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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Friday, November 14, 2008

काफी है

SEEMA GUPTA


वफ़ा का मेरी अब और क्या हसीं इनाम मिले मुझको,
जिन्दगी भर दगाबाजी का सिर पे एक इल्जाम काफी है.
बनके दीवार दुनिया के निशाने खंजर से बचाया था,
होठ सी के नाम को भी राजे दिल मे छुपाया था,
उसी महबूब के हाथों यूं नामे-ऐ -बदनाम काफी है ...
यादों मे जागकर जिनकी रात भर आँखों को जलाते थे ,
सोच कर पल पल उनकी बात होश तक भी गवाते थे ,
मुकम-ऐ- मोह्हब्त मे मिली तन्हाई का एहसान काफी है….
कभी लम्बी लम्बी मुलाकतें, और सर्द वो चांदनी रातें,
चाहत से भरे नगमे अब वो अफसाने अधुरें है ,
जीने को सिर्फ़ जहर –ऐ - जुदाई का ये भी अंजाम काफी है

2 comments:

seema gupta November 14, 2008 at 2:31 PM  

" thanks Shagufta jee for presenting my poem on this blog"

Regards

seema gupta

गुफरान सिद्दीकी November 14, 2008 at 4:31 PM  

सीमा जी यु तो अक्सर कोई ग़ज़ल शेर या चिटठा पड़ने के बाद उस पर अपने विचार देता रहता हूँ लेकिन आज शायद दूसरी बार आपको पढा इससे पहले भी अपने विचार लिखने में मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी और आज मुझे शब्द नहीं मिल रहे है................,

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