आप सभी का स्वागत है. रचनाएं भेजें और पढ़ें.
उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

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Monday, December 8, 2008

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु समीर



विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी
वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी;
संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में।
अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको,
आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे,
बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही,
अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके।
मैं तो कभी भूल जाता हूँ, पुनः कभी चलता,
लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अन्तस् में,
निष्ठुर ! तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते।
यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हूँ मैं;
मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही।
कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने,
रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से।।

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Sunday, December 7, 2008

तुम बिन

SEEMA GUPTA


हर गीत अधुरा तुम बिन मेरा,
साजों मे भी अब तार नही..
बिखरी हुई रचनाएँ हैं सारी,
शब्दों मे भी वो सार नही...
जज्बातों का उल्लेख करूं क्या ,
भावों मे मिलता करार नही...
तुम अनजानी अभिलाषा मेरी,
क्यूँ सुनते मेरी पुकार नही ...
हर राह पे जैसे पदचाप तुम्हारी ,
रोकूँ कैसे अधिकार नही ...
तर्ष्णा प्यासी एक नज़र को तेरी,
मिलने के मगर आसार नही.....

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Saturday, December 6, 2008

जख्म

सुनील ओझा

कहीं जख्म हो गये है कहीं छाले पड़ हुए है
अब भी मेरा दिल तरे हवाले पड़े हुए .
इश्क में मरकर भी यूं जिन्दा रहे हम
जैसे धूप में उका रंग है काले पड़े हुए .
उनके होठों का रंग है जैसे लाल किरण
है कश्मकश में देखने वाले पड़े हुए.
इश्क एक सजा है जिन्दगी जीने के लिए
जैसे मुहं में हो छाले पड़े हुए .
खामोश गुजर न यूं चमन से रूद्रपुरी
कांटे ही उठा ले कुछ हैं जो बिखरे पड़े हुए

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शब्दों की वादियाँ

SEEMA GUPTA

शब्दों की वादियों मे
विचरता ये मन ,
खोज रहा कुछ ऐसे कण ,
जो सजा सके मनोभावों को,
चाहत के सुंदर साजों को,
लुकती छुपती अभिलाषा को,
नैनो मे दुबकी जिज्ञासा को,
सिमटी सकुचाई आशा को,
निश्चल प्रेम की भाषा को,
शब्दों की वादियों मे
विचरता ये मन ,
खोज रहा कुछ ऐसे कण............

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Tuesday, December 2, 2008

धीरे-धीरे उतर क्षितिज से

महादेवी वर्मा


धीरे-धीरे उतर क्षितिज से
आ वसन्ती-रजनी।
तारकमय नव वेणीबन्धन
शीश-फूल कर शशि का नूतन,

रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन,
मुक्ताहल अभिराम बिछा दे
चितवन से अपनी।
पुलकती आ वसन्त-रजनी।

मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि,
अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि,
भर पद-गति में अलस तरंगिणि,
तरल रजत की धार बहा दे

मृदु स्मित से सजनी।
विहँसती आ वसन्त-रजनी।
पुलकित स्वप्नों की रोमावलि,
कर में हो स्मृतियों की अंजलि,

मलयानिल का चल दुकूल अलि।
घिर छाया-सी श्याम, विश्व को
आ अभिसार बनी।
सकुचती आ वसन्त-रजनी।

सिरह सिरह उठता सरिता-उर,
खुल खुल पड़ते सुमन सुधा-भर,
मचल आते पल फिर फिर,
सुन प्रिय की पद-चाप हो गयी

पुलकित यह अवनी।
सिरहती आ वसन्त-रजनी।

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Monday, December 1, 2008

तुम्हारे बिखराए हुए शब्द

RAJEEV THEPRA


तुम्हारे बिखराए हुए शब्दों के कणों को चुन रहा था मैं...
जो जमी में बेतरतीब थे धूल से सने हुए....
.बड़े प्यार से मैंने उन्हें उठाया वहां से...
हल्का-हल्का झाडा-पोंछा उन्हें...
और थोड़ा थपथपाया...
तभी तो उनका रूप निखर-कर
ऐसा सामने आया......
जमीं पे जब देखा था उन्हें..
कुछ चमकती हुई-सी वस्तू-से लगे थे..
हाथ में जब लिया,तब लगा...
अरे ये तो मोती हैं...
फिर बाहर नहीं छोडा उन्हें...
दिल के भीतर रखकर घर ले आया...
और अब उनका दीदार कैसे कराऊँ...
वो तो अब मेरे मन को मथ रहे हैं...
वो अब मेरी रूह को जज्ब कर रहे हैं....!!

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सरहदे-इश्क़

SEEMA GUPTA




है ये शो'ला के या चिंगारी है,
आतश-अंगेज़ बेक़रारी है ...
यूँ निगाहों से ना गिराएँ हमें,
चोट ज़िल्लत से भी करारी है ...
के शिकन आपके चेहरे पे पड़े
दिल पे अपने ये बात भारी है ...
सरहदें इश्क़ की न ठहराएँ
इश्क़ से काइनात हारी है ....
हमने क्या कर दिया जो क़ाइल हैं
आप पर जान ही तो वारी है ...
(आतश-अंगेज़ - आग भड़काने,
उत्तेजित करने वालीज़िल्लत - अपमान,
तिरस्कारकाइनात - दुनियाक़ाइल - अभिभूतवारी - न्योछावर )

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जीवन कि मंजिल का पता कैसे पायें !!

RAJEEV THEPRA


जीवन की मंजिल का पता हम कैसे पायें
इस मंजिल के पीछे जान निकल न जाए !!
आपस में भागा-दौडी,कितनी भागा-भागी,
डरते हैं कि हम रब को कहीं भूल न जाएँ !!
करता हूँ सबसे मुहब्बत,ये है सच्चा सौदा ,
मुहब्बत ही तो रब है,रब से क्या शर्मायें !!
भूखे हैं पेट जिनके,जो रहते हैं बे ठिकाने ,
सोचूं हूँ तो अक्सर ये आँखे हैं भर आयें !!
सोना-जागना-खाना-खेलना-सोचना-बतियाना,
जीवन गर यही है,जीवन से बाज आयें !!
जीने की खातिर करनी पड़े अगर बेईमानी ,
इससे तो बेहतर है कि आदम ही मर जाए !!
आदम के बारे में सोचूं,आदम की बातें करूँ,
जाना कहाँ आदम को,आदम जान ना पाए !!
जीवन की खातिर हैं हम,क्या है जीवन हमारा,
उम्र इक घुन है"गाफिल",उम्र भर खाती ही जाए !!

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Sunday, November 30, 2008

बीती बातें

VIJAY KUMAR SAPPATTI


दिल बीती बातें याद करता रहा
यादों का चिराग रातभर जलता रहा
नज़म का एक एक अल्फाज़ चुभता रहा
दिल बीती बातें याद करता रहा

जाने किसके इन्तेजार मे
शब्बा ऐ सफर कटता रहा
जो गीत तुमने छेड़े थे
रात भर मैं वह गुनगुनाता रहा
दिल बीती बातें याद करता रहा

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आने वाला.......!!

RAJEEV THEPRA


तकते-तकते राह आँख थक गई होगी....
रूह जिस्म से निकल ........
कर ......
कहीं और चली गई होगी.....
आने वाले के कदम.....
किसी और दिशा में......
मुड़ गए होंगे.....
रात भी थक कर....
सो गई होगी.....
सुबह किसी बच्चे-सी निकल,मचल गई होगी.....
आने वाला कुछ सोचता...
होगा....
सबा बहकती हुई-सी ......
कानों में कुछ कहती-सी होगी....
जिस्म से इक......
धुंआ-सा निकलता होगा....
सोच में कुछ......
.पिघलता...
.हुआ-सा होगा....
आने वाला आता ही होगा....
साँस भी थम-सी गई होगी...
आने वाला बस.....
अभी ही आने को है......
दिल की हर धड़कन...
सुबक कर रह गई होगी....
आने वाला..........
बस आया ही आया.....
मगर ...
.ऐ.....
दिल......
आने वाले को गर....
आना ही होता...
तो अब तक......
आ ही ना जाता...!!

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Saturday, November 29, 2008

कोई तो मेरे देश को बचा ले

VIJAY KUMAR SAPPATTI



आज मेरा देश जल रहा है , कोई तो मेरे देश को बचा ले .

आज सुबह देखा तो मुबई की घटनाओ ने दिल दहला दिया . मुझे ये बात समझ नही आती है कि कोई भी आतंकवादी , हमारे जैसा सामर्थ्यवान देश में कैसे बार - बार चले आतें है , शायद दुनिया में भारत ही अकेला ऐसा देश है जो इतना सामर्थ्यवान होने के बावजूद इन हमलों को रोक नही पाता है.

अच्छा ,एक बात और ..; अगर बाहर के आतंकवादी हमलों से हमारा पेट नही भरता , जो आपस में ही धर्म, भाषा, जाती , इत्यादि के नाम पर लड़ लेते है . और इन सारी बातों में सिर्फ़ बेक़सूर लोग मरते है ...

मेरा देश अब पूरी तरह से banana country बन गया है ... किसी को क्या दोष दे...
...आईये दोस्तों मेरे साथ प्रार्थना करें...

आज मेरा देश जल रहा है ,
कोई तो मेरे देश को बचा ले.
कौन है ये ?
कोई हिंदू ,कोई मुस्लिम, कोई सिख या कोई ईसाई ;
क्या इनका कोई चेहरा भी है ?
क्या ये इंसान है ....
क्यों ये मेरे देश की हत्या करतें है ,
क्यों ये मेरी माँ का सीना छलनी करतें है ..
हे प्रभु ;
कोई कृष्ण ,कोई बुद्ध ,कोई नानक , कोई ईसा ;
पैगम्बर बन कर मेरे देश आ जाए ..
मेरे देश को जलने से बचाए .
मेरे देश को मरने से बचाए..

आओं दोस्तों , मिल कर हम सब,
इंसानियत का धर्म आपस में फैलाएं
मिल कर हम सब मेरे देश को बचाएँ ...
मेरे देश को बचाएँ

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मुंबई में आतंक

अविनाश वाचस्पति



दंगे दुख देते हैं
सुख को हर लेते हैं
जाने कौन सी खुशी देते हैं
हर आतंकी को ?

खुशी पर लगता पहरा
दुख बढ़ता जाता गहरा
हर कोई है डरा डरा सा
अब आतंकी भी है सहमा।

मर्ज कोई दवा कोई हो
जांच शरीफ की हर दफा हो
आतंकी फिर बच निकलता है
या फिर नया ही पनपता है।

बम फटता है कहीं दूर तो
सहमता है सज्‍जन हर कहीं
डरता है ठिठकता है पर फिर
दुगने जोश से जिंदगी को जीने।

चढ़ जाता है अगला जीना
चाहे हो जाये पसीना पसीना
दुख कभी ठहरता नहीं देख लो
जमता है पर पिघलता है तेज।

सुख जमता है फिर भी थमता है
मुंबई जो थमता नहीं कभी भी न
थमा इस दफा न थमेगा कभी
जिंदगी से कैसे हो सकता है कोई खफा।

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दोषी कौन

SEEMA GUPTA


मैं ताज .....
भारत की गरिमा
शानो शौकत की मिसाल
शिल्प की अद्भुत कला
आकाश की ऊँचाइयों को
चूमती मेरी इमारतें ,
शान्ति का प्रतीक ...
आज आंसुओं से सराबोर हूँ
मेरा सीना छलनी
जिस्म यहाँ वहां बिखरा पढा
आग की लपटों मे तडपता हुआ,
आवाक मूक दर्शक बन
अपनी तबाही देख रहा हूँ
व्यथित हूँ व्याकुल हूँ आक्रोशित हूँ
मुझे कितने मासूम निर्दोष लोगों की

कब्रगाह बना दिया गया...
मेरी आग में जुल्स्ती तडपती,
रूहें उनका करुण रुदन ,
क्या किसी को सुनाई नही पढ़ता..
क्या दोष था मेरा ....
क्या दोष था इन जीवित आत्माओं का ...
अगर नही, तो फ़िर दोषी कौन....
दोषी कौन, दोषी कौन, दोषी कौन?????

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Friday, November 28, 2008

डैमोक्रैसी

अशोक चक्रधर


एकाएक मंत्री जी
कोई बात सोचकर
मुस्कुराए,
कुछ नए से
भाव उनके चेहरे पर आए।
उन्होंने अपने पी.ए. से पूछा—
क्यों भई,
ये डैमोक्रैसी
क्या होती है ?
पी.ए. कुछ झिझका सकुचाया, शर्माया।
-बोलो, बोलो
डैमोक्रैसी क्या होती है ?
-सर, जहां
जनता के लिए
जनता के द्वारा
जनता की
ऐसी-तैसी होती है,
वहीं डैमोक्रैसी होती है।

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Wednesday, November 26, 2008

सिलवटों की सिहरन

VIJAY KUMAR SAPPATTI


अक्सर तेरा साया
एक अनजानी धुंध से चुपचाप चला आता है
और मेरी मन की चादर में सिलवटे बना जाता है …..

मेरे हाथ , मेरे दिल की तरह
कांपते है , जब मैं
उन सिलवटों को अपने भीतर समेटती हूँ …..

तेरा साया मुस्कराता है और मुझे उस जगह छु जाता है
जहाँ तुमने कई बरस पहले मुझे छुआ था ,
मैं सिहर सिहर जाती हूँ ,कोई अजनबी बनकर तुम आते हो
और मेरी खामोशी को आग लगा जाते हो …

तेरे जिस्म का एहसास मेरे चादरों में धीमे धीमे उतरता है
मैं चादरें तो धो लेती हूँ पर मन को कैसे धो लूँ
कई जनम जी लेती हूँ तुझे भुलाने में ,
पर तेरी मुस्कराहट ,
जाने कैसे बहती चली आती है ,
न जाने, मुझ पर कैसी बेहोशी सी बिछा जाती है …..

कोई पीर पैगम्बर मुझे तेरा पता बता दे ,
कोई माझी ,तेरे किनारे मुझे ले जाए ,
कोई देवता तुझे फिर मेरी मोहब्बत बना दे.......
या तो तू यहाँ आजा ,
या मुझे वहां बुला ले......

मैंने अपने घर के दरवाजे खुले रख छोडे है ........

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एक शाम और ढली

SEEMA GUPTA

राह पे टकटकी लगाये ..
अपने उदास आंचल मे
सिली हवा के झोकें ,
धुप मे सीके कुछ पल ,
सुरज की मद्धम पडती किरणे,
रंग बदलते नभ की लाली ,
सूनेपन का कोहरा ,
मौन की बदहवासी ,
तृष्णा की व्याकुलता,
अलसाई पडती सांसों से ..
उल्जती खीजती ,
तेरे आहट की उम्मीद ,
समेटे एक शाम और ढली ....

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Tuesday, November 25, 2008

दर्द

VIJAY KUMAR SAPPATTI


जो दर्द तुमने मुझे दिए ,
वो अब तक संभाले हुए है !!
कुछ तेरी खुशियाँ बन गई है
कुछ मेरे गम बन गए है
कुछ तेरी जिंदगी बन गई है
कुछ मेरी मौत बन गई है
जो दर्द तुमने मुझे दिए ,
वो अब तक संभाले हुए है !!

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आंसू

VIJAY KUMAR SAPPATTI

उस दिन जब मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा ,
तो तुमने कहा..... नही..
और चंद आंसू जो तुम्हारी आँखों से गिरे..
उन्होंने भी कुछ नही कहा... न तो नही ... न तो हाँ ..
अगर आंसुओं कि जुबान होती तो ..
सच झूठ का पता चल जाता ..
जिंदगी बड़ी है .. या प्यार ..इसका फैसला हो जाता...

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Monday, November 24, 2008

बंजारा मन

SEEMA GUPTA


ये मन फ़िर बंजारा हुआ,
भटकने को बेकरार ,
उन्ही रास्तों पर ,
जहाँ दरख्तों के साये ,
कुछ सूखे टूटे पत्ते ,
पहचानी एक महक ,
उडता हुआ धुल का गुब्बार ,
दूर तक फैला सन्नाटा ,
यादों की किरचे ,
भीगे हुए से पल ,
फीके क़दमों के निशाँ ,
बिखरे पडे हैं लावारिस से,
उन्हें फ़िर से समेट लाने को ,ये मन फ़िर बंजारा हुआ,

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Sunday, November 23, 2008

परायों के घर

VIJAY KUMAR SAPPATTI



कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई ;
नींद की आंखो से देखा तो ,
तुम थी ,
मुझसे मेरी नज्में मांग रही थी
, उन नज्मों को, जिन्हें संभाल रखा था , मैंने तुम्हारे लिए ,
एक उम्र भर के लिए ...
आज कही खो गई थी , वक्त के धूल भरे रास्तों में ......
शायद उन्ही रास्तों में ..
जिन पर चल कर तुम यहाँ आई हो....
क्या किसी ने तुम्हे बताया नही कि,
परायों के घर भीगी आंखों से नही जाते.....

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