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Wednesday, December 10, 2008

दलिताएं खुद लिखेगीं अपना इतिहास

अनिता भारती
आईए हम कल्पना करें भारत की आजादी के आन्दोलन की और हम उसमें गांधी का नाम भूल जाएं। चलिए हम दूसरी कल्पना करें, दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत लोगों के मुक्ति संघर्ष की और उसमें हम नेल्सन मंडेला का नाम छोड़ दे। शायद आपको मेरी बात सुनकर गुस्सा आ सकता है, शायद आप यह भी कह सकते हैं कि ये क्या बेवकूफी भरी बात है? जब हम इन शोषित-पीड़ित और दमितों के आन्दोलन और इतिहास की कल्पना उनके नेताओं के बिना नहीं कर सकते तो हम भारतीय महिला आन्दोलन व इतिहास लेखन की कल्पना सावित्रीबाई फूले और डॉ० अम्बेडकर के बिना कैसे कर सकते हैं।
यह भारतीय महिला मुक्ति आन्दोलन की विडम्बना ही है कि भारतीय महिला आन्दोलन पर जो पुस्तकें लिखी जा रही हैं उन लेखिकाओं द्वारा दलित आदिवासी पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के आन्दोलन व उनके नेताओं के प्रति गहरी उपेक्षा बरती जा रही है। कुछ पुस्तकों में तो उनके नाम, उनके कार्यों तक का जिक्र नहीं है। हम इस लेख में भारतीय महिला आन्दोलन में दलित स्त्रियों के मुद्दों, सवालों और समस्याओं के प्रति बरती जा रही उपेक्षा की चर्चा करेंगे।भारतीय महिला इतिहास आन्दोलन के लेखन में अनेक समस्याएं हैं। आज जिस वर्ग, जाति और समाज की लेखिकाएं लेखन करती हैं। उनके लेखन में उनकी वर्गजातिगत व समाजगत प्रवृत्तियां व रुचियां झलकती हैं। ये लेखिकाएं समाज में प्रचलित व प्रसिद्ध व्यक्तियों, धाराओं तथा वादों में बंधी हैं। अतः इनका लेखन भी उन्हीं धाराओं, वादों और व्यक्तियों से प्रतिबद्धता दर्शाता है। एक ही तरह की स्रोत सामग्री इस्तेमाल करने से समाज के कई अनछुए, अनजान पहलू, व्यक्ति व आन्दोलन पर इनका ध्यान नहीं गया।
कारण कुछ भी हो परन्तु यह बात नकारी नहीं जा सकती कि सम्पूर्ण भारतीय महिला लेखन में दलित और अति दलित महिलाओं की भागीदारी या उपस्थिति कहीं दिखती ही नहीं है। हालांकि उनके उद्धरण, उनके नाम, उनके आन्दोलन दलित अल्पसंख्यकों द्वारा लिपिबद्ध किये जा चुके हैं और किये भी जा रहे हैं। आज जिस तरह से पुरुषों द्वारा रचित इतिहास लेखन में महिलाओं के आन्दोलन, उनके अनुभव, उनकी समस्याएं, उनके मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया गया है उसी तर्ज पर महिला लेखन में भी दलित आदिवासी, पिछड़ी अल्पसंख्यक महिलाओं के आन्दोलन, समस्याओं मुद्दों विचार धारा और सवालों को उपेक्षित किया जा रहा है।कुछ समय पहले हिन्दी में अनुवाद होकर आई राधा कुमार की पुस्तक ''स्त्री संघर्ष का इतिहास १८००-१९९०'' पढ़ने को मिली। हमारी दलित लेखिकाओं और दलित महिला आन्दोलन से जुड़ी कार्यकर्ताओं की शिकायत थी, कि राधा कुमार जी ने स्त्री आन्दोलन में दलित स्त्रियों के आन्दोलन के साथ न्याय नहीं किया है। मैं स्वयं दलित महिला आन्दोलन से कुछ वर्षों से जुड़ी रही हूं। इसी वजह से मैंने इस पुस्तक को ध्यानपूर्वक पढ़ना शुरु किया। मेरे आश्चर्य और दुःख की सीमा न रही जब मैंने राधा कुमार जी की पुस्तक में दलित महिला आन्दोलन की रीढ़ ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारतीय महिला आन्दोलन की जनक सावित्री बाई फूले का नाम पूरी तरह से उपेक्षित पाया।क्या कारण है कि नारीवादी इतिहासकार सावित्री बाई फूले के योगदान को भारतीय महिला आन्दोलन में शामिल न करते हुए दलित महिलाओं के आन्दोलन व योगदान के सबसे महत्त्वपूर्ण आधारस्तम्भ को स्वीकार करने से नकारती हैं। सावित्री बाई फूले दलित महिला आन्दोलन की रीढ़ ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतीय महिला आन्दोलन की भी आदर्श है। सावित्रीबाई ने उस समय घर से बाहर निकल दलित/गैर दलित बालिकाओं को पढ़ाना शुरु किया जब औरत का घर से बाहर निकलना अपराध माना जाता था। जब वे घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने निकलती थीं तो उन पर गोबर-पत्थर फेंके जाते थे। उन्हें रास्ते में रोककर उच्च जाति के गुण्डों द्वारा भद्दी-भद्दी गाली दी जाती थी तथा उन्हें जान से मारने की लगातार धमकियां दी जातीं थीं।
ऐसी ही विपरीत और कठोर परिस्थितियों में सावित्रीबाई फूले ने समाज सेवा का प्रण लिया। वो बिना रुके, बिना थके 'स्त्री मुक्ति' के पथ पर आगे बढ़ती रहीं। सावित्रीबाई फूले भारत में स्त्री-शिक्षा की जननी के साथ-साथ सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक तथा दलित/गैर दलित स्त्रियों की मुक्ति के संघर्ष की प्रतीक, प्रतिनिधि और अमिट योद्धा हैं।सावित्रीबाई फूले ने लड़कियों के लिए १८४८ में बुधवार पेठ (पूना) में पहला स्कूल खोलकर भारतीय स्त्रियों के जीवन में शिक्षा द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन लाने का प्रयास किया तथा स्त्री शिक्षा के द्वार खोल दिये। यह कदम एक दलित स्त्री द्वारा दलित व गैर दलित स्त्रिायों के लिए शिक्षा के क्षेत्रा में उठाया गया अभूतपूर्व कदम था। सावित्रीबाई फूले ने १८४९ में पूना में ही उस्मान शेख के यहाँ मुस्लिम स्त्री-बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। १८४९ में ही पूना, सतारा व अहमद नगर जिले में पाठशाला खोली। स्त्रिायों की दशा सुधारने के लिए १८५२ में सावित्रीबाई फूले ने 'महिला मंडल' का गठन किया। इस महिला मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चाबन्द कर सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया।हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था। विधवाओं के सर मुंडने जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए सावित्रीबाई फूले नाइयों से विधवाओं के 'बाल न काटने' का अनुरोध करते हुए आन्दोलन चलाया जिसमें काफी संख्या में नाइयों ने भाग लिया तथा विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली। भारत क्या पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन नहीं मिलता जिसमें औरतों के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरुष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो, नाइयों के कई संगठन सावित्रीबाई फूले द्वारा गठित महिला मण्डल के साथ जुड़े। सावित्रीबाई फूले और 'महिला मंडल' के साथियों ने ऐसे ही अनेक आन्दोलन वर्षों तक चलाये उनमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।भारतीय समाज में स्त्री के विधवा होने पर उसके परिवार के पुरुष जैसे देवर, जेठ, ससुर व अन्य सम्बन्धियों द्वारा उसका दैहिक शोषण किया जाता था। जिसके कारण वह कई बार माँ बन जाती थी। बदनामी से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी, या फिर अपने अवैद्य बच्चे को मार डालती थी। अपने अवैध बच्चे के कारण वह खुद आत्महत्या न करें तथा अपने अजन्मे बच्चे को भी ना मारें, इस उद्देश्य से सावित्रीबाई फूले ने भारत का पहला 'बाल हत्या प्रतिबंधक गृह' खोला तथा निराश्रित असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला। स्वयं सावित्रीबाई फूले ने आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाते हुए एक विधवा स्त्री के बच्चे को गोद लिया तथा उसे पढ़ा-लिखा कर योग्य डॉक्टर भी बनाया। ऐसे क्रांतिकारी कार्य करने वाली तथा समाज की धारा के विपरीत जाकर काम करने वाली सावित्रीबाई फूले का नाम इतिहास से गायब करने में सरासर षड्यन्त्रा की बू नजर आती है।सावित्रीबाई फूले जीवन पर्यन्त अन्तर्जातीय विवाह आयोजित व सम्पन्न कर जाति व वर्ग विहिन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत रहीं।
सावित्री बाई फूले ने लगभग ४८ वर्षों तक दलित, शोषित, पीड़ित स्त्रियों को इज्जत से रहने के लिए प्रेरित किया उनमें शिक्षा का दीप जलाया। अपने जैसे अनेक कार्यकर्ता तैयार किये जिनमें तारा बाई शिन्दे, सगुणाबाई, फातिमा शेख, सावित्रीबाई रोडे, मुक्ता आदि जिनका नाम आज भी भारतीय महिला आन्दोलन में अमर है। अपना पूरा जीवन अर्पण करने वाली सावित्रीबाई फूले के योगदान को नकारना क्या भारतीय नारी मुक्ति आन्दोलन का अपमान नहीं है?राधा कुमार ने ऐसी शख्सियत को नारी इतिहास के पन्नों में जगह न देकर सावित्रीबाई फूले के साथ-साथ दलित महिला आन्दोलन का भी घोर अपमान किया है। जब हम भारतीय स्त्री आन्दोलन या संघर्ष की बात करते हैं तो उसमें सभी जाति, वर्ग, धर्म, भाषा की स्त्रियों के योगदान की चर्चा होनी चाहिए। उसमें उन्हें उपयुक्त जगह मिलनी चाहिए। लेकिन अक्सर ऐसा होता नहीं है। दलित महिलाओं ने हमेशा संघर्ष किया है, विरोध प्रकट किया है और करती रहेगी। चाहे उसने ये विद्रोह या संघर्ष स्वतन्त्र रूप से किया हो या किसी के नेतृत्व में। ये संघर्षशील दलित नायिकाएं जिनमें वीरांगना झलकारी बाई, रानी शिरोमणि, रानी दुर्गावती हो या उदादेवी पासी, झानो और फूलो या सावित्रीबाई फूले ये सब महिला आन्दोलन में संघर्ष, त्याग और बलिदान की प्रतीक हैं। डॉ० अम्बेडकर के नेतृत्व में चले दलित महिला आन्दोलन में भी अनेक अनाम, मूक, मुखर संघर्षशील दलित औरतें शामिल हुईं जिन्होंने अपनी अस्मिता, अपनी पहचान या फिर अपनी स्वतन्त्रता बनाए व बचाए रखने के लिए जुझारू होकर जातीय दंभ से पूर्ण ब्राह्मणवादी पुरुष सत्तात्मक समाज को कड़ी टक्कर दी है।दलित महिलाओं की प्रतिभा उनकी क्षमता उनके योगदान की उपेक्षा हमेशा से ही सवर्ण मानसिकता से ग्रसित समाज में होती आई है। परन्तु नारीवादी आन्दोलन से जुड़ी लेखिकाएं व कार्यकर्ता भी ऐसा पक्षपात पूर्ण इतिहास लेखन करेंगी तो दलित महिला आन्दोलन को सोचना पड़ेगा कि आज वे स्त्रीवादी आन्दोलन में जुड़ें अथवा अलग रहें। समाज में हमेशा कुछ वर्ग जातियाँ ऐसी रहती हैं जो मुख्यधारा की न होकर भी उसका नेतृत्व करती हैं। असल सच तो यह कि दलित आदिवासी पिछड़ी शोषित दमित जातियां ही मुख्यधारा होती हैं। अगर आज ऐलिट तथा उच्च जाति जो अपने मन में मुख्यधारा होने का भ्रम पाले हुए है, अगर वे इस भ्रम को नहीं तोड़ते तो आज मजदूरों, किसानों, दलितों, शोषितों, जो कि वास्तविक मुख्यधारा हैं, वो मुख्यधारा आज नहीं तो कल ऐसे लोगों को ठोकर की नोक पर उड़ा देगी। इस भ्रमित धारा को दलित आदिवासियों के साथ उनकी शर्त पर ही जुड़ना पड़ेगा।आज जिस तरह महिला आन्दोलन व महिला लेखन में दलित महिलाओं के मुद्दों व उनकी समस्याओं को उपेक्षित कर उच्चवर्गीय महिलाओं के (स्त्री देह) छद्म मुद्दों को महत्त्व दिया जा रहा है वह अपने आप में महिला मुक्ति के औचित्य पर प्रश्नचिह्र है। सावित्रीबाई फूले का नाम इतिहास से गायब है या गायब कर दिया गया, कारण जो भी हो पर उसकी पड़ताल होना आवश्यक है। महिला आन्दोलन इतिहास लेखन में सवर्ण कुमारी देवी से लेकर सरला देवी घोषाल, मैडम भीकाजी रूस्तमकामा, ऐनी बेसेंट, कमला देवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली आदि अनेक उच्च वर्गीय सभ्रांत समाजिक कार्यकर्ताओं की पूरी कहानी व उनके कार्यों का ब्यौरा होता है, पर दलित महिलाओं के नाम व योगदान पर गहरी चुप्पी साध ली जाती है। सावित्रीबाई फूले से लेकर झलकारीबाई, फूलों और झानों, फातिमा बेग, उदा देवी पासी जैसी प्रसिद्ध दलित स्त्रियों तक के नाम को भुला दिया जाता है।राधा कुमार अपनी इतिहास पुस्तक में पंडिता रमाबाई और ज्योतिबा फूले का भी उदाहरण दो-तीन जगह देती है पर तब भी वे सावित्रीबाई फूले के योगदान को याद नहीं करती। आखिर इस घोर उपेक्षा का कारण क्या है? क्या सावित्रीबाई का नाम इतिहास इसलिए हटा दिया गया कि वो शूद्र जाति की थीं और दलित/शूद्र स्त्रियों की उन्नति के लिए कार्य कर रही थीं जिनका उच्च वर्ग की सभ्रांत लेखिकाओं और नारीवादियों की दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है। हमारे कुछ नारीवादी महिला नेता या लेखिकाएं दलित महिलाओं के प्रति अन्य सवर्ण महिलाओं द्वारा किये गये भेदभाव, उत्पीड़न व उनके द्वारा बरती जा रही उपेक्षा पर शायद इसलिए चुप रह जाती हैं कि कहीं महिला आन्दोलन दो हिस्सों में न बंट जाये? वे दलित महिलाओं द्वारा लड़े गये अस्मिता संघर्ष को अलग से जगह देने को तैयार नहीं है या फिर दलित महिलाओं के नेतृत्व में आने से उनका नेतृत्व खतरे में पड़ जायेगा। क्या यही वे कारण है या अन्य कोई कारण है कि वे सावित्री के योगदान को महत्त्व नहीं देती। अन्य कारणों में एक कारण यह भी हो सकता है कि उनके पति ने उन्हें पढ़ाया और समाज के लिए शिक्षित किया। अगर लेखिका ऐसा मानती है तो यह तो और नाइंसाफी की बात है। अक्सर हमारा समाज महिलाओं की योग्यता, क्षमता को पुरुषवादी चश्मे से देखता है, अगर सावित्रीबाई फूले ज्योतिबा फूले की मद्द से पढ़ पाईं तो क्या उनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं था? क्या किसी को, जब तक की उसमें खुद लगन, जज्बा व जागृति न हो तब तक उसे किसी भी कार्य करने को बाध्य किया जा सकता? अगर सावित्रीबाई फूले अपने पति की मद्द से पढ़ पाईं और उनकी मद्द से सामाजिक क्षेत्रा में जुड़ीं तो इसी तर्ज पर हम यह भी कह सकते हैं कि भारत की आजादी के आन्दोलन में जो भी सभ्रांत व उच्च जाति की शिक्षित वर्ग की महिलायें जुड़ी उनमें से अधिकांश अपने पतियों, भाइयों व पिताओं के प्रयास से आयीं थीं। फिर भी ऐसी महिलाओं का नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है और सावित्रीबाई फूले का नाम नगण्य हो जाता है। यह एक गंभीर बात है कि शूद्र जाति की सावित्रीबाई फूले सामाजिक कार्य करते हुए इस भेदभाव सकीर्णता से पूर्ण समाज से चौतरफा वार सह रहीं थी फिर भी अपना कार्य लगन और धैर्य से कर रहीं थीं और बिना डरे लगातार कर रही थीं। ऐसी सशक्त क्रांतिकारी, स्त्री शक्ति की प्रतीक महिला के योगदान को अनदेखा करना इतिहासकारों व आन्दोलनकारियों की नीयत पर शक पैदा करता है। जब दलित महिला आन्दोलन का इतिहास लिखा जायेगा तब ऐसे भेदभावपूर्ण लेखन व उनकी भेदभाव लेखनी को कदापि बक्शा नहीं जायेगा।सावित्रीबाई फूले की तरह ही भारतीय महिला आन्दोलन के दूसरे आधार स्तम्भ हैं डॉ० भीमराव अम्बेडकर जिन्हें भारतीय स्त्रिायों के मुक्तिदाता के रूप में जाना जाता है। राधा कुमार की पुस्तक 'स्त्री संघर्ष का इतिहास' तथा दीप्ति प्रिया मेहरोत्रा द्वारा लिखित पुस्तक भारतीय महिला आन्दोलन कल, आज और कल' में डॉ० अम्बेडकर और उनके नेतृत्व में चला दलित महिला आन्दोलन के विषय में एक भी शब्द नहीं है। 'हिन्दूकोड बिल' जिसका मुख्य आधार ही भारतीय नारी को कानूनी न्याय दिलाते हुए उन्हें उनके कानूनी अधिकार दिलाना था। उसका भी वर्णन राधा कुमार ने अपनी पुस्तक में मात्र-चार-पांच पंक्तियों में किया गया है। इस पुस्तक की विडम्बना यह कि लेखिका ने केवल एक तरह के आन्दोलन का ही वर्णन किया है और एक खास विचारधारा की स्रोत सामग्री का इस्तेमाल किया है, अगर वो समाज की मुख्यधारा के संघर्ष को शामिल करती तो यह पुस्तक अत्यन्त उपयोगी हो सकती थी।
डॉ० अम्बेडकर जो कि स्त्रियों की स्वतन्त्रता के बहुत बड़े हिमायती थे जिनके नेतृत्व में असंख्य दलित औरतें अन्याय के खिलाफ लड़ने सड़कों पर उतर आईं थीं। महाड़ के सार्वजनिक चावदार तालाब के पानी की लड़ाई में हजारों की संख्या में दलित महिलाएं शामिल हुईं। २५ दिसम्बर को अम्बेडकर द्वारा 'मनुस्मृति दहन' भारतीय महिला इतिहास की तारीख में भी अपूर्व व अनोखा दिन है। इससे पहले किसी ने भी महिलाओं के हक में धार्मिक कानूनों की सीधी-सीधी धज्जियां उड़ाते हुए मनुस्मृति को नष्ट करने का प्रयास तो क्या कभी सपने में भी नहीं सोचा था। इस घटना ने भारतीय स्त्रिायों के हक में क्रांतिकारी भूमिका अपनाई। इस मनुस्मृति दहन तथा चावदार तालाब आन्दोलन में २५०० दलित महिलाओं ने भाग लिया। डॉ० अम्बेडकर के साथ दलित महिला आन्दोलन में वेणुबाई भटकर और रंगबाई शुभरकर ने कई वर्षों तक काम किया। प्रत्येक जाति व वर्ग को मन्दिर प्रवेश का अधिकार है। दलितों को भी मन्दिर प्रवेश का अधिकार चाहिए, इस विषय पर पार्वती मन्दिर व कालाराम मन्दिर पर दलित स्त्रियों ने हजारों धरने दिए, प्रदर्शन किए तथा घायल भी हुई। दलित स्त्रियों के इस अस्मितावादी आन्दोलन में भी हजारों दलित स्त्रियां जुड़ी। इन महिलाओं में सीताबाई, गीताबाई, रमाबाई, नानबाई कावंलो ने सक्रिय भूमिका निभाई। इस पूरे दलित महिला आन्दोलन को या फिर अम्बेडकर कालीन इतिहास १९२७ से ३० तक (अभी हम केवल ३ वर्ष की बात कर रहे हैं जबकि अम्बेडकर कालीन दलित महिला इतिहास १९२४ से लेकर ५६ तक है।) आंकड़े जुटाने का तात्पर्य यही है कि यह सब आंकड़े आसानी से उपलब्ध हैं और अब स्वयं दलित सामाजिक कार्यकर्ता जगह-जगह घूमकर अपने इतिहास को खोजकर, प्रकाशित करवा रहे हैं।सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि आज तक दलित महिलाएं जिन मुश्किलों से रात-दिन जूझती हैं। पानी व आवास, शिक्षा व गरीबी, सामाजिक व जातीय हिंसा आदि समस्याएं तथाकथित नारीवादी आन्दोलन का हिस्सा भी नहीं है। भारतीय नारीवादी आन्दोलन ने हमेशा मध्यम वर्गीय व उच्चवर्गीय, उच्चजाति की औरतों के मुद्दों को ही प्राथमिकता दी है क्योंकि आन्दोलन का नेतृत्व हमेशा इन्हीं महिलाओं के हाथ में रहा है।दीप्ति प्रिया महरोत्रा अपनी पुस्तक 'भारतीय महिला आन्दोलन' में जहाँ पर्यावरण से मुद्दों तथा उनके नेता सुंदर लाल बहुगुणा से लेकर नर्मदा बचाओ जैसे जन आन्दोलन तक को अपने नारीवादी आन्दोलन में जोड़ लेती हैं, वहीं दलित महिलाओं द्वारा पानी और मन्दिर प्रवेश के लिए दो दशक तक चले प्रतीकात्मक विद्रोही आन्दोलन की इन पुस्तकों में गहरी कमी या सरासर उपेक्षा मन को व्यथित कर देती है। इन पुस्तकों में दलिताओं के ऐसे सक्रिय और जुझारू आन्दोलनों का जिक्र तक नहीं किया गया है। पानी जो कि जीवन और सम्मान का आधार है। मन्दिर जिसमें प्रवेश करने का हरेक को बराबर अधिकार है। दलित महिलाओं द्वारा वर्षों तक चलाये गये पानी और मंदिर प्रवेश का अधिकार इन सभ्रांत परिवारों की उच्च शिक्षित, विदुषी महिलाओं द्वारा नारीवादी आन्दोलन व इतिहास में शामिल न करने का एक ही अर्थ निकलता है कि उन्हें दलित महिलाओं के मुद्दों की समझ नहीं है तथा वे स्वयं उच्च जाति की हैं। इसीलिये उन्हें यह अधिकार जन्मजात ही मिल गये। यही कारण है कि दलित महिलाओं द्वारा लड़ी गयी अपने सम्मान और अधिकार की लड़ाई इन इतिहास लेखिकाओं की दृष्टि में शून्य है।चावदार तालाब जो कि सर्वसाधारण के लिए खोल दिया गया था। उसके बावजूद उसमें कुत्ते बिल्ली से लेकर पशु-पक्षी तक पानी पी सकते थे पर दलित नहीं अर्थात्‌ दलितों को पशुओं से भी कम अधिकार थे और दलित समाज में महिलाओं को और कम। वे निरीह, गरीब, दलित, शोषित औरतें दिन भर पानी के लिए इधर-उधर भटकतीं, ऊँची जात की कृपा पर निर्भर रहतीं। गिड़गिड़ाती, रोती पर पानी एक बूंद न पातीं। आखिर में थककर जब उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ विद्रोह किया तो, बदले में लाठी, डण्डे खाए। पर वे हिम्मत न हारकर संघर्ष करती रहीं। घर बार छोड़कर बच्चों को कंधे पर लादे असंख्य दलिताएं चावदार तालाब से पानी पीने के लिए कटिबद्ध रहीं। ऐसा जुझारू और मूल्यवान आन्दोलन जो कि नारीवादी इतिहासकारों की दृष्टि से छूट गया या छोड़ दिया गया। ऐसे आन्दोलन की बागडोर दलित महिलाओं के हाथ में थी।डॉ० अम्बेडकर भारतीय स्त्री खासकर, हिन्दू स्त्री जिसमें सवर्ण तथा दलित दोनों की सामाजिक आर्थिक और धार्मिक दुर्दशा को देखकर हमेशा पीड़ित रहते थे। उनकी दशा सुधारने के लिए वो एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो विशुद्ध रूप से उनकी सामाजिक, कानूनी स्थिति सुधारने में संजीवनी बूटी की तरह काम करें। इसलिए उन्होंने सौ फीसदी औरतों के हक में हिन्दू कोड बिल बनाया। इस हिन्दू कोड बिल को और डॉ० अम्बेडकर, दोनों को कट्टरपंथियों का भयंकर विरोध सहना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के विरोध में डॉ० अम्बेडकर को कई बार व्यक्तिगत अपमान झेलना पड़ा। उनके घर पर भी पत्थर बरसाये गये और संसद में भी उनका बहिष्कार किया गया। हिन्दू कोड बिल पास कराने के लिए डॉ० अम्बेडकर के साथ-साथ अनेक दलित गैर दलित महिलाओं ने भारतीय महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक लड़ाई लड़ी है। किन्तु अफसोस की बात है कि हिन्दू कोड बिल पर चलाया जाने वाला आन्दोलन भी तथाकथित नारीवादियों के द्वारा उपेक्षित कर दिया गया। हिन्दू कोड बिल पर दुर्गाबाई देशमुख और उनके महिला जत्थे ने डॉ० अम्बेडकर के साथ गांव-गांव, नगर-नगर घूमकर सभा और जनसभाओं में भारतीय महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक दुर्दशा के चित्र खिंचे।हिन्दू कोड बिल के समर्थन में दुर्गाबाई देशमुख ने तो साक्षात्‌ दुर्गा या चन्डी का रूप धारण कर लिया था। एक महिला जो पुरानी रूढ़िवाद की पोषक थी, उन्होंने कहा कि हमारा आदर्श सीता, सावित्री और द्रौपदी है।
हम सवर्ण नारियों को तलाक जैसी निन्दनीय पद्धति पर चलता नहीं देखना चाहते। हिन्दू नारी कोई आम सड़क नहीं है, जिस पर प्रत्येक व्यक्ति मनमाने ढंग से खुलेआम चल सके। दुर्गाबाई ने उनकी खूब खबर ली और कहा कि द्रौपदी के एक समय में ही पाँच पति थे। क्या हम हिन्दू नारियों का भी यही आदर्श होना चाहिए? दुर्गाबाई देशमुख का मानना था कि भारत की स्वाधीनता केवल पुरुषों के लिए ही प्राप्त नहीं की गई है, बल्कि इसमें नारी जाति के कल्याण का महान उद्देश्य और उनके कल्याण का ध्येय भी शामिल है। दुर्गाबाई देशमुख मीटिंग में ऐसे अकाट्य तर्क रखतीं जिससे कट्टरवादियों के मुंह बंद हो जाते थे तथा सारी गोष्ठी पर उनकी धाक छा जाती थी। अक्सर डॉ० अम्बेडकर और महिला साथियों द्वारा आयोजित हिन्दू कोड बिल चर्चा सभाओं में कट्टर पंथियों द्वारा सीधा हमला कर दिया जाता था और चर्चा सभाओं को जबरदस्ती बंद करा दिया जाता था। उस समय के अखबार भी हिन्दू कोड बिल के खिलाफ अनेक भड़काउ लेख छाप रहे थे उस समय देश का माहौल डॉ० अम्बेडकर और उनकी महिला साथियों के खिलाफ विषाक्त हो गया था। परन्तु ये सब डटे रहे। आखिर में जब हिन्दू कोड बिल संसद में पास न हो सका तब डॉ० अम्बेडकर ने विरोध स्वरूप संसद से त्यागपत्र दे दिया।हिन्दू कोड बिल पर डॉ० अम्बेडकर का मानना था कि वे हिन्दू कोड बिल पास कराकर भारत की समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहते थे। उन्होंने हिन्दू कोड बिल पर विचार होने वाले दिनों में अनेक सवर्ण जाति से सम्बन्ध रखने वाली क्रूर अत्याचारी, शराबी, कबाबी, एैबी पतियों द्वारा परित्यक्ता अनेक युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को देखा था, जिन्हें उनके पतियों ने त्यागकर उनके जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्रा का चार-पाँच रुपया मासिक गुजारा-भत्ता बांधा हुआ था। अक्सर तो पति इतना भत्ता नहीं देते थे। ये परित्यक्ता औरतें गुलामी और दरिद्रता भरा जीवन जीने को मजबूर थीं। इन औरतों की ऐसी दयनीय दशा को देखकर इनके माता-पिता, भाई-बन्धु भी दुःखी रहते थे। क्योंकि इन परित्यक्ता औरतों के दुःख को खत्म करने वाला, कोई कानून नहीं था। हिन्दू कोड बिल ही वह कानून हो सकता था जो ऐसी दीनहीन, दुःखी-सताई औरतों के पक्ष में खड़ा हो सकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि हिन्दू कोड बिल भारतीय स्त्रियों की सोचनीय दशा में आमूल-चूल परिवर्तन लाने वाला कानून था। जिसमें समाज में किसी भी रूप व परिस्थिति में सताई गई औरतों के हक में दोषियों के लिए दण्ड का प्रावधान था। इस बिल के द्वारा डॉ० अम्बेडकर और उनकी महिला साथी महिलाओं की स्थिति में कानूनी सुधार व हक के लिए प्रयास कर रहे थे।यह आन्दोलन लगभग ५ सालों तक चला जिसमें अनेकों-अनेक दलित व गैर दलित महिलाएं जुड़ीं। इस आन्दोलन का मकसद ही सामाजिक न्याय दिलाना था जिसका वर्षों से हनन होता आ रहा था। ऐसे क्रांतिकारी मूल्यपरक आन्दोलन पर चुपी साध लेना या मात्र सतही जानकारी देना न तो दलित महिला आन्दोलन के साथ न्यायपरक और न ही भारतीय महिला आन्दोलन के लिए लाभदायक। सच्चा इतिहास वही है जो तटस्थ हो परन्तु मुख्यधारा के प्रति अति संवदेनशील हो अगर ऐसा नहीं होता है तो वह समय दूर नहीं जब मुख्यधारा के लोग ऐसे एकांगी पक्षपाती दुर्भावना से प्रेरित होकर लिखे गये इतिहास को फाड़कर फेंकने से नहीं हिचकेंगे।

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Sunday, December 7, 2008

दलित महिलाएं एवं उनका सशक्तिकरण

डॉ. तारा परमार
मानव सभ्यता के इतिहास में महिला अस्मिता, उसके समान अधिकार और स्वतंत्रता का प्रश्न सदा से ही उलझनपूर्ण रहा है। महिला को लेकर जितनी भी व्यवस्थाएं बनी उनमें उसे प्रायः दोयम दर्जे का स्थान ही दिया गया है। महिलाएं दलितों में भी दलित मानी गई है। इसके लिये हमारी सामाजिक व्यवस्था और पुरुष प्रधान समाज की सोच पूर्णतः उत्तरदायी है। सामाजिक असमानता, निरक्षरता, अंधविश्वास, दहेज, जातिप्रथा, लिंग-भेद आदि मुद्दों के विरुद्ध आवाज उठती रही हैं और निरंतर उठ रही हैं। परंतु इन सब से पूरी तरह मुक्ति पाना अभी शेष है। घरेलू महिलाएं घर से बाहर निकलकर घर-परिवार की आवश्यकताओं के अनुरूप परंपरागत मान्यताओं और सामाजिक प्रतिबन्धों से कड़ा मुकाबला कर रही है और पुरानी पीढ़ी द्वारा आरोपित रूढ़ियों को तोड़कर खुश हो रही है। कुछ नया करने के लिए दुस्साहसिक कदम भी उठा रही है। भारतीय महिलाएं पुरुष निरपेक्ष नहीं बनना चाहती, अपनी अस्मिता बनाना और बचाना चाहती है - लेकिन पूरे अधिकार और सम्मान के साथ। हमारे यहाँ महिलाओं के मनोवैज्ञानिक संस्कार ही अधीनस्थता के हो जाते हैं। त्याग, सहिष्णुता और करुणा अतिवादी स्वरूप धीरे-धीरे महिलाओं को भीरू, असहाय और पराजित बनाते चले जाते हैं।
भारतीय संविधान ने महिला व पुरुष दोनों को समकक्ष रखकर उनके विकास के लिए समान अवसरों की गारंटी दी। अनेक प्रावधानों द्वारा महिला को सुरक्षा तथा संरक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की गई। पर इन सबके बावजूद महिला की स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया, क्योंकि सामाजिक रवैये में बुनियादी बदलाव नहीं हुए। समाज ने महिला के प्रति अपने दायित्व के निर्वहन में कोताही बरती। दरअसल दुनिया के तमाम उत्पादन के साधनों पर उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पुरुषों का स्वामित्व है और उत्पादन के साधनों पर वर्चस्व बनाये-बचाये रखने के लिए पुर्नोत्पादन के साधनों (यानी महिला की देह और कोख) पर भी संपूर्ण नियंत्रण अनिवार्य हैं जो विवाह संस्था के माध्यम से बनाया गया है। उत्तराधिकार के लिए वैद्य संतान और वैद्य संतान के लिए विवाह संस्था अनिवार्य है। विवाह संस्था से बाहर जन्मे बच्चे अवैद्य, नाजायज, हरामी हैं। इसलिये पिता की संपत्ति में कानूनी वारिस नहीं माने जाते। कानून और न्याय की नजर में वैद्य संतान पुरुष की और अवैद्य महिला की होती है। विवाह संस्था अनिवार्य है सो पुरुष की सम्पत्ति के असली (कानूनी) उत्तराधिकारी तो बेटे ही होंगे क्योंकि बेटियाँ तो परायाधन है और कन्यादान के बाद दहेज लेकर ससुराल चली जाएगी। संयुक्त हिन्दू परिवारों में सम्पत्ति का स्वामित्व केवल पुरुषों के नाम। बंटवारा करवाने का अधिकार केवल पुरुषों को। बेटा गर्भ में आते ही संपत्ति का हकदार लेकिन बेटियाँ भूण-हत्या की शिकार। परिवार या विवाह संस्था के मूल ढांचे में समता और समाज में न्याय (सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक) की नींव डाले बिना न कन्या भूण हत्या रोकना संभव होगा और न टूटते-बिखरते परिवार को बचाना। निःसन्देह पितृसत्ता को सिरे से दुबारा सोचना-समझना पड़ेगा। संपत्ति और सत्ता में महिलाओं को बराबर हिस्सा दिये बिना परिवार बचाना मुश्किल है। बेटियाँ नहीं होंगी तो बहू कहाँ से आएगी? वंश कैसे चलेगा? परिवार संरचना में आमूलचूल परिवर्तन की मांग को और अधिक टालना खतरे से खाली नहीं है।

महिला के लिए पहली चुनौती तो यही है कि बदलते परिवेश में सामाजिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए वह समाज के दृष्टिकोण को बदल डाले कि 'स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु हैं।' महिलाओं की समस्याओं के हल हेतु महिलाओं को ही आगे आकर महिलाओं को समझना पड़ेगा, यह भी एक चुनौती है पर सबसे बड़ी चुनौती यही है कि महिलाएं अपने अनेक रूपों को (बहन, बेटी, पत्नी आदि) सहज रूप में बनाए रखकर अपनी लड़ाई लड़ सकती है या नहीं; क्योंकि अति उच्छृखलता, अतिउन्मुकता, अति परकीयकता भारतीय महिलाओं, भारतीय परिवेश और पारिवारिकता के विरुद्ध है। यदि रचनात्मक जीवन उसे जीना है और समाज में अपनी पहचान बनानी है तो उसे पुरुष समाज द्वारा खीची गई लक्ष्मण रेखा को लांघना ही होगा और समाज में जो भी स्थितियाँ, चुनौतियाँ आएगी, उनका डटकर मुकाबला करना होगा। कोई जरूरी नहीं यह लक्ष्मण रेखा लांघने के बाद उसे सब कुछ आसानी से मिल जायेगा। जिनसे पाना है या जिनके बीच से होकर गुजरना है वह आज जहाँ खड़ी है कही उससे अधिक भयानक स्थितियाँ उसके सामने आ सकती है लेकिन इसी के बीच से अपना सफर तय करना और अपनी पहचान भी बनानी है। क्या यह सत्य नहीं है कि निर्धन-कमजोर-गरीब लोगों एवं सभी प्रकार की महिलाओं का विराट जनता जनार्दन तो केवल उस ज्ञान पर आश्रित रहा जो उसे वांछित परंपरा द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहा और शस्त्रा एवं साहित्य शताब्दियों तक इस देश में राजा-महाराजाओं, सामंतो-उमरावों, धनवानों-उच्च कुलीनो के प्राधिकार में रहे? महिला कामगारों में चाहे घास काटने वाली हों, तेंदूपत्ते जमा करने वाली हो, बीड़ियाँ, अगरबत्ती आदि बनाने वाली हों, मिट्टी के बर्तन बनाने वाली हों, मछलियाँ ढोने और बेचने वाली हों या कपड़ा बुनने वाली हों इन सभी क्षेत्रों में उन्हें पुरुषों से अधिक मेहनती काम करने के बाद भी उनसे कम मजदूरी मिलती है, उन महिलाओं को प्रसूतिकाल की मजदूरी नहीं मिलती, क्या महिला साक्षरता अभियान से उनमें अपने अस्तित्व के संकट को पहचानने का सोच-विचार पैदा होगा और उनमें असमानता को समूल नष्ट करने के संघर्ष की चेतना जागृत हो सकेगी? इन सब बातों को महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में सोचना-विचारना बहुत आवश्यक है।

यद्यपि यह भी उल्लेखनीय है कि महिलाओं की बेहतरी के लिए कुछ विशेष योजनाएं बनाई गई। सर्वप्रथम ग्रामीण क्षेत्रों में महिला तथा बाल विकास कार्यक्रम (डी.डब्ल्यू.सी.आर.ए.) समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आई.आर.डी.पी.) की एक उपयोजना के रूप में 1 सितम्बर १९८२ में प्रारंभ किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गरीबी की रेखा से नीचे बसरकर रहे ग्रामीण परिवारों की महिलाओं के लिए स्वरोजगार के उपयुक्त अवसर प्रदान करना है। तत्पश्चात्‌ निर्धन महिलाओं की ऋण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए १९९२-९३ में एक राष्ट्रीय महिला कोष की स्थापना की गई। इसके साथ ही ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने व उनमें बचत की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने के लिए महिला समृद्धि योजना की शुरुआत २ अक्टूबर १९९३ से की गई। राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे महिला विकास कार्यक्रमों की सूची भी लंबी होती जा रही है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 1 नवंबर १९९१ से विशेषतः ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं के कल्याण एवं विकास हेतु 'पंचधारा योजना' शुरू की गई। इस कार्यक्रम के तहत वात्सल्य योजना, ग्राम्य योजना, आयुस्मति योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना और कल्पवृक्ष योजना सन्निहित है। हरियाणा सरकार ने अनुसूचित जाति व जनजातियों की बालिकाओं के लिए 'अपनी बेटी अपना धन योजना' प्रारंभ की गई। गुजरात सरकार द्वारा चलाई जा रही 'कुंवरबाई नु मामेरू योजना', 'महाराष्ट्र में प्रचलित काम धेनु योजना', आंध्रप्रदेश में 'बालिका संरक्षण योजना' आदि इस दिशा में किए जा रहे प्रयास हैं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम के कुछ प्रावधानों और परिवार नियोजन कार्यक्रम को जो कुछ भी सीमित सफलता प्राप्त हुई उसका सीधा लाभ सबसे पहले महिलाओं को मिला। काहिरा सम्मेलन (१९९४) व बीजिंग में महिलाओं पर चतुर्थ विश्व सम्मेलन (१९९५) ने महिला व बाल स्वास्थ्य सुधार और महिलाओं के यौन स्वास्थ्य व अधिकारों जैसे अन्य मुद्दों को भारतीय नीतियों में दाखिल कर दिया। भारत सरकार सोची और तय की हुई नीतियों के साथ विदेशी हलकों से आयातित विचारों और सलाहों के चलते हुए कुछ आशाजनक स्थिति निर्मित हुई। साथ ही महिलाओं के पक्ष में किए गए कानूनी सुधारों ने भी महिलाओं की पैरवी की। लेकिन समितियों, रपटों, योजनाओं और सुधारों से परे हटकर यदि वास्तविकता देखी जाए तो महिलाओं से संबंधित मोटे-मोटे तथ्य ही उनकी स्थिति की पोल खोलते हैं। वर्ष १९९१ की जनगणना के अनुसार स्त्री-पुरुष अनुपात ९२७ महिलाएं प्रति हजार पुरुष रहा। वैवाहिक स्थिति के आंकड़े बताते हैं कि १५ से १९ वर्ष के आयु समूह में ७ प्रतिशत लड़कों और ३९ प्रतिशत लड़कियों का विवाह हो जाता है। कम आयु में विवाह और मातृत्व के बोझ के अलावा सामान्य तौर पर भी माताओं में कुपोषण, उनकी अस्वस्थता और मृत्यु दर के मुख्य कारण है। गर्भावस्था के दौरान और प्रसूति के बाद स्वास्थ्य की उपेक्षा आम बात है। यह परिस्थितियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक व्याप्त है। बालक की चाह आज भी अत्यंत तीव्र है और विज्ञान की दया से मादा भू्रण हत्याएं निरंतर वृद्धि पर है। बालिकाओं के साथ भेदभाव को भी कई स्तरों पर अनुभव किया जा सकता है। टीकाकरण व पोषण के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। बालिकाओं और महिलाओं पर यौन अत्याचार ने अकल्पनीय आयाम ग्रहण कर लिए हैं। स्वास्थ्य के अलावा मानव कल्याण के सबसे सशक्त माध्यम शिक्षा की भी हालत दयनीय हैं स्कूलों में नामांकन अनुपात शाला में उपस्थिति दर और विद्यालय त्याग अनुपात में लिंग-भेद के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। विद्यालयीन, सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों के चलते यह प्रवृत्ति स्कूली शिक्षा के आगे भी यथावत्‌ बनी रहती है। पुरुषों में साक्षरता दर ६४.१३ प्रतिशत तथा महिलाओं में ३९.२९ प्रतिशत है। साक्षरता और शिक्षा के अभाव में स्त्रियाँ जिन अनेक लाभों से वंचित रहीं उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है रोजगार। १९९१ की जनगणना के आंकड़े दर्शाते हैं कि कार्यशील जनसंख्या का ७१.४२ प्रतिशत पुरुष थे और मात्रा २८.५८ प्रतिशत महिलाएं थीं जबकि असलियत यह थी कि ऊंची निरक्षरता दर के बावजूद अधिकांश महिलाएं काम करती थीं। इसी सांख्यकीय प्रमाण के पीछे बहुलता के कारण उनके कार्य की गणना नहीं की जाती। श्रम कानूनों के दायरे से बाहर ये महिलाएं कई प्रकार के शोषण का शिकार होते हुए भी आर्थिक तंगी के कारण इस क्षेत्र में अशिक्षित और सकल राष्ट्रीय उत्पाद के लगभग एक चौथाई हिस्से के बराबर योगदान करती हुई महिलाओं का कार्य पारिवारिक श्रम के रूप में विलीन हो जाता है। इसके अलावा कई महिलाएं तथाकथित स्त्री सुलभ नौकरियों, अंशकालिक कार्यों और स्व-रोजगार के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जाती है। भारत के लिंग आधारित श्रम बाजार की एक विशेषता यह भी है कि इसके एक सिरे पर यदि अदृश्य आर्थिक योगदान करती उपेक्षित महिलाएं हैं तो दूसरे सिरे पर सफेद पोश नौकरियों, व्यवसायों व उच्च पदों पर आसीन महिलाएं भी हैं। ये बात अलग है कि व्यावसायिक शिक्षा की सीढ़ियाँ चढ़कर इन स्थितियों में पहुंचने के बाद भी ये महिलाएं कैरियर की प्रतिकूल मांगों और संस्कृतिजन्य पारिवारिक दायित्व के बीच सामंजस्य बैठाने में पिसती रहती हैं ऐसी महिलाओं की संख्या कम होते हुए भी स्त्री दशा में नाटकीय परिवर्तन दर्शाने के लिए पर्याप्त हो जाती है साथ ही दूसरे क्षेत्रों में महिलाओं के कार्य की अदृश्यता को ये आंकड़े ढांक लेते हैं। फलस्वरूप स्त्रियों की आर्थिक भूमिका को कम आंके जाने के दूरगामी परिणाम योजनाओं और विकास कार्यक्रमों की रूपरेखा तक देखे जा सकते हैं। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि महिला विकास कार्यक्रमों को पुनः परिभाषित किया जाए। भारतीय महिलाओं के संस्कारों की अच्छी विशेषताओं को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता प्रदान की जाए। साथ ही प्राथमिक शिक्षा से ही लैंगिक समानता के मुद्दों पर जोर डालना जरूरी हो जाता है। मानसिकता में बुनियादी परिवर्तन के बाद ही महिला सबलीकरण के अन्य बाह्‌य तरीके सफल हो सकते हैं।

यह बात भी उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश पांच साल पहले लागू की गई अपनी महिला नीति का आकलन किसी स्वतंत्रा एजेंसी से करवाना चाहती है, ताकि गत अनुभवों और इस अध्ययन-आकलन के निष्कर्षों के प्रकाश में नई नीति को सुदृढ़ आधार मिल सकें। सिद्धांततः प्रदेश में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए किए गए कार्यों की एक प्रभावशाली सूची है। संस्थागत प्रजातांत्रिक ढांचे में नारी को नारायणी बनाने के प्रयास के फलस्वरूप तीस प्रतिशत पंच-सरपंच महिलाएं हैं। अब यह बात अलग है कि कुछ महिला सरपंचों के पतियों की जरूरत से ज्यादा सक्रियता ने एस पी यानी सरपंच पति नामक एक नया शब्द राजनीतिक मुहावरे में जोड़ दिया है। अन्य बातों के अलावा यहाँ शिक्षा-सहकारिता, नौकरियों आदि में महिलाओं के आरक्षण के साथ-साथ भूमि स्वामित्व में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने से नारी उत्थान के आर्थिक स्वावलंबन पक्ष, को निश्चय ही मजबूती मिलेगी। महिलाओं की स्थिति में सिद्धांततः सुधार के दावों के बावजूद व्यवहारतः मैदानी हालात में कोई निर्णायक अंतर शायद ही आया हो। अगर प्रदेश के उत्तरी जिलों में बालिका के जन्म को अभी भी इतना हतोत्साहित किया जाता है कि वहाँ स्त्री-पुरुष अनुपात डगमगा गया है। क्या बालिका शिशु की हत्या गोहत्या से कम पाप हैं? हो सकता है कि इस वर्ष के जनगणना के आंकड़े इस बिंदु पर आंखे खोलने वाले साबित हों। जहाँ दतिया, देवास या रायसेन जिले महिला आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अधिकारियों की पदस्थिति के लिए जाने जाते हैं, वहीं स्वयं मुख्यमंत्री से संबंधित राजगढ़ और गुना जिले महिला उत्पीड़न के लिए रेखांकित है। स्थिति का व्यंग्य यह है कि खुद मुख्यमंत्री महिला जागरण और सशक्तीकरण के प्रबल प्रतिबद्ध पक्षधर हैं। इसका साफ मतलब है कि महिला उत्थान की तमाम योजनाओं को समाज की अपेक्षित स्वीकृति अभी भी मिलने को है। आखिर क्या कारण है कि दहेज, मौतों और बलात्कारों जैसे जघन्य अपराधों के मामले में मध्यप्रदेश देश के शीर्षस्थ प्रदेशों में से है? कहीं ऐसा तो नहीं कि महिला सशक्तीकरण की योजनाएं शासकीय दावों के कलश-कंगूरों की श्रृंगारिक शोभा बनकर रह गई है जबकि सामाजिक चेतना की नींव से उनका कोई नहीं है। महिलाओं के लिए मगर के आंसू बहाने से कुछ नहीं होगा। नारी को नारायणी बनाने के लिए उसके 'आँचल में है दूध और आंखों में है पानी' वाले हालात बदलने होंगे।

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और अन्य सभी अवसरों में सामाजिक विभेद उनके विवेक और चेतना को पंगु कर देते हैं। ऐसी स्थिति में सशक्तीकरण के सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों से औपचारिक शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और साख व रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना आवश्यक है, परंतु इन अवसरों से लाभ उठाकर भी महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आए यह आवश्यक नहीं है, इसलिए महिलाओं के आंतरिक सोच में परिवर्तन लाने के लिए प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है। आत्मिकरूप से निर्भीक, बचपन से ही शारीरिक रूप से शक्तिशाली और आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना, महिला सशक्तीकरण के चरण हो सकते हैं। इसके साथ ही विधिक साक्षरता और सहायता से इस जागृति को सही दिशा में गति दी जा सकती है जिससे सूक्ष्म से वृहद स्तर तक हो रहे प्रत्येक प्रकार के अन्याय और अपराध का सशक्त विरोध महिलाएं कर सके। पुलिस, प्रशासन और विधि से जुड़े संपूर्णतंत्र को इस संबंध में संवेदनशील बनाना सार्वजनिक नीतियों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इन सभी प्रयासों की सफलता समाज के और सबसे ज्यादा स्वयं महिलाओं के दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन पर निर्भर करती है स्वयं के प्रति आस्था और मानवीय मूल्यों में दृढ़ विश्वास से ही महिला सशक्तिकरण संभव है।

महिला सशक्तिकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें न केवल संसाधनों पर उनको अधिकार दिलाने होंगे वरन्‌ इस विचारधारा को भी बदलना होगा, जो भेदभाव के विचारों, दृष्टिकोण और विश्वास के जरिए लिंग-भेद को बनाये रखते हैं। इस विचारधारा वाले बिन्दु को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए क्योंकि इसमें परिवर्तन न होने के कारण ही सरकार की अनेक सशक्तिकरण योजनाएं निष्प्रभावी सिद्ध हुई हैं। तमाम सशक्तिकरण योजनाओं में संसाधनों के पुनर्वितरण, संसाधनों के पुनर्वितरण, संसाधनों पर समान पहुंच और अधिकार के जरिए महिला पुरुष के शक्ति संबंधों में और साथ ही ऐसे विचारों को आगे बढ़ाने वाली संस्थाओं व संरचनाओं में परिवर्तन लाना आवश्यक है। अतः सशक्तिकरण का प्रारंभ उस वैचारिक परिवर्तन पर आघात करके किया जाना चाहिए जो कि भेदभाव को आगे बढ़ाते हैं। इसके लिये महिला-पुरुष की समानता के विचारों को समाज में प्रसारित किया जाना चाहिए। महिलाओं के लिए शिक्षा अनिवार्य हो और शिक्षा के पाठ्यक्रमों में असमानता के मूल्यभारित अंशों को हटाया जाना भी आवश्यक है दूसरे, महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बनाकर सशक्त किया जाएं। विभिन्न सेवाओं एवं क्षेत्रों में आरक्षण और दूसरी सुविधाएं देकर उन्हें आगे लाने के प्रयासों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लागू की गई विभिन्न योजनाओं की समीक्षा कर बेहतर क्रियान्वयन की व्यवस्था की जाए। महिलाओं की स्थिति को सुधारने-संवारने के लिए अनेक कानून बनाये गये लेकिन इसके ठीक से क्रियान्वयन नहीं होने से वे अप्रभावी है। अतएव उनमें संशोधन एवं उनके क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी एजेन्सियों विशेषकर पुलिस और प्रशासन के साथ ही साथ न्यायपालिका को अधिक संवेदनशील बनाया जाना आवश्यक है।

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Tuesday, November 25, 2008

दलित लेखन : साहित्य में जातीय सम्प्रदायवाद का संक्रमण

डॉ० हरेराम पाठक
साहित्य विचार संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम है। साहित्य का इतिहास इस बात का साक्षी है कि समाज में जब-जब विघटन की स्थिति की आशंका हुई है तब-तब साहित्य-मनीषियों ने आगे आकर अपनी लेखनी द्वारा सामाजिक विघटन में सामंजस्यता लाने का प्रयास किया है। कोई भी साहित्यिक कृति कालजयी नहीं हो सकती है जब उसमें चिंतन की व्यापकता एवं संवेदनशीलता की गहराई समाई हुई हो। इसी चिंतन की व्यापकता, उदात्तता एवं संवेदनशीलता की गहराई के चलते, कबीर लोक पुरुष कहलाये, तुलसीदास लोक नायक एवं समन्वयवादी कवि हुए, सूरदास साहित्य जगत्‌ के सूर्य साबित हुए, भूषण, मैथिलीशरण गुप्त एवं दिनकर जी राष्ट्रकवि कहलाये और न जाने कितने कवि साहित्यकार एक विशेष संस्था के रूप में अपनी पहचान बनाने में सक्षम हुए।साहित्य में परस्पर विरोधी विचारों की आवाज भी गूँजती रही है। परन्तु यह विरोध हठधर्मिता एवं पूर्वाग्रह से प्रेरित न होकर एक सुनिश्चित सर्वमान्य तथ्य तक पहुँचने की सकारात्मक धारणा से प्रेरित रहा है।
सारांश यह है कि विरोध 'विरोध' मात्र प्रकट करने के लिए नहीं, बल्कि वैचारिक मंथन-मनन एवं सुनिश्चित निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए होता रहा है। संस्कृत साहित्य में रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचित्य आदि सम्प्रदाय वैचारिक मंथन के ही परिणामस्वरूप काव्यशास्त्रीय आलोचना के उत्कृष्ट मानक स्थापित कर पाये। हिन्दी साहित्य में वीर, भक्ति, रीति आदि कालों की अपनी अलग महत्ता रही है और इनमें भी काव्यशास्त्रीय शिल्पकला के साथ-साथ मानवीय मूल्यों की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। आधुनिक काल में छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और न जाने कितने वाद आये, सबमें विचारों की भिन्नता रही, पर अंततः सभीवाद मानव-मानव को जोड़ने में ही संलग्न रहे-'नदिया एक घाट बहुतेरे' के तर्ज पर।इन सब बातों को कहने का एकमात्र यही तात्पर्य है कि साहित्य में परस्पर विरोधी विचार भले हों, उसमें जाति-विरोधी अथवा जन-विरोधी विचार नहीं हो सकते। साहित्य में कलात्मक सम्प्रदाय स्वीकार्य है, परन्तु सामाजिक विद्वेष फैलाने वाले जातीय सम्प्रदाय बिलकुल नहीं।
आश्चर्य है कि आज दलित लेखन के नाम पर उन्हीं विरोधी विचारों को मान्यता मिलने लगी है जो साहित्य के कभी विषय रहे ही नहीं हैं। आधुनिक युग में जहाँ चिन्तन एवं विचार विमर्श हेतु अनेक मंच एवं संचार माध्यम विकसित हो चुके हैं वहाँ दलित पुस्तकों को जलाकर अपना विरोध प्रकट करने का 'फासीवादी' तरीका अपना रहे हैं। जुलाई २००४ में भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास 'रंगभूमि' की प्रतियाँ जला दी गयीं। दलित लेखक चमन लाल जी ने इसे 'फासीवादी' कर्म बताया।१ अगस्त में 'हंस' का दलित विशेषांक प्रकाशित हुआ परन्तु उसमें अकादमी के इस 'फासीवादी' कर्म पर किसी ने मुँह तक न खोली। उसी अंक में मैनेजर पाण्डेय का साक्षात्कार छपा था जिसमें उन्होंने कहा है कि ÷दलित साहित्य हिन्दी साहित्य का लोकतंत्रीकरण कर रहा है।'२
यदि दलित साहित्यकारों के ऐसे मंसूबों को लोकतंत्रीकरण कहेंगे जो अराजक तंत्र किसे कहा जायेगा, यह विचारणीय मुद्दा है।दलित साहित्यकारों का एक बहुत बड़ा अंश यह मानकर चलता है कि 'दलितों द्वारा, दलितों के जीवन पर दलितों के लिए लिखा साहित्य ही दलित साहित्य है।'३ अर्थात्‌ गैर दलित दलितों की मार्मिक सच्चाई का चाहे जितनी भी ईमानदारी से वर्णन करें उसे दलित साहित्य नहीं कहा जा सकता। क्या ऐसे विचारों से साहित्य में जातीय अथवा वर्गीय सम्प्रदायवाद का जन्म नहीं होगा? क्या ऐसा साहित्य समाज में स्वस्थ मानसिकता का विकास कर पायेगा? यह विचारणीय मानसिकता का विकास कर पायेगा? यह विचारणीय प्रश्न है। दलित लेखक मुद्राराक्षस तो यहाँ तक कहते हैं कि ''आखिर गैर दलित 'दलित' पर बोलने का अधिकार क्यों चाहता है।''४ मेरी समझ से मुद्राराक्षस की दलित एवं गैर दलित लेखक संबंधी अवधारणाओं पर कटु प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए ताकि सामान्य पाठक का रुचि संस्कार हो सके तथा साहित्य अपने असली स्वरूप में जीवित रह सके। किसी समय साहित्य का दायरा इतना व्यापक था कि अध्यात्म, दर्शन एवं विज्ञान तक उसकी सीमा रेखा में आते थे, परन्तु आश्चर्य कि वही साहित्य आज संकीर्णता के गलियारे में भटकते हुए कहीं स्त्रीवादी एवं पुरुषवादी लेखन तो कहीं दलित एवं गैर दलित लेखन तथा कहीं शहरी एवं ग्रामीण लेखन के नारेबाजी में सिकुड़ता चला जा रहा है। निश्चय ही साहित्य का यह रूप स्वास्थ्य कर नहीं कहा जा सकता।
इधर दलित लेखन के नाम पर हठधर्मिता एवं पूर्वाग्रह पूर्ण लेखन को अधिक बल मिला है। दलित लेखक कंवल भारती की बौखलाहट देखने योग्य है-''यदि आप दलित साहित्य नहीं पढेंगे तो हम आपके प्रेमचन्द एवं निराला को क्यों पढें?''५ मतलब, प्रेमचन्द और निराला गैर दलितों के लेखक हो गये, वाह रे विचार! परन्तु वहीं प्रेमचन्द और निराला यदि दलित जाति में पैदा हुए होते तो क्या कंवल भारती उन्हें पढ़ने से इंकार करते? निश्चित रूप से नहीं करते। इसका स्पष्ट अर्थ है कि दलित लेखक विचार की उदात्तता के आधार पर किसी लेखक का मूल्यांकन न कर जाति के आधार पर करने लगे हैं। परिणामस्वरूप साहित्य में संकीर्ण सम्प्रदायवाद का प्राबल्य होने लगा है।रमणिका गुप्ता इस साहित्यिक सम्प्रदायवाद का समर्थन करती हुई असंगत तर्क प्रस्तुत करती है - ''यह तो सर्वविदित है कि साहित्य रसों के आधार पर भी बाँटा जाता रहा है, अन्यथा ये श्रृंगार रस या वीर रस साहित्य क्यों कहलाता? इतना ही नहीं, उस समय रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति एवं ध्वनि सम्प्रदायों में तीव्र आपसी खींचतान इसी विभाजन का नतीजा थी।''६ रमणिका जी को यह समझना चाहिए कि संस्कृत साहित्य में रीति, वक्रोक्ति, अलंकार, रस आदि सम्प्रदायों के चलन से काव्य शास्त्रीय समीक्षा संबंधी नये-नये तथ्य एवं विद्वतापूर्ण विचार सामने आये। उक्त सम्प्रदायों को स्थापित करने वाले विद्वानों ने साहित्य को वैचारिक समृद्धि प्रदान की। क्या दलित साहित्यकार अब तक कोई वैचारिक एवं उदात्तता से परिपूर्ण साहित्यिक क्रांति लाने में सफल हुए हैं? उत्तर होगा-नहीं। अतः साहित्य के अन्य खेमों से दलित साहित्य की बराबरी बैठाना असंगत है।उसी आलेख में रमणिका जी आगे लिखती है - ''शिष्ट साहित्य वही था जो विशिष्ट लोगों द्वारा विशिष्ट लोगों के लिए लिखा जाता रहा।''७
रमणिका जी को मालूम होना चाहिए कि भारतेन्दु, प्रेमचंद, निराला, दिनकर, नागार्जुन आदि शिष्ट साहित्य के ही रचनाकार रहे हैं, लेकिन उन लोगों ने विशिष्ट लोगों के लिए भी नहीं लिखा। गोदान का 'होरी', कफन के घीसू और माधव, तथा 'ठाकुर का कुआँ' का 'जोखू' क्या विशिष्ट पात्र हैं? और तो और, रमणिका जी की भक्तिकाल पर प्रहार करने से भी नहीं चूकती है। उनका तर्क देखिए - 'भक्तिकाल का साहित्य सीधे राजा से विद्रोह न कर पाने के कारण धर्म की आड़ लेकर खड़ा हो गया और वह जनता के दरबार में ऊँचा उठ गया।'८ रमणिका जी की यह उक्ति भक्तिकालीन साहित्य की अंतर्वस्तु से अनभिज्ञता को प्रमाणित करती है। वास्तव में भक्तिकालीन साहित्य का आधार राजा के प्रति विद्रोह करना था ही नहीं। यदि राजा के प्रति विद्रोह न कर सकने की प्रतिक्रिया राजनिंदा का प्राबल्य होता, भक्ति भावना की तल्लीनता नहीं आ पायी होती।
उनकी तो स्पष्ट घोषणा थी - ''संतन को कहाँ सीकरी सो काम।'' उनकी अगली पंक्ति देखिए - ''भक्तिकाल में मनुष्य की अहमियत कहीं नहीं थी, वह राजा या ईश्वर के ही निमित्त था।''९ यह सर्वविदित है कि नैतिकता एवं उच्च मानवीय आदर्शों की स्थापना करना भक्तिकाल की मुख्य विषय वस्तु रही है। क्या नैतिकता एवं आदर्श मनुष्य की अहमियत से जुड़े सवाल नहीं हैं? कबीर ने रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं जाति-पांति के आडम्बरों का विरोध किया था। क्या ये सब मनुष्य की अहमियत से जुड़े सवाल नहीं हैं?आश्चर्य की बात है कि जहाँ भक्तिकाल में रमणिका गुप्ता को मनुष्य की अहमियत ही दिखाई नहीं पड़ती है, वही दलित लेखक चमन लाल जी भक्तिकालीन संत कवियों को ही दलित आन्दोलन का प्रेरणा स्रोत मानते हैं। वे लिखते है - ''उत्तर भारत में संत कबीर, रविदास, मीराबाई, दयाबाई, सहजोबाई व अन्य अनेक भक्त कवि सेन, पोपा आदि हिन्दी के दलित साहित्य के प्रेरणा स्रोत बने।''१०
अतः इससे प्रमाणित होता है कि दलित साहित्य के लेखकों में अभी वैचारिक ताल-मेल नहीं हो पाया है। एक ओर कंवल भारती प्रेमचंद और निराला को पढ़ने से इंकार करते हैं, तो दूसरी ओर दलित समर्थक रूपचंद गौतम लिखते हैं कि ''प्रेमचंद पहले भारतीय लेखक हैं जो सवर्णों और अवर्णों के बीच रोटी-बेटी का संबंध स्थापित करते हैं।''११ क्या यही है दलित साहित्य की वैचारिक एवं सैद्धान्तिक एकरूपता? दलित लेखन को प्रोत्साहित करने वाले प्रगतिवादी चिंतक डॉ० नामवर सिंह भी कंवल भारती के बड़बोलेपन एवं उनकी टेढ़ी निगाह से नहीं बच पाते हैं।
वे कहते हैं - ''राम विलास शर्मा और नामवर सिंह सरीखे प्रगतिशील चिन्तकों ने भी मार्क्सवाद के नाम पर ब्राह्मणवाद को ही प्रस्तुत किया है।''१२तो यह है कि दलित साहित्यकारों का वैचारिक अंतर्विरोध प्रगतिवादी साहित्य की तो एक निर्दिष्ट आचार संहिता थी, परन्तु दलित साहित्य के जितने साहित्यकार हैं, वे अपनी-अपनी सुविधा के लिए अपनी वैचारिक जिद्द को साहित्यिक मंच पर प्रतिष्ठित करने में लगे हुए हैं। उनमें न वैचारिक सोच की गहराई है, न परंपरागत साहित्य के प्रति चिंतन-मनन का प्रयास ही। यही कारण है कि वेद, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति आदि हिन्दू संस्कृति के आधार पर भूत ग्रन्थों को ब्राह्मणवादी एवं सवर्ण मनोवृत्ति के प्रचारक ग्रंथ के रूप में मानते हैं। उनसे पूछना चाहिए कि आदि रामायण के रचनाकार महर्षि बाल्मीकि, व्यास एवं कालिदास क्या सवर्ण थे? सच तो यह है कि हिन्दू धर्म के आधार भूत ग्रन्थों के रचनाकार भी दलित ही रहे हैं, वे धर्म के नियामक एवं प्रचारक रहे हैं, यदि उन्हें उत्पीड़ित किया गया होता तो उनकी रचनाओं में उसकी स्पष्ट झलक होती। यहाँ तक की बहुत से शूद्र ऋषियों ने उपनिषदों की भी रचना की है। 'तैत्तिरीय उपनिषद्' के रचयिता तितिर ऋषि शूद्र थे।दलित लेखकों ने 'स्वानुभूति' एवं 'सहानुभूति' का मुद्दा उठाकर साहित्य में जातीय आरक्षण की मुहिम चला रखी है। उनका कहना है कि दलित जाति के लेखक ही अपनी पीड़ाओं का यथार्थ अंकन कर सकते हैं क्योंकि ऐसा करते वक्त उनमें स्वानुभूति की गहराई होगी। उनकी दृष्टि में गैर-दलित पर स्वानुभूति नहीं, बल्कि सहानुभूति के आधार पर लिखते हैं जिनमें अनुभूति की सच्चाई नहीं होती है। आश्चर्य की बात है, एक ओर स्वानुभूति का प्रश्न उठाकर दलित-लेखक मात्र दलितों द्वारा लिखे साहित्य को ही दलित साहित्य मानते हैं, तो दूसरी ओर राज परिवार से आये गौतम बुद्ध को वे अपना पहला दलित नेता मानते हैं। जब एक दलित के यथार्थ की अनुभूति एक दलित ही कर सकता है तो राज परिवार में जन्म लेने वाले गौतम बुद्ध को दलित-उत्पीड़न की अनुभूति कैसे हो गई? और यदि गौतम बुद्ध को दलित उत्पीड़न की अनुभूति हो सकती है तो अन्य गैर-दलित लेखकों को उसकी अनुभूति क्यों नहीं हो सकती? क्यों, श्रीधर पाठक, निराला, प्रेमचंद, नागार्जुन आदि साहित्यकारों को 'स्वानुभूति' का मुद्दा उठाकर उन्हें सिरे से खारिज किया जा रहा है? साहित्यिक क्षरण के इस गहन पहलू पर विचार करना आवश्यक है। दूसरी ओर, स्वानुभूति के भी अपने दायरे हैं। कोई भी ऐसा दलित लेखक नहीं है जो एक ही साथ अपने सिर पर मैला ढोने का 'स्वानुभूति' रखता हो और लेखन भी करता हो। वह भी अपने बाप-दादों की अनुभूतिगत कथाओं को सुनकर अथवा पास पड़ोस के दलित मजदूरों की स्थिति देखकर ही अपनी कल्पना के सहारे साहित्य सृजन करता है। फिर, स्वानुभूति का सवाल खंडित हुआ कि नहीं।साहित्य लेखन में मुख्य बात संवेदनशीलता एवं कल्पना की उर्वरता की होती है। लेखक दलित ही हो परन्तु उसमें संवेदनशीलता एवं उर्वर कल्पना की कमी हो तो वह न तो दलित पात्रों के साथ न्याय कर पायेगा, न सवर्ण पात्रों के साथ ही। संवेदनशीलता की इसी व्यापकता को दलित लेखक 'सहानुभूति' का नाम देते हैं। परन्तु दोनों में काफी अन्तर है। 'सहानुभूति' में करूणा का भाव है, परन्तु 'संवेदनशीलता में सहानुभूति का भाव हैं। संवेदनशीलता का यही व्यापक भाव प्रेमचंद को 'दो बैलों की कथा' जैसी मार्मिक कहानी लिखने को प्रेरित करता है। उक्त कहानी में बैलों की मूल व्यथा एवं विवशता का मार्मिक चित्रण प्रेमचंद जैसे सहृदयता एवं संवेदनशीलता के पूर्ण साहित्याकार ही कर सकता है। जब कोई लेखक पशु एवं जड़ जगत का हृदयस्पर्शी एवं स्वानुभूति पूर्ण वर्णन कर सकता है तो भला दलित व्यक्ति के जीवन का दर्द भरा वर्णन स्वानुभूति एवं संवेदना के आधार पर क्यों नहीं कर सकता? क्या ईदगाह जैसी बाल मनोविज्ञान से सम्पन्न कहानी लिखने के लिए एक प्रौढ़ लेखक को पुनः बालक बनना होगा? यदि 'स्वानुभूति' शब्द को दलित लेखकों जैसा व्याख्यायित किया जाए तब तो बाल-साहित्य बच्चों द्वारा ही लिखा जायेगा, पशुओं की अंतर्व्यथा को पशुओं द्वारा लिखा जायेगा, तोता-मैना की कहानी गढ़ने के लिए तौता-मैना बनना पड़ेगा। इसका सीधा मतलब है कि हर लेखक को अपने समानधर्माओं के संबंध में लिखने का अधिकार होगा। ऐसी स्थिति में साहित्य साहित्य न होकर कुंठा ग्रस्थ बकवास का अखाड़ा बनकर रह जायेगा। दूसरी ओर इस प्रकार के लेखन को लेखन तो कह सकते हैं, साहित्य कतई नहीं कह सकते।दलित लेखकों की इसी हठधर्मिता का परिणाम है कि बहुत से दलित लेखक अपने आपको दलित विचारधारा से उसी प्रकार अलग करने लगे हैं जिस प्रकार सिद्धाचार्यों के अनगढ़पन तथा वामाचारों से तंग आकर कुछ सिद्धों ने नाथ पंथ अपना लिया था। यही कारण है कि दलित कुलोत्पन्न रत्न कुमार सांभरिया स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि 'मैं दलित साहित्य का विरोधी हूँ।'१३ हिन्दी काव्य में दलित काव्यधारा के लेखक माताप्रसाद कहते हैं - 'जहाँ ब्राह्मण वर्ग के बहुत से लोग इस बुराई को दूर करने में लगे हैं, वहीं दलित वर्ग के लोगों को भी प्राचीन काल की इस व्यवस्था के लिए, ब्राह्मणों या मनुस्मृति को कोसने से ही काम नहीं चलेगा। मनुस्मृति तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में दलित के विरुद्ध जो बातें लिखी गयी हैं, आज के संविधान में वे बेमानी हैं। उनका बार-बार उल्लेख करने से वातावरण विषाक्त होता है, गडे मुर्दे उखाड़ने से किसी का लाभ नहीं होने वाला है।'१४जिस प्रकार का प्रतिक्रियावादी दलित लेखन का चलन आजकल हो गया है वह यदि हजारों साल पहले हुआ होता तो उसकी प्रासंगिकता कुछ समझ में आती, परन्तु आज स्थिति बिल्कुल बदली हुई है। देश के संविधान द्वारा दलितों की राजनीति में भागीदारी सुनिश्चित हो चुकी है। दलित समाज के लोग भी आर्थिक एवं शैक्षणिक प्रगति कर रहे हैं। लेकिन आर्थिक एवं शैक्षणिक प्रगति होने मात्र से दलित चिंतन में बदलाव आ सकेगा, यह कोई आवश्यक नहीं हैं। दलितों में समग्र उत्थान लाने के लिए उन्हें अनावश्यक विवादों से ऊपर उठना होगा। दलित वर्ग की विभिन्न जातियों के बीच भावात्मक एकता स्थापित कर उसे सवर्णों से जोड़ना होगा। दलित लेखकों को यह दिखाई देता है कि उनके घर ब्राह्मण भोजन नहीं करता, परन्तु यह दिखाई नहीं देता कि डोम के यहाँ चमार नहीं खाता, चमार के यहाँ दुसाध नहीं खाता, धोबी के यहाँ से इनका खान-पान नहीं है। आखिर यह सब व्यवस्था कब और कैसे मिटेगी, यह चिंतनीय है। ब्राह्मणों में भी विभेद है। महापात्र ब्राह्मण को गाँव से होकर अभी भी बहुत से जगहों में गुजरने नहीं दिया जाता है। षटकर्म कराने के बाद भूले-भटके आदि वे गाँव से होकर गुजरते हैं तो उन पर ढेला फैंका जाता है। ये सब दृष्टान्त ये दर्शाते हैं कि ब्राह्मण समाज में ही ब्राह्मण अछूत हैं एवं दलित समाज के भीतर भी एक दूसरे के प्रति छूत-अछूत की भावना हैं प्रश्न उठता है, शिक्षा का इतना विकास हो जाने पर भी हमारे समाज की एक अभिशाप्त नियति अभी भी क्यों बरकरार है? उत्तर सिर्फ एक ही है कि हम दूसरे की जड़ काटने उसकी बुराई देखने आदि में ही अपनी सारी ऊर्जा खपा देते हैं, अपनी जड़ कितनी मजबूत अथवा कमजोर है, यह देखने से हम सदा कतराते रहे हैं। किसी भी आन्दोलन को हमने राजनीति में प्रवेश करने, तथा समाज में चाहें ग़लत तरीके से ही सही, धाक जमाने का जरिया बना लिया है। इस प्रकार के आन्दोलन हमें क्षणिक आत्मलीन सुख तो दे सकते हैं, परन्तु इससे हमारी सामाजिक समस्याओं का शाश्वत समाधान नहीं हो सकेगा। हमारी लड़ाई अवर्ण-सवर्ण के बीच नहीं वैचारिक प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ होनी चाहिए चाहे वह प्रदूषण अवर्ण के झरोखे से आवे या सवर्ण के।
संदर्भ सूची
१. वर्तमान साहित्य, सितम्बर, २००४, पृ० ६
२. हंस, अगस्त २००४, पृ० २००
३. समकालीन भारतीय साहित्य, मई-जून, ९८, पृ० १५७
४. इंडिया टुडे, ६ दिसम्बर २०००
५. इंडिया टुडे, ६ दिसम्बर २०००
६. समकालीन भारतीय साहित्य, मई-जून ९
८, पृ० १५०७. वही, पृ० १५१८. वही, पृ० १५१
९. वही, पृ० १५११०. वही, पृ० १५५
११. समकालीन भारतीय साहित्य, अंक ५९, पृ० १९५
१२. दलित जन उभार, पृ० १८८१३. हंस, अगस्त २००४, पृ० ८४
१४. हिन्दी काव्य में दलित काव्यधारा, पृ० ३२

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Sunday, November 23, 2008

डॉ० श्योराज सिंह बेचैन से मिर्जा गौहर हयात की अन्तरंग बातचीत

सबसे पहले श्योराज सिंह बेचैन जी आपके मुँह से पाठकों के लिए आपकी पारिवारिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि जनना चाहेंगे?

गौहर साहब समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरु करूँ? मैं आज दिल्ली में अध्यापक हूँ, लेकिन मैंने जिन्दगी कहाँ से शुरू की और कैसे शुरु की यह बहुत लम्बी दास्तान है। मैं उत्तर प्रदेश के एक बहुत ही पिछड़े हुए गाँव नन्दरौली(बदायूँ) में पैदा हुआ। मेरे पूर्वज चर्मकार का काम किया करते थे। मुर्दा मवेशी उठाना, उनका चमड़ा उतारना, उसको शुद्ध करके समाज के उपयोगी बनाना, यह सब हुआ करता था। लेकिन आप देखिए कि ऐसी दुर्घटना घटी जिसने मेरे बचपन को एक संकट कालीन स्थिति में डाल दिया। मसलन, जब मैं लगभग ५-६ वर्ष का था एक दुर्घटना में मेरे पिता जी की मृत्यु हो गयी। माँ अशिक्षित थीं। मेरे बाबा का एक पैर टूट चुका था। उनके छोटे भाई नाबीना थे और मेरे ताऊ भी नेत्राहीन थे। ऐसी स्थिति में हम बेघर हो गये और उसी समय से मेरी यात्रा दूसरों के सहारे शुरु होनी थी शुरु हुई।

आज श्योराज सिंह बेचैन आप दलित विमर्श के एक जाने-पहचाने नाम हैं। साहित्य के परिप्रेक्ष्य में आपके जीवन के प्रमुख पड़ाव?

मेरे जीवन का प्रमुख पड़ाव, साहित्य और जीवन दोनों परिप्रेक्ष्य में बड़ा साम्य। मैं बचपन में बिना किसी प्रशिक्षण के और बिना किसी गुरु के यह कहें, किसी चिंहित किये गये प्रशिक्षक के मैं कविताएँ करने लगा था। ये कविताएँ अपने परिवेश से अपने वातावरण से, अपने अनुभव से लिखी जा रही थीं। मैं विद्यार्थी था और विद्यार्थी कैसा था कि बालश्रम के क्रम में विद्यार्थी बना था। मैं बचपन में दिल्ली आ गया था। मौसा-मौसी के पास रहकर कभी नीबू बेचकर, कभी अण्डे बेचते हुए तो कभी अखबार डालते हुए, मैंने गा-गाकर अपनी कविता शुरु की। बाहर रहकर शिक्षा ग्रहण करना, खुले वातावरण से सीखना तो मिल गया, उससे सीखते रहना और अनौपचारिक शिक्षा की तरफ बढ़ना ये सब बाल संघर्ष के दिन थे और उस समय किसी निश्चित विचारधारा में बँधकर कोई कविता करना न सम्भव था, न स्वाभाविक था। जो मन में आता था, जो अनुभव से निकलता था वह लिख लिया करता था। लेकिन जब मैं कक्षा-८ का विद्यार्थी हुआ गाँव में, दिल्ली में मेरे मौसेरे भाई जो कि मौलाना आजाद मेडीकल कालेज में एम.बी.बी.एस. के छात्र थे, उन्होंने दिल्ली के कई लेखकों से मेरा परिचय करवाया। उर्दू के शायरों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कैफी आजमी, शाहिर लुधियानवी मेरे दिमाग पर छाने लगे। उनके गीत जो रेडियो पर सुनने को मिलते थे वह गीत मुझे खींच कर अपनी तरफ करते गए। उनकी किताबों को मैंने दिल्ली में ढूँढ-ढूँढकर पढ़ीं। हिन्दी ने मुझे बहुत कम प्रभावित किया। कारण ये है कि उसमें गेयता बहुत कम मिलती थी और उसमें गीत बहुत कम मिलते थे तो इसलिए मेरी सरल उर्दू में लिखे गये गीतों ने मदद की और मैं गीतकार हो गया। गेय कविताएँ लिखते हुए छात्र जीवन से लोक जीवन में प्रसिद्ध होने लगा। उसी समय यानी कि छात्र जीवन से बाल सभा का अध्यक्ष रहा और उसके बाद जब चन्दौसी में ग्रेजुएशन करने आया तो आल इण्डिया स्टूडेण्ट फैडरेशन की जिला कमेटी के अध्यक्ष पद पर काम किया और उसी दौरान मिर्जापुर में एक मुशायरा हुआ जिसमें कि कैफ़ी आजमी, अली सरदार जाफरी जैसी हस्तियाँ भी थीं। मुझे एक छात्र के रूप में कविता रखने का मौका मिला। इससे पहले अपने कालेज के एक कवि सम्मेलन में एक छोटी-सी कविता सुनायी थी लेकिन उससे लगा कि बात अधिक दूर तक नहीं गयी। अखबारों में लेखन का काम छात्र जीवन से ही शुरु हुआ और पत्रिकाओं में मेरी कविता छपना शुरु हुई। किसान आन्दोलन की यूनियन और दलित आन्दोलन में भी कार्य किया। इसी के साथ सफाई मजदूरों के लिये शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना करके वहाँ के वाल्मीकि नौजवानों को जोड़ा, कई बार ऐसी स्थितियाँ आयीं जहाँ जोखिम था। उस समय जोखिम उठा लेने के जज्बे के बारे में मैं खुद हैरान हूँ कि उस समय मैं क्या था और आज कैसा हूँ? कितना किताबी होता चला जा रहा हूँ। इसके बाद अब मेरे गीत-संग्रह नई फसल, फूलन की बारह मासी आने शुरु हुए। दलित विमर्श या दलित साहित्य ८७ के आसपास से शुरु हुआ था। इससे पहले मैं मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित था। जनवादी लेखकसंघ प्रगतिशील लेखकसंघ के असर में था और १९८७ में ही जब मैंने पी.एच.डी. का इरादा बनाया, इन्हीं धाराओं से सम्बन्धित काम के लिये सोचा था परन्तु अच्छा यह हुआ कि इस क्रम में हिन्दी दलित पत्रकारिता में पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव', इस विषय को लेकर अपना पी.एच.डी. कार्य शुरु किया और ये काम और ज्यादा सार्थक इसलिए हो पाया कि वीरेन्द्र अग्रवाल जैसे सुलझे हुए कवि मेरे निर्देशक बने। तो बुनियादी काम मैं दलित चिन्तन के संदर्भ में यह कर पाया कि मैंने बाबा साहब अम्बेडकर के मूक नायक, बहिष्कृत भारत, समता-जनता जो मराठी में निकले हुए अखबार थे, इनका करीब ५ साल तक अध्ययन और अनुवाद किया। कई किताबों में वह आया। मूर्खों जो विवाद रहेगा, यह अन्याय कोई परम्परा नहीं', दलित क्रांति का शायर इत्यादि किताबें इस क्रम में छपकर आयीं। अखबारों में लिखना शुरु किया, यह मेरे लिए एक नया क्षेत्रा था। सहारा में मेरा एक कालम चलता रहा और हिन्दुस्तान में लिख ही रहा हूँ। जनसत्ता में लिखा है, मराठी पत्रों में लिखा है और अमर उजाला में १९८७ से ही लिख रहा था। जनसत्ता, अमर उजाला के लिए कवर स्टोरी लिखी, आवरण कथा लिखी और फिर धीरे-धीरे मैं आलोचना के फील्ड में उतर गया, कविता मेरी छूटती गयी इसका मुझे दुख हुआ। अब भी कई बार सोचता हूँ कि मैं तो कवि था आलोचना के जंगल में कैसे फँस गया? अब बहुत सारे लोग इधर-उधर मुझे आलोचक के रूप में जानने लगे लेकिन जब मैं अपने कर्म क्षेत्र की तरफ लौटता हूँ किसानों, मजदूरों, दलितों और अपने पुराने मित्रों में लौटता हूँ तो वह मुझमें अपना पुराना कवि ढूँढना चाहते हैं। मुझसे उन्हीं गीतों की, उन्हीं कविताओं की मांग करते हैं जो मैं उनके बीच गाया करता था तो इस तरह यह पड़ाव चलते रहे, मैं चलता रहा, वक्त चलता रहा, स्थितियाँ बदलती रहीं, जिम्मेदारियाँ बदलती रहीं और आज मैं यहाँ खड़ा हूँ तो मैं सोचता हूँ कि साहित्य में अब बहुत कुछ नये तरीके से सोचने की जरूरत है।

आपकी नजरों में दलित कौन है?

दलित क्या है? व्यवस्था में दलित कौन है? हमने शुरु से इस बात को साफ करने की कोशिश हमारी नजर में वे सब लोग दलित हैं जो किसी न किसी रूप में अस्पृश्यता के शिकार हैं, अब बहुत सारे लोग कहते हैं कि एक अफसर बन गया या किसी की अच्छी नौकरी लग गयी, तो वह दलित नहीं रहा, यह सतही और बहुत ही सरलीकृत सोच है, बात यह है कि मान लीजिए मैं अपनी स्थिति जद्दोजहद के बाद थोड़ा बहुत सुधार लेता हूँ। लेकिन क्या मेरी बहन की स्थिति मेरी जैसी हो गयी? क्या मेरी बुआ की स्थिति मेरी जैसी हो गयी? क्या मेरी माँ की स्थिति एक गैरदलित जैसी हो गयी? क्या मेरे दादा की स्थिति संभल गयी? या मेरी मौसी और मौसा की स्थिति संभल गयी, हजारों लोग जुड़े हुए हैं इससे। नाते-रिश्तेदार, घर वाले, परिवार वाले फिर पूरी जाति वाले। अब देखिए जिस गाँव में से निकल कर आया हूँ उस गाँव में चार बच्चे भी सरकारी नौकरी में नहीं है और सारे के सारे आते हैं शाहदरा, दिल्ली में दिनभर मजदूरी करके चले जाते हैं या बाहर चले जाते हैं तो आप बताइए कि गाँव में जिनके पास जमीनें नहीं हैं शहरों में उद्योग नहीं है तो आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रताड़ित है, उपेक्षित है, माली हालत खराब है और सामाजिक दृष्टि से यह कोई एक पान की दुकान तक नहीं खोल सकते क्योंकि कोई पान लेगा ही नहीं। यह कहना कि हर आदमी दलित है सही नहीं है। अब जितने मन्द बुद्धि ब्राह्मण हैं सबको दलित मान लिया जाए यह दृष्टि नहीं होनी चाहिए। बात यह है कि जन्म के आधार पर, जाति के आधार पर, जिन लोगों ने अपने आपको श्रेष्ठ मान कर रखा है वे कभी दलित नहीं हो सकते हैं और वे जब दलित कहलवाना चाहते हैं तो उसके पीछे आप देखिए कि जो एक योजना है। इसमें दलितों के लिए आयी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हड़प लेने की नियति होती है।अभी दिल्ली में कुछ दिन पहले एक खबर छपी है कि एक व्यक्ति ने छत्तीस साल पहले एक फर्जी जाति प्रमाण पत्र इस्तेमाल किया और किसी दलित को अपना बाप बना लिया और उसने मेडीकल में दाखिला ले लिया और वह आज हेड आफ डिपार्टमेंट बन गया, अब सरकार उसकी तलाश कर रही है पता कर रही है। सवाल यह उठता है कि मध्य प्रदेश में जाकर क्या वह दलित बाप के पास जाकर कभी रहा या नहीं रहा। दिल्ली में अभी तीस प्रतिशत फर्जी सर्टिफिकेट पाये गये। सभी अनुसूचित जाति के बनना चाहते हैं। जो संविधान में न्याय करने की कोशिश हुई, जिन लोगों की क्षति हुई है उन लोगों की कुछ आंशिक क्षति की पूर्ति की जाए क्योंकि वह तमाम लाभों से वंचित रह गया है, यह एक नैतिक जिम्मेदारी है। उसको हड़प लेना और जो गैर सरकारी संस्थाएँ है उस संस्था में उसे घुसने नहीं देना और सरकारी संस्थाओं का आरक्षण और दूसरी जो कल्याणकारी योजनाएँ हैं वह फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर हड़प लेना यह साजिश है। इसके तहत हर कोई दलित बनना चाहता है, तो वास्तव में दलित वह है जो अछूत रहे हैं, जिनके साथ अस्पृश्यता बरती जाती है। इस देश में मनु महाराज ने जो वर्ण व्यवस्था बनाई थी उसका साहित्य पर, विचार पर बहुत बड़ा असर है। अभी भी जो हिन्दुओं का सारा साहित्य है, इसके बावजूद मार्क्सवाद आ गया और फ्रायडवाद आ गया, तरह-तरह के वाद आ गए, अंग्रेज भी काफी समय तक राज कर गए, फिर भी यह जो लिखते हैं उस पर मनुस्मृति का पूरा असर है। महाभारत, रामायण यह जो हिन्दुओं के ग्रन्थ है उसके भावानुवाद हिन्दी की कहानियों, हिन्दी की कविताओं और उपन्यासों में भरे पड़े हैं। इसलिए यह कहीं आगे बढ़ ही नहीं रहे हैं। यह विकास कर ही नहीं रही हैं। कोल्हू के बैल की तरह घूम रहे हैं। चूँकि दलित साहित्य अपनी मौलिक तकलीफें ले आया है और उसका समाधान चाह रहा है इसलिए उसका पात्र वही हो सकता है जिसके पास मौलिक अनुभव है उसको कोई दूसरा काल्पनिक ढंग से व्यक्त कर ही नहीं सकता। करेगा तो सब फर्जी होगा। इस बात को श्वेत साहित्य ने साबित कर दिया। इस बात को महिलाएँ भी साबित कर रही हैं तो फिर कौन दलित है, कौन नहीं दलित है, सीधी सी बात है जो अस्पृश्यता के शिकार रहे हैं वही दलित हैं।
सम्पूर्णता में आप दलित विमर्श को कैसे परिभाषित करेंगे?
सम्पूर्णता से मतलब?
दलित विमर्श के तमाम क्षेत्रों में?
दलित विमर्श एक समान्तर विमर्श के रूप में आया है। वह राजनीति में अपने नेतृत्व की बात करता है, साहित्य में भी अपने नेतृत्व की बात कर रहा है, मीडिया में भी हिस्सेदारी माँग रहा है, आर्थिक क्षेत्रों में भी उसकी माँग चल रही है, बड़ी तार्किक माँग चल रही है और कला संस्कृति के तमाम क्षेत्रों में दलित ने एक लोकतांत्रिाक मांग की है और मैं यह समझता हूँ कि अगर देश को लोकतांत्रिक बनाना चाहेंगे तो दलित विमर्श को नकार कर कोई संस्था, कोई इंस्टीट्यूट, कोई भी माध्यम लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि दलित कोई दो-चार है नहीं, छोटे-मोटे देश आस्ट्रेलिया और इंग्लैण्ड के बराबर ये लोग हैं, तो फिर इतनी बड़ी आबादी को आप नकार कर कहे कि हां, देश का विकास हो जाएगा! बहुत सारे दलितों का स्वयंभू नेता बनने की कोशिश करते हैं। गोलमेज सम्मेलन हुआ तो गाँधी जी ने दलितों का नेता बनने की कोशिश की थी। उन्होंने अपना दावा ठोका था और कहा था कि मैं दलितों का भी प्रतिनिधि हूँ, जिन्ना साहब मुसलमानों के प्रतिनिधि हुए। यदि डॉ० अम्बेडकर वहाँ उपस्थित न होते तो वही हो जाते दलितों के प्रतिनिधि। लेकिन डॉ० अम्बेडकर ने साबित किया कि, भाई गाँधी जी को कुछ लेना-देना नहीं। ये हिन्दुओं के प्रतिनिधि ही हैं। उन्हीं की ही बात सोचते हैं और उन्हीं के नुमाइंदे हैं। मैं दलितों का नुमाइंदा हूँ और यह बात उन्हें साबित करनी पड़ी। स्वामी अछूतानन्द जैसे जागरूक, जो दलित नेता, जो बुद्धिजीवी, साहित्यकार व पत्राकार भी थे, उन्होंने आदि हिन्दू अखबार निकाला था। कविताएँ और कहानियाँ लिखी थी, उन्होंने बड़ा काम किया। उन्होंने यह गलतफहमी दूर करने के लिये बहुत काम किया कि गाँधी जी दलितों के नेता हैं। साहित्य, राजनीति, कला व मीडिया में भी यही स्थिति होनी चाहिए कि दलितों के विचार का प्रतिनिधित्व गैरदलित नहीं कर सकता है। जाहिर सी बात है इसलिए साहित्य में भी एक अलग धारा आ गई। चूँकि आप मानने के लिए तैयार नहीं थे। आज हर अखबार, हर पत्रिाका, हर चैनल यह बात दबाने में खुशी महसूस नहीं करता बल्कि बताने में और आगे बढ़कर लाने के लिए मजबूर है तो उसका कारण यही है कि अब यह धारा धीरे-धीरे इतनी विकसित हो गयी कि एक समानान्तर साहित्य एक समानान्तर विचारधारा के रूप में आ गया। इससे देश का विकास होगा, इससे संस्कृति की सोच का विकास होगा, क्योंकि जो पक्ष समाज का अब तक दबा हुआ था वह इस माध्यम से आगे आ रहा है। कमजोर हिस्से अगर मजबूत हो जाते हैं तो पूरा देश मजबूत हो जाता है। हमारा देश बार-बार गुलाम क्यों हुआ? इसलिए कि २५ प्रतिशत लोगों को यहाँ किसी काम का रहने ही नहीं दिया गया। उन्हें शिक्षा नहीं दी गयी। विद्यालय की बात छोड़िए, वे रास्ता तक नहीं चल सकते थे। इस तरह से इस देश में अत्याचार हुए और आज तक उनका क्रम गोहाना तक दोहराया जा रहा है। पूरे देश में ये हो रहा है। कसम-कश बढ़ी है, दलित जब बर्दाश्त कर लेता या मार दिया जाता था और बैठ जाता था। बलात्कार हो जाता था तो कोई केस करने के लिए भी नहीं उठते थे, उस वक्त कहते थे कि व्यवस्था सब सही चल रही है। अब जब उसने जवाब देना शुरु कर दिया, उसमें खुद्दारी जागृत हुई और अधिकार बोध की चेतना आई तो लोगों को आपत्तियाँ होने लगीं। दलित चेतना जिन-जिन क्षेत्रों में आ रही है वह-वह क्षेत्र तेजी से डेमोक्रेटिक बन रहे हैं और जहाँ नहीं है वही आलोकतांत्रिाक हैं और समाज सामंती मूल्य से जकड़ा हुआ है। वही बीमार क्षेत्र है और स्वास्थ्य उसका तभी ठीक होगा जब सारे लोग आये। इसीलिए उदारीकरण भूमण्डलीयकरण से दलित परेशान नहीं हो रहा है। अंग्रेजों ने यहाँ आकर रेलवे लाइन डाली, नई पद्धति की शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत की, ऐसी-ऐसी चीजें हैं जो बहुत मजबूत है। पुल बना दिया तो आज भी नहीं टूटे और हमारे देश के ठेकेदार कैसे देश भक्त हैं? उनकी बनाई हुई इमारत टूटती है पहले, बनती हैं बाद में, तो इस तरह से है तो दलित विमर्श केवल साहित्य और समाज का विमर्श नहीं है। सारे विषय में उसकी उपस्थिति, उसका हस्तक्षेप असर डाल रहा है।
दलित आन्दोलन को मैं इस तरह सफल मानता हूँ कि यह दलित को विमर्श के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है, और दलित विमर्श की एक धारा समाज में प्रचलित हुई तो इसके परिप्रेक्ष्य में मैं आपसे यह जानना चाहूँगा कि साहित्य में दलित विमर्श क्या है? साहित्य में यह कब प्रारम्भ हुआ और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है?
देखिए, जब दलित लिखने की स्थिति में नहीं था तो बोलता था, तब भी अपनी वाणी से कहता था। कबीर के मुँह से निकलने वाला शब्द तो साहित्य की एक अच्छी परम्परा दलितों को मिली साहित्य में। कबीर की, रैदास की, अछूतानन्द की और बाद में डॉ० अम्बेडकर उस परम्परा में जुड़ते हैं। जो यह परम्परा है उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह परम्परा हिन्दुओं से बिल्कुल अलग है। हमने यह बात सामने रखी थी कि इस्लाम का ज्यादा सम्मान करना चाहिए। चूँकि इस्लाम आने से कबीर आये, इसाईयत को ज्यादा सम्मान करना चाहिए क्योंकि ईसाई ने जगह-जगह स्कूल खोले, गरीबों, अछूतों को पढ़ाने का काम किया तो उनका ऋण है। हिन्दुओं ने जगह-जगह उनको रोका। आर्य समाज जैसी संस्थाएँ या सुधार की हिन्दुओं की जितनी संस्थाएँ बनी, तब जब सामने यह दिखाई पड़े कि सारे दलित हिन्दू धर्म को छोड़कर भाग रहे हैं, इसाई बन रहे हैं या मुस्लिम बन रहे हैं या अपना कोई अलग धर्म तलाश कर रहे हैं या कुछ बौद्ध बन रहे हैं और ऐसा हुआ कि खुद डॉ० अम्बेडकर के जमाने में एक दिन में पाँच लाख दलितों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और बहुत सारे धर्मों में गए, इस्लाम में बहुत सारे लोग गए, तो इसलिए हम मानकर चलते रहे हैं कि इन दलित की दृष्टि में हिन्दू-मुस्लिम और जैन यह सब इसके लिए बराबर हैं। हिन्दू इसके लिए श्रेष्ठ नहीं हैं, क्योंकि उसी ने इसके अधिकारों को छीना और जहाँ तक आपने कहा साहित्य वाली बात है, आप देखिए कि अछूतानन्द ने १९०५ ई० में एक अखबार निकाला था अछूत जिसकी प्रतियाँ ढूँढे नहीं मिलती हैं और १९२७ ई० में उनका ये जो आदि हिन्दू, आदि से मतलब यह नहीं था कि जो आर.एस.एस. वाला हिन्दू है या विश्व हिन्दू परिषद वाला हिन्दू है। ये वे कहते थे कि हिन्दुस्तान के पहले निवासी-सीधा इसका अर्थ था - हिन्दुस्तान के पहले निवासी यानी हम इस देश के मूल वाशिन्दे। वहाँ उस कॉन्सेप्ट को लेकर चले थे। अछूत को भी उन्होंने कहा था - छूत का मतलब यह नहीं है कि हेय है। हमको आप नहीं छू सकते, गरिमा को, हमारी श्रेष्ठता को, श्रम को। आप देख सकते हैं कि उन्होंने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे, कविताएँ लिखीं, अखबार चलाया, उत्तर प्रदेश के कई सारे अखबार निकले। ढेर सारी पत्रिकाएँ निकली इस संदर्भ में, चूँकि दलित के पास साधन मुख्य धारा के नहीं थे। पत्रिकाएँ निकलती थीं बन्द हो जाती थीं। आर्थिक संकट में लोग रहते थे। बहुत कम दूरी तक ये चलती थीं। इसी के साथ कविताएँ लिखी गयीं, कहानियाँ लिखी गयीं और इस क्रम में आप देखिए कि डॉ० धर्मवीर का साहित्य आ गया। कबीर पर एक जबरदस्त काम उन्होंने किया। मोहनदास नैमिशराय, ओम प्रकाश वाल्मीकि, सूरज पाल चौहान, जय प्रकाश कर्दम का अच्छा खासा साहित्य आ गया। साहित्य की सभी विधाओं में लोग काम कर रहे हैं। देखिए अच्छी बात यह हुई कि उसी देश में मण्डल कमीशन का आन्दोलन जोर पकड़ गया। इस आन्दोलन को सबसे ज्यादा दलितों ने शक्ति दी क्योंकि दलित बाबा साहब अम्बेडकर की चेतना से लैस थे और वे सामाजिक न्याय की लडाई अपने लिए लड़ रहे थे। उस क्रम में उन्होंने यह माना इसमें पिछड़ी या पिछड़ी जातियाँ भी बढ़ेंगी, उसमें एक आवाज और मिलेगी तो हम मजबूत हो जाएँगे या अलग बात है कि पिछड़ों ने दलितों के साथ क्या किया और आगे हम कोई बात नहीं करना चाहेंगे लेकिन उस समय उस आन्दोलन ने जो वातावरण बनाया उसके राजनीतिक परिणाम आप सब लोगों की नजर में हैं ही, साहित्यिक परिणाम भी हुए। हंस जैसी पत्रिका जिसमें दलित के लिए कोई जगह नहीं थी, सारे गैर दलित, मार्क्सवादी छपते थे। इस पत्रिका के सम्पादक को दलित चेतना ने झकझोरा और एक रास्ता दिखाया।ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, कँवल भारती खुद उस पत्रिका में काफी दिन छपे, बल्कि मुझे दलित अंक को सम्पादित करने का मौका भी मिला। इस पत्रिका का चूँकि राष्ट्र व्यापी प्रभाव था और यह पत्रिाका साहित्य में एक प्रमुख पत्रिका है। इसलिए दलित आन्दोलन के साहित्यिक आन्दोलन को काफी मजबूती दी, इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है।

आपने मार्क्सवादियों की बात की। मार्क्सवादियों के साथ दलित अन्तर्विरोध पर कुछ बात करें?
अन्तर्विरोध वर्ग और वर्ण के लिए है, क्योंकि मार्क्सवादियों ने शुरु से ही जाति की समस्या को एक ऊपरी समस्या माना और वर्ग संघर्ष को प्रमुखता दी, इसमें मुझे ऐसा लगता है कि उनके पास जाति उत्पीड़न के न अनुभव थे, न स्वीकारोक्ति थी, इसलिए कि मार्क्सवादी आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले जो लोग थे वह सभी कथाकथित उच्च जाति के लोग जाते थे। सम्पन्न परिवार के थे। बहुत सारे लोग शौकिया मार्क्सवादी बनते थे, तो उनके शौक में चिन्तित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सोवियत यूनियन से सुविधाएँ लेनी थीं। दलितों के जो प्रश्न थे वे इसलिए भी छूटे क्योंकि दलितों की ओर से वहाँ नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। उनके आन्दोलनों का आधार आर्थिक था। बाबा साहब अम्बेडकर को उन्होंने कभी महत्त्व नहीं दिया, पढ़ना नहीं चाहा, समझना नहीं चाहा, उन्हें एक जाति का नेता बनाने की कोशिश की। जबकि भारत के लिए एक बड़े अर्थशास्त्री के रूप में बाबा साहब अम्बेडकर को लिया जाना चाहिए था। ये अर्थशास्त्रा के बहुत बड़े विद्वान थे। दास कैपिटल बेशक मार्क्स का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ था, लेकिन अम्बेडकर उस जमाने में अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. थे और वे भारत की योजना आयोग में जाना चाहते थे लेकिन उन्हें नहीं दिया गया। अगर उन्हें आर्थिक क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलता तो भारत की तस्वीर बहुत पहले बदल गयी होती। कानून बनाने का मौका मिला तो लोकतांत्रिक संविधान बनाया जिसमें बहुत कुछ बदला, धर्म निरपेक्षता की अवधारणा दी। समता स्वतंत्रता और जनता के पक्ष को सामने लेकर आए, लेकिन मार्क्सवादी जिस तरह की क्रांति की बात करते रहे वो सब किताबी और सैद्धान्तिक अभिव्यक्ति है। वे भ्रम में इसी तरह रहते थे कि पूजा पाठ भी चलता था, शादी विवाह भी अपनी जाति में चलते थे, तिलक जनेऊ भी चलते थे, बेटा और बेटी का विवाह भी इसी तरह होते थे, अपनी ही जाति ढूँढी जाती थी और जाति तोड़ो और जाति जोड़ो का नारा दिया जाता था। असल में जाति तब तोड़ने में लगे जब जाति के आधार पर दलितों की सुविधा निश्चित होने लगी तब उनको भी इस जाति को तोड़ो उससे दलितों को सुविधाएँ मिल रही है इसलिए वह जाति को तोड़ना नहीं चाहते थे, कहते थे कि धर्मविहीन समाज बनाना चाहते थे। वे आज तक नहीं बना, उनकी जरूरत नहीं है जिनकी जरूरत होती है वह बनाता है, तो जब जाति व्यवस्था में उनको फायदे हैं। आप देखिए कि साहित्य के जितने संस्थान है उन पर सब ब्राह्मण और उच्च जाति के लोग हैं जितने पाठ्यक्रम बनाये जाते हैं उनमें सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ लोग हावी हैं। उसमें कोई दलित नहीं होता है और जितने मीडिया संस्थानों में सारे सम्पादक उच्च जातियों के लोग हैं। जब ज्ञान के सारे क्षेत्र में ये लोग काबिज हैं, तो ऐसी स्थिति में यह कहना कि भाई मार्क्सवादियों ने क्रांति कर दिया, मार्क्सवादियों का विचार पक्ष सही था, गलत बात है। वहाँ हिस्सेदारी नहीं हुई है। जहाँ हिस्सेदारी नहीं होती है वह क्षेत्रा डेमोक्रेटिक नहीं होता है। दलित आन्दोलन के अगुआओं को दलितों का जातिवादी कहा गया। दलितों में बहुत सारे लोगों के नाम के साथ जातियाँ हटी लेकिन किसी ब्राह्मण का, चाहे वे मार्क्सवाद का सबसे बड़ा नेता हो, काम नहीं चलता।दलित ने सीधा विभाजन किया, ब्राह्मण है तो ब्राह्मण है, चाहे किसी भी पार्टी में है। क्षत्रिय है तो क्षत्रिाय है, चाहे किसी भी पार्टी में हो। जो वर्ण व्यवस्था उन्होंने बनाई है उसी वर्ण व्यवस्था के अनुसार इसका विश्लेषण किया जाना है। दलितों ने कोई व्यवस्था नहीं बनाई, वे तो समता क्षमता की बात करते हैं लेकिन समता मिल ही नहीं सकती जब तक इस विभाजन को समझा नहीं जाएगा।
अब तक की हल्की फुल्की बातचीत के पीछे एक भारी सवाल? शब्द दलित क्यों और कब प्रचलन में आया और हरिजन कहे जाने पर मतभेद की वस्तुस्थिति क्या है?
देखिए, दलित शब्द के संबंध में यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि यह कैसे प्रचलन में आ गया था और इसके अलग-अलग आशय लोगों के लिए है। शब्द कोश में भी दलित शब्द है, आपके रामायण में मिल जाएगा या महाभारत में मिल जाएगा। मराठी के तमाम साहित्य में मिल जाएगा। बाबा साहब अम्बेडकर ने इस शब्द का बहुत कम इस्तेमाल किया बल्कि मराठी में ये शब्द १९६० ई० के बाद आया, बाबा साहब जो शब्द इस्तेमाल करते थे वह बहिष्कृत था और दरअसल जब अमेरिका में ब्लैक पेन्थर शब्द चला तो मराठी में दलित पैंथर बन गया। वहाँ से ये दलित शब्द ले लिया गया। दलित शब्द से कई विचारकों को एतराज था। आज तक यह द्वन्द्व चलता है। हम अपने आपको दबा, कुचला अपने आपको क्यों माने? कुछ लोग तो हमें बुद्धि से भी दलित कहना शुरु करते हैं और जहाँ तक हरिजन वाली बात थी उसको तो डॉ० अम्बेडकर ने ही खारिज कर दिया था। हरिजन शब्द नरसी भगत की कविता से गाँधी जी ने लिया था और उन्होंने कहा जितने लोग जो सताए जाते हैं, जो अनुसूचित जाति थी उनको हरिजन कहना शुरु किया और वे कहते हैं कि वे सब भगवान के बच्चे हैं तो उनसे सवाल किया गया कि क्या आप भगवान के बच्चे नहीं? कौन भगवान का बच्चा नहीं है, अम्बेडकर ने यह बात भी बताई कि दक्षिण में जो देव दासियों के बच्चे होते हैं, जिनके कोई माँ-बाप नहीं होते है, अवैध सन्तानों को हरिजन कहा जाता है। इसका मतलब है हरामी की औलाद। ये एक तरह से गाली के रूप में होता है तो क्या आप सभी को गाली देना चाहते हैं। यहाँ तक कि गाँधी जी ने अपने अखबार का नाम हरिजन रख दिया। डॉ० अम्बेडकर ने एतराज किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की सन्तान कहना बिल्कुल गलत है। इस शब्द को अवैध करार दिया गया और आप ये समझिए कि अभी पिछले दस साल या समझिए कि अभी तक लोग हरिजन शब्द का इस्तेमाल कर देते हैं। कई अखबार के सम्पादक थे उनको चिट्ठियाँ लिख-लिखकर समझाया, लेख लिखकर समझाया लेकिन चूँकि उन्हें आनन्द आता था वे जब जान लेते थे कि हरामी की औलाद है तो वे और ज्यादा लिखते थे चूँकि दलित वहाँ अखबारों में थे नहीं, तो इसलिए इस शब्द को दलितों पर गाली के रूप में पर फेंका गया और एक तरह का प्रहार किया गया दलितों पर। अब और एक विभाजन कर लिया गया कि अनुसूचित जातियों में जो सफाई करने वाली जातियाँ हैं चलो उनको हरिजन कहें और बहुत सारे लोगों ने उसे स्वीकार भी कर लिया। जैसे वाल्मीकि समुदाय ने और यह सब मानने लगे कि हम हरिजन हैं, लेकिन जैसे ही अम्बेडकर विचारधारा पहुँची, जैसे ही दलित साहित्य का स्वर पहुँचा तो उनको एहसास हुआ तो उन्हें लगा यह तो गाली है, तो एक तरह से बेचैनी पैदा हुई और आज की स्थिति में कोई अपने आपको हरिजन कहलवाता है तो यह तो इसके पास वह विचार नहीं पहुँची थी। साहित्य में, समाज में, बल्कि साहित्य समाज ही क्या? राजनीति में भी इस शब्द को बहुत तेजी से खारिज किया। मायावती का तो बहुत लम्बा विवाद रहा है इस शब्द को लेकर सारे अखबारों में इस मसलों को उठाया गया। आज भी कोई भी दलित हरिजन शब्द को स्वीकार नहीं कर रहा है, लेकिन हम आपको बताएँ कि हम दलित शब्द पर भी बहुत बार सोचते हैं यह शब्द भी पर्याप्त नहीं है, समता बोधक नहीं है और ये समता बोधक शब्द होना चाहिए लेकिन जब हम शब्द के माध्यम से चीजें आ रही हैं और सभी आन्दोलन तेज हैं तो एक शब्द के लिए दूसरी लड़ाई लड़ना शुरु कर दिया जाए तो आन्दोलन कमजोर हो जाएगा। जब समय आयेगा तो हम सब मिल बैठकर दलित लेखक दलित विचारक, दलित-चिन्तक यह तय करेंगे कि दलित शब्द को छोड़कर ऐसा समता बोधक शब्द लिया जाए जिसे सारी दुनिया में सुना जाए चूँकि आज दलित शब्द केवल बात नहीं है, आज अमेरिका में दलित आत्मकथा पढ़ाई जा रही है। कनाड़ा में दलित आत्मकथा पढ़ाई जा रही है। सारे विश्व में दलित सम्मेलन हो रहा है। मैं खुद कनाड़ा के सम्मेलन में था। सूरीनाम में भी दलित मसले को लेकर सम्मेलन हुआ उसमें भी में था। इंग्लैण्ड में सन्‌ २००० में जो दलित सम्मेलन हुआ, उसमें भी मैं था तो सारे विश्व में दलित साहित्य पहुँच रहा है। शब्द कोश के आधार पर जो लोग बात कर रहे हैं वे उसी ब्राह्मणी परम्परा में ही बात करते हैं कि प्रभु का दीनहीन है इस तरह का। तो यह बात नहीं है। दीनहीन काहे के? एक मनुष्य है दूसरा मनुष्य है संघर्ष कर रहा है, लड़ाई हो रही है, किसी को पीट दिया तो दीनहीन थोड़े ही हो गया या किसी को दबा लिया या किसी का घर जला दिया या उसकी बेइज्जती कर दी, बहन-बेटियों के साथ बलात्कार कर दिया तो इसमें आप बहादुर थोड़े ही हो गये। आप अमानवीय कर्म करने के बाद सोचते हैं कि आप दलित नहीं हैं। जिसको आपने दबा लिया है वह दलित हो गया, दबाने वाले भी आप ही हैं उसको दबा के उसके ऊपर एक कविता लिख दें आप ही ने सताया, आप ही ने दबाया, आप ही ने घर से बाहर किया फिर उपन्यास लिख दिया, कविता लिख दिया, तो जालिम ही कालित का मसीहा बनकर जजमेन्ट दे रहा है तो यह ज्यादा चलने वाला नहीं है।

प्रेमचन्द की रंगभूमि जलायी गयी, यह दलित आन्दोलन की क्रांतिकारिता थी या दलित उग्रवाद?
प्रेमचंद की रंगभूमि जलाने का मैंने उस वक्त भी समर्थन नहीं किया था और आज भी नहीं। यह कोई तरीका नहीं है, ऐसा तभी करते हैं लोग जब उनके पास लिखने के लिए कुछ नहीं होता। साहित्य की अभिव्यक्ति में अपने आपको कमजोर पाते हैं, साहित्य का जवाब साहित्य में देना चाहिए, कलम का जवाब कलम है। इसमें कोई आगजनी या किसी शारीरिक बल का नहीं, विवेक और बुद्धि का क्षेत्र है, ज्ञान का क्षेत्र है। ज्ञान की लड़ाई ज्ञान के साथ होती है, रही गलत शुरुआत हमने इसकी निन्दा की थी। लेकिन इसी क्रम में एक अच्छी बात यह हुई है कि प्रेमचंद सामंत का मुंशी दूसरी किताब आई। अब आपको जलाना पसन्द नहीं है तो पढ़ना पसन्द कीजिए। अब यह किताब किसी के गले नहीं उतर रही है तो हो यह नहीं सकता कि दलित वे शब्द कहे जो अच्छा लगे, मीठा लगे, स्वादिष्ट लगे ऐसा हो नहीं सकता कि उसको इतना कटु अनुभव दिया है, उसको आपने इतना सताया है, अन्याय किया है कि उसकी अभिव्यक्ति वैसे हो ही नहीं सकती जैसी आप अपेक्षा रखते हैं। प्रेमचन्द का दलित से कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं, चूँकि प्रेमचंद ने दलितों के बारे में लिखा और कोई भी किसी के बारे में लिखता है अनाधिकृत ढंग से। मैं इसाईयों के बारे में बहुत कम जानता हूँ और अधिकार से लिखने लगूं और वह उस पर न बोलें तो यह गलत बात होगी। उनका अधिकार है वह उस पर बोलें और दलितों के बारे में प्रेमचंद ने लिखा है या कोई भी लिखेगा तो दलितों का हक बनता है कि वह कहें कि सही है या गलत है। मैं स्त्रियों के बारे में लिखने लगूं, मैं प्रजनन की पीड़ा पर कविता लिख दूँ और मैं जानता हूँ नहीं कि प्रजनन की पीड़ा होती क्या है? यह कोई जननी ही ठीक ढंग से बता सकती है, मेरे कान पकड़ सकती है, दर्द का एहसास यह नहीं है जो आपने लिखा है। यह बता रहे हो यह इसके अनुभव है प्रमाणिकता उसी के पास है।

दलित आन्दोलन दलित नारियों के उत्थान के लिये क्या कर रहा है?
यह बहुत महत्त्वपूर्ण सवाल है और चिन्ता का सवाल भी है, क्योंकि जो वैचारिक आन्दोलन या साहित्यिक आन्दोलन है या कहें ज्ञान का क्षेत्र है उसमें दलित स्त्रियों की हिस्सेदारी बहुत कम हुई है, पुरुष से वे ज्यादा पीछे हैं। जहाँ तक रही बात यह कि दलित क्या कर रहे हैं तो यह अच्छी शुरुआत हिन्दू कोट बिल बनाते हुए बाबा साहब ने कर दी। संविधान में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार देकर बराबर कर दिया। उसी का परिणाम है कि आज छोटे-मोटे निकायों में दलित स्त्रियाँ आ रही हैं, स्कूल कालेजों में आ रही हैं, अब साहित्य में इसलिए नहीं आई थीं कि क्योंकि वे शिक्षित नहीं थी, अनपढ़ लोग तो साहित्य लिखेंगे नहीं, किसी सामाजिक आन्दोलन में नहीं निकल पा रही थीं। आज स्थितियाँ बदली हैं, वे नैतिक आन्दोलन में हैं, सामाजिक आन्दोलन में हैं, शिक्षा के क्षेत्र में हैं, किसी दिन मीडिया के क्षेत्रा में भी आयेंगी और स्कूल कालेजों में ये लोग निकलेंगे। जरूरी नहीं है कि सारी प्रतिभाएँ गांव से ही आए। अब चूँकि ये युग ऐसा है जिसमें वैचारिक क्रांति पर सूचना क्रांति का बड़ा प्रभाव है तो उसमें दलित स्त्रिय़ां सूचनायें हासिल कर रही हैं, अपना अधिकार समझ रही हैं, उसमें बड़ी बात यह है कि अब स्त्रियो की चरित्र हनन की प्रक्रिया रूकती चली जा रही है। वे लड़ रही है, अत्याचार होता है तो एक्शन भी होता है। इसलिए संभावनाएँ बढ़ी हैं। कई लेखिकाएँ आयी हैं। हालांकि उनकी संख्या १० करोड़ में, मैं अगर दस नाम गिना दूँ तो स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। पुरुषों की भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है लेकिन आशाजनक है। काम बहुत तेजी से हो रहा है।
बिना भाषा की सीमा के ये बताइए कि दलित विमर्श का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
साहित्य पर यही प्रभाव है कि अब कोई पत्रिका, कोई अखबार, कोई साहित्यिक गोष्ठी दलित विमर्श को नकार कर आगे नहीं बढ़ पा रही है। यह सब जगह जरूरी हो गया है। यहाँ तक कि एन.सी.ई.आर.टी. के पाठ्यक्रम में भी दलित साहित्य आ गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में भी दलित साहित्य पढ़ाया जाना इसी वर्ष शुरू हुआ। पटना के एक विश्वविद्यालय में दलित साहित्य आया। अभी ये कहा जा सकता है कि दलित साहित्य जो पाठ्यक्रम का हिस्सा बनता जा रहा है। अब उसमें जिस तरह से कबीर को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रक्षिप्त कर दिया था वैसा भी सिलसिला दलित साहित्य के साथ चल रहा है। उसका कारण यह है कि अभी पाठ्यक्रम बनाने वाले लोगों में बड़ी संख्या गैर दलितों की ही है। जब वहाँ दलितों का प्रतिनिधित्व होगा और अधिकारी लोग वहाँ पहुंचेंगे तभी सही स्थिति बन पायेगी, क्योंकि मैंने पी.एच.डी. किया है मनुस्मृति में और संविधान की बात करने बैठ जाएं तो फिर यह विरोधाभाषी बात है, यही हो रहा है। किसी ने सूरदास पर काम किया है और बैठ जाए धर्मवीर पर विचार करने या फिर किसी ने तुलसीदास पर काम किया है और बैठ जाए ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविताओं पर बात करने के लिए, तो इस तरह से जब साहित्यकार अपने अधिकार क्षेत्र से इतर हस्तक्षेप करेंगे तो गड़बड़ तो होगी ही। पाठ्यक्रम में दलित साहित्य की बात सबसे पहले मैंने ही उठायी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की गोष्ठी में जब ये बात कहता तो जाने-माने साहित्यकार यही बात कहते कि पाठ्यक्रम में वही आता है जो मर जाता है, जीते जी नहीं आता है, तब मैं बहुत सारे उन साहित्यकारों का नाम गिनाता जो जिन्दा भी है पाठ्यक्रम में भी है। लेकिन अब वे जानते हैं कि भविष्य दलित साहित्य का है, मुझे लगता है कि सारे विश्वविद्यालय में दलित स्टडी के अलग विभाग खोलने पड़ेंगे। अमेरिका भी जानना चाहता है, इंग्लैण्ड भी जानना चाहेगा कि दलित साहित्य क्या है? तो उसके लिए अलग विभाग खोलने पड़ेंगे। बाकी अध्ययन अब हो चुके हैं। ब्राह्मणों से संबंधित अध्ययन आवश्यकता से अधिक हो चुका है। अब उसकी जरूरत नहीं रही चूँकि दलित साहित्य नया है इसलिए उसमें ५०-६० साल तक काम तो होगा ही। अच्छी बात है कि अब साधन आधुनिक हैं काम होगा तो तेजी से होगा। आज का दलित साहित्य सूचना माध्यमों से पूरे विश्व के स्तर पर प्रसारित होता है। जब अछूतानन्द बात करते थे तो उस समय कानपुर से दिल्ली तक बात आने में बड़ा समय लग जाता था। तो संचार माध्यमों के कारण उनको फायदा मिलेगा और एक नया साहित्यिक वातावरण तैयार होगा। आप स्वयं जब जय प्रकाश कर्दम जी, ओम प्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम जी जैसे नाम जहाँ कबीर और रैदास की परम्परा को विकसित करते दिखते हैं। वही राजनीति में जो आज का दलित नेतृत्व है ऐसा लगता है कि उसके द्वारा अम्बेडकर की परम्परा का क्षय हो रहा है।
इस पर मैं आपका विचार जानना चाहता हूँ?
नहीं, राजनीति में उतार-चढ़ाव आते हैं। राजनीति अपने तरीके से होती है। साहित्य में भी बहुत सारे लोग ब्राह्मणों से फैसले करवाने लग जाते हैं। ब्राह्मणों से भूमिकाएँ लिखवाने लगते हैं, ब्राह्मणों के पत्रों को पाकर समझते हैं कि बड़ी बात हो गयी। ये जो मनोवैज्ञानिक बीमारी है। जब साहित्य में है तो राजनीति में स्वाभाविक है। राजनीति बोध का मामला है कोई एक जाति राज्य नहीं कर सकती और भारत का एक मनोविज्ञान यह है भी कि अगर दलित पिछड़ी जातियों को साथ लाना चाहे तो वह चाहेगा कि ब्राह्मण पहले आ जाए तभी वह आयेगा तो इसलिए राजनीतिज्ञ, सामाजिक, मनोविज्ञान के आधार पर ये रणनीति पर काम करते हैं। बाबा साहब अम्बेडकर के सामने भी मजबूरियाँ थीं ऐसी। जब बाबा साहब ने दलितों के अखबार निकाले तो उन्हें ढूढे से दलित सम्पादक नहीं मिले। बहिष्कृत भारत के सम्पादक नियुक्त करने के लिए उन्हें ब्राह्मणों के पास जाना पड़ा तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आज की राजनीति में मायावती जी ब्राह्मणों के पास जाती हैं और आगे बढ़ती हैं वह गलत है। वामपंथी और दक्षिणपंथी दो प्रकार के ब्राह्मण है। मायावती दक्षिणपंथी के साथ दो बार सीट पर बैठती हैं तब भी वे आलोचना करते हैं, लड़ती हैं तब भी करते हैं। ज्यादा बौद्धिक लोग अगर राजनीति में जायेंगे तो बाबा साहब के विचारों को ज्यादा फैलायेंगे। मायावती ने उतना गहरा अध्ययन नहीं किया। बाबा साहब की मोटी-मोटी बातें उनके पास हैं जितना है उसी हिसाब से अपना काम कर रही हैं। मैं समझता हूँ कि राजनीति से साहित्य को ज्यादा प्रभावित नहीं मानना चाहिए।
दलित इतिहास पर अभी तक समुचित कार्य नहीं हुआ है, इस दिशा में क्या प्रगति हो रही है?
देखिए, जो हमने पत्रकारिता पर कार्य किया था, वह पत्रकारिता पर पूरा इतिहास उसमें लगभग आ चुका है। मुझे नहीं लगता है कि उसमें कुछ जोड़ने की जरूरत है। हिन्दी दलित कथा पर जो रजत रानी मीनू का शोध हुआ है उसमें कथा का इतिहास आ रहा है। कहानी का इतिहास पूरी तरह से आ रहा है और साहित्य के विस्तृत परिप्रेक्ष्य में इतिहास की बहुत सारी सूचनायें आ रही हैं। लेकिन एक स्वतंत्रा इतिहास लिखने की अब आवश्यकता जो अभी बनी हुयी है उसके लिए मैं अपनी तरफ से प्रयास कर रहा हूँ। मैंने एक परियोजना भी दी है, वह परियोजना समकालीन दलित साहित्य इतिहास की खोज और सृजन शीर्षक है। अगर मुझे अवसर मिलता है और परियोजना स्वीकृति होती है तो मैं अपनी तरफ से इतिहास लिखकर देने का वायदा करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि यह मौका मिलेगा और तीन साल में इतिहास लिखकर दूँगा। अगर मुझे परियोजना का मौका नहीं मिला तो उसमें यह हो सकता है कि अपनी आत्मकथा जो अभी-अभी मेरे सामने काम है उसको जैसे ही पूरा करूंगा और मैं इतिहास पर लग जाऊँ। इतिहास के लिए जो कच्ची सामग्री है मैं समझता हूँ कि मुझसे ज्यादा हिन्दी के क्षेत्र में किसी के पास शायद नहीं है क्योंकि पत्राकारिता पर पी.एच.डी. करते समय यह सामग्री जुटा ली थी।

हिन्दी की अपेक्षा दूसरी अन्य भाषाओं पर विशेषकर तेलुगू भाषा में बहुत कम काम हुआ। इन भाषाओं की अनुवाद पर क्या स्थिति है?
दलितों का स्वतंत्र मंच अनुवाद के लिये नहीं है, लेकिन गैर दलित जो अनुवाद करा रहे हैं, उसमें पूरा न्याय नहीं हो रहा है। जब अनुवादक दलित होते हैं, लेखक दलित होते हैं लेकिन प्रकाशकों के अभाव में दलितों का शोषण होता है। उन्हें अनुवाद का पैसा नहीं मिलता। यहाँ तक पंजाबी दलित साहित्य का अनुवाद हुआ, तेलुगू का भी कुछ कविताओं का अनुवाद हुआ। यहाँ की एक फाउण्डेशन ने लेखकों को किराया तक नहीं दिया, संकट बहुत है। कविता, कहानियाँ जो भी इस दौर में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज मानी है उसके लिए कुर्बानी दे रहे हैं लोग, लेकिन अभी अच्छे अनुवादकों की समस्या है। गैर दलितों में ही लोग अभी मिल रहे हैं। चूँकि हमारे देश में जो सारी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं उसमें चार-पांच भाषाएँ सीखने का न वक्त है न सामर्थ्य है। जो रोजगार की कैरियर दृष्टि से भाषा आकर्षित करती है वह अंग्रेजी भाषा है। इसलिए अपनी मातृ भाषा के अलावा जो लोग दूसरी भाषा को सीखते हैं वह अंग्रेजी ही है तो अंग्रेजी में जो भाषा आ जाती है वह दूसरी भाषाओं में आसानी से आ जाती है।

श्योराज जी आप खुद भी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं अभी हाल में आपके मित्र चन्द्रभान का एक कालम दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ जिसमें मीडिया के सालाना २२५ अरब के कारोबार में तथा लगभग ६ लाख नौकरियों में उन्होंने दलितों की संख्या नगण्य बताई और उनका कहना है कि जरा गहराई से देखें तो १७ करोड़ दलित के बीच में १७ दलित के नाम भी मुख्य धारा में नहीं हैं। ये दोनों ही प्रश्न इस कॉलम में अनुत्तरित ही रह गए हैं। उनके उत्तर में आपसे जानना चाहूँगा कि इन दो तथ्यों के बीच क्या प्रमुख कारण है ?
देखिए, गौहर साहब मैं और चन्द्रभान जी बहुत पहले पिछले १०-१५ साल से मीडिया वाले प्रश्नों पर सोचते रहे हैं, वे मेरे मित्र हैं, हम लोगों ने मीडिया पर पेपर आज से १० साल पहले जारी किया था उसमें हम सब लोगों ने... की थी आप को जानकर हैरानी होगी कांशीराम जी का मीडिया के साथ विवाद हुआ था और मीडिया एक तरफा तस्वीरें दे रहा था, खबरें दे रहा था। उस समय एक विदेशी पत्रिका ने आकर कोशिश की थी कि वह दलित पत्रकारों का भी पक्ष जाने तो उसमें उसने सारे संस्थान छान मारे, सारी रिपोर्ट देखी, सारे सूचना केन्द्र तलाश किये लेकिन उन्हें कहीं दलित पत्रकार नहीं मिला। मैं उन दिनों एक कॉलम लिखा करता था - दलित विवाद। यह सहारा में आया करता था। हमारे मित्र चन्द्रभान जी के अलावा कोई दूसरा स्थाई स्तम्भकार नहीं है। वे अंग्रेजी में लिखते हैं। उनका कॉलम नियमित आ रहा है। मैं अस्थाई लिख रहा हूँ। हिन्दुस्तान भी छाप रहा है और भी अखबार छाप रहे हैं लेकिन कोई अखबार इस तरह से कॉलम देने के लिये तैयार नहीं है जो दलितों के लिए हो, दूसरे लोगों का एक सप्ताह में अगर आना है तो आयेगा ही। पन्त जी का कॉलम आना है या कमलेश्वर का कॉलम आना है या किसी और का कॉलम आना है तो आयेगा ही, चाहे वे कुछ भी लिखें। भारद्वाज का कॉलम छपना है हंस में तो वे छपेगा चाहे वे कुछ भी लिख दें। ऐसी स्थिति दलितों के लिये अभी नहीं है और इसीलिए हम कहते हैं कि मीडिया में अभी लोकतांत्रिक भागीदारी की बहुत सख्त जरूरत है और अब ये निर्भर इस बात पर करता है, इनके स्वामी सम्पादक उन्हें जगह देंगे या नहीं देंगे। दलितों के पक्ष बहुत कट-छट के, बहुत आंशिक तौर पर और वे कई बार समय गुजर जाने के बाद आता है। उसका सीधा-सा कारण यह है कि अगर बाबा साहब अम्बेडकर उस समय जब आजादी की लड़ाई के समय ही निजी क्षेत्रों में अगर आरक्षण की बात स्थापित कर जाते और कानून बना जाते तो आज मीडिया में भी लोग होते। लेकिन उन्होंने सरकारी क्षेत्रों के लिए आरक्षण की लम्बी लड़ाई लड़ी और बहुत सारा विरोध हुआ। आज निजी क्षेत्रा में जो २५ प्रतिशत आरक्षण देने की जो बात हो रही है तो अब देखते हैं कि निजी क्षेत्रा कौन से होंगे, मीडिया में कितना होगा, सिनेमा का क्षेत्र कितना होगा, उद्योग का क्षेत्रा कितना होगा, केवल स्कूल ही होंगे या कुछ और भी होगा ये देखना होगा। अब दबाव है चूँकि सारे क्षेत्रा लोकतंत्रीकरण हो रहा है। अब भूमण्डलीयकरण का दौर है सारी दुनिया एक हो रही है। सारी दुनिया आधुनिक हो रही है तो कोई संस्थान अकेले विचार को लेकर एक जाति, एक ही धर्म का बोल बाला लेकर डेमोक्रेटिक नहीं हो सकता। ये बात तो जाहिर हो गयी है और अब कोई आदमी लोकतांत्रिाक नैतिकता का दावा तभी कर सकता है जब उसके पास प्रतिस्पर्धा के लिये स्थान है। प्रतिनिधित्व लोगों का है तभी विभिन्न तरीके के विचार आ सकते हैं, विविधता की कमी के कारण आप समझिए कि हिन्दुस्तान का मीडिया पिस रहा है, हिन्दुस्तान का साहित्य दो कौड़ी का हो गया है, हिन्दुस्तान की शिक्षा को कोई नहीं पूछ रहा है क्योंकि स्पर्धा है ही नहीं। लोग मूल्यांकन करते हैं अपने एक पक्ष को लेकर करते हैं इसलिए हम पिछड़ते चले जा रहे हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड की तरफ हमारी प्रतिभा भाग रही है, ये क्यों भाग रही है? इसलिए कि हमारे यहाँ स्तर बहुत ही निम्न है और वो इसलिए है कि कोई कम्पटीशन नहीं है। कुछ लोग शुरू से ही कोशिश करते हैं शिक्षा के क्षेत्र में आए ही नहीं, ज्ञान के क्षेत्रा में ही नहीं, मीडिया के क्षेत्रा में न आएँ चूँकि मीडिया का क्षेत्र सीखने नहीं देंगे तो वे कैसे आप के जमाने में पत्रकार बनेगा। ये तो सुविधा उन्हीं लोगों को थी जो मालिक थे, सम्पन्न थे, बड़े घरानों से आये और खुद ही अखबार निकालना शुरू कर दिया। आजादी के आन्दोलन का फायदा लेते हुए सम्पादक बन गए, मालिक बन गए, आज के युग में तो पूरा प्रशिक्षित पत्रकार चाहिए, पूरा सीखा हुआ पढ़ा-लिखा पत्रकार चाहिए और दलित को तो अतिरिक्त योग्यता का पत्रकार होना चाहिए, लेखक होना चाहिए क्योंकि उसको ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए तुरन्त ये कहना कि मीडिया में बहुत जल्दी कुछ सुधार हो जाएगा ये संभव नहीं है। हम लोगों ने उस समय कहा था जो आदमी कहीं चपरासी बनने योग्य नहीं होता वो ब्राह्मण होने के नाते किसी भी अखबार का सम्पादक बन गया। आप देखिए कि ये बात नहीं है कि पत्रिका नहीं है, वाइस चांसलर कितने है, प्रो. कितने हैं, आपको हीरो कितने दिखाई पड़ते हैं, अभिनेता कितने, नेता कितने हैं, फिल्म इण्डस्ट्री में कितने लोग हैं, उद्योगपति कितने हैं, क्षेत्र तो सारे खाली पड़े हैं। आरक्षण से कुछ आई०पी०एस० और पी०सी०एस० बनकर गए। इतने से २५ करोड़ जनता का बदलाव होता है? कुछ लाख दो लाख नौकरियों से करोड़ों लोगों का भला हुआ है? जमीन उनसे छीन ली, मकान उनके पास नहीं है। उद्योग में कुछ नहीं करने दिया जाता है तो ये जो अत्याचार के उत्पीड़न का सिलसिला है अब आप कल्पना कीजिए कि आजादी के बाद ये हो रहा है तो आजादी के पहले क्या होता होगा। इसलिए ये कहना कि मीडिया में लोग नहीं हैं, क्यों नहीं है तो सवाल ये उठता है। इसका सीधा-सीधा कारण है जब दूसरी जगह शिक्षा नहीं मिली, साहित्य में नहीं तो मीडिया में कहाँ से हो, आप देख रहे हैं कि पब्लिक स्कूल का जो हाल है जिस तरह से सरकारी संस्थाएँ कार्य कर रही है उनमें तो पढ़ाई-लिखाई बंद सी हो गयी है। गांव-गांव तक स्कूल खोल दिए गये प्राइवेट और उनमें लूट मचा दी गयी पैसों की और उसमें कोई गरीब या मजदूर दलित का बच्चा पढ़ सकता है और पढ़ाई कर भी ली हो कोई या एम.ए. तक पढ़ाई कर ले, मगर उसमें … तो उसको और ज्यादा मार दिया जाता है। ये लोग तो कोशिश करते हैं कि दलितों को खूब पढ़ाओ लेकिन अच्छी शिक्षा न दो। वह एम.ए. पास भी पाँचवी से पिट जाएगा ऐसे करने की कोशिश करते हैं। वे तो अतिरिक्त श्रम करने के कारण उसकी बौद्धिक क्षमता अधिक होने के कारण चूँकि उसने हमेशा श्रम किया है, मेहनत करता है तो उस चीजों को पकड़ लेता है। हमारे जैसे लोगों को कब का मसलकर रख दिया होता। इसलिए जो व्यवस्था है उसको बदलना पड़ेगा और वे दबाव से बदलेंगी, शिक्षा से नहीं बदलेंगी।

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Thursday, November 20, 2008

दलित-विमर्श, दलित-उत्कर्ष और दलित-संघर्ष

प्रो० शुकदेव सिंह
भाग्यफल, नियति, पुनर्जन्म, वर्ण एवं जाति, धर्म, धम्म और पंथ के जटिल संकुल पर प्रश्नवाचक लगाते हुए 'सभी मनुष्य, मनुष्य ही हैं', यह तर्क उचित हुआ। नया तर्क इस शताब्दी के दूसरे प्रहर अर्थात्‌ सन्‌ १९४५-१९४६ के बाद सुगबुगाता है। उसके पहले प्रश्न, जिज्ञासा या आलोचना के रूप में दलित-विमर्श की तलाश अणुव्रत इत्यादि लोकायतों, आजीवकों, सिद्धों, नाथों और संतों के आन्दोलन में की जा सकती है। इस अन्वेषण का कोई विशेष अर्थ नहीं है। दया, करुणा, प्रेम और न्याय के कारण निरन्तर इस तरह के विचार उदित होते हैं। वे अलंकारी होते हैं। भाषा की शोभा होते हैं। इसलिए ब्याध, रैक्व, वाल्मीकि, व्यास, शबरी से लेकर संत कबीर, रैदास, घासीदास, सतनामी तक दलित चेतना की जो पंक्ति बनती है, वह वाग्योग है। विद्या के संसार में अन्वेषणों और गवेषणाओं से, दलित चेतना का पक्ष ऐतिहासिक गरिमा प्राप्त करता है। उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। अगर ऐसा होता तो अणुव्रत इत्यादि लोकायत आजीवक गोशाल, अजित केशकम्बली, कात्यायन, कश्यप, संयज और निगण्ठ-पुत्त ने संसार के भारतीय हिस्से को बदल दिया होता। घृणा के आधार पर गठित समाज-तंत्र ध्वस्त हो गया होता। इन सारे प्रश्नों से हमारे अतीत का मंथन होता है। केवल यह पता चलता है कि जिस तरह आज हम जागृत हैं उसी तरह कभी पहले भी थे। आज के दलित जागरण से उसे जोड़ना बंद कर देना होगा। इतिहास और संस्कृति के मसले बड़े जटिल होते हैं। हर बर्तन में छेद किया जा सकता है और खोजा भी जा सकता है। इसलिए भारत के वर्तमान दलित जागरण के दो मुख-मुखौटों से बात शुरू होनी चाहिए।
१.महात्मा गांधी का दया विह्नल हरिजन आन्दोलन।
२.डॉ० अम्बेडकर का युयुत्सु शब्द-विविधता के सारे कौशल से सम्पन्न विद्यापटु आह्नान।महात्मा गांधी दलित-कर्म के साहस तक उतरकर यह बताना चाहते हैं कि छोटा-बड़ा कोई नहीं। अगर ओछे कसाब चमड़ा उतारना, चमड़ा राँधना, रंगना, मल साफ करना नीच कर्म है तो सबको इसे कर्तव्य मान लेना चाहिए। कर्म के साथ जुड़े हुए ऊँच-नीच को, उस कर्म को अपना कर्म मान लेने से घृणा खत्म हो जायेगी। मैला उठाओ, मुर्दा फूँको, सबके साथ उठो, बैठो, खाओ भी तो जन-समस्या हल हो जायेगी। गांधी जी के सद्भाव में कोई कमी नहीं है लेकिन उनका सद्भाव बड़ा ही सज्जन, गाँव की भाषा में कपड़े का अश्लील रूप है। डॉ० अम्बेडकर शास्त्र और मिथकों के उस बल को निर्बल करना चाहते थे, जो छोटे-बड़े की धारणा को पारम्परिक शक्ति देते हैं। डॉ० अम्बेडकर के पास एक ओर इतनी विद्या है कि वे अपने ढंग से शास्त्रा और मिथकों की डि कोडिंग कर लेते हैं। मनोनुकूल अर्थ और प्रतिवादी गवेषणा के द्वारा वे शिक्षित दुनिया को चुप करते हैं और अशिक्षितों को संगठित भी करते हैं। सुन्दर रूप और वेष के साथ वे दुनिया में अकेले चिंतक हैं, जो असुन्दर, कुरूप और मलिन के बीच अपने आदमी के रूप में खड़े हैं। वे अवतार और ईश्वर या देवता के रूप में नहीं खड़े होते। वे नायक या 'नेता' के रूप में खड़े होते हैं। वे दलित कहे जाने वाले जिस जाति-समूह के प्रवक्ता और प्रतिनिधि हैं, उस समाज की इतनी भी परवाह नहीं करते कि सारी घृणा का केन्द्र प्रबल ब्राह्मण जाति का एक सदस्य उनके घर में क्यों हैं? वे ब्राह्मणी के पति हैं। उनमें एक ऐसी निष्ठा है जिसके कारण कोई यह विचार नहीं कर सकता था कि उनके कपड़े कैसे हैं? चिथड़ा पहनने वाले भूखे, नंगे लोगों में वे कैसे इतने लोकप्रिय हो सकते हैं। वास्तव में वे जनाधार की चिंता ही नहीं करते। वे जानते थे कि गरीब, दलित, गाँव से बाहर एक निजी बस्ती में रहने वाला समाज उन्हें अपना मानेगा ही। इसलिए उनकी सारी ताकत शास्त्रों को खोलने, भारतीय नेताओं से मुठभेड़ की स्थिति बनाये रखने और अंग्रेज सत्ता का अघोषित समर्थन प्राप्त करने में लगी रहती थी। उनके पास धर्म-परिवर्तन करा लेने वाला एक प्रभावशाली ध्वज भी था। उस समय के अनेक नेताओं को यह डर था कि यदि डॉ० अम्बेडकर चाहेंगे तो बड़ी संख्या में दलित जातियों के लोग दूसरे धर्म इस्लाम या क्रिश्चियन पट्टी में चले जायेंगे। हिन्दू बहुलता खण्डित हो जायेगी। इसीलिए डॉ० अम्बेडकर को ऊपर से राष्ट्रीय और भीतर से कांग्रेसी या लीगी नेताओं पर अपनी पकड़ बनानी पड़ी और उन्हें, उन्होंने राजनीतिक कला और विद्वता के साथ भयभीत बनाकर रखा। वे युगपुरुष थे। महान विभूति थे। उस समय के स्वतंत्रता आन्दोलन की कई महत्त्वपूर्ण चाभियाँ उनके पास थीं। वे खास तरह की सामंती अकड़ के आदमी थे। अंग्रेजी पढ़े-लिखे गुजरात, महाराष्ट्र दक्षिण भारत और बंगाल के नेता भारतीय विश्वसनीयता के लिए अपने कपड़े और रहन-सहन को भी बदल रहे थे। कुर्ता-टोपी, चप्पल, खान-पान सबकी एक यूनीफार्म बनती जा रही थी। डॉ० अम्बेडकर ने नेता वेश नहीं बनाया। डॉ० अम्बेडकर का यह भी महत्त्व है कि उन्होंने 'विक्टोरियन-गार्व' और 'खान पान' तथा रहन-सहन में कोई परिवर्तन नहीं किया। उनका पाखण्ड में विश्वास नहीं था। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में जनता के आदमी के रूप में तेजस्वी और प्रतिभाशील नेता बाबू जगजीवन राम का उदय हुआ, जिन्होंने तथाकथित दलित संसार को वे सारी सुविधाएँ दिलाईं, जिनके लिए डॉ० अम्बेडकर सपना देखते थे। शायद भीतर-भीतर बाबू जगजीवन राम को धोती, कुर्ता, टोपी के साथ गाँधी जी के अधिक विश्वसनीय दलित नेता के रूप में सामने लाया गया। वैसे बाबू जी निन्यानबे प्रतिशत निजी प्रतिभा, त्याग और वाग्मिता के कारण ही आरक्षण को सुरक्षित कर पाये। वे राष्ट्रीय नेता थे। दलित समाज के साथ सम्पूर्ण भारतीयता पर उनके अनेक ऋण हैं। हरित क्रान्ति, बांग्ला देश विजय के साथ ही उनकी प्रतिभा ने देश को बहुत कुछ दिया है। अब यह कहने से कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि डॉ० अम्बेडकर की राजनीति की तुलना में बाबू जगजीवन राम को भारतीयजन नेताओं का अधिक समर्थन प्राप्त था। जिस तरह वैदिक काल से लेकर संत कबीर, रैदास और घासीदास के समय तक का सम्पूर्ण आन्दोलन दलित अस्मिता का इतिहास है और सुन्दर प्रतिपक्षी धारणा का गौरव है। उसी तरह आधुनिक दलित-विमर्श की दृष्टि से डॉ० अम्बेडकर और बाबू जगजीवन राम का स्मरण सुन्दर पुण्य-स्मृति है। इतिहास में डॉ० अम्बेडकर और बाबू जगजीवन राम की स्मृति अलंकारी हो चुकी है।आधुनिक दलित-विमर्श तीसरे तरह का जागरण है। आत्मकथाएँ, उपन्यास, कविता और जनान्दोलन के द्वारा यह बात सामने लायी गई कि इस देश में मनुष्य, मनुष्य को किस सीमा तक हीन समझता है। यह एक वैचारिक आन्दोलन है। इसमें पुरानी परम्पराओं का उल्लेख, संतों का स्मरण या डॉ० अम्बेडकर का पूजन केवल माध्यम हैं। इसमें आजादी के बाद तक के दलित चिंतन का आधुनिक विमर्श से सीधा वास्ता नहीं है। यह दलित-विमर्श मुख्य रूप से उन पढ़े-लिखे लोगों का कमाया हुआ सच है, जिन्हें डॉ० अम्बेडकर और बाबू जगजीवन राम के कारण आरक्षण मिला, शिक्षा तथा नौकरी मिली और बराबरी वाले समाज में बराबर उठने, बैठने की महिमा मिली। मैं जहाँ तक जानता हूं बाबू जगजीवन राम ने शिक्षा से अधिक प्रतिष्ठा के पदों पर आरक्षित लोगों को बिठाने का आरक्षण तय किया। बड़े सरकारी पद, विधान सभा से लेकर राज्य सभा तक प्रवेश का कोटा, राज्यपाल का पद, विदेशी शिक्षा आदि सब कुछ बाबू जगजीवन राम ने ही सोचा था। रविदास, दलित साहित्य अकादमी और आक्रामक दलित-विमर्श जैसे सारे मुहावरे बाबू जगजीवन राम की भाषा के अर्थोत्तर उपाय हैं। इन उपायों का एक बिन्दु बाबू जगजीवन राम की उपेक्षा और डॉ० अम्बेडकर के पूजन से भी सम्बद्ध है। मैं रैदास सम्बन्धी चेतना से भी पच्चीस साल से सम्बन्धित हूँ और 'अम्बेडकर एवार्डी' के रूप में डॉ० अम्बेडकर से जुड़े वाद, सिद्धान्त का दर्शन की गम्भीरता से भी हल्का, फुलका वास्ता रखता हूँ। इसलिए दलित-विमर्श खास तरह से हिन्दी भाषा में दलित-विमर्श के विषय में कुछ बातें कहना चाहता हूँ।
(क) हिन्दी का दलित-विमर्श, मराठी दलित विमर्श की प्रेरणा का ऋणी है।
(ख) हिन्दी दलित-विमर्श का साहित्य और चिंतन शिक्षित आरक्षण भोगी प्रायः सुविधा सम्पन्न दलित समाज का ही है।(ग) हिन्दी जनपद में व्यापक रूप से प्राप्त रामावतारी रामधारी संस्कृति और दलित लोक-ऊर्जा का खड़ी बोली के दलित-विमर्श से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।
(घ) दलित विमर्श के समर्थक सवर्ण और शिक्षित अधिकांश कम्युनिस्ट हैं जिनके लिए दलित-विमर्श अपनी पार्टी को मजबूत करने का एक सहारा या बैसाखी है। दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश दलित-प्रज्ञा के दलित लेखकों को यह पता नहीं है।
(ड़) दलित-विमर्श में मनुवाद, शूद्र धारणा, प्रत्याख्यान की भाषा, यह सारा कर्म समुच्चय उन लोगों के अज्ञान से सम्बन्धित हैं जो नहीं जानते कि मनु का शूद्र, कबीर का शूद्र, रैदास का शूद्र, तुलसीदास का वर्णाधम एक ही और अनवरत नहीं है। मनु से लेकर तुलसीदास तक शूद्र की धारणा में निरन्तर परिवर्तन हुआ है। चतुर्थ वर्ण की अनेक जातियाँ चौथे नम्बर से दूसरे-तीसरे नम्बर तक पहुंच गयी हैं।
(च) अंग्रेजों ने खास तरह से ब्रिग्स और सरकारी तंत्र ने अछूत, शूद्र, जरायम-पेशा, आदिवासी और घुमन्तू जातियों की जो सूची तैयार की है, उस सूची में बहुत फेरबदल की आवश्यकता है। इनमें कई जातियाँ इस्लाम से बचने के लिए ही घुमन्तू, भगोड़ा या जरायम-पेशा बनीं, लेकिन वे अब कुछ अंशों में धर्म से मुसलमान हो चुकी हैं। अब दलित-विमर्श की सूची में सी. (चमार) और नानसी (नान चमार) दुसाध-महार, दो खेमें बन चुके हैं। बाकी दलित जातियाँ न ठीक से गिनी गई हैं और न उन्हें दलित-विमर्श के भीतर पहचानने का प्रयत्न हुआ है।
(छ) जी०डब्ल्यू० ब्रिग्स ने १९०६ ई० में 'दि चमार्स' नामक किताब में बहुत गहन अध्ययन किया। अनजाने उन्होंने संकेत किया कि चमार, दुसाध अनेक दलित जातियों के अपने नायक हैं।मरे हुए जानवर का माँस खाने, प्रकारान्तर में गोमाँस सेवन के कारण ईसाई मिशनरी के लोगों ने एक चमार उपजाति को ईसाई समझ लिया। अगर सर्वेक्षण किया जाय तो पता चलेगा कि इसी उपजाति के लोग अधिक से अधिक संख्या में ईसाई बनें। सूअर पाल कर मुसलमानों से तो बच गये, लेकिन ईसाई बनना उनकी नियति हो गयी।
(ज) मनुवाद और डॉ० अम्बेडकर से जुड़े हुए श्रद्धा आंदोलनों में एक सशक्त दलित चेतना सामने आई है। इसी चेतना की एक इकाई धर्म-परिवर्तन के नाम पर बौद्ध शिविरों में प्रवेश कर गई है। जब हिन्दू रहते हुए आरक्षण की सभी सुविधाएं प्राप्त हैं तो 'नव बौद्ध' होने का मतलब क्या है? इसके पीछे कौन सी ताकतें हैं? प्रसिद्ध लेखक मोहनदास नैमिशराय के साथ सारनाथ जाकर मैंने नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत के बौद्ध युवकों से 'नव बौद्धों' के बारे में पूछा - लड़के-लड़कियों ने बड़ी दबी आवाज में यह कहा कि 'बौद्ध' हमारे देश के समाज में सबसे ऊँचा है, जैसे यहाँ के समाज में ब्राह्मण को माना जाता था। हमें आश्चर्य है कि यहाँ 'नव बौद्ध' के नाम पर वे लोग आते हैं जो पूरे भारतीय समाज में सबसे नीचे होते थे। यहाँ दलित और पिछड़ा समाज के लोग ही ज्यादा 'नव बौद्ध' होते हैं। हमें उनके साथ उठने-बैठने में दिक्कत होती है। मेरा ख्याल है कि इस सच्चाई से 'नव बौद्ध' आंदोलन परिचित है। फिर भी 'नव बौद्ध' एक ऐसा छत्र है जिसके नीचे कई जातियाँ एकत्र हो खड़ी हो सकती हैं। खटिक, आखेटक, सोनकर को व्याध की, चमार, कोरी अनेक जातियों को रैदास या घासीदास की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दुसाध को गोगापीर की आवश्यकता नहीं होगी। इसी तरह अन्य को अपने पूर्व-पुरुषों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। तब शबरी, माण्डव ऋषि, रैक्व बाद में सुहेलदेव, झलकारी बाई की अलग से जाति-नायक के रूप में आवश्यकता नहीं होगी। 'बुद्ध' से काम चल जायेगा।दलित-विमर्श के ये छोटे से प्रश्नवाचक हैं। दलित-चेतना के भीतर अघोषित रूप से कई दरारें पड़ी हुई हैं। दलित-चेतना के राजनीतिकरण और हस्तिआसन मिलने के बाद अनेक सवर्ण भी इसमें उतर रहे हैं। ऐसी स्थिति में दलित-विमर्श का जो संगठित, उग्र एवं प्रभावशाली रूप है, वह रामनामी ओढ़कर माला जपता हुआ दिखाई पड़ सकता है।जाहिर है कि जब दलित बहुजन के बहुरंगीपन को एकाकार करना था तो कृष्ण-भक्ति के छत्र का प्रयोग किया गया था। आज बहुरंगीपन पर 'नव बौद्ध' का छत्र तान दिया गया है। मैं मानता हूँ कि कृष्ण छाते के नीचे केवल कुछ मठों, क्षेत्रों, आश्रमों में जाति-संकीर्णता एवं मनुष्य घृणा कम हुई थी। यह व्यापक नहीं थीं। भगवदभक्त छत्र भर थी। मैं पुराण को स्मरण करते हुए कालिक एवं सामयिक मानूँ तो इस पर विचार करना चाहिए और बहस होनी चाहिए। प्रश्न उठना चाहिए कि क्या नव बौद्ध हिन्दू हैं? या नहीं हैं? क्या दलित हैं? क्या सचमुच आपस में एक या अद्वितीय हैं?दलित-विमर्श की लिखित और वाचिक परम्पराओं का बड़ी तेजी से विकास हो रहा है। इसी तरह स्त्री-विमर्श भी समकालीन होने की पहचान बन चुका है। हिन्दी में स्त्री-विमर्श की बात पहले मैंने ही उठायी थी और प्रसिद्ध लेखक मृदुला गर्ग ने लेखन को स्त्री-पुरुष में बाँटने का विरोध किया था। उनके 'मस्जिद मोठ' वाले घर में अपनी छात्रा राक्सन के साथ हम तीनों ने गंभीर बातचीत की। बाद में एक प्रचार-प्रवीण उड़नशील पत्रिका में मृदुला जी ने स्त्री-विमर्श को महत्त्व दिया। उस बातचीत का स्मरण भी किया फिर प्रभा खेतान सहित सैकड़ों लेखिकाओं ने विमर्श के ताल में अपनी कागज की नैया बहायी। झिझिरी खेली। स्त्री-विमर्श रोग-हंसध्वनि में गूँजने लगा। 'दलित-विमर्श' के सन्दर्भ में भी एक बड़े दलित नेता ने मुझसे आपत्ति करते हुए कहा था कि फिर वही हर गाँव की बस्ती में एक दलित बस्ती, छूत-अछूत को अलग करने वाली डीह, ददनी वाली प्रेत-रेखा? हम तो सार्वजनिक बस्ती में प्रवेश कर रहे हैं। आप फिर नई चमटोल बनाना चाह रहे हैं। मैं चुप हुआ। अब तो चीखने पर भी कोई सुनने वाला नहीं है। नक्कारखाने में 'तिलक कामोद' का तराना छिड़ चुका है और बाबा तिलकधारी यादव दलित-विमर्श की बैसाखी पर बड़ी तेजी से चल रहे हैं। सोचना होगा कि 'दलित विमर्श' साहित्यिक आन्दोलन है, कला-चेतना है, धर्म है या धम्म है। क्या है? इस पक्ष की पहली टिप्पणी है कि प्रेमचन्द दलित विरोधी हैं। उन्होंने 'सद्गति', 'कफन' अपनी कई कहानियों में दलितों को विनोद, उपहास और मजाक का विषय बनाया है। क्या दलित इतना नीच हो सकता है कि घर में लड़की चीख-चिल्ला रही हो, मर रही हो और उसके पति और श्वसुर, पिता और पुत्र, घीसू और माधव एक साथ पकते हुए आलू के लिए ललचा रहे हों, घर में लड़की मर रही हो, एक साथ दायें-बायें पावों की तरह चलते हुए 'कफन' के लिए माल इकट्ठा कर रहे हों, घर में मुर्दा पड़ा हो, उसे छोड़कर एक साथ कफन खरीदने जा रहे हों? कफन न खरीद कर एक साथ शराब पी रहे हों, पूड़ी, मिठाई खा रहे हों, नाच रहे हों, निर्गुण गा रहे हों। क्रूरता की किसी भी सीमा पर अपने देश में पत्नी और पुत्रवधू के मुर्दे के साथ ऐसी नागवार क्रूरता असम्भव है। प्रेमचन्द की यह कहानी कसाई-झूठ है। इसमें क्रूर उपहास और सवर्ण मानसिकता का धतूरा-पुष्प हैं जिसमें रूप के बावजूद बदबू आती है। 'सद्गति' में पण्डित वर्षा में जिस तरह मुर्दे को घसीट रहा है उस तरह घसीटने वाले को गाँव के आदमी पत्थर से मार-मार कर थूक चटा देते और गाँव के देशी कुत्ते भोंककर, काटकर उसी बरसात में भर्ता बना देते। कोई गाय-बैल-सूअर को भी मुर्दा रस्सी में बाँधकर, घसीट कर नहीं चलता। यह कहानी भी प्रेमचन्द की ही दुर्गति करा देती है। दलित लेखक इसे घृणा का प्रचार करने वाली कहानी कहते हैं। शायद दिल्ली वाले भारद्वाज के पूर्वज बाबू श्रीनाथ सिंह ने भी इसे घृणा-प्रचारक कहा था। मोहनदास नैमिशराय ने अपनी एक कहानी में एक सवर्ण का मुर्दा उठाने के लिए दलित जमात का आह्नान करने वाले एक युवक को सामने किया है, जो कहता है कि सवर्णों का मुर्दा हमें ही उठाना पड़ेगा। संकेत है कि दलितों के मुर्दे कलम की नोंक पर घसीटे नहीं जायेंगे। 'अपने-अपने पिंजरे' में बंद उड़ने के लिए छटपटाते हुए मोहनदास नैमिशराय दलित लेखकों में ज्यादा संयत एवं प्रबुद्ध हैं। उनका भी मानना है कि दलितों की समस्या का सृजन दलित ही कर सकते हैं। क्या यह आकस्मिक है कि दलित-लेखन के नाम पर अधिकांश आत्मकथाएं लिखी गई हैं, क्या यह संयोग ही है कि इन 'आत्मकथाओं' में 'शेखर : एक जीवनी' और 'नदी के द्वीप' की रंगीनी नहीं है? दलित-लेखकों के लेखकीय विश्वास के आगे कई प्रश्न हैं। क्या वे लिखते समय दलित हैं? दलित यंत्राणा में हैं? उनका सम्बोधन, पाठक समुदाय केवल दलितों का ही है?
दलित विद्वानों में डॉ० धर्मवीर की काफी चर्चा हुई है। उन्होंने कबीर साहित्य के अध्येताओं को अध्येता नहीं, आलोचक माना और निंदक समझकर पण्डित हजारी प्रसाद द्विवेदी सहित कई प्रसिद्ध विद्वानों का विरोध किया। यहाँ भी प्रश्न है कि डॉ० धर्मवीर ने कबीर या रैदास को कितना पढ़ा। वे कबीर या रैदास को समझाना चाहते हैं या कबीर अथवा रैदास की पढ़ाई पर नाकेबंदी करना चाहते हैं। (मेरी किताब 'भये कबीर, कबीर-डॉ० धर्मवीर आई०ए०एस० को समर्पित है। भूमिकायें सविनय प्रश्न हैं। अन्त में एक पुस्तक सूची। इनमें कितनी पुस्तकें कलक्टर-कमिश्नर साहब ने देखी पढ़ीं। ईमानदारी से बताएँ।) यह स्पष्ट कर देना होगा कि उन्होंने कबीर या रैदास को बहुत कम पढ़ा है। उनके लेखन का महत्त्व उनके आरक्षित महत्त्व की तरह ही होगा। उनके पद और प्रोन्नति की तरह ही उनका लेखन ऊँचा है। सवाल यह है कि वे किसके लिए लिख रहे हैं? कबीर को पढ़ने वाली कोई जमात उनके पास है क्या? कबीर पर लिखने वालों से कोई उनका आमना-सामना है क्या? उनका सम्बोधन सवर्ण समाज के लिए है अथवा उनके विरोधियों का समाज है? उनके लेखकीय झुण्ड में गाँव-गाँव में, बस्ती-बस्ती में, भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ, भौजी जैसी पारिवारिक शब्दावली के हिंसक 'कॉमरेड' तो नहीं हैं? जिनके लिए परिवार, जाति, धर्म, देश सबका पर्याय केवल एक शब्द है 'कॉमरेड'।
दलित लेखकों और विद्वानों, पाठकों और समर्थकों को अपनी निजी जमात पर नजर रखनी होगी और अपना कुरुक्षेत्र भारतीय हिन्दू भूगोल के भीतर ही बनाना होगा क्योंकि दलित-सत्ता और दलित अस्मिता हिन्दू जाति की नकारात्मक किन्तु निश्चित सीमा-रेखा के भीतर ही तय होगी, वर्ण के बाहर जाते ही दलित प्रश्न वर्ग के धुएँ में खो जायेगा। कोई समर्थक नहीं मिलेगा। गरीबों को गरीब मिल जायेंगे। साहबों को साहब नहीं मिलेंगे।
दलित समस्या पर बड़ी निष्ठा के साथ गाँव-गाँव, शहर-शहर, किताब-किताब, पन्ना-पन्ना समझ के भीतर से मेरा यह कहना है कि दूसरों का बोलना बंद करने से पहले बोलना सीखना पड़ेगा। यह रैदास से सीखिए। आरती का पद लिख रहे हैं। कह रहे हैं, गाय के दूध को बछड़े ने जूठा कर दिया, गंगा के जल को मछलियों ने मैला किया, फूलों को भौंरों ने अपवित्र किया। तुम्हारी पूजा कैसे करूँ?'मन ही पूजा, मन ही धूप।'रामहि पूजा कहाँ चढ़ाऊँ। फल अरु फूल न अनुपम पाऊँ।दूध त बछरयो थनहुं जुठारयो। पुहुये भँवर जलमीन बिगारयो।मलयागिरि बाँधियों भुवंगा। विष अमृत बसइ इक संगा।मन ही पूजा, मन ही धूप। मन ही से सेऊँ सहज सरुप।पूजा अरचा न जानूँ तोरी। कह 'रैदास' कवन गति मोरी।यह पाखण्ड का सतर्क विरोध है। आरती की लय में स्वसंवेद्य प्रज्ञा का विस्तार। इसी तरह कबीर अपनी महिमा से ही विकल हैं। वे चाहते हैं कि कबीर, कबीर रह जाएं। वे पूरी दलित-जमात को सम्बोधित करते हुए कहते हैं - मैं बिगड़ा, तुम न बिगड़ना। हरा-भरा पेड़ था, चंदन के संग चंदन होकर बिगड़ गया। निर्मल जल था, गंगा के संग गंगा होकर बिगड़ गया। लोहा था, पारस के संग सोना होकर बिगड़ा। कबीर था, ताना-बाना वाला जुलाहा। राम के संग राम होकर बिगड़ा।कबीर बिगरा राम दुहाई।तुम जनि बिगरयो मेरे भाई।चंदन के ढिक विरख, जु भैला। बिगरि-बिगरि सो चंदन ह्नैला।पारस को जो लोह छुवेगा। बिगरि-बिगरि सो कंचन ह्नैला।गंगा में जे नीर मिलेगा। बिगरि-बिगरि गंगोदक ह्नैला।कहे कबीर जो राम कहैला। बिगरि-बिगरि सो रामहि ह्नैला।कहना है कि कबीर अपनी सारी आध्यात्मिक उपलब्धियों के बावजूद अपनी बस्ती में रहना चाहते हैं - ''सुनिये सबकी, करिये मन की, रहिये अपने गाँवा जी।'' मैं कहना चाहता हूँ कि दलित-लेखकों को सारी प्रतिभा के बावजूद अपनी इयत्ता पर विश्वास करना होगा। अपने रहन और सहन में दलित-विश्वसनीयता प्राप्त करनी होगी। कुरीतियों और आसनों से उतर कर उस शब्द-विवेक के लिए जूझना पड़ेगा, जो कामगर, दस्तकार शब्दावली को, कर्घा को, राँपी को, ताना बाना को और कुल मिलाकर अपनी जूतों से भरी कठवत को अध्यात्म के शिखर तक उठाना होगा। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'। शास्त्र, विद्या और ज्ञान से सँवारे शब्दों को छोड़कर मेहनत-मजदूरी-दस्तकारी के शब्दों का विश्वास करना होगा। दलित-दुःख लिखने के लिए दलित शब्दावली का अन्वेषण करना होगा।महिमा का तिरस्कार, काम करते हुए आदमी से पारिवारिक सम्बन्ध, शब्द और अर्थ तथा कामगार आत्मीयता को लेकर ही दलितों का लेखक बना जा सकता है, वरना सब कुछ चमक-दमक से छपा हुआ सवर्णों का लिपिक कर्म हो जायेगा। यह देखना हो तो दलितों के समारोह में आइये, जहाँ रैदास-चालीसा और कबीर-चालीसा, शिव-चालीसा और हनुमान-चालीसा से ज्यादा बिकते हैं। यहाँ रैदास और कबीर की पुस्तकों, तस्वीरों को लक्ष्मीविष्णु से ज्यादा खरीदा और आदर दिया जाता है। जहाँ भूख-प्यास की परवाह के बिना 'बाबा साहब अम्बेडकर की जय' बोलते हैं। जहाँ मैले-कुचैले, अस्त-व्यस्त कपड़ों में बनिहारिन औरतें बाबा साहब को चमक-दमक के बावजूद अपना आदमी मान लेती हैं और बाबा साहब में अपना रिश्ता न देखते हुए भी 'जय भीम' के नारे लगाती हैं। ऐसी मैली भीड़ के बीच से जो शब्द और अक्षर पैदा हो रहे हैं उन्हें 'कम्पोज' करने के लिए कुर्सीपरस्त अफसरों की उंगलियां नहीं, दस्तकारों की उंगलियों की जरूरत है। कोई विद्याधर दलित शब्दों के कारण नहीं, अपने संकल्प के कारण दलितों का सिपाही बन सकता है। यह कला-कर्म नहीं, मनुष्यमुक्ति और कलंक से हाथापाई का मोर्चाबन्द अभियान है।मैं मानता हूँ कि पिछले दस बारह वर्षों से लिखा हुआ दलित साहित्य, जागरूक, रचना के लिए समर्पित लोगों का साहित्य है, लेकिन इसे जनता का दुःख बाँटने के बजाय, विदेश एवं दिल्ली में लिखे हुए प्रो-दलित साहित्य पढ़कर लिखा गया है। उनके सारे प्रशंसक अपने घरों में दलितों के कवच स्लैंग शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने क्रोध का मुहावरा तैयार करते हैं। ऐसे क्रोधी समर्थकों की भीड़ पर दलित कलम को अपनी नोंक घुसानी होगी और सारी स्याही छद्म समर्थकों के मुँह पर पोत देनी होगी।प्रज्ञा-चतुर नागरिक को दलित की पंक्ति में बैठकर पहले गाली सुनने का अभ्यास करना चाहिए यह नया पाठक दलित लेखकों को दलित रचनाकार बना सकता है। लेखन और सम्बोधन की ठीक-ठीक पहचान न होने के कारण अधिकांश दलित-साहित्य बदले और गुस्से का सत्तापोषित साहित्य बनकर रह जायेगा। जैसे पूँजीपति कंजूसों के क्षेत्रों में बँटने वाला भोजन भूख नहीं मिटाता, भूख को ही गालियाँ देता है।

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