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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Sunday, November 23, 2008

परायों के घर

VIJAY KUMAR SAPPATTI



कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई ;
नींद की आंखो से देखा तो ,
तुम थी ,
मुझसे मेरी नज्में मांग रही थी
, उन नज्मों को, जिन्हें संभाल रखा था , मैंने तुम्हारे लिए ,
एक उम्र भर के लिए ...
आज कही खो गई थी , वक्त के धूल भरे रास्तों में ......
शायद उन्ही रास्तों में ..
जिन पर चल कर तुम यहाँ आई हो....
क्या किसी ने तुम्हे बताया नही कि,
परायों के घर भीगी आंखों से नही जाते.....

4 comments:

परमजीत बाली November 23, 2008 at 11:51 PM  

बहुत सुन्दर रचना है।

Mired Mirage November 23, 2008 at 11:57 PM  

सुन्दर !
घुघूती बासूती

डा. फीरोज़ अहमद November 24, 2008 at 8:32 AM  

कल रात दिल के दरवाजे पर दस्तक हुई ;
नींद की आंखो से देखा तो ,
तुम थी ,
मुझसे मेरी नज्में मांग रही थी
bahaut khoob.

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