर्षों के अथक श्रम से मैंने लिपिबद्ध किया था किसी लोकगाथा के लिपिबद्ध करने का यही श्रीगणेश था। उसके पहले किसी ने इतनी विशाल गाथा को लिपिबद्ध प्रामाणिकता और क्रमबद्धता-समग्रता के साथ किया हो तो बताइए। आप कहेंगे, यह मेरा अहम्‌ बोल रहा है। नहीं भाई, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तो इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था - किसी लोकगाथा को लिखने का यह प्रथम कार्य है। इसके लिए इतना श्रम किया गया है कि इस पर एक लाख रुपये का पुरस्कार भी कम है। बात का प्रसंग यह है कि इसकी पाण्डुलिपि पर राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार(उ.प्र. हिन्दी संस्थान का) देने पर विवाद खड़ा हो गया था। तब उसकी टंकित तीन प्रतियाँ भाई ठाकुर प्रसाद सिंह ने (निदेशक) निर्णय के लिए तीन विद्वानों के पास भेजी थीं-द्विवेदी जी, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय और डॉ. रघुवंश (इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष) तीनों ही ने कलम तोड़कर इस कार्य को सराहा था और तब आचार्य द्विवेदी, महादेवी वर्मा, रामविलास शर्मा, रामकुमार वर्मा, सेठ गोविन्ददास जैसे विद्वानों के साथ इस आदिवासी लेखक को भी सर्वोच्च नामित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से ३७ वर्ष की अवस्था में सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
इस कृति पर केंद्रित होकर मैंने लोरिकायनः एक अध्ययन नाम से शोधकार्य किया जो बाद में प्रकाशित हुई और उस पर बिहार सरकार राजभाषा विभाग का सर्वोच्च नामित विद्यापति पुरस्कार मिल गया। इस कृति पर एक था लोरिक, एक थी मंजरी, लोरिकायन का चरित्रसंगठन और काव्य सौष्ठव नामक दो और कृतियाँ प्रकाशित हुयीं। बिहार से भी इस पर शोधकार्य हुआ। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रश्नपत्र में इससे प्रश्न पूछे जाते हैं। इस पर अध्ययन की और भी संभावनाएँ हैं - जैसे भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, कथा-संरचना एवं कथा-रूढ़ियाँ आदि। रामार्णल के तीन खण्डों का संपादन पुनर्लेखन मेरा दूसरा महत्त्वपूर्ण कार्य है, समय आने पर उसे समझा जायेगा।
लोक साहित्य एवं लोक कलाओं के संग्रह-संकलन हेतु सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका कैसी रही है? क्या आप उनके क्रिया-कलापों से संतुष्ट हैं।
लोक साहित्य एवं लोक कलाओं के संग्रह संकलन हेतु सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं की न भूमिका रही है न रहेगी। पहले सूचना विभाग ऐसे कार्य करता था। पं. रामनरेश त्रिापाठी के संग्रह छपे। आज वोट की राजनीति का जहाँ बोलबाला हो, वहाँ यह सब कार्य नहीं हो सकता। पहले सरकारी संस्थाएँ, केन्द्र में कार्य कराती थीं, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद से अच्छा कार्य हुआ। आदिवासी लोक कला परिषद् भोपाल से श्री कपिल तिवारी भी अच्छा कार्य कर-करा रहे हैं और जगहों से कुछ होता होगा, मुझे पता नहीं है। मैं सरकारी संस्थाओं के क्रिया-कलापों से कतई संतुष्ट नहीं हूँ। दो हजार कजरियों का संग्रह करके मैंने उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी को पच्चीस वर्ष पहले दिया था, एक कजली नहीं छपी। उ.प्र. संस्कृति विभाग में मेरी एक पुस्तक पड़ी है। एक केन्द्र सरकार में भी है, कहाँ छप रही है। इसके लिए और सरकारी संस्थाओं को आगे आकर टीम बनाकर काम-करना, कराना होगा। असम की लोक कलाओं का संग्रह आप करिये कराइए न। ऐसे ही और लोग भी करें।
लोक साहित्य के अध्येताओं को आप कौन-सा संदेश देना चाहते हैं?
यही कि जो जहाँ है, वह काम करें। तमाम लोकवार्ताओं का संग्रह टीम भावना से मिशन बनाकर करने की जरूरत है। हर विश्वविद्यालय महाविद्यालय में हिन्दी विभाग के अन्तर्गत लोकवार्ता प्रमाण बनाया जाये। सामग्री संकलित कराकर उस पर निरंतर कार्य कराया जाये।

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Saturday, January 31, 2009

स्वप्न

डा. महेंद्रभटनागर,



पागल सिरफिरे
किसी भटनागर ने
माननीय प्रधान-मंत्री .. की
हत्या कर दी,
भून दिया गोली से!!

ख़बर फैलते ही
लोगों ने घेर लिया मुझको -
‘भटनागर है,
मारो ... मारो ... साले को!
हत्यारा है ... हत्यारा है!’

मैंने उन्हें बहुत समझाया
चीख-चीख कर समझाया -
भाई, मैं वैसा ‘भटनागर’ नहीं!
अरे, यह तो फ़कत नाम है मेरा,
उपनाम (सरनेम) नहीं!

मैं
‘महेंद्रभटनागर हूँ,
या ‘महेंद्र’ हूँ
भटनागर-वटनागर नहीं,
भई, कदापि नहीं!
ज़रा, सोचो-समझो।

लेकिन भीड़ सोचती कब है?
तर्क सचाई सुनती कब है?
सब टूट पड़े मुझ पर
और राख कर दिया मेरा घर!!

इतिहास गवाही दे —
किन-किन ने / कब-कब / कहाँ-कहाँ
झेली यह विभीषिका,
यह ज़ुल्म सहा?
कब-कब / कहाँ-कहाँ
दरिन्दगी की ऐसी रौ में
मानव समाज
हो पथ-भ्रष्ट बहा?

वंश हमारा
धर्म हमारा
जोड़ा जाता है क्यों
नामों से, उपनामों से?
कोई सहज बता दे —
ईसाई हूँ या मुस्लिम
या फिर हिन्दू हूँ
(कार्यस्थ एक,
शूद्र कहीं का!)
कहा करे कि
‘नाम है मेरा - महेंद्रभटनागर,
जिसमें न छिपा है वंश, न धर्म!’
(न और कोई मर्म!)

अतः कहना सही नहीं -
‘क्या धरा है नाम में!’
अथवा
‘जात न पूछो साधु की!’
हे कबीर!
क्या कोई मानेगा बात तुम्हारी?
आख़िर,
कब मानेगा बात तुम्हारी?

‘शिक्षित’ समाज में,
‘सभ्य सुसंस्कृत’ समाज में
आदमी - सुरक्षित है कितना?
आदमी - अरक्षित है कितना?
हे सर्वज्ञ इलाही,
दे, सत्य गवाही!

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Thursday, January 29, 2009

पहल

डा. महेंद्रभटनागर

घबराए
डरे-सताए
मोहल्लों में / नगरों में / देशों में
यदि -
सब्र और सुकून की
बहती
सौम्य-धारा चाहिए,
आदमी-आदमी के बीच पनपता
यदि -
प्रेम-बंध गहरा भाईचारा चाहिए,
.
तो —
विवेकशून्य अंध-विश्वासों की
कन्दराओं में
अटके-भटके
आदमी को
इंसान नया बनना होगा।
युगानुरूप
नया समाज-शास्त्र
विरचना होगा!
तमाम खोखले
अप्रासंगिक
मज़हबी उसूलों को,
आडम्बरों को
त्याग कर
वैज्ञानिक विचार-भूमि पर
नयी उन्नत मानव-संस्कृति को
गढ़ना होगा।
अभिनव आलोक में
पूर्ण निष्ठा से
नयी दिशा में
बढ़ना होगा!
.
इंसानी रिश्तों को
सर्वोच्च मान कर
सहज स्वाभाविक रूप में
ढलना होगा,
स्थायी शान्ति-राह पर
आश्वस्त भाव से
अविराम अथक
चलना होगा!
.
कल्पित दिव्य शक्ति के स्थान पर
‘मनुजता अमर सत्य’
कहना होगा!
सम्पूर्ण विश्व को
परिवार एक
जान कर, मान कर
परस्पर मेल-मिलाप से
रहना होगा!
.
वर्तमान की चुनौतियों से
जूझते हुए
जीवन वास्तव को
चुनना होगा!
हर मनुष्य की
राग-भावना, विचारणा को
गुनना-सुनना होगा!

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Thursday, January 22, 2009

दंगे-फसाद कुछ लोगों के बनाये भ्रम हैं : एक साधारण होटल वाला



डॉ. मेराज अहमद
सबसे पहले आप अपना नाम और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में थोड़ा-सा बतायें?
मेरा नाम चन्द्र प्रकाश है उम्र पचास-पचपन के बीच है। मैं आगरा में पैदा हुआ और मेरी तीन बेटियाँ हैं और एक बेटा है।
आप काम क्या करते है?
मैं एक होटल चलाता हूँ। यही साधारण-सा चाय पानी का।
कब से?
३५ साल हो गए।
आपने पढ़ाई कितनी की है?
मैंने इंटर किया है।
कहाँ से?
आगरा बी.आर. कालेज से किया है।
उसमें पढ़ने-लिखने में आपकी रुचि थी?
हाँ, मेरी बहुत अच्छी परसेंटेज रही है। मैंने डिप्लोमा इंजीनियरिंग भी किया है।
डिप्लोमा इंजीनियरिंग भी किया लेकिन होटल के व्यवसाय में आ गये तो क्या इससे संतुष्ट हैं?
हाँ, अब तो जीवन कट ही रहा है समय ही कितना बचा है? रोजी-रोटी चल ही रही है।
क्या मन में कसक उठती है कि पढ़ाई की और नौकरी नहीं मिली?
नौकरी की थी रेलवे में लेकिन बीमार हो गया इसलिए छूट गई।
बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में रुचि?
बहुत है। बड़ी बच्ची मेरी सऊदी अरब में वहाँ इंटरनेशनल कॉन्वेन्ट में पढ़ाती है। दूसरी भी एम.ए. के बाद शादी हो गई, तीसरी एम.ए. कर चुकी है। बी.एड. की तैयारी कर रही है।
बेटे?
बेटा मेरा इंजीनियरिंग कर रहा है।
आपने अपने बच्चों के अलावा परिवार के दूसरे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में क्या सोचते हैं?
पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है। मेरा तो मानना है कि आधे पेट खाकर बच्चों को पढ़ाना-लिखाना चाहिए।
क्या भविष्य में चाहेंगे कि आपके घर-परिवार के बच्चे इसी व्यवसाय में आयें?
कभी नहीं चाहेंगे।
क्यों नहीं चाहेंगे?
क्योंकि इसमें शांति नहीं है। इसके अलावा दूसरी तरफ देखने का मौका नहीं मिलता है।
आपको ऐसा नहीं लगता कि अगर वह दूसरे पेशे में होगा तो सामाजिक प्रतिष्ठा अधिक होगी?
बिल्कुल, पढ़ने-लिखने के बाद तो कुछ भी कर सकता है। देखिए, पढ़ाई के बल पर आज मेरी बच्ची बाहर है।
क्या आपको बच्ची का उल्लेख करके गौरव की अनुभूति होती है?
बहुत खुशी होती है साहब, बयान नहीं कर सकते हैं।
क्या पढ़ने-लिखने में रुचि है, यानी पुस्तक, अखबार और पत्रिाकाएँ बगैरह पढ़ते हैं?
पढ़ता तो प्रतिदिन हूँ। अखबार-अमर उजाला, इसमें देश की विदेश की जो भी खबरें होती हैं।
किताबें पढ़ने में रुचि है आपकी?
हाँ-हाँ।
कैसी किताबें?
कुछ धार्मिक किताबें और कुछ सामाजिक किताबें पढ़ता रहता हूँ
साहित्य के बारे में कुछ सुना है आपने?
हाँ।
क्या सुना है?
साहित्य कई प्रकार के होते हैं जैसे-सामाजिक साहित्य होता है, आर्थिक यानी बिजनेस परपज से होता है। ज्यादातर मैं बिजनेस के बारे में पढ़ता रहता हूँ।
कहानी, कविता, उपन्यास आदि के बारे में कुछ सुना है?
हाँ।
जो लिखते हैं कैसे लोग होते है?
अच्छे ही होते हैं।
यानी लिखना चाहिए।
जरूर। इससे आने वाली पीढ़ी को लाभ मिलता है।
कभी कुछ साहित्य नहीं पढ़ा?
पढ़ा तो है लेकिन पिछले १० सालों से कुछ नहीं पढ़ा।
पहले क्या पढ़ते थे?
जैसे कहानियाँ बहुत निकलती थीं अखबारों में मडर के केस होत थे।
आजकल?
नहीं
जो भी पढ़ते हैं उसका क्या महत्त्व होता है?
इसके जरिये हम जानकारी लेते हैं कहीं बम फट गया, अक्सर मन में यह भी आता है कि कोई एकाक बम मेरी दुकान में न रख जाए। तो इस तरीके से लाभ है।
कुछ पुस्तकें पढ़ने का मन होता है?
होता तो है लेकिन टाइम नहीं मिल पाता है।
मिले तो कैसी किताबें पढ़ना चाहेंगे?
धार्मिक हों, सामाजिक हों, जीवन अच्छे ढंग से बिताने का संस्कार हो।
आपने कहा कि अब के साहित्य से परिचित नहीं हूँ लेकिन साहित्य के बारे में जानते हैं तो जो साहित्य लिखा जा रहा है उससे परिचित होना चाहेंगे?
हाँ, बिल्कुल।
अच्छा मैं बताता हूँ एक नाम है प्रेमचन्द उनके बारे में कुछ सुना है?
प्रेमचन्द जी की मैंने कहानियाँ पढ़ी हैं। परीक्षाओं में उनकी कहानियों के बारे में पूछा जाता था। उनके नाम से तो खूब परिचित हूँ। उनकी कहानी जैसे दो बैलों की जोड़ी.... और?
ईदगाह?
हाँ।
नशा?
हाँ-हाँ, नशा।
और भी कोई नाम बताइये सोचकर साहित्यकारों का?
याद नहीं।
तुलसीदास का नाम सुना है?
तुलसीदास का, कालीदास का सुना है, सूरदास, कबीर हैं।
आजकल जो आपके आसपास इसी शहर के हैं। उनका नाम सुना है?
.....
अलीगढ़ के मशहूर साहित्यकार गोपाल दास नीरज का नाम सुना है?
उनका नाम पढ़ा है अखबार में, सुना भी है सरकार ने बहुत सारे इनाम भी दिये लेकिन कविताएँ कोई याद नहीं।
आपके होटल में कैसे लोग आते हैं?
सभी तरीके के लोग आते हैं। यूनीवर्सिटी एम्प्लाईज, स्टूडैन्ट्स, नेता वगैरह भी। इसमें दोनों तरह के होते हैं - अच्छे और बुरे।
नेताओं से आपकी है पहचान?
हाँ, जिले के जितने बड़े-बड़े नेता हैं जैसे- विधायक है, एम.पी. है। सबसे पहचान है।
क्या कभी राजनीति पर इन लोगों से बात होती है?
बिल्कुल नहीं! न मेरा राजनीति से लगाव है न ही इन लोगों से कभी काम ही पड़ता है।
आप ऐसी जगह हैं जहाँ अक्सर नेताओं की भाषण और मीटिंग होती हैं क्या उसे कभी सुनने जाते हैं।
बिल्कुल नहीं?
अच्छा ये जो आज आन्दोलन दलित का चला है इसके बारे में कुछ सुना है?
देखो जी, आन्दोलन वान्दोलन कुछ नहीं यह तो राजनीति है, दलित आजकल कौन हैं? जो गलत आमाल करता है शराब पीता है। दलितों की यही पहचान है।
कभी आपने सोचने की कोशिश की? वह शराब और गलत आमाल क्यों करता है?
इसमें दो चीजें होती है एक तो माहौल ऐसा होता है और दूसरा संस्कार ऐसा होता है जो नहीं भी पीने वाला होता है, वह भी पीने लगता है। ऐसा होना नहीं चाहिए। अगर छोड़ दें तो बच्चे पढ़-लिख सकते हैं?
आपने बताया कि आपके होटल में तरह-तरह के लोग आते हैं तो एक ग्राहक के बजाए उनसे एक आदमी की हैसियत से आये तो उनसे मिलकर आपको कैसा लगता है।
अच्छा लगता है। खासतौर से जो स्टूडैन्ट आते हैं उनसे मिल करके बहुत अच्छा लगता है।
अच्छा चन्द्रप्रकाश जी यह बताइये कि समाज और देश के जो हालात कैसे हैं?
बहुत बुरे है राजनीति ने सबसे ज्यादा इसे खराब कर रखा है। हमारे देश की राजनीति विदेशों पर निर्भर हो गयी है। लगता है उनका विदेशों में कोई कन्टेक्ट है जबकि हमारे अपने अन्दर कोई कमी नहीं। नेता लोग चीजों को सही से समझते नहीं। महँगाई को ही ले लीजिए कितना खरीदना है कितना बेचना है अगर सही से हिसाब रखते हो तो क्या मँहगाई इतनी बढ़ती।
कहीं आप भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहे हैं।
बिल्कुल, यही तो गरीबी की जड़ में है।
क्या आप अपनी सामाजिक हैसियत से संतुष्ट हैं।
हाँ, असल बात तो परिवार की होती है। अगर परिवार सही है तो सब ठीक। मान-सम्मान उसी से मिलता है। संस्कार अच्छे होने चाहिए फिर समाज अपने आप ही सम्मान देता है।
आपको सबसे अच्छा नेता कौन लगता है?
मनमोहन सिंह इस समय सबसे अच्छे नेता हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आपको कौन पार्टी सबसे अधिक पसंद है?
कोई नहीं, यहाँ तो किसी ने हिन्दूवाद फैलाया है किसी ने दलितवाद फैलाया है, मुलायम सिंह ने गुण्डावाद फैलाया है। किसी से संतुष्ट नहीं हूँ।
तो फिर कैसी होनी चाहिए राजनीति?
साफ सुथरी होनी चाहिए। न हिन्दूवाद हो न मुस्लिमवाद हो।
अच्छा आप ऐसे शहर में रहते है। जो दंगों के लिए मशहूर है आपने भी दंगे झेले होंगे इस पर कुछ कहना चाहेंगे।
मेरा तो साफ कहना है कि आवाम को इससे कुछ लेना देना नहीं है। दरअसल पूँजीपति अपने लाभ के लिए व्यवसाय में फायदे के लिए करवाते हैं। एक बार दंगा हुआ माल को गोदाम में जमा किया और बाद में लाभ ही लाभ। हफ्ते में करोड़ो के माल बना लेते हैं।
दंगे?
पूँजीपतियों के खेल हैं।
लड़ाई तो आवाम लड़ता है आपस में?
वह बिल्कुल नहीं लड़ना चाहता लेकिन उन्हें भरमा के किसी को कुछ पैसे देके या दारू पिला के दंगों में झौंक दिया जाता है।
आप कैसे इलाके में रहते हैं?
जिस इलाके में रहता हूँ वहाँ ९०-९५ प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।
तो क्या आपको या आपके परिवार को कोई परेशानी होती है?
कोई परेशानी नहीं होती है। हम लोग मिल जुल के रहते हैं। हमारे कई मुस्लिम दोस्त हैं जो हमारे सुख-दुख में हमारे साथ खड़े रहने के लिये तैयार रहते हैं। कभी-कभी दंगा फंगा हो भी जाते है तो मुझसे लोग यही कहते हैं कि निशंक होकर सोवो हम लोग हैं।
यानी कि...?
यह दंगे फसाद कुछ लोगों के बनाये हुए और भ्रम हैं।

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Wednesday, January 21, 2009

श्रेयस्

डा. महेंद्रभटनागर,.

सृष्टि में वरेण्य
एक-मात्र
स्नेह-प्यार भावना!
मनुष्य की
मनुष्य-लोक मध्य,
सर्व जन-समष्टि मध्य
राग-प्रीति भावना!
.
समस्त जीव-जन्तु मध्य
अशेष हो
मनुष्य की दयालुता!
यही
महान श्रेष्ठतम उपासना!
.
विश्व में
हरेक व्यक्ति
रात-दिन
सतत
यही करे
पवित्र प्रकर्ष साधना!
.
व्यक्ति-व्यक्ति में जगे
यही
सरल-तरल अबोध निष्कपट
एकनिष्ठ चाहना!
.

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Tuesday, January 20, 2009

विपत्ति-ग्रस्त

डा. महेंद्र भटनागर

बारिश
थमने का नाम नहीं लेती,
जल में डूबे
गाँवों-क़स्बों को
थोड़ा भी
आराम नहीं देती!
सचमुच,
इस बरस तो क़हर ही
टूट पड़ा है,
देवा, भौचक खामोश
खड़ा है!
.
ढह गया घरौंधा
छप्पर-टप्पर,
बस, असबाब पड़ा है
औंधा!
.
आटा-दाल गया सब बह,
देवा, भूखा रह!
.
इंधन गीला
नहीं जलेगा चूल्हा,
तैर रहा है चैका
रहा-सहा!
.
घन-घन करते
नभ में वायुयान
मँडराते
गिद्धों जैसे!
शायद,
नेता
मंत्री आये
करने चेहलक़दमी,
उत्तर-दक्षिण
पूरब-पश्चिम
छायी
ग़मी-ग़मी!
अफ़सोस
कि बारिश नहीं थमी!

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Monday, January 19, 2009

उद्देश्यपूर्ण पत्रिका


-[वाड्मय]- यूं तो राही मासूम रजा पर अनेक पत्रिकाओं ने विशेष अंक प्रकाशित किए हैं परन्तु राही की बहुमुखी रचनात्मक प्रतिभा के अनेक रंगों को उजागर करती हुई दुर्लभ सामग्री से भरपूर है त्रैमासिक पत्रिका वाड्मय का राही मासूम रजा अंक। प्रथम खंड में प्रताप दीक्षित के परिचयात्मक लेख के साथ राही की चुनी हुई 7 कहानियां हैं। दूसरे खंड में उनके लेखन की बहुकोणीय पडताल और मीमांसा है। साक्षात्कार खंड में प्रेम कुमार की उनकी संगिनी नैयर रजा से बेहद दिलचस्प और बेबाक बातचीत है जो इस आयोजन की उपलब्धि है। हिंदी सिनेमा को राही के योगदान पर प्रकाश डालते हुए चौथा खंड अपने में विशिष्ट और महत्वपूर्ण है। -[वाड्मय/ सं. डा.एम.फीरोज अहमद] http://in.jagran.yahoo.com/sahitya/?page=slideshow&articleid=1969&category=11#0

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