आप सभी का स्वागत है. रचनाएं भेजें और पढ़ें.
उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, November 29, 2008

मुंबई में आतंक

अविनाश वाचस्पति



दंगे दुख देते हैं
सुख को हर लेते हैं
जाने कौन सी खुशी देते हैं
हर आतंकी को ?

खुशी पर लगता पहरा
दुख बढ़ता जाता गहरा
हर कोई है डरा डरा सा
अब आतंकी भी है सहमा।

मर्ज कोई दवा कोई हो
जांच शरीफ की हर दफा हो
आतंकी फिर बच निकलता है
या फिर नया ही पनपता है।

बम फटता है कहीं दूर तो
सहमता है सज्‍जन हर कहीं
डरता है ठिठकता है पर फिर
दुगने जोश से जिंदगी को जीने।

चढ़ जाता है अगला जीना
चाहे हो जाये पसीना पसीना
दुख कभी ठहरता नहीं देख लो
जमता है पर पिघलता है तेज।

सुख जमता है फिर भी थमता है
मुंबई जो थमता नहीं कभी भी न
थमा इस दफा न थमेगा कभी
जिंदगी से कैसे हो सकता है कोई खफा।

0 comments:

About This Blog

  © Blogger templates ProBlogger Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP