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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, November 1, 2008

एक दोयम दर्जे का प्रेम-पत्र

मौ० आरिफ
प्रिय.....समीरा।लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझनामरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना ।हँसो मत समीरा पूरा खत पढ़ लो फिर चाहे जो करना। उस शेर का बुरा मत मानना। तुम सोच रही हो कि क्या आज भी मेरे पास इस सस्ते सड़क छाप शेर के अलावा कुछ लिखने को नहीं है। मुँह का स्वाद अगर खराब हो गया है तो माफी चाहता हूँ...पर क्या करूँ, मैं हूँ ही ऐसा और इसे तुमसे बेहतर कौन समझ सकता है?हुआ यूँ कि अपने एक साहित्यकार मित्र की एक पुस्तक वह जो यथार्थ था पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा था - बचपन के अनुभवों की स्मृति स्त्री-पुरुष के पहले-पहले प्यार की तरह है जो अद्वितीय और अविस्मरणीय होती है। बस तुम याद आ गईं। जीवन का एक काल-खण्ड सजीव हो गया जो सिर्फ मेरा और तुम्हारा है। वह एक साल-हमारा एक साल-तुम्हारे पति और मेरी पत्नी से अनछुआ....प्रेमपत्र।अन्दर क्या-क्या घट रहा है कैसे बताऊँ। आँखों के सामने बमुश्किल ही कौंध पाता है वह सब। पर सच तो यह है कि तुमसे कभी भी मुक्त नहीं हो सका पूरी तरह....तुम्हें प्यार करना बन्द कर दिया तब भी। तुम यही कहीं रही हो...सदा...लेकिन जिन अनगिनत कोणों से तुम्हें कभी देखा था...देखता था, वे कोण अब नहीं बनते। वे लकीरें अब आपस में नहीं मिलती। मिलकर नये चित्र नहीं रचतीं।जिस दिन मित्र की पुस्तक में वे पंक्तियाँ पढ़कर तुम्हारे बारे में सोचने लगा, उसी रात सपने में तुम आईं। अपनी माँ के साथ तुम छत पर बैठी थीं। शायद उनका पैर दबा रही थीं। जाने कहाँ से मैं पहुँच गया। मैं भी नीचे ही बैठ गया। मुझे अचरज हुआ कि तुम्हारी मम्मी मुझसे अच्छी-अच्छी बातें कर रही हैं। उन दिनों...किन दिनों....याद करो...बहुत दिनों पहले....बहुत-बहुत दिनों पहले...युगों पहले....जब छोटे शहरों की सड़कें इतनी भरी-भरी नहीं होती थीं...जब जाड़े की इतवारों को सबकुछ कितना शांत और सुलझा हुआ रहता था....तब तो तुम्हारी मम्मी मुझे तुम्हारी ओर ताकने भी नहीं देती थीं।हम लोग उन दिनों कितने बड़े थे? बहुत छोटे थे क्या? इतने छोटे भी नहीं थे कि लोग हमें बेहिचक एक दूसरे से मिलने-जुलने की खुली छूट देते। कब देखा था तुम्हें पहली बार? कौन सा जुमला था जो पहली बार मैंने तुमसे बोला था? कौन सा दिन था वह? शायद किसी त्योहार का दिन था जब मैंने तुमसे पूछा था - किस क्लास में पढ़ती हो तुम? तुम्हें तो जैसे इसी का इंतजार था। बस शुरू हो गई थी तुम। कृष्णजन्माष्टमी के बहाने एक दिन में तीन बार डे्रस चेंज किया था तुमने। हर बार मुझे और अच्छी लगी थीं तुम।हो सकता है तुम्हें लगे मैं एक जजबाती और रूमानी मनचले किशोर में तब्दील हो गया हूँ। आई डोंट केयर। मैं देख रहा हूँ एक लड़की को...गाती, गुनगुनाती....कभी छत की रेलिंग से लटकी....कभी यों ही घूमती टहलती...कुछ तलाशती। और देख रहा हूँ तुम्हें मुस्कुराते, हँसते खिलखिलाते। .....चलते हुए, रिक्शे पर बैठे हुए...बैग लेकर स्कूल से आते हुए.....छत पर खड़ी होकर कंघी करते हुए। कभी एक चोटी में तो कभी दो चोटी में तो कभी खुले बालों में मेरे कमरे के सामने से गुजरते हुए।जिस दिन तुम्हें छत पर बैठकर अपनी माँ का पैर दबाते हुए सपने में देखा उसके दूसरे ही दिन बाजार गया। दिलो-दिमाग पर तो तुम छायी ही थी। एक दुकान पर खड़ी दो महिलाओं को ऊन के लच्छों पर हाथ फेरते देखा। उनमें से एक वाकई सुन्दर थी। दूसरी बस ठीक-ठाक। मोटी कुछ चौड़ी-चौड़ी.....बेतरतीबी से साड़ी पहने हुए...बड़ा सा पर्स टांगे। वह तुम्हारे जैसी लग रही थी। मैं उसे गौर से देखने लगा। वह तुम्हारे जैसी ही थी। बिल्कुल तुम। क्या वह तुम थी समीरा? जब वह महिला दुकान से बाहर आई तो मैंने उसकी चाल पर गौर किया। मैंने सोचा बड़ी होकर तुम इसी महिला की तरह हो गई होगी। उसकी चाल तुम्हारी चाल से कितना मेल खाती थी। उसका बच्चा उसे तंग कर रहा था और उसे डाँटने के लिए वह मुड़ी तो मैंने देखा कि सुन्दर होते हुए भी वह आकर्षक नहीं लग रही थी। सचमुच मुझे बहुत निराशा हुई। कितनी आकर्षक हुआ करती थीं तुम! कितना खिचाव होता था तुम्हारे चेहरे में! गौर से देखा तो उसकी चाल बड़ी बदनुमा लगी। पहले तो तुम ऐसे नहीं चलती थीं समीरा। पर शायद अब ऐसे ही चलने लगी हो। कितनी तीखी और बेसुरी आवाज में उसने डाँटा था अपने बच्चे को। और डाँटे ही जा रही थी....बिना इस बात की परवाह किये कि अगल-बगल के लोग भी देखने लगे हैं।घर लौटा तो तुम्हारे बारे में सोचता रहा। जाने क्यों एक तरह की वितृष्णा से भर गया। मुझे लगा मैं तुम्हें इस रूप में नहीं देख सकता। सपने में कितनी सुन्दर, कितनी भोली-भाली लगीं थीं तुम। बिन-ब्याही रह गई थीं तुम मेरी प्रतीक्षा करते। पर सामने से देखने पर कैसी हो गई थी। अपने बड़े, विवाहित रूप में तुम ऐसी हो जाओगी मैंने कल्पना में भी नहीं सोचा था।पर मुझे इन चीजों से क्या लेना देना। तुम्हारा वर्तमान मेरा सरोकार नहीं है समीरा। मेरा संबंध तो तुम्हारे भूतकाल से है। तुम्हारे बीते जीवन के उस साल से जब तुम बसंत में पुष्प की तरह खिली थीं। तुम्हारे उस कालखण्ड पर तुम्हारे बाद मेरा अधिकार है। केवल मेरा।तुम्हें खत लिखने की एक वजह यह भी है। मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम कभी मेरी थीं। बस मुझे जिद सवार हो गई है कि तुम्हें बताऊँ कि हम दोनों ही कभी एक दूसरे को कितना चाहते थे। मरते थे एक-दूसरे पर। किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है। कितने ही लोगों के साथ ऐसा हो चुका है। हमारे तुम्हारे साथ भी ऐसा हुआ।खत लिखने के दो कारण और हैं। उतने ही मजबूत जितने बाकी जो मैंने गिनाये। एक तो यह कि मैं मन ही मन अपनी पत्नी को जताना चाहता हूँ कि उसके अलावा भी मुझे चाहने वाला कोई गुजर चुका है। ऐसी चाहत का हकदार मैं रह चुका हूँ जिसे लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता।साथ ही तुम्हारे पति से न जाने क्यों मुझे ईर्श्या हो रही है। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि जनाब जो स्त्री आप पर जान छिड़कती है, आपको रोज रिझाती है, आपके लिए रोज खाना पकाती है, आपके बच्चे पाल पोश रही है, आपके साथ हम-बिस्तर होती है, आपके घर की मालकिन है, वह कभी मेरी थी। पूरी की पूरी मेरी। प्रेम का पहला अंकुर जब उसके दिल में फूटा तो उसने मुझे अपने सामने पाया। मोहब्बत से लबरेज थी वह.... और पूरा का पूरा प्रेम उसने मुझ पर उडेल दिया था-आखिरी बूँद तक। उसका निश्छल प्रथम प्रेम और अपनी पूरी तीव्रता और वेग के साथ मेरे नसीब में बदा था और मुझे हासिल हुआ। आप जो पा रहे हैं वह अगर आपको नहीं मिलता तो किसी और को मिलता-या फिर किसी और को....। मुझे जो मिला वह प्रकृति का दिया हुआ प्रथम पुष्प था-पहली बहार की खुशबू समेटे-जो मेरी प्रेयसी ने मुझ पर लुटा दिया।नेचर ने जब उसके बदन को गमकाया तो वह मेरे सामने प्रस्तुत हुई। मैंने उसे सूंघा, सराहा। उसके कुँआरे शरीर की गंध मस्त कर देने वाली थी। जिस गंध को आप जानते होंगे। वह. वह नहीं थी। तब वह परफ्यूम और शैम्पू और मेकअप नहीं लगाती थी। उसके बदन की सच्ची खुशबू से सिर्फ मैं वाकिफ हूँ। आप नहीं। जब वह जवान हो रही थी उस दौर को मैंने जाना है, देखा है। मैं गवाही देता हूँ कि एक अजीब दौर था। अजीब समय था।.....शब्दों से परे है आवारा हवाओं का वह खूबसूरत मौसम। वह बयार अब क्यों नहीं बहती....।कच्ची उमर का आकषर्ण समझकर आप इसे दरकिनार न कर दीजिएगा। यह एक सच्चाई है, फैक्ट है हम दोनों के जीवन का। इसने आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा है.... और शायद आपकी वाइफ का भी। पता नहीं आप उसे किस उमर में मिले...मेरी उससे भेंट तब हुई जब वह सोलह की थी और मैं उससे एक साल बड़ा। पहली ही नजर में मर मिटी थी वह मुझ पर वह मुझे एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं होने देना चाहती थी....रोती थी मेरे लिए....हँसती थी मेरे लिए.....पूजती थी मुझे। राह तकते छत पर छुपी खड़ी रहती थी। पागल दिवाने थे हम दोनों एक दूसरे के लिए। मैं हिम्मत दिखाता तो वह मेरे साथ भाग सकती थी....मैं उकसाता तो वह आत्महत्या तक कर लेती।बाढ़ आई नदी को देखा है आपने? बौराये पेड़ पर नजर डाली है? बिना लगाम के घोड़े से पाला पड़ा है? कुछ ऐसा था उसके प्यार का आवेग-ऐसी थी उसके प्यार की लज्जत। बिना किसी से डरे, बिना किसी की परवाह किये वह मुझे प्रेम करती थी। भाई बुरा नहीं मानना, आपके पास तो वह एक नधी हुई घोड़ी बनकर गई है। आप उसके अंगों की गोपनीयता से परिचित होंगे। आपका सबकुछ.....पर मेरा वह पहला चुम्बन, वह बोसा, जो उसे चकित कर गया था... आपकी सभी क्रीड़ाओं पर भारी है। नहीं भूल सकती वह कभी उसे। फिर असीमित, अनगिनत चुंबनों की उसकी चाह....मैं कैसे भूल सकता हूँ।आप उससे कैसे मिले? आपको उससे जन्मपत्री ने मिलाया होगा, या किसी बिचौलिये ने या फिर आप लोगों के परिवार वालों ने। हमें हमारी उम्र ने मिलाया था हमारे नसीब ने मिलाया था। हमें मौसमों ने मिलाया था, बादलों, बिजलियों, नदियों, तालों, पहाड़ों और सागरों ने मिलाया था। सड़कों और रेल की पटरियों ने मिलाया था। जाड़े-पाले, धूप-लू और सर्द हवाओं ने मिली भगत की थी हमें मिलाने के लिए। चाँद, सूरज, तारों, सितारों ने शडयंत्र किया था मुझे और उसे एक-दूसरे के करीब लाने के लिए।अपनी माँ से जब उसने कुछ पकाना सीखा तो सबसे पहले मुझे खिलाया था। उसके हाथ का बुना हुआ पहला स्वेटर और पहला मफलर मेरे हिस्से में आया। मैं उसे प्यार से बिल्ली कहता था....पता नहीं क्यों। क्या आपने भी उसे कोई प्यार का नाम दिया है? मुझे पता है आप किस उम्र में उसे मिले हैं ऐसे में आपका शब्दकोश इन शरारतों के लिए नाकाफी है। आज वह आपके बच्चों को स्कूल भेजती है, उनका होमवर्क पूरा कराती है अच्छे रिजल्ट के लिए दिन-रात एक कर देती है। उसे स्वयं पढ़ते-लिखते मैंने नहीं देखा था....फेल होते-होते बची थी वह...कितनी बार स्कूल का नागा किया था उसने मेरी खातिर। अगर मैं कभी नाराज हो जाता....उससे एक-दो दिन बात नहीं करता तो बस डबडबाई आँख लेकर छत के मुंडेरी से लगकर खड़ी रहती-दूसरी दिशा में ताकते।कभी चिट्ठी लिखती है आपको? यही न....बच्चों की तबीयत....उनकी पढ़ाई, घर का खर्च, आपके माता-पिता का समाचार... उनकी दवा दारू...। मुझे अपने खतों में बताया करती थी हवा कैसी बही... कौन सा गाना सुनकर उदास हो गई..... कहाँ थे दो दिन से देखा नहीं.....नीला स्वेटर क्यों नहीं पहने.....कि मैं खम्भे के पास क्यों नहीं खड़ा था....कि वह वही वाला लव-इन-टोकियो लग गई थी मैंने क्यों नहीं देखा...कि अबकी गर्मियों में मामा के यहाँ जायेगी....मन नहीं है तब भी।पर मेरे भाई, क्या कर दिया तुमने उसकी मासूमियत और चंचलता को। उसकी खूबसूरत सादगी को...। तुम्हारे साथ रहते-रहते कितनी बेडौल हो गई है। कहाँ गई उसकी मनभावन काया, क्यूँ नजर लगा दिया तुमने उसकी कोयल जैसी आवाज को। उस दिन कैसे डाँट रही थी अपने बच्चे को बाजार में....कितना कर्कश स्वर था उसका। साड़ी और गहने में लदी फंदी रखते हो उसको। कितना ढेर सारा पाउडर लीपती है चेहरे पर अब। क्या से क्या कर दिया तुमने मेरी जान को। उसकी बेलाग हँसी भी खा गये....कहाँ फेंक आये मेरी रानी के पुराने कपड़ो को.... वो फ्रॉकें....वो स्कर्ट ब्लाउज....वो शर्ट और बेलबॉटम।समीरा, देख रही हो मैं कितना बहक गया हूँ। तुम्हें खत लिखने बैठा था, तुम्हारे पति से दो-दो हाथ करने लगा। खत इतना लम्बा हो गया है कि डर है तुम आधे पर ही मोड़कर रख दोगी। ऊपर से वह शेर...जो मैंने खत के शुरू में लिखा है....मूड तो तुम्हारा खराब होगा ही। लेकिन पेन बन्द करने से पहले एक बात बताता चलूँ समीरा। मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हारी एक विचित्र सी इमेज मेरे मस्तिष्क में बनी थी। मैं किनारे वाले कमरे में बैठा था...जिसकी खिड़की सड़क पर खुलती थी। हाथ में किताब लिए तुम किसी लड़की से बात कर रही थीं। कुछ ऊँची सी....टाइट सी फ्रॉक पहन रखी थी तुमने। तुम्हारी टाँगों का ज्यादा हिस्सा तुम्हारी फ्रॉक से बाहर था। मुझे याद पड़ रहा है कि मुझे सब कुछ बहुत अच्छा लगा था। मैंने साथ वाले लड़के से पूछा कौन है ये। समीरा, इस मुहल्ले में बस अकेली है.....उसने कहा था। जैसे ही तुम किताब हाथ में झुलाते खिड़की के सामने से गुजरी, वह बोला-क्या चीज है! तुम सहसा धीरे हुई....पहले कनखियों से...फिर लगभग घूरते हुए तुमने खिड़की के अन्दर देखा और फिर बढ़ गईं। अगर मैं सीधे शब्दों में कहूं तो तुम्हारे अन्दर मुझे आत्म-विश्वास और स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ दिखाई पड़ा। याद पड़ रहा है कि मैंने मन ही मन कहा था बोल्ड एण्ड ब्युटीफुल। लड़कियों की एक डरपोक और शर्मीली इमेज मेरे दिमाग में थी। जो मैंने देखा वह उससे मेल नहीं खाया। सच मानो समीरा...मैं कुछ डर सा गया। सोचने लगा...तुम इसी मुहल्ले में रहती हो....कहीं अकेले न टकरा जाओ....मेरी किसी बात को कमेंट न समझ बैठो।पर पहली ही नज+र में तुम मुझ पर मर मिटी थीं। तुम्हारा आत्मविश्वास, तुम्हारा स्वाभिमान, तुम्हारा वह खिड़की में घूरना, तुम्हारी बोल्डनेस....कहाँ चली गई थी जब तुमने मुझे देखा। देखती ही रहती थी....देखने के कितने बहाने....कितनी जगहें खोज लेती थीं तुम। कैसे-कैसे पत्र लिखती थी तुम...लगता नहीं था मेरी बोल्ड एवं ब्युटीफुल इतनी रोमांटिक है अन्दर से।और समीरा....जब आखिरी बार तुम कमरे में आई थीं....जब मैं जा रहा था...जब हम अलग हो रहे थे....तुम मुझसे लगकर कितना-कितना रोई थीं। हिचकियाँ बंध गई थीं तुम्हें...कोई सुन न ले...इसलिए धीरे-धीरे रो रही थीं तुम। जिस तरह से तुम मुझसे लगी थीं...मालूम पड़ता था। जैसे तुम्हारे अन्दर कोई वजन ही नहीं है...एकदम हल्की गुड़िया जैसे था तुम्हारा स्पर्श और तुम्हारा आलिंगन। भिगो दिया था तुमने मेरी शर्ट के ऊपरी हिस्से को।नहीं मालूम कि जिस समय में हम लोग जी रहे हैं....जिन स्थितियों से घिरे हुए हैं....जो हमारे सरोकार हैं....जो एक आदर्श स्थिति की मांग होती है...उसमें प्रेम और प्रेमपत्र का कोई स्थान होना भी चाहिए या नहीं। पर यकीन मानो, मेरी बोल्ड एण्ड ब्युटीफुल मेरा यकीन करो, तुम्हारे आँसुओं से आज तक धुल रहा हूँ......मेरा पूरा सीना जहाँ तुमने सर रखकर आँसू बहाया था तर-बतर है। वह दृश्य मुझे हल्का और बेदाग बना रहा है।बस । तुम्हारा मानिक।अंत में एक शेर और...समीरा डोंट माइंड। जानती हो.... मैं हूँ ही ऐसा। तुम्हारा प्रेमी रहा हूँ.....मेरे इस पहलू को तुमसे बेहतर कौन जान सकता है।तुम मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर कहीं नाराज न होनाअपने खूसट पति से डरकर कहीं फाड़ न देना।यह सब लिखने के बाद कुछ अजीब सी कैफियत हो रही है मेरी। ऐसी जजबाती, बचकानी बातें कलमबन्द करके सच पूछो तो मैं खुद को काफी कमतर पा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द है एम्ब्रेस्ड... बस ऐसा ही फील कर रहा हूँ...कुछ-कुछ शर्मिन्दा सा। कैसी ओछी बातें मैंने लिख दी हैं। कुछ पागलपन जैसा नहीं लगता.....हाँ। तुम सोच रही होगी आखिर इस आदमी को कितनी फुर्सत है...कोई काम धाम नहीं जो प्यार मुहब्बत की बातें लेकर बैठ गया। कब की.....कौन सी बात...अब याद करता फिर रहा है। बनावटी मजनूँ।इस तरह की रूमानियत भरी चाइल्डिश बातें एक विवाहित महिला के बारे में लिखने की जुर्रत कैसे की इसने। जिन तारों को झनझनाने की कोशिश मैंने किया है उनका संगीत कब का अर्थहीन हो चुका है। मुझे महसूस हो रहा है तुम मेरा खत पढ़कर मेरा मजाक उड़ाओगी। अपने धीर गंभीर पति को हँस-हँसकर पढ़ाओगी। यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी मेरा पत्र दिखाओगी। कहोगी उनसे कि तुम्हारे पड़ोस में एक पागल बेहूदा लड़का रहता था जो वक्त के साथ मेच्योर नहीं हुआ। कैसी अधकचरी अभिव्यक्ति है उसकी। कैसा भौंडा प्रदर्शन किया है उसने अपनी दबी हुई कामेच्छा का.. अपनी कुंठा का। भद्र शालीन महिलाओं से कैसे पेश आते हैं नहीं सीख सका यह मजनूँ। क्या उसकी पत्नी किसी और को चाहती है। क्या उसके बच्चे बड़े नहीं हुए । क्या वह इतना कमजोर रह गया कि सोलह-सत्तरह साल की उम्र में देखा-देखी को इतने सालों बाद प्रेम और विछोह का जामा पहनाकर सहानुभूति हासिल करना चाहता हैं। कैसा घटिया रूमानी, दोयम दर्जे का प्रेमपत्र लिखा है इस आदमी ने।सचमुच मैं यही सोचकर शर्मिन्दगी और बेचारगी से सराबोर हूँ। तुम मेरी खिल्ली उड़ा रही हो....और मुझे इसी बात का डर था। और सच यह भी है कि इस पल मैं स्वयं को सत्तरह साल के एक लड़के के रूप में ही देख पा रहा हूँ। और तुम्हें चालीस पार एक सभ्य सुसंस्कृत नारी के रूप में। और मैं साफ देख रहा हूँ कि काला चश्मा लगाये कार की अगली सीट पर तुम बैठी हो। बच्चे पिछली सीट पर बैठे कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं। तुम्हारे पति सामने दुकान से फल खरीद रहे हैं। मैं देख रहा हूँ तुम्हें और तुम्हारे दमकते स्त्रीत्व को। कितनी सुन्दर है तुम्हारी साड़ी, तुम्हारा ब्लाउज और तुम्हारी शाल। तुमने चश्मे को सर पर चढ़ा लिया है और हंस-हँस कर मेरा पत्र पढ़ रही हो। फिर हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाती हो। फिर पत्र अपने पति को थमा देती हो। वे भी हँस रहे हैं....हँस-हँसकर लोट-पोट हो रहे हैं। तुम दोनों लोट-पोट हो रहे हो। तुम्हारे बच्चे भी लोट-पोट हो रहे हैं। तुम पत्र के कुछ खास पंक्तियों पर ऊँगली रखती हो और अपने पति को दिखाती हो और फिर हँसते-हँसते अपना सर उनके कंधे पर रख देती हो।अब अपने पति को तुम फिर कुछ दिखा रही हो। वे फिर लोट-पोट हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में एक छोटा कागज का टुकड़ा है...जिस पर तुमने जल्दी-जल्दी कुछ लिखा है। वही टुकड़ा तुम्हारी गाड़ी में सबको लोट-पोट कर रहा है। तुम्हारी गाड़ी मेरे बगल से सरकती है। तुमने वही कागज का टुकड़ा मेरी ओर फेंक दिया। तुम्हारी गाड़ी आगे बढ़ जाती है और फिर तुम्हें लेकर ओझल हो जाती है। क्या खूब लिखा है तुमने, मेरी बोल्ड एवं ब्युटीफुल।डियर मानिक,लिखते हो खत खून से क्या शर्म नहीं आती।जलते हो मेरे उनसे क्या अपनी नहीं भाती।थूका है तुम्हें देखकर कुल्ली न समझना।मरती हूँ सोनू के पापा पे अपनी न समझना।हो सके तो इसे भाभी जी को भी पढ़ा देना।श्रीमती समीरा भगत।बगुला भगत! शायद मेरे मुँह से यही निकला। बगुला भगत!

4 comments:

Udan Tashtari November 1, 2008 at 8:13 PM  

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.

डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!

PD November 1, 2008 at 8:51 PM  

badhiya raha aapka ye prem patra..

kripya Udan tashtari ji ki baat par gaur kijiyega.. :)

संगीता पुरी November 1, 2008 at 9:58 PM  

इस नए चिटठे के साथ चिटठा जगत में आपका स्‍वागत है । बहुत अच्‍छा लिखते हैं आप। आशा है कि आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को मजबूती देकर पाठको का ज्ञानवर्द्धन करेंगे। हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है।

Amit K. Sagar November 2, 2008 at 7:37 PM  

ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है. लिखते रहिये. शुभकामनयें.
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मेरे ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं.

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