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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Wednesday, December 17, 2008

आवाज़

अमृता प्रीतम




बरसों की राहें चीर कर
तेरी आवाज़ आयी है
सस्सी के पैरों को जैसे
किसी ने मरहम लगाई है...

आज किसी के सिर से
जैसे हुमा गुज़र गया
चाँद ने रात के बालों में
जैसे फूल टाँक दिया

नींद के होठों से जैसे
सपने की महक आती है
पहली किरण रात की
जब माँग में सिन्दूर भरती है...

हर एक हर्फ़ के बदन
तेरी महक आती रही
मुहब्बत के पहले गीत की
पहली सतर गाती रही

हसरत के धागे जोड़ कर
हम ओढ़नी बुनते रहे
बिरहा की हिचकी में भी हम
शहनाई सुनते रहे...

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