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Monday, January 19, 2009

नारेबाजी से कविता कमजोर होती है : डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया



डॉ. राजेश कुमार
आपकी पहली प्रकाशित कविता कौन-सी है?

मेरी पहली प्रकाशित कविता शोणित के नाले है। यह कविता ४३-४४ में हंस में प्रकाशित हुई। इस कविता में मेरे कवि-व्यक्तित्व की व्यंजना है। मेरे प्रथम कविता-संग्रह बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ में यह कविता है। प्रगतिशील आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने मेरी इस कविता की जमकर प्रशंसा की है।
आपकी शोणित के नाले' कविता में दुर्धर्ष अपराजेयता, बीमारी से लड़ने का भाव तथा मानवता का विचार-बोध निहित है। सुना जाता है कि यह कविता आपने बीमारी के दौरान ही लिखी थी। क्या इस कविता को आपके संस्कार-वृक्ष की बीज कविता कहा जा सकता है।
हाँ, आपने एकदम ठीक सोचा है। जरा कविता सुनिए -
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले।
क्यों मेरे ही दरवाजे पर रोगों ने डेरे डाले?
मन ने तन से कहा, साथ दो, पर पाया कोरा उत्तर।
हुए तटस्थ कुटुम्बी साथी कुछ आतंकित-से होकर॥
किन्तु न वे कायर सब मुझको हतोत्साह करने वाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
युग से पिछड़े हुए हितैषी सड़ी सीख देने आते।
मैं अपनी रस्सियाँ तोड़ता, वे अपनी ताने जाते।
वे न साथ मेरा दे सकते, मैं भी खूब समझता हूँ।
चलता अपने पाँव, नियति का टूटा यान न चढ़ता हूँ।
तोल लिया मैंने अपना बल, देखूँ फौलादी ताले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
डट कर लड़ने की शिक्षा ही मिली दूध में माता के।
फिर मैं क्यों परवाह करूँ, क्या अक्षर किसी विधाता के?
मानव का लोहू बहता है मेरी स्फीत शिराओं में।
है प्रहार करने की ताकत अब भी सुदृढ़ भुजाओ में।
शीघ्र समझ लेंगी बाधाएँ पड़ीं कि वे किसके पाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
धरती किसकी, मानव की या दानव की? होता निर्णय।
उसमें मेरा कितना हिस्सा, इसका भी मुझको निश्चय।
इसीलिए मैं आज मौत का पंजा भी मरोड़ दूँगा।
इस्पाती मुक्के से बीमारी की कमर तोड़ दूँगा।
युग-हलचल से देखू मुझको कौन दूर रखने वाले।
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले॥
यह कविता मेरे संस्कारों की बीज कविता ही है। इसमें दुनिया को बेहतर बनाने का माद्दा मिलता है। मेरी यह विचारधारा बाद में कविता-संग्रहों में भी पाई जाती है। इस कविता में तीन प्रमुख बातों पर ध्यान है। पहली बात है- दुनिया के भविष्य की चिन्ता, दूसरी बात है-अपने स्वास्थ्य की चिन्ता तथा तीसरी बात है-युगीन अंधजड़ता के प्रति प्रतिवाद तथा विद्रोह का भाव। मुझे क्रॉनिक मलेरिया था। उन दिनों यह बहुत खतरनाक था, मैं रजाई ओढ़े हुए काँप रहा था। मेरे पिताजी मेरे ऊपर लेटे हुए थे। मैं तब इन पंक्तियों को बुदबुदा रहा था-
दुनिया के भविष्य-पथ पर बहते हैं शोणित के नाले।
क्यों मेरे ही दरवाजे पर रोगों ने डेरे डाले?

आपके कविता-संग्रह ÷बंगाल के प्रति और अन्य कविताएँ में गाँधी-जिन्ना मिलन पर एक कविता है-देश के दो हाथ मिलकर। गाँधी-जिन्ना मिलन की असफलता पर आप क्या कहेंगे।
जिन्ना की जड़ता तथा हठधर्मिता के कारण यह वार्ता परिणाम हीन रही। एकता स्थापित करने के लिए जितना उद्योग गाँधी कर सकते थे, उन्होंने किया। लेकिन जिन्ना अपनी जिद पर अड़े रहे। अंततः बातचीत बेनतीजा रही।

आपकी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना है। मेरे विचार से राजनैतिक पूर्वग्रहों से कविता की शक्ति कमजोर होती है। इस सम्बन्ध में आपका क्या अभिमत है।

आपका कथन लगभग सही है। आज के जीवन में राजनीति का स्थान बन गया है। आज की राजनीति जीवन परक है। कविताओं में राजनैतिक चेतना नहीं होनी चाहिए। नारेबाजी से कविता कमजोर होती है। प्रगतिशील कविता में जहाँ नारेबाजी है, वहाँ संवेदनात्मकता का अभाव है। सांस्कृतिक चेतना के अभ्युदय से कविता प्राणवान्‌ होती है। मेरी कुछ कविताओं में राजनैतिक चेतना होने से कविता की शक्ति कमजोर हुई है। बाद में मैं किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्त हो गया हूँ। मैंने कोशिश की है कि कविता नारेबाजी से बचे। लाल सेना की नारेबाजी से बचकर साहित्य लिखा जाता, तो बेहतर होता। त्रिलोचन की कविताएँ इस दृष्टि से बेजोड़ हैं। वे भारतीय जन-संदर्भों से कविता ऊँचाई पर ले जाते हैं।

१९६५ के भारत-पाक युद्ध के संदर्भ में सूली और शांति आपका लोकप्रिय काव्य-ग्रन्थ है। इस काव्य-ग्रन्थ में कश्मीर के प्राकृतिक सौन्दर्य का जैसा चित्रण है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें युद्ध का वर्णन भी अद्भुत है। इस ग्रन्थ के बारे में आपकी क्या राय है।

सूली और शांति भावदशा और मनोदशा की अच्छी कृति है। कश्मीर-सुषमा की प्रशंसा रामविलास जी ने भी की है। १९५९ के आस पास कश्मीर में एक भ्रमणकारी दल के साथ गया। भ्रमणकारी योजना केन्द्र की थी। इसमें करीब सौ लोग गए थे। डलझील के किनारे निशातबाग था। इसमें हम ठहरे थे। सुबह बसों में निकल जाते थे, रात को आते थे। इसलिए इस वर्णन में इतना यथार्थ है। चेकोस्लोवाकिया का एक युवा भी यहीं मिल गया। वह हिन्दी-प्रेमी भी था। युद्ध का वर्णन रेडियो सुनने तथा समाचार-पत्र पढ़ने के आधार पर है। लोगों ने इसे सराहा है।
डाक्टर साहब, क्या आप अपनी साहित्यिक उपलब्धियों से परितुष्ट हैं।

अगर मुझे चार-पाँच वर्ष और मिल जाएँ, तो साहित्य के लिए कुछ विशिष्ट दे सकूँगा। एटा में रहने के कारण वह नहीं दे सका, जो मुझे देना चाहिए था। साहित्यिक क्षेत्र में दो चीजें बाधक बनीं-छोटी जगह, प्रधानाचार्य का पद। मैं अविनाशी सहाय आर्य इण्टर कालेज, एटा का प्रधानाचार्य रहा। यह स्कूल आर.एस.एस. का था। यहाँ दक्षिणपंथी लोग (आर.एस.एस. के लोग) ज्यादा थे। इन लोगों ने साहित्य में बाधा पहुँचाई। मुझे कालेज के प्रबन्धक परेशान करते रहे। मैं ईमानदार था। कोई मेरा बाल बाँका नहीं कर सका। आजकल संपाति-चिन्ता नामक प्रबन्ध-काव्य लिख रहा हूँ। यदि पूरा कर सका, तो ठीक होगा। इसमें मैंने राम के अन्तर-विरोधों को उजागर किया है। मैं संपाति पक्षी प्रकट करता हूँ। वह राम से अन्तर-विरोधों के प्रश्न करता है। राम निरुत्तर भाव से जल समाधि लेते हैं।

आप अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति किसे मानते हैं?

यह बता पाना थोड़ा मुश्किल है। बात की चिड़िया से मैं संतुष्ट हूँ। इसमें बौद्धिक चिन्तन है। यह मुक्त छन्द का संग्रह है। इसमें मेरी विचारधारा का विस्तार है। वैसे अभी हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक कृति बेहतर दुनिया के लिए संघर्षों के सहयात्री लिखकर मुझे सर्वाधिक प्रसन्नता है।

डाक्टर साहब, संस्मरणात्मक लेखन में किन-किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए?
सफल संस्मरण में अपने को सामने नहीं रखना चाहिए। होता क्या है, लोग स्वयं को हाइलाइट करते हैं। मैंने स्वयं को हाइलाइट नहीं किया। संस्मरण जिसके बारे में लिखा जा रहा है, उसी को हाइलाइट किया। किसी भी प्रकार की कुण्ठा को संस्मरण में स्थान नहीं देना चाहिए। संस्मरण में आरोपण की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

डाक्टर साहब, १९४२ के क्विट इण्डिया मूवमेन्ट में आपकी सक्रियता रही है। यद्यपि उस काल में आप बी.ए. के विद्यार्थी रहे, फिर भी आपने अपना योगदान किया है। इस बारे में आप बताइए।
मैं आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन से सम्बद्ध था। यू.पी. ब्रान्च में कार्य करता था। इसका उद्देश्य आजादी के लिए छात्रों को प्रेरित करना था। शिवदान सिंह चौहान भी इसमें थे। प्रगतिशील विचारों को प्रसारित करना भी हमारा ध्येय था। जब बम्बई (आजकल मुम्बई) में भारत छोड़ो आन्दोलन का नारा देने वाले कांग्रेस के सब नेता गिरफ्तार किए गए, तब आगरे में विद्यार्थियों ने जुलूस निकाला। मैं सेन्ट जोन्स कालेज, आगरा में बी.ए. का छात्रथा। थाना हरीपर्वत पर एस०पी० ने जुलूस को तितर-बितर करना चाहा। मैं नेतृत्व कर रहा था। शाम चार बजे से लेकर रात सात बजे तक पुलिस से पथराव हुआ। दूसरे दिन मेरी गिरफ्तारी का वारण्ट जारी हुआ।

आज की आलोचना-पद्धति पर आपकी क्या राय है। आपकी दृष्टि में हिन्दी में सफल आलोचक कौन हैं?

आज की आलोचनात्मक-पद्धति वैयक्तिक ज्यादा है, साहित्यिक और सैद्धान्तिक उतनी नहीं है। आज की आलोचनात्मक पद्धति उतना प्रभावित नहीं करती है, जितना करना चाहिए। आलोचक या तो स्वयं को हावी कर देता है या आलोच्य को। आलोचना संतुलित होनी चाहिए। हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सबसे सफल आलोचक हैं। उनके बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम भी आदरणीय है। रामविलास जी की आलोचना में कहीं-कहीं वैयक्तिकता है। उनकी सीमाएँ हैं। वे जिससे खुश हों, उसे आसमान पर बिठा देते हैं, जिससे नाराज हों, उसे हीनमान बताते हैं। इसके बावजूद उनकी आलोचना ठीक है। कुछ लोगों ने रामविलास जी की आलोचना से असहमति तो जताई है, लेकिन उनकी मान्यताओं का सप्रमाण खण्डन नहीं किया है।

आपको कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं?

मुझे दो पुरस्कार मिले हैं। बाद में साहित्यिक राजनीतिक का शिकार रहा। सूली और शांति पर उत्तर-प्रदेश हिन्दी समिति का पुरस्कार ६८-६९ में मिला। १९७५-७६ में दीवारों के पार पर बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार मिला। हमारे देश में पुरस्कार भी राजनीति से प्रेरित हैं। मेरी किताबें भी देर से प्रकाशित हुईं। राजनीति भी बदल चुकी थी।

आप किन-किन कवियों से प्रभावित रहे हैं?

मैं आरम्भ में मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत से प्रभावित रहा हूँ। राष्ट्रीयता के मामले में एक सीमा तक दिनकर से भी प्रभावित हूँ। बाद में निराला का प्रभाव मुझ पर है। रचनात्मक प्रवेग मेरा अपने आपका है।

डाक्टर साहब, १९४३ ई. के तार सप्तक के प्रकाशन के बाद अज्ञेय एक नायक के रूप में सामने आते हैं। क्या तथाकथित प्रयोगवाद ने प्रगतिशील हिन्दी-कविता को क्षति पहुँचाई है।
कुछ समय तक अज्ञेय के व्यक्तित्व ने प्रगतिशील हिन्दी-कविता को आच्छादित किया। थोड़े समय तक क्षति भी हुई। लेकिन बाद में हिन्दी-कविता इससे उबर गयी।

कुछ पुराने कम्युनिस्टों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की निन्दा की है। मेरे विचार से नेताजी की देश-भक्ति को प्रश्नचिद्दित नहीं किया जा सकता। नेताजी के बारे में आपकी क्या अवधारणा है।
मैंने १९३९ में नेताजी का फारवर्ड ब्लॉक ज्वाइन किया। मैं इटावा में उपाध्यक्ष भी था। इटावा रेलवे स्टेशन पर मैं उनसे मिला। वे दिल्ली से इलाहाबाद जा रहे थे। वे बहुत आशावादी थे। नेताजी अग्रगामी दल को मजबूत करने पर बल दे रहे थे। उन्होंने कहा-हम अंग्रेजों को तबाह कर देंगे। उनका तबाह शब्द मुझे आज भी याद है। नेताजी सोवियत संघ से ही मदद लेना चाहते थे। लेकिन विश्व की तत्कालीन परिस्थितियों के कारण उन्हें जापान-जर्मनी का आश्रय लेना पड़ा। तब से मैं विचारों में अन्तर मानने लगा। वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी मौत विमान-दुर्घटना में नहीं हुई। वे एटा में रिजोर रियासत में साढे तीन वर्ष संन्यासी के रूप में रहे। वह कई भाषाएँ जानते थे, अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते थे। वह ३०-४० बाल्टियों से नहाते थे। शॉलमारी आश्रम इन्होंने स्थापित किया। जब मैं यहाँ आया, वे रिजोर से जा चुके थे। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभिसीतारमैया को गाँधी जी ने खड़ा किया। बोस स्वंय खड़े हुए। बोस जीते। गाँधी ने स्वयं स्वीकार किया कि यह उनकी हार है। बाद मे बोस ने स्वयं इस्तीफा दे दिया। गाँधी जी के प्रति उनके मन में आदर-भाव तो था, लेकिन वे उनकी नीतियों में विश्वास नहीं रखते थे। समाजवादी विचारधारा नेहरू की ज्यादा थी। विचारधारा में सुभाष नम्बर दो पर थे। लेकिन राष्ट्र के प्रति मर मिटने का भाव सुभाष में सबसे ज्यादा था। उन दिनों सुभाष की लोकप्रियता शिखर पर थी। गाँधी, नेहरू, सुभाष से पीछे थे - लोकप्रियता में। उस समय की नीतियों के कारण नेताजी ने स्वयं को गुप्त रखा।
अभी हाल ही में वन्देमातरम्‌ के गायन को लेकर देश में उठा-पटक हुई है। आप भारतवासियों को इस संबंध में क्या कहेंगे।

इसको लेकर दोनों वर्गों को समझदारी से काम लेना चाहिए। इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ को अतिवादिता की हद तक खींचने की कोशिश की गई है। मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है। मैंने हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद नहीं रखा है

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Sunday, January 18, 2009

मैं कहता आँखिन देखी... : काशीनाथ सिंह

प्रो. रामकली सराफ
आपका ग्रामीण जीवन से गहरा सरोकार रहा है, आपके कहानी लेखन में इसकी क्या भूमिका रही है?

ऐसा है कि मैं गाँव में पैदा हुआ, वहीं पला बढ़ा, खेला-कूदा, खेती में भी साथ देता रहा। कटाई हो, दँवरी हो ये सब कुछ मैंने किया। हाईस्कूल तक गाँव में पढ़ा। उसके बाद इंटरमीडिएट में मैं शहर आया और फिर शहर में ही सारी पढ़ाई लिखायी हुई और वो भी बनारस में। लिखना तो शुरू कर दिया था बी.ए. में मामूली कविताएँ लिखता था जिसका कोई मतलब नहीं था। सन्‌ १९६० ई. के आसपास विधिवत्‌ लिखना शुरू किया।

कविता जब आप लिख रहे थे शुरू में, तो अचानक ये कैसे मोड़ आ गया कि कहानी लिखने लगे?

इसलिए कि मेरे भाई साहब (डॉ. नामवर सिंह) स्तम्भ लिख रहे थे कहानी पत्रिका के लिए और ज्यादातर घर में कहानियों पर बात होती थी। तो कहानी पत्रिका की कहानियों को पढ़ता था और उन कहानियों को पढ़ता था जिनकी तारीफ करते थे भाई साहब। खासतौर से रूसी कहानियाँ, हेमिंग्वे की कहानियाँ, मंटो की कहानियाँ तो इन्हें पढ़ता था तो कहानी की तरफ धीरे-धीरे मुड़ने लगा और कहानी लिखना शुरू किया सन्‌ ६० के बाद से। तो जो पात्र हमारे आते थे, जो जीवन होता था वो गाँव का ही होता था। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं उस आदमी के बारे में लिख रहा हूँ जो गाँव को छोड़ चुका है, लेकिन शहर में रहते हुए शहर का नहीं हो पा रहा है। सन्‌ ६० के आस-पास की स्थितियाँ ऐसी ही थीं भी। मेरी शुरुआत की कहानियों में इस तरह का एक आदमी था।
नयी कहानी का दौर और उसके समाप्ति पर आपने लिखना शुरू किया। लेकिन उस प्रभाव से जो अपने को अलग किया लेकिन मुख्य बात यह है कि उस पूरे प्रभाव से स्वयं को बचाते हुए कैसे इतना बड़ा परिवर्तन आपके लेखन में आया? क्या बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं इसके मूल में?
देखिए, लगभग ऐसा समय तो शीतयुद्ध का था, कांग्रेसी हुकूमत थी। जनता का मोहभंग हो गया था... ढेर सारी योजनाएँ चालू की गयी थीं और योजनाएँ या तो अधूरी थीं या जैसे बाँध बन रहा था, बने बाँध लेकिन बारिश हो तो बाँध बह जाय। सड़कें टूट जाएं, विकास जैसे होना चाहिए था वैसे नहीं हो रहा था। तो लग रहा था कि यह सत्ता इस लोकतंत्र में जनता के लिए जो काम कर रही है वह काम संतोषजनक नहीं है और इस पर मुहर लगाने का काम किया जनता ने। पूरी तरह से भारत प्रभावित हुआ था। इस परिवर्तन ने हमारी भाषा को भी प्रभावित किया और हमारे कंटेंट को भी।

आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आज जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगड़ा भारी पांडे कौन कुमति तोहे लागि... आदि में जो गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ, वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।

आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं? (संदर्भ-संतों घर में झगड़ा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागि, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं? व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। २०-२५ वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। ९० के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन्‌ १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और...। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इसमें महिलाएँ भी थीं और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मुहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुतः यह है एक मुहल्ला, लेकिन है नहीं मुहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीना महिला जो बनारस पर शोध कर रही है, बनारस के प्रति क्या धारणा है? वह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मुहल्ला मानकर न देखा जाय।

बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, ईसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा.

डॉ. साहब आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हें खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?

जी, साहस किया था उसे लेकर...। प्रेमचंद ने अपनी कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल... (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नहीं किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ,... डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतो-असंतो घोंघा बसंतो हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतो घर में झगड़ा भारी हो... सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढ़ने वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन... धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्त्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है जया सिंह, दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।

कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?

कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।

हाँ,... मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के सन्दर्भ में पूछ रही थी।

सड़क के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।

एक बात खास यह लगती है कि दलित लेखन की भाषा पर भी अश्लीलता का आरोप लगा लेकिन वे अपने बचाव के लिए आपके पास क्यों नहीं लौटते हैं? क्यों नहीं कहते कि सवर्ण लेखकों ने भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया?

दलित लेखन एक आन्दोलन की तरह था - इनके पहले मैंने लिखा है, लेकिन दलित लेखन की भाषा पर हमसे कोई खास बात...। उन्होंने काफी बाद में शुरू किया लेकिन उनकी ओर से कोई तालमेल नहीं कोई सफाई नहीं...।

इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं - इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?

ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। वह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि हैं और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहा करता था।

आप डॉ. धर्मवीर के बारे में क्या कहेंगे जो धर्मवीर कबीर पर और कबीर के आलोचकों पर प्रहार कर रहे हैं?
धर्मवीर कबीर पर ही नहीं प्रेमचंद पर भी (सामंत का मुंशी) प्रहार करते हैं। मैंने पढ़ा नहीं उसे। धर्मवीर को अब उतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, वे अनर्थ कर रहे हैं। चीजों को गलत इंटरप्रेट कर रहे हैं। सचमुच धर्मवीर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?

नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढ़ने और पढ़ाने की नहीं। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताजों में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।

महाकवि तुलसीदास में भी तो श्रवणीयता है वे केवल सनातनी और ब्राह्मणवादी ही नहीं थे। तो क्या भविष्य में तुलसीदास पर लिखने के लिए सोचा है आपने?

जी, नाटक लिखने की सोच रहा हूँ दस पन्द्रह वर्षों से। खासतौर से तुलसीदास जब अंतिम दिनों में बाहुशूल से पीड़ित हैं कोई देखने वाला नहीं है। तुलसीदास के उपेक्षित दिनों पर। जिस तरह से इस ब्राह्मण मुहल्ले ने उपेक्षित किया है उन्हें। वैसे इन विषयों पर लिखना इतिहास की ओर लौटना होगा और इतिहास की ओर लौटना एक तरह से भागना होता है। हमें वर्तमान पर लिखना चाहिए। वैसे जो भी नाटक आए जैसे- आषाढ़ का एक दिन हो अंधायुग हो कबिरा खड़ा बाजार में' हो सभी इतिहासाश्रित नाटक हैं। जबकि ऐसा मैं नहीं सोचता इसलिए हम वहाँ आश्रय नहीं चाहते हैं। इसलिए तुलसीदास पर मैंने नहीं लिखा।

संचारतंत्र और मीडिया, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद पर आप लगातार हमले कर रहे हैं। सच ही यह समय का यथार्थ है और यथार्थ की अभिव्यक्ति है लेकिन प्रारंभिक दौर में आपने जिस तरह काम किया है स्त्री-विमर्श पर। कहनी : उपखान में संग्रहित अनेक कहानियाँ इसकी गवाह हैं। अब जब पूरा दौर स्त्री-विमर्श को लेकर सक्रिय है आप मौन क्यों हैं? जबकि सातवें दशक में बड़े बेबाक तरीके से अभिव्यक्त कर रहे थे?
स्त्री-विमर्श पर बातें खूब हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, राजेन्द्र यादव के अनुसार दलित और स्त्री एक हैं। स्त्रियों का शोषण दलित भी अपने घरों में करते हैं। पुरुष वर्चस्व सभी जगह है। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि वह लेखन ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है, न स्त्रियों द्वारा और न पुरुषों द्वारा। खुद स्त्रीविमर्श पर बात करने वाले लोग अपनी बेटियों और पत्नियों पर दोहरे मानदंड अपनाते हैं, यह सोचने का विषय है।

लेकिन डॉ. साहब यहाँ हावी तो पुंसवादी दृष्टि ही रही है।

हाँ-हाँ, आप ठीक कह रही हैं।

डॉ. साहब, मार्क्सवाद के बारे में बताएँ? पहले आप इस जीवन दर्शन से प्रभावित रहे लेकिन अब ऐसा नहीं लगता कि आप उससे कुछ अलग हटे हैं। इसमें एक और बात कि स्त्री और दलित लेखन में मार्क्सवाद की भूमिका कितनी बनती है?

देखिए, मार्क्सवादी दृष्टि से हम अलग नहीं हैं। अब हम लोकतांत्रिाक हो गए हैं। मार्क्सवाद को हम व्यवहार में लाए और वही हमारे विचार में भी बदलाव लाया। अब मार्क्सवादी कट्टरता नहीं रही है हमारे भीतर। स्त्री, दलित मुद्दे पर मार्क्सवादी दृष्टि हमें बल देती है। दलित जीवन में वर्ण के साथ वर्गान्तरण हो रहा है और दलित लेखक आत्मबद्ध हो रहे हैं। वर्ण एक सामाजिक सच्चाई है लेकिन वर्ग को दरकिनार करके नहीं देखना चाहिए। अम्बेडकर और मार्क्सवाद दोनों मिलकर दलित लेखन को ताकत प्रदान करते हैं।

हाँ, यह तो सही है लेकिन डॉ. साहब आपने भी जाति केन्द्रित कहानियाँ लिखीं हैं, जिसमें जातीय समस्याओं को लेकर गंभीर विमर्श किया गया है, फिर भी इन कहानियों ने दलित लेखकों का ध्यान आकर्षित नहीं किया?

हाँ, जाति केन्द्रित कहानियाँ हैं चोट, सराय मोहन... जाति को ध्यान में रखकर ७१ में चोट लिखी जो आधार पत्रिका में प्रकाशित हुई। वे तीन घर कहानी सराय मोहन की' उन्हें दलित विमर्श की कहानी नहीं कह सकता, क्योंकि दलित विमर्श तब तक आया ही नहीं था। इसमें सवर्ण दृष्टि... यह लेखक की गलती है। चोट कहानी में दलित अन्तर्विरोध भी है - तीन घरों के बारे में टिप्पणी है इसमें। दलित स्त्री है अपने कामरेड मित्र से कहती है कि उन दलित घरों पर ध्यान मत दीजिए। कहानी सराय मोहन' में ठाकुर, ब्राह्मण, हरिजन हैं। हरिजन रोटियाँ बना रहा है और उसकी रोटियाँ सब खा जाते हैं। भूख के सामने जाति का कोई मतलब नहीं रह जाता। लेकिन जैसे ही पता चलता है कि वह दलित है ब्राह्मण तो पचा जाता है और ठाकुर कै कर देता है और उसकी लुटिया भी चुराकर पंडित जी चल देते हैं। जैसे वे तीन घर दलितों के भीतर के अंतर्विरोध को व्यक्त करती हुई कहानी है वैसे ही कहानी सराय मोहन में ब्राह्मण के प्रति उपहास का भाव है दलित का प्रतिकार है। पर कहानीकार ने स्वयं बताया कि ये दलित विमर्श की कहानियाँ नहीं हैं।

भले ही आप कहें, लेकिन दलितों ने उसकी नोटिस क्यों नहीं ली जबकि दलित टोन तो है?
कोई बात नहीं... उधर ध्यान जाना चाहिए था।

ठाकुर का कुआँ, सद्गति, कफन इस पर क्या कहेंगे? जबकि ये भी तो दलित विमर्श से पहले की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ बराबर उनके घेरे में हैं क्यों?

सारनाथ वाली गोष्ठी में मैंने कहा था प्रेमचंद बरगद हैं और हम लोग बरोह हैं, जो उसी की डाल से हम लोग निकले हुए हैं जिसकी जड़े जमीन में हो जाती हैं। प्रेमचंद आज भी अद्वितीय हैं। उनके सामने जातियाँ नहीं थी, पूरा देश था। जाति या दलित उसी स्वाधीनता आन्दोलन के अंग हैं।

आज के दलित लेखन को किस रूप में आप देखते हैं?

प्रेमचंद की दृष्टि गाँधीवादी थी और आज के दलित लेखन की दृष्टि अम्बेडकरवादी है। सुमनाक्षर ने रंगभूमि जलायी। जबकि ओमप्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल पाल चौहान की सहमति है प्रेमचंद से। हाँ, असहमति है तो इसलिए कि प्रेमचंद लेखक हैं दलित नहीं। दलितों की पीड़ा केवल दलित ही लिख सकते हैं, जबकि साहित्य में ऐसा कोई अंकुश नहीं है। वे मानते हैं कि दलितों की समस्या पर अम्बेडकरवादी दृष्टि से विचार करें। लेकिन यदि कोई सवर्ण भी अम्बेडकरवादी दृष्टि से लिखे तो भी वे ऐसा नहीं मानेंगे। इसके लिए वे दलित होना आवश्यक मानते हैं। यह नजरिया एकांगी है।

आपने महत्त्वपूर्ण दलित लेखक सूरजपाल चौहान की संतप्त की भूमिका लिखी है। दो पृष्ठ की भूमिका पाठक को बाध्य कर देती है कृति से होकर गुजरने के लिए। डॉ. साहब एक बात बताना चाहेंगे कि सूरजपाल ने दलित पीड़ा को न सिर्फ बाहरी संघर्ष को अभिव्यक्त किया है अपितु दलित समाज के भीतर की संरचना को एकांकित किया है? दूसरे शब्दों में दलित अंतर्विरोधों का खुलासा किया है उन्होंने इस कृति में। हम देख भी रहे हैं। आज यह स्थिति दलित लेखन में तेजी से घर कर रही है। दो हिस्सों में बँटा दलित लेखन कहीं अपने उत्स तक पहुँचने के पहले चूक तो नहीं रहा है?

मैं ऐसा नहीं मानता। कहानियाँ उतनी अच्छी नहीं लगीं आत्मकथा के बनिस्बत। आत्मकथाएँ मुझे बेहद पसंद हैं। अंतर्विरोध आन्दोलन को अंततः मजबूत करता है। यह एक डेमोक्रेटिक प्रोसेस' है। इससे आन्दोलन मजबूत होगा। मैं देखता हूँ प्रगतिशील आन्दोलन को, शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द गुप्त, अमृत राय, यशपाल एक ही आन्दोलन में थे। लेकिन इनके विचार विरोधी थे और आन्दोलन प्रभावित हुआ, प्रगतिशील लेखन खत्म हुआ। दलित आन्दोलन का भी ऐसा हो सकता है। लेकिन विचारधाराओं में टकराव से जो स्थिति आएगी उसमें से लेखन की एक उर्वर भूमि बनेगी। विघटन के बीच से जो चीज आएगी उसमें एक ताजगी एक नयी ऊर्जा मिलेगी।

हाँ, यह भी एक संभावना बनती है। लेकिन क्या दलित लेखन में खासतौर पर आत्मकथाएँ एक रस नहीं हो रही हैं?

हाँ-हाँ, जो आन्दोलन हुआ था अफ्रीका में ब्लैक लिटरेचर का वह थम गया। आज दलित आन्दोलन की आवाज भी मद्धिम हो रही है। कंट्राडिक्शन का आना शुभ है यहाँ से ऊर्जा मिलेगी। दूसरी बात सभी एक ही दिशा में सोचेंगे-लिखेंगे तो आन्दोलन का क्या होगा?

फिर भी डॉ. साहब आन्दोलन की धार मद्धिम पड़ी है?
हाँ, ऐसा हो रहा है।

दलित लेखन में स्त्रीलेखन की कमी आपको परेशान करती है? मान लीजिए कि विमला चौहान भी अपने सच को लिखें तो कहीं सच का दूसरा रूप तो उभरकर सामने नहीं आयेगा? क्योंकि शुरू से ही सब कुछ का बहुत हद तक एहसास करते हुए सूरजपाल मूक क्यों बने रहे? उनका लेखन तो काफी बोल्ड है। लेकिन इसके मूल में वजह क्या है? उनमें भी कोई कमी तो नहीं है? लेखन में इतनी प्रखरता साफ दृष्टि और जीवन में इतनी चुप्पी?

विमला चौहान का प्रसंग पढ़ा था भूमिका लिखते समय, उस समय मेरी स्थिति थी कि एक तरफ तो सूरजपाल के सामने सिर झुक रहा था और क्रोध भी आ रहा था कि रोका क्यों नहीं? सूरजपाल की कौन-सी मजबूरियाँ थी? सूरजपाल ने क्यों नहीं रोका क्यों चुप थे? विमला आगे बढ़ती जा रही थी। (क्षणभर चुप रहकर) यह तो विमला ही बता सकती हैं।
दलित लेखन में स्त्रियों को लेकर उनकी समस्याओं को लेकर लेखक चुप हैं, लेखन के क्षेत्र में दलित स्त्रिायाँ भी आगे नहीं आ रही हैं। जबकि मराठी में कुछ दलित स्त्रियों ने बड़ी शिद्दत से अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं?

देखिए, मैं तस्लीमा को पढ़ता हूँ भारतीय लेखिकाओं को पढ़ता हूँ। अब लेखन कम हो रहा है, विमर्श ज्यादा हो रहा है। यहाँ वह तेजस्विता नहीं है। स्त्रीविमर्श का मतलब हिन्दी के लेखक के लिए देहमुक्ति है।

जी डाक्टर साहब, कुछ लेखकों के लिए हो सकता है, पर स्त्रीविमर्श यहीं तक सिमटा हुआ नहीं है। स्थितियाँ तो विपरीत हैं, एक साथ स्त्री पर भूमंडलीकरण, बाजारवाद, पुरोहितवाद मिलकर हमला कर रहे हैं, स्त्री आन्दोलन आज भी साहित्य के धरातल पर ही ज्यादा दीख रहा है। सामाजिक धरातल पर बहुत कम, तो ऐसे में किस प्रकार यह सामाजिक धरातल पर आएगा क्योंकि स्त्रीआन्दोलन और स्त्री साहित्य अस्मत और अस्मिता का साहित्य है?

देखिए, जो हजारों साल से हमारे संस्कार बने हैं, उसे न तो पुरुष लेखक तोड़ रहे हैं और न स्त्रियाँ। स्त्रियाँ तो तोड़ रही हैं बहुत हद तक पुरुष लेखक नहीं तोड़ पा रहे हैं। उनकी फ्यूडल मानसिकता स्त्री शोषण से बाज नहीं आ रही है।

वर्तमान कथा लेखन पर आपकी क्या टिप्पणी है?
संभावनाओं से भरा अच्छा लेखन हो रहा है। हाँ, युवा लेखकों में प्रसिद्धि पाने की बेचैनी है जो घातक है उनके लिए।

पहले लेखन में जो प्रतिरोधी स्वर था जो धार थी, वह धार आज के लेखन में क्या कम हुई है?
(थोड़ा गंभीर होकर) इसे पॉजिटिव ढंग से लेना चाहिए। ये कम अधिक होते रहते हैं। आज के युवा लेखकों में कम लिखकर प्रसिद्धि पाने का जो उतावलापन है, उसी बाजारवाद के कारण है। बाजारवाद के विरोध में लिखते भी हैं और उसी से स्वीकृति भी पाना चाहते हैं। धार तो कमजोर हुई ही है।

अपना रास्ता लो बाबा' में एक छटपटाहट है उस युवक के मन में। उसे लगता है कि उसके अंदर जो लगाव है वह टूटेगा तो कोई बड़ी चीज बिखर जायेगी। लेकिन आज सम्बन्धों के भीतर वह गहराई नहीं रह गयी है, वह उष्मा भी नहीं बची है। उससे रिक्त हो रहा है युवा लेखन। कहीं अपनी आत्मबद्धता के कारण है। इसे पीढ़ियों का गैप ही कहा जा सकता है? इनका लेखन आपको चुनौती नहीं दे पा रहा है। आपको इरीलिवेन्ट साबित नहीं कर पा रहा है। यही कारण है कि आज भी पाठक आपके लेखन को बड़ी शिद्दत के साथ पसंद कर रहे हैं।

इस टिप्पणी के लिए आपको धन्यवाद दे रहा हूँ। आप बहुत सही कह रही हैं। हाँ, यह पीढ़ी हमें हाशिए पर नहीं डाल पा रही है, जबकि इनसे पहले की पीढ़ी में एक ऊर्जा थी, चुनौती थी।
क्या व्यवस्था के साथ उनकी सहमतियाँ ज्यादा बन रही है?

हाँ, ऐसा है। लिखने के साथ जितना श्रम किया जाना चाहिए उतना श्रम नहीं कर रहे हैं। साथ ही लेखक का जो संबंध जनजीवन से होना चाहिए, लोक जीवन से होना चाहिए, अब ऐसा कम है।

सही है जब सुरेश कांटक, अखिलेश, उदय प्रकाश, सृंजय, देवेन्द्र आदि लिख रहे हैं तो उनमें तो एक धार है, कथा लेखन में एक ऊँचाई है।
आपसे मैं सहमत हूँ।

लेकिन आज?

आज निश्चित ही वह बात नहीं रह गयी है जो व्यवस्था को चुनौती दे सके या पाठक को व्यग्र और बेचैन बना सके और उद्वेलित कर सके।

वैसे आज आपको कथा लेखन के क्षेत्र में कौन से नये लेखक आकृष्ट कर रहे हैं?

चंदन पाण्डेय, कुणाल सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार मिश्र अच्छा लिख रहे हैं। इनके भीतर वह बेचैनी नहीं है जिसे हम लोग महसूस कर रहे हैं अपने लेखन के दौरान। चंदन पांडेय की दो कहानियाँ तो ठीक आयीं लेकिन तीसरी कहानी ऐसी लिखी जिस पर हम उम्मीद रखें या न रखें। देखिए न, आज ही एक लड़के ने फोन किया और कहा कि यह पुरस्कार मुझे मिल जाता तो ठीक रहता। स्वयं के लिए कहा था।


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Friday, January 16, 2009

हर इंसान के अन्दर साहित्यकार छिपा होता हैः प्रो. जमाल अहमद

डॉ. मेराज अहमद एवं डॉ. फ़ीरोज अहमद
डाक्टर साहब, संक्षेप में पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए?


जन्म फैजाबाद (वर्तमान में अम्बेडकर नगर) जिले में स्थित एक गाँव के संभ्रान्त परिवार में हुआ। खेती बाड़ी थी लेकिन की नहीं, करायी जाती थी। परिवार में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था। अधिकांश लोग शिक्षक थे। एक चचा ने वकालत शुरू कर दी थी। हाईस्कूल गाँव से करके गर्वमेन्ट कालेज फैजाबाद से इंटरमीडिएट किया। इसी बीच मेरे बड़े भाई अलीगढ़ में पढ़ने आ गये थे। मैं इंटर के बाद इलाहाबाद जाने के लिए तैयार था, लेकिन बड़े भाई ने अलीगढ़ की ऐसी तस्वीर खींची कि मैंने इलाहाबाद के बजाए अलीगढ़ आ गया। बी.ए., एम.ए. यहीं से किया। शोध के लिए दिल्ली के स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स में गया ही था कि मेरी नियुक्ति आगरा विश्वविद्यालय के एक कालेज में हो गयी। थोड़े दिन के बाद मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आ गया। तब से यहीं हूँ।

अपने अध्ययन काल में क्या कभी आपका विषय के रूप में साहित्य से सम्बन्ध रहा है?

नहीं, हाईस्कूल और इंटर में हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी विषय के रूप में जरूर पढ़ा लेकिन बाद में छूट गया। हाँ! साहित्य से दिलचस्पी जरूर रही। परिवार से थोड़े-बहुत साहित्यिक संस्कार मिले। शुरुआती दिनों में प्रेमचन्द के उपन्यास, कहानियों ने भी साहित्य में रुचि बढ़ायी लेकिन साहित्य से मेरा कोई प्रोफेशनल सम्बन्ध नहीं था इसलिए जो अच्छा लगा वही पढ़ा। यही कारण है कि साहित्य का मेरा ज्ञान बहुत अच्छा नहीं है।

फिर भी दिलचस्पी के लिए ही सही, साहित्य आपने पढ़ा ही, तो निश्चित रूप से कुछ न कुछ उसकी समझ आपके मन में बनी ही होगी। विशुद्ध रूप से आपके अपने दृष्टिकोण से साहित्य क्या है?

यकीनन बनी ही नहीं मुझे लगता है कि साफ भी है। एक खास बात यहाँ यह जरूर है कि जब मैंने समाजशास्त्र पढ़ा तब यह दृष्टि साफ हुई। साहित्य अपने समाज को निरूपित करता है और उससे प्रभावित भी होता है। मध्ययुगीन समाज को लेकर लिखे गये साहित्य में उस युग की बड़ी साफ झलक दिखाई पड़ती है और आधुनिक युग का परिवर्तन भी साहित्य में साफ-साफ दिखाई देता है। परिवर्तन सभी विधाओं में दिखाई देता है। मैं इसे तीन तरीके से देखता हूँ-आजादी के पहले के साहित्य को अगर देखिए तो तत्कालीन समाज और उसकी विसंगतियाँ, गरीबी, अन्याय और शोषण, जातीय विभाजन आदि को ले करके साहित्य की रचना हुई। आजादी की जंग के समानान्तर बहुत से साहित्यकारों ने आजादी को लेकर विविध स्तरों पर रचना की। प्रगतिशील लेखन की शुरुआत हो गयी थी। उसी समय यूरोप के इंडीविजुअल की चिन्ता ने भी यहाँ के साहित्य को प्रभावित किया। फलस्वरूप तमाम तरह के आन्दोलन या मूवमेन्ट पनपने लगे। आजादी के बाद जो साहित्य आया उसकी समस्यायें अलग तरीके की थीं। आजादी को लेकर के जो अपेक्षाएँ और आकांक्षाएँ थीं उनको ले करके साहित्य रचा गया इसी तरीके से राजनीतिक परिवर्तन और समाज के विभिन्न समुदायों में जो बिखराव और अलगाव पनपने लगा उसको साहित्य ने केन्द्र में स्थान दिया। उदाहरण के तौर पर राजनीति के जाति व्यवस्था पर पड़े प्रभाव की प्रस्तुति को हम साहित्य में देख सकते हैं। इधर के साहित्य को जो मैंने देखा उसे देखकर लगता है कि साहित्य अब भावात्मक हो रहा है। इसी के साथ-साथ मुख्तलिफ तबके जैसे महिलाएँ, दलित और अल्पसंख्यक तथा कमजोर वर्ग है उसकी अन्तःपीड़ा को भी साहित्य टटोल रहा है।

तो क्या जिनकी समस्याओं को खंगाला और टटोला जा रहा है उनके लिए वह साहित्य किसी स्तर पर कारगर हो रहा है? इसका उनको लाभ मिल रहा है?

भारतीय सन्दर्भों में देखा जाए तो ऐसा नहीं है, जैसा कि यूरोप में। यह बात सिर्फ साहित्य में ही नहीं, चाहे राजनीति हो या शिक्षण संस्थाएँ। वैचारिक रूप से तो समस्याओं को उजागर किया जाता है वास्तविकता के धरातल पर जिसको हम व्यवहारिक रूप कहते हैं, यह कहिए कि ऐक्शन के लेबल पर वह हमको नहीं दिखाई देता है। नतीजे के तौर पर साहित्य के माध्यम से सामाजिक रूपान्तर की जो प्रक्रिया होनी चाहिए थी वह दिखाई नहीं देती है। दरअसल जिनकी समस्या है लोग उनसे दूर रहकर उन्हें समझना और उठाना चाहते हैं इसलिए तालमेल नहीं बैठ पाता है।

आखिर फिर कैसा प्रयास किया जाए कि जिसके ऊपर साहित्य लिखा जा रहा है उससे साहित्य का सम्बन्ध स्थापित हो सके? इस संदर्भ में आप समाजशास्त्री की हैसियत से क्या सोचते हैं?

मेराज साहब, किसी शायर का एक मिसरा याद आ रहा है - 'खूने शहीद से भी कीमत के सिवा फनकार की कलम की सिहायी की बूंद' माना यह जाता है कि साहित्य किसी समय या समाज के आन्दोलन को अभिव्यक्त करने का सबसे बड़ा साधन है। लेकिन २० वीं सदी के औद्योगिक समाज में मार्क्सवादी दृष्टिकोण से रचना जरूर हुई लेकिन यह रचनाएँ परिवर्तन का साधन नहीं बन पायी। २० वीं शताब्दी की आखिरी दहाई और उसके बाद साहित्य की वह हैसियत नहीं कि वो समाज को कोई ठोस आधार दे सके। एक बात और है कि समाज को प्रभावित करने वाली ताकत अब साहित्य और साहित्यकारों के हाथ से निकल कर कुछ हद तक पापुलर क्षेत्रों में चली गयी है। इसमें मीडिया का बड़ा अहम्‌ स्थान है। सिनेमा है। यह समाज के बड़े अहम्‌ हिस्से हो गए हैं। कुछ तो साहित्यकारों की रचना और उसके पाठक सीमित होते जा रहे हैं इसलिए भी अब साहित्य समाज को बहुत गहराई से प्रभावित नहीं कर पा रहा है।

इसका मतलब यह है कि आप कहना चाह रहे हैं कि साहित्यकारों को अगर आवाम से जुड़ना है जिनके लिए वह बात कर रहे हैं जिनके लिए लिख रहे हैं उनके लिए लिखने के लिए वह मीडिया इत्यादि से जो पापुलर मीडिया है, उनसे जुड़ें?

ऐसा ही हो रहा है साहित्यकार संचार माध्यम से पहले भी जुड़े थे। जुड़ भी रहे हैं। अगर नहीं जुड़े हैं तो उनके परिणाम दूरगामी नहीं हो सकते हैं। लेकिन यह भी है कि पॉपुलर इश्यू जो भी उठाये जायेंगे अगर उनमें गंभीरता नहीं है तो वह बहुत आगे तक नहीं जा पायेंगे। किसी भी इश्यू को टिकाऊ होने के लिए जब तक उसमें साहित्यिक पुट नहीं होगा उसका ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं होगा तब तक वह इश्यू उपयोग की वस्तु नहीं बन सकता है न ही उसके माध्यम से किसी खास बदलाव की कल्पना ही की जा सकती है।
आप अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे बड़े शिक्षण संस्थान से जुड़े हैं विश्वविद्यालय में साहित्यिक गतिविधियों की जो स्थिति है उसे किस स्तर की मानते हैं? उससे संतुष्ट हैं कि नहीं?
कोई भी विश्वविद्यालय हो, चाहे अलीगढ़ या दूसरा, बुनियादी तौर पर यह ज्ञान के केन्द्र होते हैं यहां पर नई पीढ़ी के जेहन तैयार होते हैं। विचार गढ़े जाते हैं। साहित्य विचारों को स्वरूप देने का बहुत सशक्त माध्यम है। विडम्बना की बात यह है कि हमारे विश्वविद्यालय के साथ-साथ दूसरे विश्वविद्यालयों में भी साहित्यिक संस्कृति कमजोर पड़ी है। यहां पर भी पॉपुलर मीडिया का दखल बढ़ा है। एक सच्चाई यह भी है कि उच्च शिक्षा विशिष्ट वर्ग के दायरे से निकलकर साधारण वर्ग के दायरे में आ गयी है और साधारण वर्ग में प्रोफेशनलिज्+म का जोर इतना बढ़ा है कि अब लोगों के पास समय ही नहीं बचा है कि वह इस क्षेत्र में जा करके समय गुजार सकें। इसे हम व्यवहारिकता का असर भी कह सकते हैं।

यानी की बाजारवाद का प्रभाव?

बिल्कुल, मार्केट ने पिछले १५ वर्षों में यानी कि ९० के बाद का जो दशक है उसमें उपभोक्ता संस्कृति को बहुत ज्यादा पनपाया है। ज्ञान का भी वस्तु के रूप में इस्तेमाल होने लगा है। उसकी मर्यादा, गरिमा उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रह जाती है इसलिए आप भी जानते हैं कि पॉपुलर साहित्य का प्र्रभाव पड़ा है। आज साहित्य की यह मजबूरी है कि उससे किसी न किसी स्तर पर मार्केट की जरूरत से मैचिंग करनी पड़ती है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य के सामाजिक सन्दर्भों में साहित्य की कोई विशिष्ट भूमिका हो सकती है?
शायद आप जो समसामयिक साम्प्रदायिकता है, नगरीकरण है, आपाधापी है, गतिशीलता आदि के
संदर्भ में बात कर रहे हैं?

जी?

देखिए, पिछले २५-३० वर्षों में बहुत अधिक परिवर्तन हुआ है। नई ह्‌यूमन एक्टिविटीज, नये-नये काम और नये-नये वर्ग उभरे हैं। खासतौर से प्रोफेशनलिज्म का हर क्षेत्र में जैसा असर दिखाई दे रहा है, पहले कभी नहीं था। पहले सम्बन्धों में टिकाऊपन था अब गतिशीलता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि साहित्य की भूमिका कम हुई है। दरअसल साहित्य इंसान की बड़ी मौलिक एक्टिविटी है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि प्रत्येक इंसान मूलतः साहित्यिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर यह गुण छुपा होता है। बात असल में यह है कि कुछ लोग अभिव्यक्त कर ले जाते हैं, बहुत सारे नहीं। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मैं यह कहना चाहूँगा कि साहित्यकार जब कुछ सम्प्रेषित करता है तो बहुत बड़ी संख्या में जब लोगों को यह लगता है कि ऐसा तो मैं भी सोच रहा था लेकिन उसके पास भाषा नहीं थी। इसलिए ऐसा कह नहीं पाया। जहाँ तक साहित्य के मूल या उसकी भूमिका की बात है, उसके स्कोप की बात है, फैलाव की बात है, वह कभी कम होने वाली नहीं। हाँ, टाइम का एक टेम्परामेंट होता है। आधुनिक समय का मिजाज बहुत तेज है। साहित्य गरिमामय होता है इसलिए साहित्य को समझने के लिए ठहराव की जरूरत होती है। चूँकि समय की कमी है इसलिए साहित्य उनका शिकार हो रहा है।

डाक्टर साहब, आपका सम्बन्ध समाजशास्त्र से है इसके अध्ययन में साहित्य कहा तक मदद करता है?

यह बड़ा मशहूर कथन है कि साहित्य समाज का दर्पण है और समाजषास्त्र समाज का अध्ययन। लिहाजा मद्द तो करेगा ही। समाज के अध्ययन की जो विभिन्न प्रविधियाँ हैं उनमें एक है ऐतिहासिक प्रविधि। इसके अन्तर्गत वर्तमान को प्रभावित करने वाले अतीत की वास्तविकता को समझने में साहित्य की मदद ली जाती है। हालांकि साहित्य में सामाजिक वास्तविकता की सम्पूर्णता नहीं होती है क्योंकि उसमें साहित्यकार का मर्म उसका अपना सच उसकी प्रतिबद्धता कुंठाएं और व्यक्तिगत प्रक्रियाएँ होती हैं, लेकिन समाजशास्त्री उसको पढ़कर अपने काम की चीज ले लेते हैं। उदाहरण के लिए मैं बताऊँ कि किसी साहित्य में मान लीजिए कि चित्रण है अस्पृश्यता का, हो सकता है कि जिस स्तर का चित्रण किया गया है वैसी अस्पृश्यता न हो लेकिन यह तो यक़ीनी बात है कि अस्पृश्यता का अस्तित्व रहा होगा तभी तो यह चित्रण किया गया होगा? साहित्य हमेशा से ही समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण साधन रहा है।

साहित्यिक हल्के में यह बात आमतौर पर कही जाती रही है कि २० वीं शताब्दी उत्तरार्ध के सामाजिक इतिहास के अध्ययन में प्रेमचन्द के साहित्य का बड़ा अहम्‌ रोल है। इस संदर्भ में आपकी क्या टिप्पणी है?

देखिए, जितना प्रेमचंद को मैंने पढ़ा है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि उन्होंने साहित्य के माध्यम से अपने समय की सच्चाई, कुंठाओं, अन्दरूनी कन्ट्रीडिक्शन को बड़ी हिम्मत के साथ उठाया है। समाज में धर्म और नैतिकता, वर्ग वैभिन्य इत्यादि के साथ-साथ गरीबों के दुख-दर्द, उच्च वर्ग के द्वन्द्व इन सारी सामाजिक स्थितियों का प्रेमचन्द जी ने बड़ी गहराई के साथ चित्रण किया है। इससे आप समझ सकते हैं कि उनकी क्या भूमिका हो सकती है।
आपका सबसे प्रिय साहित्यकार कौन है?

यह सवाल जरा मुश्किल है क्योंकि मैंने साहित्य को किसी खास नजरिये से पढ़ा नहीं है। हाँ, जो प्रगतिशील लेखक हैं या उनसे संबंधित साहित्यकार हैं वह मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। उनको मैं महत्त्वपूर्ण इसलिए मानता हूँ क्योंकि वे परिवर्तन के हामी है परिवर्तन से मेरा अर्थ विकास करने वाली शक्तियों के उद्घाटन से है, नारे से नहीं। प्रेमचंद उनमें से हैं जो परिवर्तन के हामी है। उर्दू में अल्लामा इकबाल का दर्शन भी मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उनके केन्द्र में व्यक्ति। वह अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्ति की अहमियत को सामने लाते है। ऐसा व्यक्ति जिसका किसी वर्ग से कोई सम्बन्ध नहीं है। दरअसल इकबाल के दर्शन को किसी समय, समुदाय या वर्ग से बाँधकर नहीं रख सकते हैं। इसलिए वह मुझे बेहद पसंद है।

वर्तमान में ऐसे कुछ साहित्यकार हैं जिनसे आप मिलते-जुलते रहते हैं?
देखिए, साहित्य मेरा विषय नहीं बल्कि दिलचस्पी है। इसलिए बहुत व्यवस्थित तरीके से नहीं लेकिन यदाकदा जैसे नामवर सिंह या अलीगढ़ में के.पी. सिंह, नमिता सिंह, ये मुलाकातें अचानक ही होती हैं।

कैसा लगता है उस समय आपको?

किसी दार्शनिक ने कहा है कि - साहित्यकार बौद्धिक होता है इसलिए विचारों की बात करता है। इसलिए उससे मिलकर अच्छा लगता है।
आपके नजरिए से कोई ऐसा विषय है जिस पर आपको लगता है कि लिखा जाना चाहिए?
देखिए, मैं साहित्यकार नहीं समाजशास्त्री हूँ इस दृष्टि से कहूँगा कि इधर २०-२५ वर्षों में बड़ा परिवर्तन हुआ है। उसे साहित्यकार केन्द्र में रखे हैं, अह्‌म बात यह है कि अल्पसंख्यक एक बड़ा मुद्दा हो सकता है। जो कि कमजोर है। संविधान इत्यादि के माध्यम से इनको ऊपर लाने का काम तो किया ही जा रहा है दूसरे और भी कमजोर वर्ग हैं। उनके साथ भी यही स्थिति है लेकिन उससे बात बनती नहीं है। इनको दो नजरिये से देखना होगा मुस्लिम की हैसियत से विशेष रूप से मुसलमानों के बारे में बात करना चाहूँगा। दरअसल उसकी जो कमजोर हालत है उसका एक कारण बाह्य भी है लेकिन उसके कारक उनकी अपनी सामाजिक रचना के अन्दर भी मौजूद हैं। कमोवेश दूसरे कमजोर वर्गों के लिए कहीं जा सकती है। जैसे अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजातियाँ आदि। कानून बना करके इनको आगे लाना एक हद तक ही मुमकिन है। उसे अपने आप भी सोचना होगा दरअसल जब तक उनके अंदर ही मंथन नहीं होगा, इसके लिए इस समाज के बुद्धिजीवी, राजनीतिक नेतृत्व और धार्मिक नेतृत्व को आगे आ करके संजीदगी और ईमानदारी से अपने अंदर झाँकना होगा। समय के साथ बदलना होगा यानी कि खुद ही कोशिश करनी होगी। बाहर से मदद आने के बाद वह बदलाव आ ही नहीं सकता। जिसकी वह अपेक्षा करता है। इधर दंगे-फसाद, बाबरी मस्जिद की शहादत आदि से लोगों को बड़ी तकलीफें हुई। काफी कुछ इस पर लिखा भी गया। धर्म निरपेक्षता की बहुत बात हुई लेकिन धर्म निरपेक्षता एकपक्षीय नहीं होनी चाहिए। अल्पसंख्यक ये सोचता है कि बहुसंख्यक हमारे लिए सेकुलर हों भारत का संविधान भी यही कहता है। लेकिन जब उससे धर्म निरपेक्ष होने की बात कही जाती है तो कहता है कि हम अल्पसंख्यक हैं तो उसे भी सेकुलर होने की जरूरत है।

कुल मिलाकर आप यह कहना चाहते हैं कि दबे-कुचले और अल्पसंख्यक वर्ग की अपनी जिम्मेदारी भी है?



बिल्कुल, उन्हें आत्ममंथन करना होगा, अपनी कमियों और खूबियों को अंडरलाइन करना होगा। परिवर्तन के लिए अन्दर से योजना बनानी होगी। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक अपेक्षित परिवर्तन नहीं होगा।

आपका तात्पर्य यह है कि अगर इसी तथ्य को इन्हीं सन्दर्भों को अपनायें तो साहित्य में अच्छी चीज आ सकती है?

बिल्कुल ये साहित्यकार के लिये अच्छा विषय हो सकता है कि चाहे अल्पसंख्यक हो चाहे दलित। वह जैसा अपने लिए सोचते हैं वैसा दूसरे के लिए करना चाहिए और इसी को विषय के रूप में अपनाना चाहिए। मेराज साहब, साम्प्रदायिकता को मैं सिर्फ धर्म के सन्दर्भों में नहीं देखता इसके सामाजिक संदर्भ भी हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि हम जो करते हैं ठीक है लेकिन दूसरे हमारे लिए ऐसा न करें। दरअसल यह है साम्प्रदायिकता । जबकि हकीकत यह है कि वो चीज हमारे लिए बुरी है तो दूसरों के लिये बुरी होनी चाहिए।

एक समाजशास्त्री की हैसियत से नवोदित साहित्यकारों से क्या कहना चाहेंगे? यानी संदेश?

मैं तो संदेश नहीं देना चाहता, साहित्यकार असल में और आमतौर पर बड़ा ईमानदार होता है। इसलिए वह बहुत देर तक मिथ्या को छिपाकर आडियेन्स तक नहीं पहुँच पायेगा। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि आडियेंस को बहुत देर तक भ्रम में नहीं रख पायेगा। इसलिए साहित्यकारों को समाज के लिए सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। उसके विकास में सहयोग दें। जन अपेक्षाओं को ईमानदारी से पेश करें अगर साहित्यकार ऐसा करता है तो शायद सामाजिक संदर्भ में इसका बहुत बड़ा योगदान होगा।


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Tuesday, January 13, 2009

देह से नहीं दिमाग से होगी स्त्री-मुक्ति : चित्रा मुदगल



श्याम सुशील
चित्रा जी, पिछले दिनों राष्ट्रीय सहारा में मैनेजर पाण्डेय, राजेन्द्र यादव और निर्मला जैन के बीच काफी वाद-विवाद और प्रतिवाद हुआ-स्त्री लेखन को लेकर। लेकिन उनकी बहसों के केन्द्र में, खासकर राजेन्द्र यादव के लिए स्त्रीलेखन का मतलब देह तक सीमित है। जबकि निर्मला जैन देह के साथ स्त्रीके मन की भी बातें करती हैं और इसी संदर्भ में उन्होंने कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और आप सबकी चर्चा की। इन बहसों को लेकर आप क्या सोचती हैं?


सुशील जी, स्त्रीविमर्श पर जिस तरह की साहित्यिक बहसें चल रही हैं, मुझे लगता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सोच की बात कर रहा है और अपनी सोच को वह स्त्रीविमर्श की परिभाषा के रूप में रेखांकित होते देखना चाहता है। हालांकि यह बहुत स्वस्थ प्रक्रिया है कि स्त्रीविमर्श को लेखक, समीक्षक और विद्वानजन अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर रहे हैं और इससे हमें मुख्य बिन्दुओं तक पहुँचाने का रास्ता भी मिलता है। लेकिन रास्ता तब अवरुद्ध होता लगता है, जब राजेन्द्र यादव जैसे महत्त्वपूर्ण रचनाकार स्त्रीविमर्श को अपनी सोच से परिभाषित करने की कोशिश में उसे सीमित कर देते हैं। राजेन्द्र की चेष्टा हमें अवाक्‌ करती है कि यह स्त्रीविमर्श को सही अर्थों में परिभाषित करने का प्रयत्न है या उसकी आड़ में स्त्रीदेह को ले करके अपनी कुण्ठाओं की अभिव्यक्ति है। यहाँ मुझे मल्लिका सेहरावत और राजेन्द्र यादव के स्त्रीविमर्श में कोई विशेष फर्क नज+र नहीं आता। औचित्य खोजने का पराक्रम-भर है। कुछ लोग समझते हैं कि देह से मुक्ति में ही स्त्रियों की मुक्ति है और उस मुक्ति को वह देह के निचले हिस्से में ही खोजते हैं। उन्हें स्त्रीधड़ के ऊपर एक अदद मस्तिष्क नजर नहीं आता, जो पुरुषों के मुकाबले उतना ही उर्वर है। मुझे उसी मस्तिष्क की सामाजिक पहचान और मान्यता में ही स्त्रीविमर्श की सही परिभाषा नजर आती है। आधी आबादी की पहचान का संघर्ष और विमर्श उसी को अर्जित करने का संघर्ष है। स्त्रीधड़ के निचले हिस्से की बात करने वाला लेखक बड़ी चालाकी से स्त्रीधड़ के ऊपर अवस्थित उसके मस्तिष्क को अनदेखा और उपेक्षित कर उसकी पुरुष सत्तात्मकता को ही जाहिर कर रहा है ताकि वह स्त्रीधड़ के निचले हिस्से का अपने धड़ के ऊपर के मस्तिष्क के माध्यम से जिस तरह चाहे उपयोग कर सके। वह स्त्रियों को बेवकूफ बनाना चाहता है।

मैं समझती हूँ कि मस्तिष्क की पहचान के साथ ही आधी आबादी की समाज में निर्णायक भागीदारी को स्वीकृति हासिल हो जाएगी हासिल हो रही है, लेकिन अभी उसे अपनी धरती, अपना क्षितिज और अपना आकाश जहाँ और जिस सीमा तक उपलब्ध होना चाहिए, नहीं हो रहा, नहीं दिया जा रहा, बल्कि पुरुष वर्चस्व स्त्रीविमर्श के आन्दोलन से अतिरिक्त सतर्क और सावधान हो रहा है और उसे दिग्भ्रमित करने के अनेक मंच सृजित किए जा रहे हैं, जहाँ स्त्रीके परम हितैषी होने के दावे-प्रतिदावे ऊँची आवाज में किए जा रहे हैं। स्त्रीका दैहिक उत्पीड़न और बढ़ गया है, जब से वह अपने स्व की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में डंके की चोट पर उतर आई है, चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो, राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे सेना हो या गाँव। गाँव में हमारी आधी आबादी का बहुत बड़ा प्रतिशत जो अभी भी नाक तक घूँघट को खींच, सूर्य की ओर अपनी आँखें नहीं उठा पाता है, और इक्कीसवीं सदी में भी लोटा लेकर खेतों में जाने को मजबूर है और शोषित होता है इन सबकी लड़ाई चैतन्यशील स्त्रीलड़ रही है और निश्चय ही वो उसे पालतू भेड़-बकरी की परिभाषा से बाहर लाएगी और बताएगी कि तुम्हारे इस घूँघट के भीतर का जो मस्तिष्क है, वह पुरुषों के मस्तिष्क से किसी तरह से कम नहीं है और तुम्हारी देह को अपवित्र करने वाले जब कुएँ और तालाबों में डूबकर नहीं मरते तो तुम्हें भी डूबकर मरने की जरूरत नहीं है। इस बात को महिलाएँ समझ रही हैं, चेतना ग्रहण कर रही हैं और इसी का परिणाम है कि अब शहरों में जिन लड़कियों के साथ देह उत्पीड़न होता है, वो लड़कियाँ बस और टे्रन के नीचे जाकर स्वयं को खत्म नहीं कर रही हैं, बल्कि यह साहस दिखा रही हैं कि पुलिस स्टेशन में जाकर उन बलात्कारियों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवा रही हैं। इन लड़कियों की अपने दैहिक शोषण के खिलाफ यह पहल, अपने उनके मस्तिष्क और उनकी चेतना की पहचान है क्योंकि उनके मस्तिष्क ने ही उन्हें यह साहस दिया कि अपने देह के निचले हिस्से के शोषण का प्रतिकार वे बेखौफ होकर करेंगी और उनके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगी। मस्तिष्क की चेतना ने ही उन्हें यह साहस प्रदान किया है कि वे अपने धड़ के नीचे की लड़ाई भी लड़ सकें। जब तक वो अपने मस्तिष्क की चेतना से सम्पन्न नहीं थीं तब तक धड़ के नीचे की लड़ाई लड़ने की वो हिम्मत नहीं जुटा सकती थीं या अपने विषय में निर्णय नहीं ले सकती थीं कि उन्हें क्या करना चाहिए। दूसरे लोग निर्णय लेते थे कि देह के अपवित्र हो जाने के बाद उन्हें जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह निर्णय भी पुरुषसत्तात्मक समाज ने ही लिया था, क्योंकि वह अपनी स्त्रीमें किसी की साझेदारी नहीं चाहता था, उसके मन की बात तो दूर। इसी तरह से उसके घर में जो उसकी स्त्रीबनकर आने वाली होती, उसकी यौन शुचिता भी उसके लिए जरूरी थी।

अगर समाज में आधी आबादी को अपने मस्तिष्क की पहचान मिल जाएगी तो वह अपनी इच्छा-अनिच्छा की लड़ाई भी लड़ लेगी और अपने तईं होने वाले उत्पीड़नों का प्रतिकार साहस के साथ कर सकेगी। स्त्री विमर्श में स्त्री के मस्तिष्क के पहचान की लड़ाई की बात न करके राजेन्द्र यादव ने यह साबित कर दिया है कि वह स्त्री विरोधी व्यक्ति हैं फ्यूडिस्टिक आचरण वाले व्यक्ति हैं। उनके विषय में मन्नू जी ने भी यह बात स्वीकारी है। राजेन्द्र जी को वही स्त्रियाँ स्वचेतना सम्पन्न लगी हैं जो धड़ के नीचे वाले स्त्री विमर्श के समर्थन में आगे आईं और उनकी रचनाओं में भी, वक्तव्यों में भी यह एकपक्षीय स्त्री विमर्श रेखांकित हुआ है, शायद वह मन से उसकी समर्थक न हों।

आज हिन्दी आलोचना में स्त्री, दलित, आदिवासी आदि जिन मुद्दों पर बहसें हो रही हैं, उसे आप कितना जरूरी समझती हैं। जबकि आप हिन्दी आलोचना की परम्परा को देखें तो वहाँ सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक विकास की प्रक्रिया, मार्क्सवाद आदि बड़े-बड़े मुद्दे रहे हैं। एक लेखिका होने के नाते आपके लिए आलोचना या इस तरह के विमर्श का अर्थ क्या है?

मेरे लिए साहित्यिक आलोचना या विमर्श का अर्थ समाज के सर्वांगीण सरोकारों से है। स्त्रीविमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श को भी उसी परिप्रेक्ष्य में संतुलन और विवेक और विवेच्य दृष्टि के साथ देखा, परखा और मूल्यांकित किया जाना जरूरी है, नहीं तो किसी की भी पक्षधरता का अतिवाद साहित्य के सरोकारों के संतुलन को डगमगाता है। एक तरफ आप पँसेरी चढ़ा दीजिए और दूसरी तरह सेर भी न रखिए तो तराजू असंतुलित हो जाएगा और न्याय नहीं होगा। बल्कि दलित और स्त्रीविमर्श की अतिवादिता ने चाहे वह लेखकों के द्वारा हो या समीक्षकों के विकासशील समाज की किशोर और युवा पीढ़ी की कठिनाइयों और जटिलताओं को लगभग अनदेखा कर रही है; जिनके कंधों पर विकासशील समाज की समृद्धि, संस्कार और एक समतामूलक समाज का सपना टिका हुआ है। आज अगर किसान आत्महत्या कर रहा है तो नई पीढ़ी भी चौंधियाते मॉलों की छठी और सातवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर रही है। इन गाँठों को आखिर कौन खोलेगा, कौन मूल्यांकित करेगा? समीक्षक को वर्गरहित, जातिरहित तथा गुटबंदी रहित हो कर के रचना को रचनात्मक उसकी समग्रता में मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि लेखकों के साथ वह भी (आलोचक) खेमों में बँटकर और ओछी राजनीति में उलझकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा को विस्मृत कर चुके हैं, बल्कि उससे आगे बढ़कर जो नए प्रतिमान उन्हें स्थापित करने चाहिए थे, मुझे लगता है कि कुछ विद्वान ही ऐसा कर पा रहे हैं।

कुछ ऐसे आलोचकों के बारे में आप बताएँ, जिन्होंने हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किए हैं या कर पा रहे हैं?

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की परम्परा में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. विजय मोहन सिंह, शिवकुमार मिश्र, मैनेजर पाण्डेय, सुधीश पचौरी, मधुरेश, पुष्पपाल सिंह, निर्मला जी हैं। निर्मला जैन जितनी विदुषी हैं, उसका स्वतंत्रउपयोग उन्होंने नहीं किया। निर्मला जी जैसी विदुषी ने अपनी एक स्वतंत्रसत्ता नहीं बनाई। कभी वो नामवर जी की आवाज लगीं, कभी नगेन्द्र जी की आवाज लगीं, कभी राजेन्द्र यादव की। उन्होंने इन लोगों से स्वतंत्रकिसी कृति की स्थापना नहीं की। हाँ, देवीशंकर अवस्थी और मलयज ने आलोचना में जिस स्वस्थ परम्परा की शुरूआत की, दुख इस बात का है कि वे असमय हमसे छिन गए। इन लोगों ने उन लोगों के लेखन की शक्ति को रेखांकित किया। जिनके नाम कुछ दिग्गजों ने कभी नहीं लिये।

हिन्दी के नए आलोचकों से आपकी उम्मीदें क्या हैं? किन लोगों में आपको संभावनाएँ दीखती हैं, जो आलोचना में नई चीजों को लेकर आ रहे हैं?

नए लोगों में अजय तिवारी, महेश दर्पण, देवेन्द्र चौबे, अरविन्द त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, अनामिका, पंकज चतुर्वेदी और इधर साधना अग्रवाल भी एक निष्पक्ष समीक्ष्य दृष्टि विकसित कर रही हैं। अच्छी बात यह है कि ये लोग किसी एक खाँचे से पोषित पल्लवित नहीं हो रहे। इनका मेग्नीफाइन ग्लास सूक्ष्म से सूक्ष्म पक्षों की परिणितियों को भी दृष्टि में रखता है और ये चरित्रों के दबावजन्य प्रभावों और उनसे उपजी मनोवैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन गहरी संवेदना और सरोकारों के साथ जिस तरह चलनी से चाल कर, निथारकर जिस तरह से हमारे सामने रखते हैं, किसी भी रचना या कृति को, सहमतियों और असहमतियों के बावजूद-उसके निकट से निकटतर होने का पाठकीय अवसर उपलब्ध होता है, जो दुराग्रह जनित नहीं लगता है।


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Saturday, January 10, 2009

अम्बेडकर के विचारों की अभिव्यक्ति ही दलित साहित्य है : ओमप्रकाश वाल्मीकि



डॉ. शगुफ्ता नियाज
पारिवारिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइये?
मैं, बरला, मुजफ्फर नगर के एक साधारण परिवार में पैदा हुआ और उन दिनों दलित परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। जो स्कूल जाने की कोशिश करते थे, उनको जाने नहीं दिया जाता था। जो जाना भी चाहते थे, उनको रोकने की कोशिश की जाती थी। जो पहुँच जाते थे, उनको भगाने की कोशिश की जाती थी। शिक्षकों की मानसिकता जातिवादी होती थी और वे ऐसा कोई मौका नहीं चूकते थे जहाँ वे जाति के आधार पर अपमानित किया जा सके। बचपन की ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जिनका चित्रण मैंने जूठन में किया है जो दलित जीवन के दग्ध अनुभव हैं। ऐसी स्थितियों में शिक्षा पाना बहुत मुश्किल होता था। परिवार की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं होती थी कि शिक्षा ग्रहण कर सके। इन हालात में शिक्षा पाकर साहित्य की तरफ मुड़ना बहुत ही मुश्किल काम था, लेकिन मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ता रहा मेरे मन में साहित्य के प्रति आकर्षण भी बढ़ा और साहित्य ने ही मुझे हीनता-बोध से बाहर निकाला और जब मैं ७-८वीं कक्षा में था, तभी से कविता, कहानी लिखने की कोशिश करने लगा था, लेकिन सही दिशा मुझे मिली जब मैंने महाराष्ट्र में दलित पेंथर के आन्दोलन को बहुत करीब से देखा और डॉ. अम्बेडकर के जीवन दर्शन को अपनी व्यथा-कथाओं में अभिव्यक्त करने की प्रेरणा मिली।

आपकी नजरों में दलित कौन है? शब्द दलित क्यों और कब प्रचलन में आया?

अगर सीधे-सीधे दलित को परिभाषित किया जाये, तो दलित वह है, जिसे संविधान में अनुसूचित जाति, जनजाति कहाँ गया है और जिसे सामाजिक जीवन में उसके मानवीय हक़ों से दूर रखा गया है। वर्ण-व्यवस्था में जो अस्पृश्य, अन्त्यज, अछूत है, वही दलित है।
दलित शब्द डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन से बाहर आया है और इसे राष्ट्र स्तर पर स्वीकार किया गया। ऐसा पहली बार हुआ है कि दलितों ने दलितों द्वारा अपने लिए किसी शब्द को चुना। अभी तक जितने भी शब्द दिये गये थे, वे तमाम शब्द गैर दलितों द्वारा दिये गये थे, इस शब्द ने उनकी आकांक्षा और अस्मिता को एक पहचान दी है। इस शब्द का प्रचलन तब और अधिक बढ़ा जब मराठी दलित साहित्य आन्दोलन का सूत्रापात हुआ। आज यह शब्द संघर्ष का प्रतीक बन गया है।


आपकी दृष्टि में दलित साहित्य क्या है? दलित साहित्य के सैद्धान्तिक पक्ष पर अपनी राय प्रकट कीजिए?


दलित साहित्य वही साहित्य है जिसमें दलितों की पीड़ा की अभिव्यक्ति हो और जिसकी अन्तर्ऊर्जा में दलित चेतना का समावेश हो। दलित चेतना का केन्द्र बिन्दु हजारों साल का उत्पीड़न, शोषण है और उससे मुक्त होने की कोशिश ही दलित चेतना है। दलित चेतना का सरोकार डॉ. अम्बेडकर के जीवन संघर्ष से जुड़ता है। इसीलिए हम यूं भी कह सकते हैं कि जिस साहित्य में अम्बेडकर विचार हो वही दलित साहित्य है। अम्बेडकर के विचार से विहीन साहित्य, भले ही वह लिखा हो किसी दलित ने वह हरिजन साहित्य हो सकता है, लेकिन दलित साहित्य नहीं हो सकता है। यदि कोई गैर दलित इस विचार के तहत अपनी रचनाधर्मिता की अभिव्यक्ति करता है तो उसे भी हम दलित साहित्य कह सकते हैं। लेकिन गैर दलित को जातीय भावना से मुक्त होना चाहिए, वर्ण व्यवस्था में अटूट विश्वास रखने वाला कोई लेखक दलित साहित्य लिखेगा तो वह सिर्फ दिखावा ही होगा।

हिन्दी साहित्य के सौन्दयशास्त्र और दलित साहित्य के सौन्दय शास्त्र में आपको कोई भेद लगता है। अगर लगता है तो बताने का कष्ट करें।

हिन्दी साहित्य का सौन्दयशास्त्र संस्कृत के काव्य शास्त्र के आधार पर तैयार किया गया है। जिसके तहत उसकी तमाम मान्यताएं सामंतवादी हैं और उसके जीवन मूल्य ब्राह्मणवादी विचारधारा से संचालित होते हैं। उस साहित्य में आनन्द और रस की जो महत्ता स्थापित होती है, उसे दलित साहित्य स्वीकार नहीं करता है। दलित साहित्य आनंद के लिए नहीं लिखा जाता है, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्राता, समता, भाई चारे की भावना को महत्ता देता है और उसके केन्द्र में मनुष्य ही सर्वोपरि है। उन तमाम मान्यताओं का विरोध करता है, जिनमें महाकाव्यों का नायक उच्च कुलोत्पन्न होना चाहिए। ऐसी तमाम चीजों को दलित साहित्य स्वीकार नहीं करता साथ ही भारतीय समाज व्यवस्था जो वर्ण व्यवस्था से संचालित होती है। उसे मनुष्य विरोधी मानता है।

आपकी दृष्टि में दलित-चेतना क्या है?

जैसा कि उससे पहले कहा गया है कि दलित चेतना हजारों साल के उत्पीड़न से मुक्त होने की इच्छा ही दलित चेतना है।

दलित लेखन में दलित लेखकों और गैर-दलित लेखकों की अपनी-अपनी भूमिकाएँ क्या हैं? क्या ग़ैर दलित लेखक दलित साहित्य के प्रति पूर्व धारणा से ग्रस्त है साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डालने का कष्ट करेंगे कि क्या दलित साहित्यकारों पर सवर्ण विचारधारा का प्रभाव है?
दलित लेखन में दलित लेखकों और गैर दलित लेखकों की भूमिकाएँ अलग-अलग ही हैं। अभी तक जो हिन्दी साहित्य में गैर दलित लेखकों द्वारा लिखा गया साहित्य सामने आया है उसका मुख्य स्वर यथास्थिति बनाए रखने का है। वह आदर्शवादी और सुधारवादी दृष्टिकोण के तहत लिखा गया है, और एक मुख्य बात है कि उन रचनाओं में दलित व्इरमबज की तरह इस्तेमाल हुए हैं, ...की तरह नहीं। जहाँ ... की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है, वहाँ भी दलितों के आन्तरिक चित्रण का अभाव दिखाई पड़ता है। दलित लेखकों ने दलित पात्रों को ...की तरह लिखा और उनकी सामाजिक भूमिकाओं को प्रतिबद्धता के साथ चित्रित किया है। जहाँ तक दलित साहित्यकारों पर सवर्णों के प्रभाव का कारण है। दलित साहित्य के पूर्व अनेक रचनाकार उसी प्रभाव में आकर लेखन कार्य कर रहे थे। आज भी ऐसे अनेक जन्मा दलित लेखक हैं जो कहते हैं वे दलित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनाओं में सवर्ण-सोच का प्रभाव दिखायी पड़ता है, उनकी रचनाओं में दलित चेतना और दलित-संघर्ष का अभाव साफ-साफ देखा जा सकता है।

सदियों का सन्ताप और बस बहुत हो चुका आपके दो कविता संग्रह है। सलाम एवं घुसपैठिए आपके कहानी संग्रह है तथा जूठन आपकी आत्मकथा है। दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र पुस्तक भी आपने लिखी है। मैं जानना चाहती हूं कि आपको दलित साहित्य की रचना करने में कौन-कौन सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्या सवर्णों के अलावा आपके अपनों ने भी आपको आहत किया?

जब मैंने लिखना शुरू किया तो बहुत सारी कठिनाइयाँ और चुनौतियाँ मेरे सामने थीं। छपने-छपाने की समस्याओं से भी जूझना पड़ा। उस समय की चर्चित पत्रिका सारिका ने दस वर्ष तक मेरी कहानी अपने पास रखकर लौटाई थी इस आशय के साथ यदि और इन्तजार कर सकते हैं तो भेज दीजिए हम उसे छापेंगे। अब आप इसी से अन्दाज लगा सकते हैं कि हिन्दी सम्पादकों का रवैया दलित लेखक के साथ कैसा रहा, किसी भी लेखक के लिए दस वर्ष बहुत होते हैं लेकिन सम्पादकों को यह करते समय कतई शर्मिन्दगी नहीं हुई और वे लगातार दलित रचनाओं के साथ यही करते रहे। जहाँ तक अपनों का सवाल है, ऐसे कई दलित प्रकाशक थे जिनके पास मैं अपनी पुस्तकें लेकर गया, लेकिन वहाँ भी जातिवाद कुण्डली मारे बैठा था और दलित लेखकों में मैं अकेला लेखक था जिसकी कोई भी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई थी।


दलित कविता लिखने का विचार आपके मन में कब और कैसे आया?
मैंने अपने बचपन में ही इस बात को महसूस कर लिया था कि हमारा समाज तमाम प्रताड़नाओं, उत्पीड़न, शोषण को चुपचाप सह रहा है। ऐसा नहीं है कि उसको बयान नहीं करते थे। वे अपने घरों में या बिरादरी के छोटे-मोटे समारोहों या कार्यक्रमों में शोषण के खिलाफ बोलते थे। लेकिन उनकी आवाज अनसुनी रह जाती थी, और जब मेरा परिचय साहित्य से हुआ तो मुझे लगा कि साहित्य ही इस आवाज को दूसरों तक पहुंचा सकता है। मैंने बचपन में ही कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं।

कहानी लिखने के पीछे कौन-सा दर्द छिपा है?

कहानी लिखने के पीछे भी वही स्थितियाँ मौजूद थीं जो बात कविता में सीधे-सीधे नहीं कही जा सकती है। वह कहानी के माध्यम से ज्यादा आसानी से लोगों तक जा सकती है। जीवन का यथार्थ, उसके उसी रूप में, जैसा मौजूद है, पाठकों तक पहुंचाने में कहानी विधा की अपनी महत्ता है। जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। कथाकथन कार्यक्रमों के माध्यम से ये अनुभव और ज्यादा गहरे हुए थे। दिल्ली की दलित बस्तियों में राजेन्द्र यादव जी के साथ ऐसे अनेक कार्यक्रम हुए जहां आम आदमी सीधे कहानियों से जुड़ता था।

डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गाँधी में से प्रेमचन्द पर किसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। क्या प्रेमचन्द का कुछ लेखन दलितों के लिए समर्पित है?

प्रेमचन्द पर गाँधी के प्रभाव से पहले आर्य समाज का प्रभाव था। उनकी बहुत सारी रचनाएं आदर्शवाद की मानसिकता के साथ लिखी गईं। बाद में वे गाँधी जी के प्रभाव में आते हैं और कर्मभूमि, रंगभूमि जैसी रचनाएं लिखते हैं। अम्बेडकर का प्रभाव उन पर सीधे-सीधे नहीं दिखाई देता लेकिन सामाजिक दबाव के तहत उन्होंने कुछ ऐसी कहानियाँ लिखीं, जिन पर अम्बेडकर का प्रभाव साफ दिखाई पड़ता है। उदाहरण के तौर पर ठाकुर का कुंआ, दूध का दाम और मंत्र जैसी कहानियाँ अम्बेडकर के प्रभाव की कहानियाँ हैं। लेकिन ३५० कहानियों में से तीन-चार कहानियाँ लिखकर वे दलित के प्रति समर्पित नहीं हो सकते। उनकी ज्यादातर कहानियाँ गाँधीवादी प्रभाव के सुधारवादी दृष्टिकोण की कहानियाँ हैं।

दलित साहित्य के बारे में हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचकों का नजरिया क्या है?

आरम्भिक दौर में हिन्दी के आलोचकों का नजरिया दलित साहित्य के प्रति नकारात्मक ही रहा है। आज भी ऐसे अनेक आलोचक हैं जो दलित साहित्य को साहित्य मानने को तैयार नहीं हैं। लेकिन दलित साहित्य को ऐसे आलोचकों की स्वीकृति की जरूरत नहीं है, क्योंकि दलित साहित्य का फलक व्यापक है। वह समाज की बेहतरी के लिए समर्पित है और समाज में बदलाव की प्रक्रिया का समर्थक है। उसका उद्देश्य भिन्न है। जो लोग भारतीय समाज व्यवस्था के समर्थक हैं उन्हें दलित साहित्य क्यों स्वीकार होगा। ऐसे आलोचक ब्राह्मणवादी मानसिकता के साथ साहित्य को पढ़ते हैं।

दलित विमर्श पर आज लगभग हर पत्रिका अपने विशेषांक निकाल रही है। क्या दलित विशेषांक निकालने वालों के यथार्थ से अवगत करायेंगे साथ ही यह भी बताना चाहेंगे कि दलित विमर्श के पीछे का विमर्श क्या है?

हाँ, प्रत्येक पत्रिका दलित विशेषांक निकाल रही है लेकिन उनमें से बहुत सारी पत्रिकायें हैं, जो आज भी दलित रचनाकारों को छापने का मन नहीं बना पा रही हैं। बल्कि उनके विरोध में ही कभी टिप्पणियाँ, कभी लेख प्रकाशित करने में पीछे नहीं हैं। इसीलिए ऐसे सम्पादकों के तमाम गठजोड़ कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते हैं। ऐसे सम्पादकों को अवसरवाद के बजाए पहले अपनी मानसिकता को बदलना होगा और दलित विमर्श में सक्रिय भागीदारी करनी होगी। दलित विशेषांक निकालने से पहले दलित रचनाओं को स्थान देना होगा। दलित साहित्य के उद्देश्य को भी समझना होगा।

दलित और स्त्री दोनों ही सामाजिक शोषण के शिकार रहे हैं। क्या आप इससे सहमत है?

हाँ, बिलकुल सहमत हूँ। मैं स्वयं इस बात को मानता हूँ जिन स्थितियों से दलितों को गुजरना पड़ा है। उन्हीं स्थितियों से स्त्रियाँ भी गुजर रही हैं। दलित यदि मन्दिरों में नहीं जा सकते हैं तो दक्षिण के एक मन्दिर में स्त्री के प्रवेश को लेकर हंगामा मचा हुआ है। दलित के भगवान की मूर्ति छू लेने से भगवान अपवित्रहो जाते हैं वही स्थिति महिलाओं की भी है। दक्षिण ही नहीं उत्तर भारत में अनेक ऐसे मन्दिर हैं जहाँ स्त्रियों के प्रवेश को निषेध किया गया है। घरेलू स्तर पर भी स्त्रियों के अधिकार नगण्य हैं। उन्हें पांव की जूती मानने वालों की कमी नहीं। तरह-तरह के बंधनों में उन्हें जकड़ा हुआ है और यह सब धर्म और संस्कृति के नाम पर होता है।

दलित साहित्य को लेकर आपकी भविष्य में क्या रणनीति है और क्या योजना है?

दलित साहित्य को लेकर भविष्य में रणनीति और योजना को लेकर इस तरह अभिव्यक्ति नहीं किया जा सकता है। किसी एक लेखक के करने से कुछ नहीं होता। एक समूह होता है लेखकों का। वह अपनी रचनाओं के माध्यम से आने वाले समय को तय करता है।

वरिष्ठ दलित साहित्यकारों ने मार्ग तैयार किया है उस पर चलने के लिए उभरते दलित रचनाकारों का आप कैसे मार्ग दर्शन करना चाहेंगे?
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भरते रचनाकारों को अपनी दृष्टि को साफ करने के लिए अपनी अध्ययनशीलता को बढ़ाना होगा और साहित्य के सरोकारों को गम्भीरता के साथ विश्लेषण करके समझना होगा। आज जिस तरह से स्थितियां बदल रही हैं, उनमें कई तरह की चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। उन चुनौतियों को दूर करना और अपनी प्रतिबद्धता के द्वारा समाज में बदलाव की प्रक्रिया को, रचनाओं के द्वारा रेखांकित करना होगा।

क्या हिन्दी दलित साहित्य पर मराठी दलित साहित्य का प्रभाव है?

दलित साहित्य की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई है और डॉ. अम्बेडकर का आन्दोलन भी पहले महाराष्ट्र में शुरू हुआ और इसके बाद ही देश के अन्य राज्यों में उसका विस्तार हुआ। इस विस्तार के कारण ही हिन्दी में दलित साहित्य का विकास हुआ और यह कोई अनुचित बात नहीं है। एक जगह से दूसरी जगह पर साहित्य का प्रभाव पड़ता है। हिन्दी में इससे पूर्व ऐसी घटनाएं हुई हैं। भक्ति काव्य दक्षिण के प्रभाव से शुरू हुआ। छायावाद पर यूरोप के रोमान्टिक प्रभाव को देखा जा सकता है। निराला पर विवेकानन्द और रामकृष्ण परमहंस का प्रभाव देखा जा सकता है। प्रेमचन्द पर आर्य समाज का प्रभाव, गाँधीवाद का प्रभाव देखा जा सकता है। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद पर मार्क्स का प्रभाव देखा जा सकता है। जनवादी दौर की तमाम कहानियाँ वामपंथी प्रभाव से मुक्त नहीं हैं।

आप कहानियाँ लिखते हैं आप अपनी कहानियों के माध्यम से शोषितों को क्या संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, विस्तार से बताने का कष्ट करेंगे, साथ ही यह भी बताने का कष्ट करेंगे कि समाज में घुसपैठिए कहाँ-कहाँ पर मौजूद हैं?


कहानी मैं सिर्फ शोषितों के लिए नहीं लिख रहा हूँ। मैं कहानियाँ लिख रहा हूँ शोषितों के दर्द को, उनकी वाणी को शब्द देने के लिए ताकि शोषकों के छद्म और शोषण की सही-सही तस्वीर साहित्य के माध्यम से लोगों तक जा सके। वे तमाम लोग जो ये कहते हैं कि देश में जातिवाद नहीं है उन्हें बताया जा सके कि देश में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं और जहाँ तक घुसपैठियों का सवाल है ऐसे लोगों की कमी नहीं है। जो दलितों की हर-एक गतिविधि को अपने कार्य क्षेत्रों में अनावश्यक घुसपैठ मानते हैं। जबकि यह उनकी घुसपैठ नहीं, बल्कि ये उनका मौलिक अधिकार है कि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकें।
कुछ दलित साहित्यकार अपने को डॉ. अम्बेडकर से भी बड़ा स्थापित करने की जुगाड़ में रहते हैं? उनसे दलित साहित्य का कितना भला होगा।

ऐसे लोगों से साहित्य का भला तो बाद की बात है, वे पहले अपने को ही बड़ा बना लें और यदि कोई व्यक्ति डॉ. अम्बेडकर से अपने को ही बड़ा बना लेता है तो यह हीनता की नहीं गर्व की बात होगी लेकिन उससे पहले उसे अपने इर्द-गिर्द अच्छी तरह से देख लेना चाहिए कि वह कहाँ खड़ा है। झूठ ज्यादा दिन नहीं चलता, मुखौटे में भी चेहरा तो दिखायी दे ही जाता है।
साहित्य में दलित विमर्श क्या है? साहित्य में यह कब प्रारम्भ हुआ और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है?

साहित्य में दलित विमर्श से सीधा-सीधा तात्पर्य दलित साहित्य आन्दोलन और अम्बेडकर विचारधारा से है। इसका सूत्रपात डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन से हुआ जो आज भी जारी है। यह विमर्श दलित मुक्ति से जुड़ा है।
दलित आन्दोलन का दलितों के व्यापक धरातल पर क्या कोई प्रभाव पड़ रहा है? अगर पड़ रहा है तो किस प्रकार?

बिलकुल पड़ रहा है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दलितों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की है। जिसकी प्रेरणा उन्हें दलित आन्दोलन से ही मिली है और भविष्य में भी इसके सकारात्मक परिणाम दिखायी देंगे। आज दलितों में मुक्ति की छटपटाहट बढ़ी है। वे समाज में समता, बंधुता के लिए संघर्षरत हैं और यह सब दलित आन्दोलन से प्रेरित होकर हुआ है, इसमें दलित साहित्य ने सकारात्मक भूमिका निभायी है।

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Monday, January 5, 2009

उत्तर-आधुनिकतावाद को एक मुहावरे के रूप में अपनाये जाने से हिन्दी आलोचना का कोई ज्यादा भला होने वाला नहीं है : प्रो. मैनेजर पाण्डेय


देवेन्द्र चौबे, अभिषेक रौशन, उदय कुमार एवं रेखा पाण्डेय
प्रो. पाण्डेय, देरिदा कहते हैं कि इतिहास एक पाठ है, उसका कोई निश्चित अर्थ नहीं होता है। देरिदा की इस धारणा के आलोक में उत्तर-आधुनिकता के बारे में आप क्या सोचते हैं?
देखिए, एक तो देरिदा खुद को उत्तर-आधुनिक नहीं मानते, और वैसे भी उत्तर आधुनिकतावाद का कोई सुनिश्चित अर्थ नहीं है। उत्तर-आधुनिकतावाद के बहुत सारे विचारक या कहिए कि जिनको उत्तर-आधुनिकतावाद का विचारक माना जाता है, उनमें से अनेक लोगों ने यह स्वीकार किया है कि हम उत्तर-आधुनिकतावादी नहीं हैं। इसलिए एक तो देरिदा के इस कथन को उत्तर-आधुनिकतावादी कथन नहीं माना जा सकता। इस कथन की अलग से व्याख्या और उस पर बात की जाए, यह समझ में आता है। आपके सवाल से एक बात यह भी जुड़ी हुई है कि जैसे देरिदा के इस कथन में सबसे अधिक महत्त्व अनिश्चितता को या .... को दिया गया है कि पाठ का कोई निश्चित अर्थ नहीं होता, उसी तरह उत्तर-आधुनिकतावाद को अधिकांश स्थापनाओं के बारे में यह कहा जा सकता है कि उनका भी कोई निश्चित अर्थ नहीं है। इसलिए उत्तर-आधुनिकतावाद की तरह-तरह की व्याख्याएँ प्रचलित हुई हैं, बल्कि मैं अतिरंजना का खतरा उठाते हुए यह कह सकता हूँ कि उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जितने मुँह उतनी बातें सुनाई पड़ती हैं। अब रही बात देरिदा के उस कथन की, तो उस कथन को दो-तीन संदर्भों में समझने की जरूरत है। पाठ के रूप में अब तक हम लोग लिखित पाठ जानते हैं और दर्शन के प्रसंग में यह परंपरा लम्बे काल से बनी हुई कि पुराने पाठों की नई व्याख्या करते हुए नई दार्शनिक दृष्टि का विकास होता रहा है; और मेरा ख्याल है कि जॉक देरिदा की मान्यता के मूल में दर्शन की यह परम्परा मौजूद है। पाठ का दूसरा रूप साहित्यिक कृतियों में दिखाई देता है। उत्तर-आधुनिकतावादी लेखक को महत्त्व नहीं देते। स्वयं दो विचारकों ने, रोलाबार्थ और फूको ने लेखक के बदले पाठ को महत्त्व दिया है, या बल्कि रोलाबार्थ का तो यह कथन है कि लेखक की मृत्यु की कीमत पर ही पाठ और पाठक का महत्त्व स्थापित हो सकता है। तब पाठ से पाठक का सम्बन्ध ही आलोचना का केन्द्रीय तत्त्व होगा, पाठ से लेखक का सम्बन्ध नहीं। ऐसी स्थिति में, पाठक तो बदलते रहते हैं। हर युग के नए पाठक पुरानी रचनाओं का पुराने पाठों का नया अर्थ करते हैं। इसलिए जॉक देरिदा के इस कथन का एक अभिप्राय साहित्यिक पाठों के अर्थ की अनेकता भी है। आगे एक और स्तर पर इस बात को देखा जा सकता है। सबसे अधिक परेशानी यह है कि जॉक देरिदा सब कुछ को पाठ मानते हैं। ...तो इसका मतलब है कि संसार की घटनाएँ, स्थितियाँ ये सब पाठ हैं। अब यहीं से खतरनाक अर्थ की शुरूआत होती है। मान लीजिए कि उनके अनुसार हम मान लें कि इराक पर अमेरिकी हमला की घटना एक पाठ है, तो इतनी दूर तक तो सही होगा कि उसका एक अर्थ जार्ज बुश अपना लगाते हैं और दूसरा अर्थ इराक की जनता लगाती है और दोनों अर्थों की टकराहट हो रही है इतिहास की प्रक्रिया में। पर सवाल यह है कि वह दोनों में से किसी एक अर्थ को स्वीकार करें, क्योंकि यह कहना काफी नहीं होगा कि इस घटना रूपी पाठ के दो अर्थ हैं, बल्कि दो अर्थ कहने का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए यह तो बाहर बैठे आदमी को बताना ही पड़ेगा कि वह किस अर्थ को सही समझता है। इसलिए जॉक देरिदा के इस कथन में अर्थ की अनिश्चितता के साथ-साथ विचारक की नैतिक स्थिति की भी अनिश्चितता है और ऐसी स्थिति में अर्थ का अनर्थ होने लगता है। मान लीजिए कि हम बाबरी मस्जिद के ध्वंश को भी एक घटना और पाठ के रूप में देखें तो उसका एक अर्थ हिन्दूवादी लोग करते हैं, दूसरा अर्थ मुसलमान करते हैं और तीसरा अर्थ इस देश के लोकतांत्रिक चेतना वाले लोग करते हैं और यह कहना कि तीनों अर्थ बराबर सही हैं कुछ भी कहना नहीं है, बल्कि अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचना है। इसलिए जॉक देरिदा के पाठ में फिसलन की संभावना बहुत है और इस तरह के मुहावरेदार वाक्यों के ऐसे ही खतरे हुआ करते हैं।
आज भारत में विचारधाराओं को लेकर जो सारी बहसें हो रही हैं उसमें उत्तर-आधुनिकतावाद से संबंधित बहस को आप किस रूप में देखते हैं?
देखिए, जहाँ तक मुझे मालूम है कि हिन्दुस्तान की बहुत सारी भाषाओं में उत्तर आधुनिकतावाद के बारे में बातें हो रही हैं, बहसें हो रही हैं, हम उनको नहीं जानते, आप भी नहीं जानते। दो भाषाएँ ऐसी हैं जिनमें होने वाली बहसों से हम परिचित हैं, एक तो हिन्दी दूसरी भाषा है अंग्रेजी। अंग्रेजी में जो उत्तर-आधुनिकतावाद से संबंधित बहसें हैं, वह पश्चिम में होने वाली बहसों का विस्तार हैं। मुझे हिन्दुस्तान के किसी अंग्रेजी लेखक की ऐसी किताब या ऐसा लेख पढ़ने को नहीं मिला है जो उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में कोई नई बात कहता हो। हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद पर जो बहस है वह और भी खराब स्तर की है। हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद पर कोई गंभीर बहस हुई ही नहीं है, न तो उसकी व्याख्या करने वाली बहस, न उसके पक्ष को ठीक से प्रस्तुत करने वाली बहस और न उसका विरोध करने वाली बहस; बल्कि मैं तो अभी यही कह सकता हूँ कि हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जो कुछ लिखा गया है वह बहुत कुछ पश्चिम में और वह भी अंग्रेजी के माध्यम से उत्तर-आधुनिकतावाद के बारे में जो बातें कही गयी हैं, उनकी पुनर्प्रस्तुति ही हिन्दी में हुई है। मतलब हिन्दी में जो उत्तर-आधुनिकतावाद पर लिखने वाले हैं उनमें सबसे अधिक तो सुधीश पचौरी ही लिखते रहते हैं और जाहिर है कि वे काफी उत्तर-आधुनिकतावादी भाषा में उत्तर-आधुनिकतावाद पर लिखते हैं। इसलिए उनके लेखन से भी उत्तर-आधुनिकतावाद का कोई स्वरूप लोगों के सामने स्पष्ट हुआ हो, ऐसा नहीं है। हाँ, इस बहस के प्रसंग में मैं यह जरूर कहूँगा कि असल में उत्तर-आधुनिकतावाद की बुनियादी बहस मार्क्सवाद से है। अपने यहाँ मार्क्सवादियों ने भी उत्तर-आधुनिकतावाद से पैदा हुए सवालों का कोई बहुत अच्छा उत्तर दिया हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। मेरी अपनी जानकारी में दो लोग हैं, एक तो प्रो. रणधीर सिंह और दूसरे एजाज अहमद, जिन्होंने उत्तर-आधुनिकतावाद पर गंभीरता से बहस करने की कोशिश की है मार्क्सवाद की ओर से बहस करने की कोशिश की है। इसलिए मैं कहूँगा कि अभी उत्तर-आधुनिकतावाद को ठीक से समझने-समझाने की जरूरत हिन्दी में बनी हुई है। देखिए, मैं विचार और आलोचना के प्रसंग में इस धारण को महत्त्व देता हूँ कि किसी भी विचार को अस्वीकार करने से बेहतर है कि उसको गलत साबित करना, अगर आपको वह गलत लगता है तो। क्योंकि अस्वीकार करने में कुछ बौद्धिक प्रयास नहीं लगता, गलत साबित करने में बौद्धिक प्रयास की जरूरत होती है। इसलिए हिन्दी में उत्साही मार्क्सवादियों ने उत्तर-आधुनिकतावाद को अस्वीकार करने का काम बहुत अधिक किया है और उसे गलत साबित करने का काम बहुत कम किया है।
उत्तर-आधुनिकतावाद के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि इससे स्थानीय स्वायत्तता और विकेन्द्रीकरण की जमीन मजबूत हुई है और उत्तर उपनिवेशवादी साहित्य, तीसरी दुनिया का साहित्य, नारी एवं अश्वेत लेखन, दलित साहित्य आदि केन्द्र में आए हैं। आप इस तर्क से कहाँ तक सहमत हैं?
देखिए, एक बात तो यह है कि हिन्दी में या सारी दुनिया में आपने जिन-जिन समस्याओं की चर्चा की है उन तीनों समस्याओं पर गंभीर बहसें उत्तर-आधुनिकतावाद के आने के बहुत पहले से चल रही हैं। मतलब स्त्रीकी स्वाधीनता और पराधीनता के प्रश्न पर बहस, भारतीय समाज के प्रसंग में दलितों की पराधीनता और स्वाधीनता पर बहस या फिर उसी से जुड़ा हुआ दलित साहित्य का प्रश्न और इसके साथ ही केन्द्र बनाम हाशिए का द्वंद्व, इन सब पर बहसें उत्तर-आधुनिकतावाद के आने के बहुत पहले से चल रही हैं। बात यह है कि उत्तर-आधुनिकतावाद केवल शब्द नहीं, बल्कि एक विचार प्रक्रिया के रूप में इतिहास पर आप ध्यान दें तो मालूम होगा कि कुल मिलाकर १९८० के आस-पास से इसकी शुरूआत होती है। थोड़ा पहले आप फूको को उसमें जोड़कर देखें तो थोड़ा और पीछे जाएँगे ७० के दशक में, अन्यथा सब लोग जानते हैं लेकिन स्त्रियों की स्वाधीनता के प्रश्न पर हम सारी दुनिया को छोड़ भी दें तो हिन्दी में ४० के दशक से बहस चल रही है कम या ज्यादे। मतलब महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक श्रृंखला की कड़ियाँ १९३५ के आस-पास उनके लिखे निबंधों का ऐसा संकलन है जो पुस्तकाकार १९४२ में छपा। मतलब हिन्दी में और हिन्दुस्तान में स्त्रियों की स्वाधीनता का सवाल देश की स्वाधीनता के सवाल से जुड़ा हुआ दिखाई देता है और उसके बाद आप देख सकते हैं हिन्दी में स्त्रियों की स्वाधीनता का एक बड़ा प्रमाण उनकी स्वतंत्र रचनाशीलता में दिखाई देता है। हिन्दी साहित्य में स्त्रियों को रचनाशीलता का इतिहास भी छिट-पुट ही सही बहुत पुराना है लेकिन व्यवस्थित रूप से उसकी शुरूआत नई कविता, नई कहानी के दौर से दिखाई देती है। अब रही बात दलित साहित्य की तो देखिए, हिन्दी में दलित साहित्य बाद में आया, पर मराठी में दलित साहित्य उत्तर-आधुनिकतावाद के बहुत पहले से स्थिर और स्थापित धारा के रूप में मौजूद है और हिन्दी के दलित लेखक उत्तर-आधुनिकतावाद से जितना परिचित हैं, प्रेरित हैं और प्रभावित हैं उससे बहुत अधिक वह मराठी के दलित लेखक से परिचित, प्रेरित और प्रभावित हैं। रही बात केन्द्र और हाशिए के द्वंद्व की, तो बहुत पहले बीसवीं सदी के दूसरे या तीसरे दशक की बात होगी, ...केन्द्र और हाशिए की बहस स्वयं आधुनिकतावादी विचार और रचनाशीलता में मौजूद रही है, इसलिए यह कहना कि उत्तर-आधुनिकतावाद के कारण स्त्रियों की स्वाधीनता, दलित लेखन या केन्द्र और हाशिए पर बहस की शुरुआत हुई उससे कोई दिशा मिली है मुझे एकदम ठीक नहीं लगता। हाँ, यह जरूर कहूँगा कि उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतन ने इन तीनों प्रसंगों में थोड़ी मद्द की है, क्योंकि पहले के दिनों में ये सब विवाद के विषय के उत्तर-आधुनिकतावाद ने इन सबके महत्त्व को नए रूप में स्थापित करने में मद्द की है। इसलिए व्यक्ति की स्वायत्तता, समुदायों की स्वतंत्रता और समाज में हाशिए पर रहने वाले लोगों की ताकत का अहसास, यह उत्तर-आधुनिकतावाद की मद्द से बेहतर रूप में समझा गया है। इसलिए मैं यह जरूर कहूँगा कि ये सारी बहसें पुरानी हैं, पर उत्तर-आधुनिकतावाद ने इन बहसों को नई धार देने में मद्द की है।
मार्क्सवादी चिंतन का आधार आर्थिक विश्लेषण था। उत्तर-आधुनिकतावाद आर्थिक पक्ष के प्रति उदासीन है। क्या यह सही नहीं है कि आर्थिक पक्ष के प्रति उदासीनता के कारण ही मार्क्सवादी विचारक उत्तर-आधुनिकतावाद की आलोचना करते हैं?
हाँ, पर बात सही है। देखिए, उत्तर-आधुनिकतावाद असल में सामाजिक संरचना को महत्त्व नहीं देता और इसीलिए वह वर्ग को भी महत्त्व नहीं देता। मुझे तो लगता है कि यह उत्तर-आधुनिकतावाद का एक अंतर्विरोध है कि आप सुबह से शाम तक हाशिए के लोगों की बात तो करें, पर सर्वहारा की बात आते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगें। स्वयं पूँजीवादी व्यवस्था के हाशिए पर रहता है सर्वहारा वर्ग। लेकिन मार्क्सवादियों ने असल में जब उत्तर-आधुनिकतावाद की आलोचना की है तो इसलिए भी की है कि उत्तर-आधुनिकतावादी, सामाजिक, राजनीतिक द्वंद्व, संघर्ष और किसी भी तरह से मुक्ति के प्रयास को महत्त्व नहीं देते। वे बल्कि अधिक से अधिक द्वंद्व को विचार के स्तर तक स्वीकार करते हैं; बहस के स्तर पर उसको मानते हैं, लेकिन सामाजिक व्यवहार में भी उसको लागू करना जरूरी है यह वे स्वीकार नहीं करते और तब मुझे वाल्टर बेंजामिन का एक कथन याद पड़ता है कि पूँजीवाद और सर्वहारा के बीच लड़ाई विचारकों के दिमाग में नहीं, समाज में होती है। पर समाज में जो लड़ाई होती है वह लड़ाई किसी भी तरह से उत्तर आधुनिकतावादियों को स्वीकार नहीं। मुझे फूको का एक ... याद पड़ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था कि एक स्तर पर हम सब लोग आंतरिक द्वंद्व से गुजरते हैं। अब दिमाग के भीतर द्वंद्व हो यह वे मानते हैं लेकिन समाज में वह द्वंद्व हो और निर्णायक दौड़ तक पहुँचे, यह उनके लिए महत्त्व की बात नहीं है। वे यह बात पहली बार थोड़े कह रहे हैं। बहुत पहले जयशंकर प्रसाद कामायनी में कह चुके हैं कि -
देवों की विजय दानवों की
हारों का होता युद्ध रहा
संघर्ष सदा उर अन्तर में
जीवित रह नित्य विरुद्ध रहा।
मतलब यह कि मनुष्य की चेतना के भीतर अच्छी प्रवृत्तियों और बुरी प्रवृत्तियों जिसको वे दैवी और आसुरी प्रवृत्तियाँ कहते हैं उनके बीच द्वंद्व चलता ही रहता है। जयशंकर प्रसाद के इस कथन के लगभग ५०-६० साल बाद बहुत नई बात की तरह जो फूको ने कहा वह वही है जो जयशंकर प्रसाद कह चुके। इसलिए मार्क्सवादी जब उत्तर-आधुनिकतावाद का विरोध करते हैं तो इसलिए भी कि उत्तर-आधुनिकतावादी मुक्ति को किसी धारणा और कोशिश को महत्त्व नहीं देते। उत्तर-आधुनिकतावादी दिमागी गुलामी की बात तो करते हैं पर सामाजिक और राजनीतिक गुलामी की बात नहीं करते और उस तरह की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए जो संघर्ष है उसको भी महत्त्व नहीं देते। इसलिए बहुत लोगों का ख्याल है कि उत्तर-आधुनिकतावाद ने एक तरह से संघर्षशील चेतना को लकवाग्रस्त करने का प्रयास किया है कि हर चीज केवल बौद्धिक बहस तक सीमित रह जाए। समाज में जो संघर्ष है और द्वंद्व हैं वह केवल बौद्धिक बहसों से हल नहीं होंगे।
उत्तर-आधुनिकतावादी मजदूरी को सेवा का नाम देते हैं इस पर आपकी कोई टिप्पणी....।
फ्रांस के एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री थे। अभी उनकी क्मंजी हुई है। उन्होंने कहा है कि पंडिताऊ शास्त्रार्थ की प्रवृत्ति उत्तर-आधुनिकतावाद में दिखाई देती है। मतलब यह कि मजदूरी को सेवा कहना, उसमें से शोषण के बोध को गायब करना। शोषण का बोध नहीं होगा तो संघर्ष की संभावना भी नहीं होगी। इसीलिए मैं बार-बार कहा करता हूँ कि उत्तर-आधुनिकतावाद असल में पूँजीवाद के वर्तमान दौड़ की रक्षा करने वाली विचारधारा है।
उत्तर-आधुनिकतावादी कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग खत्म हो गया वे सब मध्य वर्ग में शामिल हो गए हैं। उनकी इस मान्यता पर आपका क्या सोचना है?
अरे,मतलब सपने में ऐसा हो गया होगा। सपनों पर तो मेरा नियंत्रण नहीं है।जाकर पूछना चाहिए कि भारत जैसे देश में जहाँ लाखों मजदूर बेकार हैं और दस हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है ये जीवन से मुक्त होकर मध्य वर्ग में शामिल हुए हैं क्या? इस मूर्खतापूर्ण मान्यता पर मैं क्या कह सकता हूँ। आप उन किसानों से जाकर अब तो खैर कैसे पूछेंगे आप, जिन्होंने आत्महत्या कर ली। उनके घर-परिवार के लोग बता सकते हैं कि वे मध्य वर्ग में शामिल हुए हैं या प्रेतों में शामिल हो गए हैं।यह बहुत ही भ्रामक, मैं कह सकता कि छल-छद्म से भरी हुई बातें हैं।
हिन्दी आलोचना में एक दौर ऐसा था जब आधुनिकता और-आधुनिकतावाद की चर्चा थी। आज उत्तर-आधुनिकतावाद की चर्चा जोरों पर है। आधुनिकता और-आधुनिकतावाद से उत्तर-आधुनिकतावाद की यह यात्रा साहित्य और समाज की वास्तविकताओं से कितना जुड़ा है?
भई देखो, बात यह है कि यह तो मैं मान सकता हूँ कि आजकल हिन्दी आलोचना में उत्तर-आधुनिकतावाद की चर्चा बहुत है, लेकिन मेरी जानकारी में हिन्दी में कोई उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना नहीं है, मैं सुधीश पचौरी को याद करते हुए यह बात कहना चाहता हूँ। उसका एक कारण है कि उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता भी हिन्दी में अभी उस तरह से विकसित नहीं हुई है जिसकी उत्तर-आधुनिकतावादी औजारों से ही व्याख्या करने की स्थिति बनती हो। इसलिए यह पूरी बहस ठोस आलोचना पर होने के बदले केवल विस्तार के स्तर पर मौजूद है। लेकिन आधुनिकता और आधुनिकतावाद से संबंधित जो बहस थी वह गहरे स्तर पर आलोचनात्मक बहस थी। क्योंकि आधुनिकता रचनाशीलता और-आधुनिकतावादी रचनाशीलता के विकास के साथ-साथ आधुनिक और-आधुनिकतावादी आलोचना का भी विकास हुआ। हिन्दी में उसका क्षेत्र बहुत लम्बा है। आप उसको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक में देख सकते हैं और देखिए, जब आधुनिक कहा जाता है तो मैं तो मार्क्सवाद को भी आधुनिकता का ही एक रूप समझता हूँ। यद्यपि तब मार्क्सवादियों ने आधुनिकतावाद का विरोध किया लेकिन आधुनिक और-आधुनिकतावाद में फर्क करने की जरूरत है। मैं इसलिए आधुनिक विचारधाराओं के अन्तर्गत मार्क्सवाद को रखता हूँ, आधुनिकतावाद को इससे अलग रखता हूँ। जैसी रचनाशीलता, आधुनिकता और-आधुनिकतावाद के साथ हिन्दी में विकसित थी, वैसी रचनाशीलता और आलोचना अभी उत्तर-आधुनिकतावाद से प्रेरित-प्रभावित होकर हिन्दी में विकसित नहीं हुई है।
आपने एक साक्षात्कार में कहा है कि आलोचना को कोई वाद वहीं तक मद्द कर सकता है जहाँ तक वह रचना की अर्थवत्ता और सार्थकता समझने में सहायक हो। उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में यह बात कहाँ तक सच है?
देखिए, उत्तर-आधुनिकतावाद के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि यह हवा में तैरते विचारों को पकड़कर अपना व्यवसाय चलाने की कोशिश है। यह ठीक है कि मार्क्सवाद से या मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि से आप पुराने साहित्य की भी व्याख्या कर सकते हैं। लोगों ने कालिदास से लेकर भक्तिकाल होते हुए छायावाद तक की व्याख्या मार्क्सवादी दृष्टि से की है। मार्क्सवादी दृष्टि से गैर मार्क्सवादी रचनाओं की व्याख्या करना जिस तरह संभव है उसी तरह उत्तर-आधुनिकतावाद दृष्टि से गैर उत्तर आधुनिकतावादी और पुरानी रचनाओं की व्याख्या करना भी संभव है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब पहले उत्तर-आधुनिकतावाद की व्यवस्थित समझ विकसित हो। मेरी चिन्ता और शिकायत यह है कि अभी हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावाद की व्यवस्थित समझ ही पैदा नहीं हुई है। उत्तर-आधुनिकतावाद की एक स्थापना यह है कि साहित्य के प्रसंग में शास्त्रीय और लौकिक के बीच कोई फर्क नहीं है। ... अगर आप इसको रचना के स्तर पर देखना चाहें तो नागार्जुन की मंत्र कविता में इसको देखा जा सकता है। बाबा ने लौकिक और शास्त्रीय दोनों को मिलाने की कोशिश की है और बहुत सफल कोशिश की है। इस कोशिश के माध्यम से उन्होंने धारदार राजनीतिक समझ की कविता लिखी है मंत्र। अब कोई चाहे और उत्तराआधुनिकतावाद के भीतर लौकिक और शास्त्रीय के द्वंद्व और दोनों की एकता की जटिलता को समझता हो, तो वह नागार्जुन की इस कविता की ठीक से व्याख्या कर सकता है। लेकिन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए उत्तर- आधुनिकतावाद को एक मुहावरे के रूप में अपनाते जाने से हिन्दी आलोचना का कोई ज्यादे भला होने वाला नहीं है।
एक समय में मार्क्सवादी विचारधारा ने हिन्दी साहित्य की दिशा और दशा बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। क्या आपको लगता है कि उत्तर-आधुनिकतावाद वही भूमिका निभा पाएगा?
देखिए, ऐसा है कि मार्क्सवादी आलोचना ने हिन्दी आलोचना और हिन्दी साहित्य की दिशा बदलने में जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उसका एक कारण यह भी था कि मार्क्सवादी आलोचना केवल साहित्यिक दृष्टिकोण नहीं है। वह एक साथ साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण है और इस व्यापक दृष्टि के तहत मार्क्सवादी आलोचना ने हिन्दी साहित्य में हस्तक्षेप किया और उसकी दिशा बदलने में एक भूमिका निभाई। उत्तर-आधुनिकतावाद इस तरह की समग्रता को स्वीकार नहीं करता। दूसरी बात यह भी है कि मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का विकास अपने देश में जनसंघर्षों की लम्बी परंपरा से जुड़कर हुआ था और उसी प्रकार की रचनाशीलता भी विकसित हुई थी। हिन्दी में अभी उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का भी ठीक से विकास नहीं है। मैंने नागार्जुन की एक कविता का उल्लेख किया यद्यपि यह कविता लिखते समय नागार्जुन ने किसी उत्तर-आधुनिकतावाद को ध्यान में नहीं रखा था और वे जानते भी नहीं थे कि उत्तर-आधुनिकतावाद क्या है। सजग रूप से उत्तर-आधुनिकतावादी लेखक हिन्दी में मेरी जानकारी में एक ही है, वे हैं मनोहर श्याम जोशी, जो घोषित रूप से अपने उपन्यासों को उत्तर-आधुनिकतावादी मानते हैं और स्वीकार भी करते हैं। असल में जब तक हिन्दी में उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का विकास नहीं होगा तब तक उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना भी ठीक से विकसित नहीं होगी। इसीलिए मैं सारांश के रूप में कहूँ तो उत्तर-आधुनिकतावादी आलोचना दृष्टि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, यद्यपि वह मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का स्थानापन्न कभी नहीं बनेगी। लेकिन उसकी एक भूमिका हो सकती है बशर्तें कि एक तो स्वयं उत्तर-आधुनिकतावाद की शक्ति और सीमाओं का स्पष्ट बोध हो और दूसरे उत्तर-आधुनिकतावादी रचनाशीलता का भी विकास हो और तीसरे इन दोनों के बीच एक द्वंद्वात्मक संबंध का निर्माण हो।

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Sunday, January 4, 2009

अदब से ही रिश्ता बाकी रहा : जाबिर हुसेन

रामधारी सिंह दिवाकर
आपके रचनाकर्म पर मरगंगा में दूब किताब लिखते समय मुख्यतः आपकी कृतियां ही मेरे सामने थीं। आपके परिवार या आपकी वंश-परंपरा के विषय में जानने की कोशिश मैंने नहीं की। अब चाहता हूं कि आपकी जिंदगी के कुछ अनजाने पक्ष भी हमारे सामने आयें। क्या आप अपने और अपने परिवार के विषय में कुछ बताना चाहेंगे?
मैंने अपने बारे में बहुत कम लिखा या कहा है, बल्कि नहीं के बराबर। इस मामले में अपने को औरों से थोड़ा अलग महसूस करता हूँ। जरूरत हो तो भी अपने रिश्तेदारों का जिक्र करने से परहेज करता हूँ। मैं उनमें नहीं, जो अपनी कारगुजारियाँ बयान करते वक्त अपने बाप-दादों की सिफतों का सहारा लेते हैं। बस इतना ही काफी है जानना कि मेरा खानदान कई पीढ़ियों से इल्म-व-अदब की ख़िदमत करता रहा है। कई अहम्‌ शायर-अदीब हुए हैं, अपने खानदान में। वालिद, चचा, फूफा, भाई-बहन, सब शायरी, अफसानानिगारी में अच्छी-खासी शोहरत के मालिक रहे हैं। बहार हुसैनाबादी, परवीन शाकिर, अख्तर पयामी, शीन अख्तर, महदी अली, जीशान फातमी, इनमें से कुछ हैं। बहार हुसैनाबादी ने तो अपनी उर्दू-फारसी शायरी से अपने समकालीन गजलगो शायरों को हैरत में डाल दिया था।
अपना रिश्ता सूफी परंपरा से रहा है। सात-आठ सौ वर्षों की अपनी तारीख़ लिखी मिलती है। मनेरशरीफ के सूफियों से अपना सिलसिला जुड़ा है। शाह शुएब अपने पुरखों में हैं। कइयों को बादशाहों और अंग्रेज शासकों के हाथ जाम-ए-शहादत पीने की नौबत आई है। उसूलपसंदी, ईमानदारी, इल्म-दोस्ती विरासत में मिली है। कोई अनर्गल आरोप लगाता है तो मन में आरोप लगाने वाले के प्रति दया का भाव जागता है। जो हमारी जड़ों से वाकिफ नहीं और जो अपनी जड़ों को ही हमारी जड़ समझने की भूल करता है, वही आरोप लगाने की कोशिश करता है। मुझे ऐसे लोगों पर तरस आता है।
मुझे नहीं मालूम इल्म-व-अदब की हमारी परंपरा और कितना आगे जायेगी। हमारे बाद की नस्लें इसे आगे बढ़ा सकेंगी, तभी तो हमारी विरासत महफूज रह पायेगी। कभी-कभी हालात मुझे मायूस कर देते हैं। लोगों में इल्म हासिल करने के लिए कोई बेचैनी नहीं रह गई है। आसानी से सब कुछ मिल जाए, यही जिंदगी का मकसद हो गया है।
कुछ अपनी अदबी तालीम, औपचारिक शिक्षा के बारे में बतायेंगे।
अदब की तालीम तो बस घर के माहौल ने दी है। सोचने-समझने की सलाहियत हुई तो देखा कि खानदान में अपने बड़े भाई अख्तर पयामी की जेहानत और शायरी की धूम मची है। सबकी जबान पर उनकी नज्में हैं, अशआर हैं। फिर शीन अख्तर की कहानियों का दौर आया। दोनों भाइयों की सियासी सरगर्मियों ने भी दिल-व-दिमाग़ में हरकत पैदा कर दी। स्कूल के दिनों से ही बीड़ी मजदूरों के संगठन से जुड़ गया। उनके सम्मेलनों, सभाओं में सक्रिय भागीदारी होने लगी। वालदैन को भाइयों की तरह मेरे बिगड़ने का भी अंदेशा हुआ तो सख्तियां बढ़ गयीं। पढ़ाई में अव्वल आते रहने की वजह से शिकायत का कोई मौक़ा उन्हें कभी नहीं मिला। अपनी ख्वाहिश राजनीति विज्ञान पढ़ने की थी, लेकिन वालिद ने अंग्रेजी साहित्य की डोर हाथों में थमा दी। फिर तो बस अदब से ही रिश्ता रह गया, बाकी चीजें पीछे छूट गईं। केन्द्रीय सेवाओं के इम्तेहान में बैठा, कामयाबी मिली, लेकिन किस्मत कहीं और ले जाना चाहती थी। फिर कालेज की नौकरी में आ गया। रिद्म ऑफ विजन इन हार्ट क्रेन्स पोयटरी शीर्षक से शोध-निबंध लिखा। आपातकाल के दौरान पुलिस कार्रवाई में शोध-निबंध की सारी पांडुलिपि नष्ट हो गई। किताबों का बड़ा सरमाया भी जाता रहा। आज भी इसकी याद आने पर गहरी टीस महसूस होती है।
आप हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखते हैं। क्या कभी आपके सामने अभिव्यक्ति की माध्यम-भाषा को लेकर कोई आंतरिक संकट महसूस हुआ? आपके आरंभिक लेखन के पीछे कौन-सी प्रेरणाएं थीं।
स्कूल-कालेज के दिनों से ही लिखने-पढ़ने का शौक गहराया। घर का माहौल ही ऐसा था कि अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ न कुछ लिखना लाजिमी था। आरंभ में नज्में लिखीं, कविताएं लिखीं। पत्रिाकाओं में छपीं। आरंभिक रचनाएं सज्जाद जहीर की पत्रिका में प्रकाशित हुईं। बड़े प्यार से बीड़ी मजदूरों की तहरीक से जुड़ी मेरी रिपोर्टें और नज्में छापते थे। उन दिनों मैं आठवीं-नवीं कक्षा में था। नज्में छपने लगीं तो वालदैन की वहशत बढ़ी। वो दरअसल मुझे अफ़सर बनाना चाहते थे। लेकिन अपनी मिट्टी में ही सरकारी तंत्र से तनावपूर्ण दूरी रखने की ख़ासियत छिपी थी। भाषा को लेकर मुझे कोई समस्या नहीं रही। हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं में लिखता रहा। मेरे लिए बता पाना मुश्किल है कि कौन-सी रचना पहले किस भाषा में लिखी गई। ज्यादातर रचनाएं एक साथ दोनों भाषाओं में लिखी गईं। शुरू के दिनों में संस्कृत और फारसी का प्रभाव अधिक रहा। यह प्रभाव दरअसल मेरे शिक्षकों की देन थी। आहिस्ता-आहिस्ता, शायद कालेज के दिनों में, मैंने इस प्रभाव पर काबू पाने की कोशिश की। बाद के अनुभवों ने अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा खुद गढ़ ली। आगे चलकर यह भाषा मेरी नहीं रह गई, मेरे सरोकारों और अनुभवों की भाषा हो गई। मेरे कितने काम की बन पाई यह भाषा, मैं नहीं जानता। लेकिन अपने सरोकारों की तल्ख़ सच्चाई बयान करने के लिए इससे अलग किसी भाषा का इस्तेमाल मेरे लिए मुमकिन नहीं था। उर्दू के कुछ अहम्‌ लोगों को मेरी तहरीरों में हिंदी-उर्दू के मिले-जुले अलफ़ाज की मौजूदगी पर एतराज है। इस एतराज को लेकर संजीदगी से गौर करने पर मुझे महसूस होता है कि वो मुझसे ख़ालिस क्लासीकी जबान लिखने की उम्मीद रखते हैं। मैं इसका अहल नहीं हूं। मेरे लिए अपने सरोकारों और अनुभवों से हटकर कोई रचना-माध्यम तैयार करना संभव नहीं है। आगे भी शायद यह संभव नहीं हो।
आपकी कथा-डायरियों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि तमाम घटनाएं सच्चाई की दस्तावेज हैं। एक कथाकार के रूप में सोचते हुए मुझे लगता है, इस कच्चे माल को लेकर कलात्मक रचनाएं भी लिखी जा सकती थीं लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। क्या लेखन के यथार्थ को लेकर आपकी कुछ निजी मान्यताएं या प्रतिबद्धताएं हैं? अपनी कथा-डायरियों के वस्तुगत यथार्थ के विषय में साफ-साफ कुछ बताना चाहेंगे।
मैंने बहुत सोचकर, योजना बनाकर, गहरा परिश्रम करके अपनी कथा-डायरियों की दुनिया नहीं रची है। यह दुनिया दरअसल मेरे सामाजिक सरोकारों और संघर्षों की कोख से अपने आप जन्मी है। इसमें रचनाकार की हैसियत से मेरा कोई विशेष योगदान नहीं। मैंने सिर्फ इतना किया कि जो तजुर्बे मेरे सामने आये, जो घटनाएं मेरी आंखों ने खुद देखीं, और जिनसे होकर मैं खुद गुजरा, उनको शब्दों का जामा पहनाया और उन्हें एक कथावरण दिया। कथावरण देते समय भी मैंने यह सावधानी जरूर बरती कि मूल कथा-सामग्री पर कला की कृत्रिम परतें नहीं पड़ें। मेरे लिए कला के उस रूप को स्वीकारना कठिन हो जाता है, जो समाज को, पाठकों को जीवन के यथार्थों से कट जाने के लिए प्रेरित करता है। मुझे कला का वही रूप स्वीकार है जो उपेक्षित समाज को न सिर्फ आत्मबल प्रदान करे, बल्कि उसे हालात से जूझने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी करे।
मैं किसी शाम पड़ोस के किसी गांव में जाता हूँ, अपनी आंखों से गांव के शोहदों की दरिंदगी की शिकार शांतीया की लाश देखता हूँ, प्रतिरोध के लिए दस-बीस गांव के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को तैयार करता हूँ। स्वयं पुलिस बल की ज्यादतियों का मुकाबला करता हूँ। आख़िरकार शोहदों को सजा दिलाने में कामयाब होता हूं। अब यह एक तजुर्बा मेरी कथा-डायरी का आधार बनता है। इतना जरूर है कि डायरी लिखते वक्त मैं घटना के प्रतिरोध में अपनी भूमिका को बिल्कुल गौण कर देता हूँ। ऐसा नहीं होने पर मेरी हस्तक्षेप-कार्रवाई ही डायरी के केंद्र में आ जाती और जो स्थान बलात्कार की शिकार उस दलित महिला को मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता। यह उदाहरण मेरी कथा-डायरी के तमाम संदर्भों को परिभाषित करता है। डायरी में बस कहीं-कहीं एक नैरेटर के रूप में मेरी मौजूदगी दर्ज होती है, वो भी बिल्कुल हाशिए पर।
मैं अपनी कथा-डायरी के अधिकांश पात्रों से गहरे तौर पर जुड़ा होता हूँ। आज भी सैकड़ों ऐसे पात्र जिंदा हैं, मेरे आसपास हैं, जिनकी यातनाओं को मैंने अपनी डायरी में दर्ज किया है। लेकिन उन्हें उनकी यातनाओं से निजात दिलाने की ख़ातिर मैंने जो लड़ाइयां लड़ीं उनका जिक्र मैंने अपनी डायरी में करना जरूरी समझा। मेरा मक़सद हालात के प्रति व्यापक समाज में तेजी से क्षीण हो रही संवेदनशीलता के तंतुओं को दोबारा जिंदा या बहाल करना था। मैं इस मक़सद में बड़ी हद तक सफल रहा हूँ। बिहार में नई सामाजिक शक्तियों के उभार तथा उनकी व्यापक गोलबंदी के पीछे इन प्रयासों की अच्छी-खासी भूमिका रही है। मैंने इस काम में अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लगाया है। मैं सुख और समृद्धि के पीछे कभी नहीं भागा। मैंने, एक सामान्य, मध्यम वर्ग के परिवार को जो सुविधायें मिल सकती हैं, उनसे भी अपने आप को बचाने की कोशिश की। अपने लिए कांटों का यह रास्ता मैंने अपनी मजरी से चुना है, किसी और को इसका कुसूरवार नहीं ठहरा सकता। मेरी रचनाओं की मिट्टी इन्हीं सच्चाइयों से गूंधी गई है।
आपने कविताएं भी लिखी हैं। ज्यादा सहज आप कहां होते हैं, डायरी में या कविताओं में? ये दो भिन्न विधाएं क्या जाबिर हुसेन के अंतर्जगत के अलग-अलग प्रतिरूप हैं?
कथा-डायरी का रिश्ता मेरे सामाजिक सरोकारों से है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। ये मेरे खुद से बाहर के सफर को रेखांकित करती है, मुझको व्यापक समाज से जोड़ती है। लेकिन कविता मेरे भीतर जो कैफ़ियत है, उसको व्यक्त करने का माध्यम बनती है। कविताओं में अपने आपसे बातें करने का अवसर मिलता है। कभी-कभी अपने आपसे बातें करना जिंदा रहने के बराबर है। यह सिलसिला रुक जाये तो शायद जिंदा रहना भी मुश्किल हो। कविताओं में अपने आपको पूरी तरह खोलने का सुख है, जो आपका होकर भी सिर्फ आप तक सीमित नहीं रहता उसकी हदें व्यापक हो जाती हैं, विस्तारित भी। कविता मेरी रचनाशीलता को जिंदा रखती है। इसलिए बार-बार इसकी शरण में आता हूँ।
इन सबके बावजूद आप सच्ची बात पूछेंगे तो कहूंगा कि मैं न तो कविताएं लिखता हूँ, न कथा-डायरियां। ये दोनों मुझसे खुद को लिखवाती हैं और मेरे लिए मुश्किलें पैदा करती हैं। मुझे इन मुश्किलों से निबटने की कला नहीं मालूम। मैं करूँ भी तो क्या!
इधर क्या कुछ लिख रहे हैं?
तीन अहम्‌ काम अपने हाथ में ले रखें हैं। एक तो विधान परिषद् में अपने बारह साल के अनुभवों पर आधारित पुस्तक है। काफ़ी हिस्सा इस पुस्तक का लिखा जा चुका है। शीघ्र प्रकाश में आ जाए, ऐसी इच्छा है। दूसरा काम कबीर आज पर अपनी अधूरी पुस्तक का है। इसमें इधर थोड़ी प्रगति हुई है। लेकिन सबसे अहम्‌ काम उपन्यास कैनवस पर लिखी जा रही लंबी कथा-डायरी दोआबा है। ज्यादा समय इसी पर दे रहा हूं। दोस्तों और मेहरबानों ने जिंदा रहने दिया, तो जल्द ही ये सारे काम मुकम्मल हो जायेंगे।
आप लंबे समय से राजनीति में हैं। क्या हिंदू बहुल दलीय राजनीति में आपको मुस्लिम होने या इस नाते अकेले पड़ जाने का भी एहसास हुआ है?
मैं राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूँ। अब भी मेरे रिश्ते राजनीति से हैं। मैं वर्षों राजनीतिक ओहदों पर रहा हूं। एसेम्बली काउंसिल में रहा हूं। एक दशक से ज्यादा मैंने सदन चलाया है। अब कुछ महीनों से संसद में हूँ। मेरे लिए ये ओहदे हमेशा व्यापक सामाजिक जवाबदेही निभाने का माध्यम रहे हैं। मैं अपने फैसलों से कई निहित स्वार्थी राजनेताओं और अपराधी सरगनाओं को नाराज करता रहा हूं। जो तत्त्व जनता के बुनियादी सवालों पर अपने स्वार्थों को तरजीह देने के आदी हैं, उनसे हमेशा मेरा संघर्ष रहा है। ऐसे तत्त्व न सिर्फ मेरी मुखाल्फ़त करते हैं, बल्कि मेरे खून के प्यासे भी हैं। मैं इन तत्त्वों के इरादे जानता हूं, लेकिन इससे घबराता नहीं। समय-समय पर ये तत्त्व मुझे विवादों में ढकेलने की कोशिश करते रहते हैं। मैं उनके नाम गिनाना नहीं चाहता। सामाजिक संदर्भों में मेरी निरंतर क्रियाशीलता के कारण ही ये तत्त्व मुझे निशाना बनाते हैं। ये दरअसल नस्लवाद में यक़ीन रखने वाले लोग हैं। ये अपनी सोच और नजरिए से घोर जातिवादी और सांप्रदायिक हैं। मैं उन्हें तमाम पसमांदा बिरादरियों का हिमायती नजर आता हूँ। ये हमेशा लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि मेरा जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ है और राजनीति में मेरे अधिकार सीमित हैं। दलितों के प्रति भी इनके विचार कुछ इसी प्रकार के हैं। ये स्वस्थ एवं प्रगतिशील विचारों के दुश्मन हैं। इससे ज्यादा मैं इस वक्त उनके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।

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Sunday, November 23, 2008

डॉ० श्योराज सिंह बेचैन से मिर्जा गौहर हयात की अन्तरंग बातचीत

सबसे पहले श्योराज सिंह बेचैन जी आपके मुँह से पाठकों के लिए आपकी पारिवारिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि जनना चाहेंगे?

गौहर साहब समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरु करूँ? मैं आज दिल्ली में अध्यापक हूँ, लेकिन मैंने जिन्दगी कहाँ से शुरू की और कैसे शुरु की यह बहुत लम्बी दास्तान है। मैं उत्तर प्रदेश के एक बहुत ही पिछड़े हुए गाँव नन्दरौली(बदायूँ) में पैदा हुआ। मेरे पूर्वज चर्मकार का काम किया करते थे। मुर्दा मवेशी उठाना, उनका चमड़ा उतारना, उसको शुद्ध करके समाज के उपयोगी बनाना, यह सब हुआ करता था। लेकिन आप देखिए कि ऐसी दुर्घटना घटी जिसने मेरे बचपन को एक संकट कालीन स्थिति में डाल दिया। मसलन, जब मैं लगभग ५-६ वर्ष का था एक दुर्घटना में मेरे पिता जी की मृत्यु हो गयी। माँ अशिक्षित थीं। मेरे बाबा का एक पैर टूट चुका था। उनके छोटे भाई नाबीना थे और मेरे ताऊ भी नेत्राहीन थे। ऐसी स्थिति में हम बेघर हो गये और उसी समय से मेरी यात्रा दूसरों के सहारे शुरु होनी थी शुरु हुई।

आज श्योराज सिंह बेचैन आप दलित विमर्श के एक जाने-पहचाने नाम हैं। साहित्य के परिप्रेक्ष्य में आपके जीवन के प्रमुख पड़ाव?

मेरे जीवन का प्रमुख पड़ाव, साहित्य और जीवन दोनों परिप्रेक्ष्य में बड़ा साम्य। मैं बचपन में बिना किसी प्रशिक्षण के और बिना किसी गुरु के यह कहें, किसी चिंहित किये गये प्रशिक्षक के मैं कविताएँ करने लगा था। ये कविताएँ अपने परिवेश से अपने वातावरण से, अपने अनुभव से लिखी जा रही थीं। मैं विद्यार्थी था और विद्यार्थी कैसा था कि बालश्रम के क्रम में विद्यार्थी बना था। मैं बचपन में दिल्ली आ गया था। मौसा-मौसी के पास रहकर कभी नीबू बेचकर, कभी अण्डे बेचते हुए तो कभी अखबार डालते हुए, मैंने गा-गाकर अपनी कविता शुरु की। बाहर रहकर शिक्षा ग्रहण करना, खुले वातावरण से सीखना तो मिल गया, उससे सीखते रहना और अनौपचारिक शिक्षा की तरफ बढ़ना ये सब बाल संघर्ष के दिन थे और उस समय किसी निश्चित विचारधारा में बँधकर कोई कविता करना न सम्भव था, न स्वाभाविक था। जो मन में आता था, जो अनुभव से निकलता था वह लिख लिया करता था। लेकिन जब मैं कक्षा-८ का विद्यार्थी हुआ गाँव में, दिल्ली में मेरे मौसेरे भाई जो कि मौलाना आजाद मेडीकल कालेज में एम.बी.बी.एस. के छात्र थे, उन्होंने दिल्ली के कई लेखकों से मेरा परिचय करवाया। उर्दू के शायरों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। कैफी आजमी, शाहिर लुधियानवी मेरे दिमाग पर छाने लगे। उनके गीत जो रेडियो पर सुनने को मिलते थे वह गीत मुझे खींच कर अपनी तरफ करते गए। उनकी किताबों को मैंने दिल्ली में ढूँढ-ढूँढकर पढ़ीं। हिन्दी ने मुझे बहुत कम प्रभावित किया। कारण ये है कि उसमें गेयता बहुत कम मिलती थी और उसमें गीत बहुत कम मिलते थे तो इसलिए मेरी सरल उर्दू में लिखे गये गीतों ने मदद की और मैं गीतकार हो गया। गेय कविताएँ लिखते हुए छात्र जीवन से लोक जीवन में प्रसिद्ध होने लगा। उसी समय यानी कि छात्र जीवन से बाल सभा का अध्यक्ष रहा और उसके बाद जब चन्दौसी में ग्रेजुएशन करने आया तो आल इण्डिया स्टूडेण्ट फैडरेशन की जिला कमेटी के अध्यक्ष पद पर काम किया और उसी दौरान मिर्जापुर में एक मुशायरा हुआ जिसमें कि कैफ़ी आजमी, अली सरदार जाफरी जैसी हस्तियाँ भी थीं। मुझे एक छात्र के रूप में कविता रखने का मौका मिला। इससे पहले अपने कालेज के एक कवि सम्मेलन में एक छोटी-सी कविता सुनायी थी लेकिन उससे लगा कि बात अधिक दूर तक नहीं गयी। अखबारों में लेखन का काम छात्र जीवन से ही शुरु हुआ और पत्रिकाओं में मेरी कविता छपना शुरु हुई। किसान आन्दोलन की यूनियन और दलित आन्दोलन में भी कार्य किया। इसी के साथ सफाई मजदूरों के लिये शोषित समाज संघर्ष समिति की स्थापना करके वहाँ के वाल्मीकि नौजवानों को जोड़ा, कई बार ऐसी स्थितियाँ आयीं जहाँ जोखिम था। उस समय जोखिम उठा लेने के जज्बे के बारे में मैं खुद हैरान हूँ कि उस समय मैं क्या था और आज कैसा हूँ? कितना किताबी होता चला जा रहा हूँ। इसके बाद अब मेरे गीत-संग्रह नई फसल, फूलन की बारह मासी आने शुरु हुए। दलित विमर्श या दलित साहित्य ८७ के आसपास से शुरु हुआ था। इससे पहले मैं मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित था। जनवादी लेखकसंघ प्रगतिशील लेखकसंघ के असर में था और १९८७ में ही जब मैंने पी.एच.डी. का इरादा बनाया, इन्हीं धाराओं से सम्बन्धित काम के लिये सोचा था परन्तु अच्छा यह हुआ कि इस क्रम में हिन्दी दलित पत्रकारिता में पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव', इस विषय को लेकर अपना पी.एच.डी. कार्य शुरु किया और ये काम और ज्यादा सार्थक इसलिए हो पाया कि वीरेन्द्र अग्रवाल जैसे सुलझे हुए कवि मेरे निर्देशक बने। तो बुनियादी काम मैं दलित चिन्तन के संदर्भ में यह कर पाया कि मैंने बाबा साहब अम्बेडकर के मूक नायक, बहिष्कृत भारत, समता-जनता जो मराठी में निकले हुए अखबार थे, इनका करीब ५ साल तक अध्ययन और अनुवाद किया। कई किताबों में वह आया। मूर्खों जो विवाद रहेगा, यह अन्याय कोई परम्परा नहीं', दलित क्रांति का शायर इत्यादि किताबें इस क्रम में छपकर आयीं। अखबारों में लिखना शुरु किया, यह मेरे लिए एक नया क्षेत्रा था। सहारा में मेरा एक कालम चलता रहा और हिन्दुस्तान में लिख ही रहा हूँ। जनसत्ता में लिखा है, मराठी पत्रों में लिखा है और अमर उजाला में १९८७ से ही लिख रहा था। जनसत्ता, अमर उजाला के लिए कवर स्टोरी लिखी, आवरण कथा लिखी और फिर धीरे-धीरे मैं आलोचना के फील्ड में उतर गया, कविता मेरी छूटती गयी इसका मुझे दुख हुआ। अब भी कई बार सोचता हूँ कि मैं तो कवि था आलोचना के जंगल में कैसे फँस गया? अब बहुत सारे लोग इधर-उधर मुझे आलोचक के रूप में जानने लगे लेकिन जब मैं अपने कर्म क्षेत्र की तरफ लौटता हूँ किसानों, मजदूरों, दलितों और अपने पुराने मित्रों में लौटता हूँ तो वह मुझमें अपना पुराना कवि ढूँढना चाहते हैं। मुझसे उन्हीं गीतों की, उन्हीं कविताओं की मांग करते हैं जो मैं उनके बीच गाया करता था तो इस तरह यह पड़ाव चलते रहे, मैं चलता रहा, वक्त चलता रहा, स्थितियाँ बदलती रहीं, जिम्मेदारियाँ बदलती रहीं और आज मैं यहाँ खड़ा हूँ तो मैं सोचता हूँ कि साहित्य में अब बहुत कुछ नये तरीके से सोचने की जरूरत है।

आपकी नजरों में दलित कौन है?

दलित क्या है? व्यवस्था में दलित कौन है? हमने शुरु से इस बात को साफ करने की कोशिश हमारी नजर में वे सब लोग दलित हैं जो किसी न किसी रूप में अस्पृश्यता के शिकार हैं, अब बहुत सारे लोग कहते हैं कि एक अफसर बन गया या किसी की अच्छी नौकरी लग गयी, तो वह दलित नहीं रहा, यह सतही और बहुत ही सरलीकृत सोच है, बात यह है कि मान लीजिए मैं अपनी स्थिति जद्दोजहद के बाद थोड़ा बहुत सुधार लेता हूँ। लेकिन क्या मेरी बहन की स्थिति मेरी जैसी हो गयी? क्या मेरी बुआ की स्थिति मेरी जैसी हो गयी? क्या मेरी माँ की स्थिति एक गैरदलित जैसी हो गयी? क्या मेरे दादा की स्थिति संभल गयी? या मेरी मौसी और मौसा की स्थिति संभल गयी, हजारों लोग जुड़े हुए हैं इससे। नाते-रिश्तेदार, घर वाले, परिवार वाले फिर पूरी जाति वाले। अब देखिए जिस गाँव में से निकल कर आया हूँ उस गाँव में चार बच्चे भी सरकारी नौकरी में नहीं है और सारे के सारे आते हैं शाहदरा, दिल्ली में दिनभर मजदूरी करके चले जाते हैं या बाहर चले जाते हैं तो आप बताइए कि गाँव में जिनके पास जमीनें नहीं हैं शहरों में उद्योग नहीं है तो आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रताड़ित है, उपेक्षित है, माली हालत खराब है और सामाजिक दृष्टि से यह कोई एक पान की दुकान तक नहीं खोल सकते क्योंकि कोई पान लेगा ही नहीं। यह कहना कि हर आदमी दलित है सही नहीं है। अब जितने मन्द बुद्धि ब्राह्मण हैं सबको दलित मान लिया जाए यह दृष्टि नहीं होनी चाहिए। बात यह है कि जन्म के आधार पर, जाति के आधार पर, जिन लोगों ने अपने आपको श्रेष्ठ मान कर रखा है वे कभी दलित नहीं हो सकते हैं और वे जब दलित कहलवाना चाहते हैं तो उसके पीछे आप देखिए कि जो एक योजना है। इसमें दलितों के लिए आयी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हड़प लेने की नियति होती है।अभी दिल्ली में कुछ दिन पहले एक खबर छपी है कि एक व्यक्ति ने छत्तीस साल पहले एक फर्जी जाति प्रमाण पत्र इस्तेमाल किया और किसी दलित को अपना बाप बना लिया और उसने मेडीकल में दाखिला ले लिया और वह आज हेड आफ डिपार्टमेंट बन गया, अब सरकार उसकी तलाश कर रही है पता कर रही है। सवाल यह उठता है कि मध्य प्रदेश में जाकर क्या वह दलित बाप के पास जाकर कभी रहा या नहीं रहा। दिल्ली में अभी तीस प्रतिशत फर्जी सर्टिफिकेट पाये गये। सभी अनुसूचित जाति के बनना चाहते हैं। जो संविधान में न्याय करने की कोशिश हुई, जिन लोगों की क्षति हुई है उन लोगों की कुछ आंशिक क्षति की पूर्ति की जाए क्योंकि वह तमाम लाभों से वंचित रह गया है, यह एक नैतिक जिम्मेदारी है। उसको हड़प लेना और जो गैर सरकारी संस्थाएँ है उस संस्था में उसे घुसने नहीं देना और सरकारी संस्थाओं का आरक्षण और दूसरी जो कल्याणकारी योजनाएँ हैं वह फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर हड़प लेना यह साजिश है। इसके तहत हर कोई दलित बनना चाहता है, तो वास्तव में दलित वह है जो अछूत रहे हैं, जिनके साथ अस्पृश्यता बरती जाती है। इस देश में मनु महाराज ने जो वर्ण व्यवस्था बनाई थी उसका साहित्य पर, विचार पर बहुत बड़ा असर है। अभी भी जो हिन्दुओं का सारा साहित्य है, इसके बावजूद मार्क्सवाद आ गया और फ्रायडवाद आ गया, तरह-तरह के वाद आ गए, अंग्रेज भी काफी समय तक राज कर गए, फिर भी यह जो लिखते हैं उस पर मनुस्मृति का पूरा असर है। महाभारत, रामायण यह जो हिन्दुओं के ग्रन्थ है उसके भावानुवाद हिन्दी की कहानियों, हिन्दी की कविताओं और उपन्यासों में भरे पड़े हैं। इसलिए यह कहीं आगे बढ़ ही नहीं रहे हैं। यह विकास कर ही नहीं रही हैं। कोल्हू के बैल की तरह घूम रहे हैं। चूँकि दलित साहित्य अपनी मौलिक तकलीफें ले आया है और उसका समाधान चाह रहा है इसलिए उसका पात्र वही हो सकता है जिसके पास मौलिक अनुभव है उसको कोई दूसरा काल्पनिक ढंग से व्यक्त कर ही नहीं सकता। करेगा तो सब फर्जी होगा। इस बात को श्वेत साहित्य ने साबित कर दिया। इस बात को महिलाएँ भी साबित कर रही हैं तो फिर कौन दलित है, कौन नहीं दलित है, सीधी सी बात है जो अस्पृश्यता के शिकार रहे हैं वही दलित हैं।
सम्पूर्णता में आप दलित विमर्श को कैसे परिभाषित करेंगे?
सम्पूर्णता से मतलब?
दलित विमर्श के तमाम क्षेत्रों में?
दलित विमर्श एक समान्तर विमर्श के रूप में आया है। वह राजनीति में अपने नेतृत्व की बात करता है, साहित्य में भी अपने नेतृत्व की बात कर रहा है, मीडिया में भी हिस्सेदारी माँग रहा है, आर्थिक क्षेत्रों में भी उसकी माँग चल रही है, बड़ी तार्किक माँग चल रही है और कला संस्कृति के तमाम क्षेत्रों में दलित ने एक लोकतांत्रिाक मांग की है और मैं यह समझता हूँ कि अगर देश को लोकतांत्रिक बनाना चाहेंगे तो दलित विमर्श को नकार कर कोई संस्था, कोई इंस्टीट्यूट, कोई भी माध्यम लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। कारण यह है कि दलित कोई दो-चार है नहीं, छोटे-मोटे देश आस्ट्रेलिया और इंग्लैण्ड के बराबर ये लोग हैं, तो फिर इतनी बड़ी आबादी को आप नकार कर कहे कि हां, देश का विकास हो जाएगा! बहुत सारे दलितों का स्वयंभू नेता बनने की कोशिश करते हैं। गोलमेज सम्मेलन हुआ तो गाँधी जी ने दलितों का नेता बनने की कोशिश की थी। उन्होंने अपना दावा ठोका था और कहा था कि मैं दलितों का भी प्रतिनिधि हूँ, जिन्ना साहब मुसलमानों के प्रतिनिधि हुए। यदि डॉ० अम्बेडकर वहाँ उपस्थित न होते तो वही हो जाते दलितों के प्रतिनिधि। लेकिन डॉ० अम्बेडकर ने साबित किया कि, भाई गाँधी जी को कुछ लेना-देना नहीं। ये हिन्दुओं के प्रतिनिधि ही हैं। उन्हीं की ही बात सोचते हैं और उन्हीं के नुमाइंदे हैं। मैं दलितों का नुमाइंदा हूँ और यह बात उन्हें साबित करनी पड़ी। स्वामी अछूतानन्द जैसे जागरूक, जो दलित नेता, जो बुद्धिजीवी, साहित्यकार व पत्राकार भी थे, उन्होंने आदि हिन्दू अखबार निकाला था। कविताएँ और कहानियाँ लिखी थी, उन्होंने बड़ा काम किया। उन्होंने यह गलतफहमी दूर करने के लिये बहुत काम किया कि गाँधी जी दलितों के नेता हैं। साहित्य, राजनीति, कला व मीडिया में भी यही स्थिति होनी चाहिए कि दलितों के विचार का प्रतिनिधित्व गैरदलित नहीं कर सकता है। जाहिर सी बात है इसलिए साहित्य में भी एक अलग धारा आ गई। चूँकि आप मानने के लिए तैयार नहीं थे। आज हर अखबार, हर पत्रिाका, हर चैनल यह बात दबाने में खुशी महसूस नहीं करता बल्कि बताने में और आगे बढ़कर लाने के लिए मजबूर है तो उसका कारण यही है कि अब यह धारा धीरे-धीरे इतनी विकसित हो गयी कि एक समानान्तर साहित्य एक समानान्तर विचारधारा के रूप में आ गया। इससे देश का विकास होगा, इससे संस्कृति की सोच का विकास होगा, क्योंकि जो पक्ष समाज का अब तक दबा हुआ था वह इस माध्यम से आगे आ रहा है। कमजोर हिस्से अगर मजबूत हो जाते हैं तो पूरा देश मजबूत हो जाता है। हमारा देश बार-बार गुलाम क्यों हुआ? इसलिए कि २५ प्रतिशत लोगों को यहाँ किसी काम का रहने ही नहीं दिया गया। उन्हें शिक्षा नहीं दी गयी। विद्यालय की बात छोड़िए, वे रास्ता तक नहीं चल सकते थे। इस तरह से इस देश में अत्याचार हुए और आज तक उनका क्रम गोहाना तक दोहराया जा रहा है। पूरे देश में ये हो रहा है। कसम-कश बढ़ी है, दलित जब बर्दाश्त कर लेता या मार दिया जाता था और बैठ जाता था। बलात्कार हो जाता था तो कोई केस करने के लिए भी नहीं उठते थे, उस वक्त कहते थे कि व्यवस्था सब सही चल रही है। अब जब उसने जवाब देना शुरु कर दिया, उसमें खुद्दारी जागृत हुई और अधिकार बोध की चेतना आई तो लोगों को आपत्तियाँ होने लगीं। दलित चेतना जिन-जिन क्षेत्रों में आ रही है वह-वह क्षेत्र तेजी से डेमोक्रेटिक बन रहे हैं और जहाँ नहीं है वही आलोकतांत्रिाक हैं और समाज सामंती मूल्य से जकड़ा हुआ है। वही बीमार क्षेत्र है और स्वास्थ्य उसका तभी ठीक होगा जब सारे लोग आये। इसीलिए उदारीकरण भूमण्डलीयकरण से दलित परेशान नहीं हो रहा है। अंग्रेजों ने यहाँ आकर रेलवे लाइन डाली, नई पद्धति की शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत की, ऐसी-ऐसी चीजें हैं जो बहुत मजबूत है। पुल बना दिया तो आज भी नहीं टूटे और हमारे देश के ठेकेदार कैसे देश भक्त हैं? उनकी बनाई हुई इमारत टूटती है पहले, बनती हैं बाद में, तो इस तरह से है तो दलित विमर्श केवल साहित्य और समाज का विमर्श नहीं है। सारे विषय में उसकी उपस्थिति, उसका हस्तक्षेप असर डाल रहा है।
दलित आन्दोलन को मैं इस तरह सफल मानता हूँ कि यह दलित को विमर्श के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है, और दलित विमर्श की एक धारा समाज में प्रचलित हुई तो इसके परिप्रेक्ष्य में मैं आपसे यह जानना चाहूँगा कि साहित्य में दलित विमर्श क्या है? साहित्य में यह कब प्रारम्भ हुआ और वर्तमान में उसकी क्या स्थिति है?
देखिए, जब दलित लिखने की स्थिति में नहीं था तो बोलता था, तब भी अपनी वाणी से कहता था। कबीर के मुँह से निकलने वाला शब्द तो साहित्य की एक अच्छी परम्परा दलितों को मिली साहित्य में। कबीर की, रैदास की, अछूतानन्द की और बाद में डॉ० अम्बेडकर उस परम्परा में जुड़ते हैं। जो यह परम्परा है उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि यह परम्परा हिन्दुओं से बिल्कुल अलग है। हमने यह बात सामने रखी थी कि इस्लाम का ज्यादा सम्मान करना चाहिए। चूँकि इस्लाम आने से कबीर आये, इसाईयत को ज्यादा सम्मान करना चाहिए क्योंकि ईसाई ने जगह-जगह स्कूल खोले, गरीबों, अछूतों को पढ़ाने का काम किया तो उनका ऋण है। हिन्दुओं ने जगह-जगह उनको रोका। आर्य समाज जैसी संस्थाएँ या सुधार की हिन्दुओं की जितनी संस्थाएँ बनी, तब जब सामने यह दिखाई पड़े कि सारे दलित हिन्दू धर्म को छोड़कर भाग रहे हैं, इसाई बन रहे हैं या मुस्लिम बन रहे हैं या अपना कोई अलग धर्म तलाश कर रहे हैं या कुछ बौद्ध बन रहे हैं और ऐसा हुआ कि खुद डॉ० अम्बेडकर के जमाने में एक दिन में पाँच लाख दलितों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और बहुत सारे धर्मों में गए, इस्लाम में बहुत सारे लोग गए, तो इसलिए हम मानकर चलते रहे हैं कि इन दलित की दृष्टि में हिन्दू-मुस्लिम और जैन यह सब इसके लिए बराबर हैं। हिन्दू इसके लिए श्रेष्ठ नहीं हैं, क्योंकि उसी ने इसके अधिकारों को छीना और जहाँ तक आपने कहा साहित्य वाली बात है, आप देखिए कि अछूतानन्द ने १९०५ ई० में एक अखबार निकाला था अछूत जिसकी प्रतियाँ ढूँढे नहीं मिलती हैं और १९२७ ई० में उनका ये जो आदि हिन्दू, आदि से मतलब यह नहीं था कि जो आर.एस.एस. वाला हिन्दू है या विश्व हिन्दू परिषद वाला हिन्दू है। ये वे कहते थे कि हिन्दुस्तान के पहले निवासी-सीधा इसका अर्थ था - हिन्दुस्तान के पहले निवासी यानी हम इस देश के मूल वाशिन्दे। वहाँ उस कॉन्सेप्ट को लेकर चले थे। अछूत को भी उन्होंने कहा था - छूत का मतलब यह नहीं है कि हेय है। हमको आप नहीं छू सकते, गरिमा को, हमारी श्रेष्ठता को, श्रम को। आप देख सकते हैं कि उन्होंने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे, कविताएँ लिखीं, अखबार चलाया, उत्तर प्रदेश के कई सारे अखबार निकले। ढेर सारी पत्रिकाएँ निकली इस संदर्भ में, चूँकि दलित के पास साधन मुख्य धारा के नहीं थे। पत्रिकाएँ निकलती थीं बन्द हो जाती थीं। आर्थिक संकट में लोग रहते थे। बहुत कम दूरी तक ये चलती थीं। इसी के साथ कविताएँ लिखी गयीं, कहानियाँ लिखी गयीं और इस क्रम में आप देखिए कि डॉ० धर्मवीर का साहित्य आ गया। कबीर पर एक जबरदस्त काम उन्होंने किया। मोहनदास नैमिशराय, ओम प्रकाश वाल्मीकि, सूरज पाल चौहान, जय प्रकाश कर्दम का अच्छा खासा साहित्य आ गया। साहित्य की सभी विधाओं में लोग काम कर रहे हैं। देखिए अच्छी बात यह हुई कि उसी देश में मण्डल कमीशन का आन्दोलन जोर पकड़ गया। इस आन्दोलन को सबसे ज्यादा दलितों ने शक्ति दी क्योंकि दलित बाबा साहब अम्बेडकर की चेतना से लैस थे और वे सामाजिक न्याय की लडाई अपने लिए लड़ रहे थे। उस क्रम में उन्होंने यह माना इसमें पिछड़ी या पिछड़ी जातियाँ भी बढ़ेंगी, उसमें एक आवाज और मिलेगी तो हम मजबूत हो जाएँगे या अलग बात है कि पिछड़ों ने दलितों के साथ क्या किया और आगे हम कोई बात नहीं करना चाहेंगे लेकिन उस समय उस आन्दोलन ने जो वातावरण बनाया उसके राजनीतिक परिणाम आप सब लोगों की नजर में हैं ही, साहित्यिक परिणाम भी हुए। हंस जैसी पत्रिका जिसमें दलित के लिए कोई जगह नहीं थी, सारे गैर दलित, मार्क्सवादी छपते थे। इस पत्रिका के सम्पादक को दलित चेतना ने झकझोरा और एक रास्ता दिखाया।ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, कँवल भारती खुद उस पत्रिका में काफी दिन छपे, बल्कि मुझे दलित अंक को सम्पादित करने का मौका भी मिला। इस पत्रिका का चूँकि राष्ट्र व्यापी प्रभाव था और यह पत्रिाका साहित्य में एक प्रमुख पत्रिका है। इसलिए दलित आन्दोलन के साहित्यिक आन्दोलन को काफी मजबूती दी, इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है।

आपने मार्क्सवादियों की बात की। मार्क्सवादियों के साथ दलित अन्तर्विरोध पर कुछ बात करें?
अन्तर्विरोध वर्ग और वर्ण के लिए है, क्योंकि मार्क्सवादियों ने शुरु से ही जाति की समस्या को एक ऊपरी समस्या माना और वर्ग संघर्ष को प्रमुखता दी, इसमें मुझे ऐसा लगता है कि उनके पास जाति उत्पीड़न के न अनुभव थे, न स्वीकारोक्ति थी, इसलिए कि मार्क्सवादी आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले जो लोग थे वह सभी कथाकथित उच्च जाति के लोग जाते थे। सम्पन्न परिवार के थे। बहुत सारे लोग शौकिया मार्क्सवादी बनते थे, तो उनके शौक में चिन्तित होने का प्रश्न ही नहीं उठता। सोवियत यूनियन से सुविधाएँ लेनी थीं। दलितों के जो प्रश्न थे वे इसलिए भी छूटे क्योंकि दलितों की ओर से वहाँ नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। उनके आन्दोलनों का आधार आर्थिक था। बाबा साहब अम्बेडकर को उन्होंने कभी महत्त्व नहीं दिया, पढ़ना नहीं चाहा, समझना नहीं चाहा, उन्हें एक जाति का नेता बनाने की कोशिश की। जबकि भारत के लिए एक बड़े अर्थशास्त्री के रूप में बाबा साहब अम्बेडकर को लिया जाना चाहिए था। ये अर्थशास्त्रा के बहुत बड़े विद्वान थे। दास कैपिटल बेशक मार्क्स का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ था, लेकिन अम्बेडकर उस जमाने में अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. थे और वे भारत की योजना आयोग में जाना चाहते थे लेकिन उन्हें नहीं दिया गया। अगर उन्हें आर्थिक क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलता तो भारत की तस्वीर बहुत पहले बदल गयी होती। कानून बनाने का मौका मिला तो लोकतांत्रिक संविधान बनाया जिसमें बहुत कुछ बदला, धर्म निरपेक्षता की अवधारणा दी। समता स्वतंत्रता और जनता के पक्ष को सामने लेकर आए, लेकिन मार्क्सवादी जिस तरह की क्रांति की बात करते रहे वो सब किताबी और सैद्धान्तिक अभिव्यक्ति है। वे भ्रम में इसी तरह रहते थे कि पूजा पाठ भी चलता था, शादी विवाह भी अपनी जाति में चलते थे, तिलक जनेऊ भी चलते थे, बेटा और बेटी का विवाह भी इसी तरह होते थे, अपनी ही जाति ढूँढी जाती थी और जाति तोड़ो और जाति जोड़ो का नारा दिया जाता था। असल में जाति तब तोड़ने में लगे जब जाति के आधार पर दलितों की सुविधा निश्चित होने लगी तब उनको भी इस जाति को तोड़ो उससे दलितों को सुविधाएँ मिल रही है इसलिए वह जाति को तोड़ना नहीं चाहते थे, कहते थे कि धर्मविहीन समाज बनाना चाहते थे। वे आज तक नहीं बना, उनकी जरूरत नहीं है जिनकी जरूरत होती है वह बनाता है, तो जब जाति व्यवस्था में उनको फायदे हैं। आप देखिए कि साहित्य के जितने संस्थान है उन पर सब ब्राह्मण और उच्च जाति के लोग हैं जितने पाठ्यक्रम बनाये जाते हैं उनमें सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ लोग हावी हैं। उसमें कोई दलित नहीं होता है और जितने मीडिया संस्थानों में सारे सम्पादक उच्च जातियों के लोग हैं। जब ज्ञान के सारे क्षेत्र में ये लोग काबिज हैं, तो ऐसी स्थिति में यह कहना कि भाई मार्क्सवादियों ने क्रांति कर दिया, मार्क्सवादियों का विचार पक्ष सही था, गलत बात है। वहाँ हिस्सेदारी नहीं हुई है। जहाँ हिस्सेदारी नहीं होती है वह क्षेत्रा डेमोक्रेटिक नहीं होता है। दलित आन्दोलन के अगुआओं को दलितों का जातिवादी कहा गया। दलितों में बहुत सारे लोगों के नाम के साथ जातियाँ हटी लेकिन किसी ब्राह्मण का, चाहे वे मार्क्सवाद का सबसे बड़ा नेता हो, काम नहीं चलता।दलित ने सीधा विभाजन किया, ब्राह्मण है तो ब्राह्मण है, चाहे किसी भी पार्टी में है। क्षत्रिय है तो क्षत्रिाय है, चाहे किसी भी पार्टी में हो। जो वर्ण व्यवस्था उन्होंने बनाई है उसी वर्ण व्यवस्था के अनुसार इसका विश्लेषण किया जाना है। दलितों ने कोई व्यवस्था नहीं बनाई, वे तो समता क्षमता की बात करते हैं लेकिन समता मिल ही नहीं सकती जब तक इस विभाजन को समझा नहीं जाएगा।
अब तक की हल्की फुल्की बातचीत के पीछे एक भारी सवाल? शब्द दलित क्यों और कब प्रचलन में आया और हरिजन कहे जाने पर मतभेद की वस्तुस्थिति क्या है?
देखिए, दलित शब्द के संबंध में यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि यह कैसे प्रचलन में आ गया था और इसके अलग-अलग आशय लोगों के लिए है। शब्द कोश में भी दलित शब्द है, आपके रामायण में मिल जाएगा या महाभारत में मिल जाएगा। मराठी के तमाम साहित्य में मिल जाएगा। बाबा साहब अम्बेडकर ने इस शब्द का बहुत कम इस्तेमाल किया बल्कि मराठी में ये शब्द १९६० ई० के बाद आया, बाबा साहब जो शब्द इस्तेमाल करते थे वह बहिष्कृत था और दरअसल जब अमेरिका में ब्लैक पेन्थर शब्द चला तो मराठी में दलित पैंथर बन गया। वहाँ से ये दलित शब्द ले लिया गया। दलित शब्द से कई विचारकों को एतराज था। आज तक यह द्वन्द्व चलता है। हम अपने आपको दबा, कुचला अपने आपको क्यों माने? कुछ लोग तो हमें बुद्धि से भी दलित कहना शुरु करते हैं और जहाँ तक हरिजन वाली बात थी उसको तो डॉ० अम्बेडकर ने ही खारिज कर दिया था। हरिजन शब्द नरसी भगत की कविता से गाँधी जी ने लिया था और उन्होंने कहा जितने लोग जो सताए जाते हैं, जो अनुसूचित जाति थी उनको हरिजन कहना शुरु किया और वे कहते हैं कि वे सब भगवान के बच्चे हैं तो उनसे सवाल किया गया कि क्या आप भगवान के बच्चे नहीं? कौन भगवान का बच्चा नहीं है, अम्बेडकर ने यह बात भी बताई कि दक्षिण में जो देव दासियों के बच्चे होते हैं, जिनके कोई माँ-बाप नहीं होते है, अवैध सन्तानों को हरिजन कहा जाता है। इसका मतलब है हरामी की औलाद। ये एक तरह से गाली के रूप में होता है तो क्या आप सभी को गाली देना चाहते हैं। यहाँ तक कि गाँधी जी ने अपने अखबार का नाम हरिजन रख दिया। डॉ० अम्बेडकर ने एतराज किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर की सन्तान कहना बिल्कुल गलत है। इस शब्द को अवैध करार दिया गया और आप ये समझिए कि अभी पिछले दस साल या समझिए कि अभी तक लोग हरिजन शब्द का इस्तेमाल कर देते हैं। कई अखबार के सम्पादक थे उनको चिट्ठियाँ लिख-लिखकर समझाया, लेख लिखकर समझाया लेकिन चूँकि उन्हें आनन्द आता था वे जब जान लेते थे कि हरामी की औलाद है तो वे और ज्यादा लिखते थे चूँकि दलित वहाँ अखबारों में थे नहीं, तो इसलिए इस शब्द को दलितों पर गाली के रूप में पर फेंका गया और एक तरह का प्रहार किया गया दलितों पर। अब और एक विभाजन कर लिया गया कि अनुसूचित जातियों में जो सफाई करने वाली जातियाँ हैं चलो उनको हरिजन कहें और बहुत सारे लोगों ने उसे स्वीकार भी कर लिया। जैसे वाल्मीकि समुदाय ने और यह सब मानने लगे कि हम हरिजन हैं, लेकिन जैसे ही अम्बेडकर विचारधारा पहुँची, जैसे ही दलित साहित्य का स्वर पहुँचा तो उनको एहसास हुआ तो उन्हें लगा यह तो गाली है, तो एक तरह से बेचैनी पैदा हुई और आज की स्थिति में कोई अपने आपको हरिजन कहलवाता है तो यह तो इसके पास वह विचार नहीं पहुँची थी। साहित्य में, समाज में, बल्कि साहित्य समाज ही क्या? राजनीति में भी इस शब्द को बहुत तेजी से खारिज किया। मायावती का तो बहुत लम्बा विवाद रहा है इस शब्द को लेकर सारे अखबारों में इस मसलों को उठाया गया। आज भी कोई भी दलित हरिजन शब्द को स्वीकार नहीं कर रहा है, लेकिन हम आपको बताएँ कि हम दलित शब्द पर भी बहुत बार सोचते हैं यह शब्द भी पर्याप्त नहीं है, समता बोधक नहीं है और ये समता बोधक शब्द होना चाहिए लेकिन जब हम शब्द के माध्यम से चीजें आ रही हैं और सभी आन्दोलन तेज हैं तो एक शब्द के लिए दूसरी लड़ाई लड़ना शुरु कर दिया जाए तो आन्दोलन कमजोर हो जाएगा। जब समय आयेगा तो हम सब मिल बैठकर दलित लेखक दलित विचारक, दलित-चिन्तक यह तय करेंगे कि दलित शब्द को छोड़कर ऐसा समता बोधक शब्द लिया जाए जिसे सारी दुनिया में सुना जाए चूँकि आज दलित शब्द केवल बात नहीं है, आज अमेरिका में दलित आत्मकथा पढ़ाई जा रही है। कनाड़ा में दलित आत्मकथा पढ़ाई जा रही है। सारे विश्व में दलित सम्मेलन हो रहा है। मैं खुद कनाड़ा के सम्मेलन में था। सूरीनाम में भी दलित मसले को लेकर सम्मेलन हुआ उसमें भी में था। इंग्लैण्ड में सन्‌ २००० में जो दलित सम्मेलन हुआ, उसमें भी मैं था तो सारे विश्व में दलित साहित्य पहुँच रहा है। शब्द कोश के आधार पर जो लोग बात कर रहे हैं वे उसी ब्राह्मणी परम्परा में ही बात करते हैं कि प्रभु का दीनहीन है इस तरह का। तो यह बात नहीं है। दीनहीन काहे के? एक मनुष्य है दूसरा मनुष्य है संघर्ष कर रहा है, लड़ाई हो रही है, किसी को पीट दिया तो दीनहीन थोड़े ही हो गया या किसी को दबा लिया या किसी का घर जला दिया या उसकी बेइज्जती कर दी, बहन-बेटियों के साथ बलात्कार कर दिया तो इसमें आप बहादुर थोड़े ही हो गये। आप अमानवीय कर्म करने के बाद सोचते हैं कि आप दलित नहीं हैं। जिसको आपने दबा लिया है वह दलित हो गया, दबाने वाले भी आप ही हैं उसको दबा के उसके ऊपर एक कविता लिख दें आप ही ने सताया, आप ही ने दबाया, आप ही ने घर से बाहर किया फिर उपन्यास लिख दिया, कविता लिख दिया, तो जालिम ही कालित का मसीहा बनकर जजमेन्ट दे रहा है तो यह ज्यादा चलने वाला नहीं है।

प्रेमचन्द की रंगभूमि जलायी गयी, यह दलित आन्दोलन की क्रांतिकारिता थी या दलित उग्रवाद?
प्रेमचंद की रंगभूमि जलाने का मैंने उस वक्त भी समर्थन नहीं किया था और आज भी नहीं। यह कोई तरीका नहीं है, ऐसा तभी करते हैं लोग जब उनके पास लिखने के लिए कुछ नहीं होता। साहित्य की अभिव्यक्ति में अपने आपको कमजोर पाते हैं, साहित्य का जवाब साहित्य में देना चाहिए, कलम का जवाब कलम है। इसमें कोई आगजनी या किसी शारीरिक बल का नहीं, विवेक और बुद्धि का क्षेत्र है, ज्ञान का क्षेत्र है। ज्ञान की लड़ाई ज्ञान के साथ होती है, रही गलत शुरुआत हमने इसकी निन्दा की थी। लेकिन इसी क्रम में एक अच्छी बात यह हुई है कि प्रेमचंद सामंत का मुंशी दूसरी किताब आई। अब आपको जलाना पसन्द नहीं है तो पढ़ना पसन्द कीजिए। अब यह किताब किसी के गले नहीं उतर रही है तो हो यह नहीं सकता कि दलित वे शब्द कहे जो अच्छा लगे, मीठा लगे, स्वादिष्ट लगे ऐसा हो नहीं सकता कि उसको इतना कटु अनुभव दिया है, उसको आपने इतना सताया है, अन्याय किया है कि उसकी अभिव्यक्ति वैसे हो ही नहीं सकती जैसी आप अपेक्षा रखते हैं। प्रेमचन्द का दलित से कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं, चूँकि प्रेमचंद ने दलितों के बारे में लिखा और कोई भी किसी के बारे में लिखता है अनाधिकृत ढंग से। मैं इसाईयों के बारे में बहुत कम जानता हूँ और अधिकार से लिखने लगूं और वह उस पर न बोलें तो यह गलत बात होगी। उनका अधिकार है वह उस पर बोलें और दलितों के बारे में प्रेमचंद ने लिखा है या कोई भी लिखेगा तो दलितों का हक बनता है कि वह कहें कि सही है या गलत है। मैं स्त्रियों के बारे में लिखने लगूं, मैं प्रजनन की पीड़ा पर कविता लिख दूँ और मैं जानता हूँ नहीं कि प्रजनन की पीड़ा होती क्या है? यह कोई जननी ही ठीक ढंग से बता सकती है, मेरे कान पकड़ सकती है, दर्द का एहसास यह नहीं है जो आपने लिखा है। यह बता रहे हो यह इसके अनुभव है प्रमाणिकता उसी के पास है।

दलित आन्दोलन दलित नारियों के उत्थान के लिये क्या कर रहा है?
यह बहुत महत्त्वपूर्ण सवाल है और चिन्ता का सवाल भी है, क्योंकि जो वैचारिक आन्दोलन या साहित्यिक आन्दोलन है या कहें ज्ञान का क्षेत्र है उसमें दलित स्त्रियों की हिस्सेदारी बहुत कम हुई है, पुरुष से वे ज्यादा पीछे हैं। जहाँ तक रही बात यह कि दलित क्या कर रहे हैं तो यह अच्छी शुरुआत हिन्दू कोट बिल बनाते हुए बाबा साहब ने कर दी। संविधान में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार देकर बराबर कर दिया। उसी का परिणाम है कि आज छोटे-मोटे निकायों में दलित स्त्रियाँ आ रही हैं, स्कूल कालेजों में आ रही हैं, अब साहित्य में इसलिए नहीं आई थीं कि क्योंकि वे शिक्षित नहीं थी, अनपढ़ लोग तो साहित्य लिखेंगे नहीं, किसी सामाजिक आन्दोलन में नहीं निकल पा रही थीं। आज स्थितियाँ बदली हैं, वे नैतिक आन्दोलन में हैं, सामाजिक आन्दोलन में हैं, शिक्षा के क्षेत्र में हैं, किसी दिन मीडिया के क्षेत्रा में भी आयेंगी और स्कूल कालेजों में ये लोग निकलेंगे। जरूरी नहीं है कि सारी प्रतिभाएँ गांव से ही आए। अब चूँकि ये युग ऐसा है जिसमें वैचारिक क्रांति पर सूचना क्रांति का बड़ा प्रभाव है तो उसमें दलित स्त्रिय़ां सूचनायें हासिल कर रही हैं, अपना अधिकार समझ रही हैं, उसमें बड़ी बात यह है कि अब स्त्रियो की चरित्र हनन की प्रक्रिया रूकती चली जा रही है। वे लड़ रही है, अत्याचार होता है तो एक्शन भी होता है। इसलिए संभावनाएँ बढ़ी हैं। कई लेखिकाएँ आयी हैं। हालांकि उनकी संख्या १० करोड़ में, मैं अगर दस नाम गिना दूँ तो स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। पुरुषों की भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है लेकिन आशाजनक है। काम बहुत तेजी से हो रहा है।
बिना भाषा की सीमा के ये बताइए कि दलित विमर्श का साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा?
साहित्य पर यही प्रभाव है कि अब कोई पत्रिका, कोई अखबार, कोई साहित्यिक गोष्ठी दलित विमर्श को नकार कर आगे नहीं बढ़ पा रही है। यह सब जगह जरूरी हो गया है। यहाँ तक कि एन.सी.ई.आर.टी. के पाठ्यक्रम में भी दलित साहित्य आ गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में भी दलित साहित्य पढ़ाया जाना इसी वर्ष शुरू हुआ। पटना के एक विश्वविद्यालय में दलित साहित्य आया। अभी ये कहा जा सकता है कि दलित साहित्य जो पाठ्यक्रम का हिस्सा बनता जा रहा है। अब उसमें जिस तरह से कबीर को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रक्षिप्त कर दिया था वैसा भी सिलसिला दलित साहित्य के साथ चल रहा है। उसका कारण यह है कि अभी पाठ्यक्रम बनाने वाले लोगों में बड़ी संख्या गैर दलितों की ही है। जब वहाँ दलितों का प्रतिनिधित्व होगा और अधिकारी लोग वहाँ पहुंचेंगे तभी सही स्थिति बन पायेगी, क्योंकि मैंने पी.एच.डी. किया है मनुस्मृति में और संविधान की बात करने बैठ जाएं तो फिर यह विरोधाभाषी बात है, यही हो रहा है। किसी ने सूरदास पर काम किया है और बैठ जाए धर्मवीर पर विचार करने या फिर किसी ने तुलसीदास पर काम किया है और बैठ जाए ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविताओं पर बात करने के लिए, तो इस तरह से जब साहित्यकार अपने अधिकार क्षेत्र से इतर हस्तक्षेप करेंगे तो गड़बड़ तो होगी ही। पाठ्यक्रम में दलित साहित्य की बात सबसे पहले मैंने ही उठायी। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की गोष्ठी में जब ये बात कहता तो जाने-माने साहित्यकार यही बात कहते कि पाठ्यक्रम में वही आता है जो मर जाता है, जीते जी नहीं आता है, तब मैं बहुत सारे उन साहित्यकारों का नाम गिनाता जो जिन्दा भी है पाठ्यक्रम में भी है। लेकिन अब वे जानते हैं कि भविष्य दलित साहित्य का है, मुझे लगता है कि सारे विश्वविद्यालय में दलित स्टडी के अलग विभाग खोलने पड़ेंगे। अमेरिका भी जानना चाहता है, इंग्लैण्ड भी जानना चाहेगा कि दलित साहित्य क्या है? तो उसके लिए अलग विभाग खोलने पड़ेंगे। बाकी अध्ययन अब हो चुके हैं। ब्राह्मणों से संबंधित अध्ययन आवश्यकता से अधिक हो चुका है। अब उसकी जरूरत नहीं रही चूँकि दलित साहित्य नया है इसलिए उसमें ५०-६० साल तक काम तो होगा ही। अच्छी बात है कि अब साधन आधुनिक हैं काम होगा तो तेजी से होगा। आज का दलित साहित्य सूचना माध्यमों से पूरे विश्व के स्तर पर प्रसारित होता है। जब अछूतानन्द बात करते थे तो उस समय कानपुर से दिल्ली तक बात आने में बड़ा समय लग जाता था। तो संचार माध्यमों के कारण उनको फायदा मिलेगा और एक नया साहित्यिक वातावरण तैयार होगा। आप स्वयं जब जय प्रकाश कर्दम जी, ओम प्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम जी जैसे नाम जहाँ कबीर और रैदास की परम्परा को विकसित करते दिखते हैं। वही राजनीति में जो आज का दलित नेतृत्व है ऐसा लगता है कि उसके द्वारा अम्बेडकर की परम्परा का क्षय हो रहा है।
इस पर मैं आपका विचार जानना चाहता हूँ?
नहीं, राजनीति में उतार-चढ़ाव आते हैं। राजनीति अपने तरीके से होती है। साहित्य में भी बहुत सारे लोग ब्राह्मणों से फैसले करवाने लग जाते हैं। ब्राह्मणों से भूमिकाएँ लिखवाने लगते हैं, ब्राह्मणों के पत्रों को पाकर समझते हैं कि बड़ी बात हो गयी। ये जो मनोवैज्ञानिक बीमारी है। जब साहित्य में है तो राजनीति में स्वाभाविक है। राजनीति बोध का मामला है कोई एक जाति राज्य नहीं कर सकती और भारत का एक मनोविज्ञान यह है भी कि अगर दलित पिछड़ी जातियों को साथ लाना चाहे तो वह चाहेगा कि ब्राह्मण पहले आ जाए तभी वह आयेगा तो इसलिए राजनीतिज्ञ, सामाजिक, मनोविज्ञान के आधार पर ये रणनीति पर काम करते हैं। बाबा साहब अम्बेडकर के सामने भी मजबूरियाँ थीं ऐसी। जब बाबा साहब ने दलितों के अखबार निकाले तो उन्हें ढूढे से दलित सम्पादक नहीं मिले। बहिष्कृत भारत के सम्पादक नियुक्त करने के लिए उन्हें ब्राह्मणों के पास जाना पड़ा तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आज की राजनीति में मायावती जी ब्राह्मणों के पास जाती हैं और आगे बढ़ती हैं वह गलत है। वामपंथी और दक्षिणपंथी दो प्रकार के ब्राह्मण है। मायावती दक्षिणपंथी के साथ दो बार सीट पर बैठती हैं तब भी वे आलोचना करते हैं, लड़ती हैं तब भी करते हैं। ज्यादा बौद्धिक लोग अगर राजनीति में जायेंगे तो बाबा साहब के विचारों को ज्यादा फैलायेंगे। मायावती ने उतना गहरा अध्ययन नहीं किया। बाबा साहब की मोटी-मोटी बातें उनके पास हैं जितना है उसी हिसाब से अपना काम कर रही हैं। मैं समझता हूँ कि राजनीति से साहित्य को ज्यादा प्रभावित नहीं मानना चाहिए।
दलित इतिहास पर अभी तक समुचित कार्य नहीं हुआ है, इस दिशा में क्या प्रगति हो रही है?
देखिए, जो हमने पत्रकारिता पर कार्य किया था, वह पत्रकारिता पर पूरा इतिहास उसमें लगभग आ चुका है। मुझे नहीं लगता है कि उसमें कुछ जोड़ने की जरूरत है। हिन्दी दलित कथा पर जो रजत रानी मीनू का शोध हुआ है उसमें कथा का इतिहास आ रहा है। कहानी का इतिहास पूरी तरह से आ रहा है और साहित्य के विस्तृत परिप्रेक्ष्य में इतिहास की बहुत सारी सूचनायें आ रही हैं। लेकिन एक स्वतंत्रा इतिहास लिखने की अब आवश्यकता जो अभी बनी हुयी है उसके लिए मैं अपनी तरफ से प्रयास कर रहा हूँ। मैंने एक परियोजना भी दी है, वह परियोजना समकालीन दलित साहित्य इतिहास की खोज और सृजन शीर्षक है। अगर मुझे अवसर मिलता है और परियोजना स्वीकृति होती है तो मैं अपनी तरफ से इतिहास लिखकर देने का वायदा करता हूँ। मुझे उम्मीद है कि यह मौका मिलेगा और तीन साल में इतिहास लिखकर दूँगा। अगर मुझे परियोजना का मौका नहीं मिला तो उसमें यह हो सकता है कि अपनी आत्मकथा जो अभी-अभी मेरे सामने काम है उसको जैसे ही पूरा करूंगा और मैं इतिहास पर लग जाऊँ। इतिहास के लिए जो कच्ची सामग्री है मैं समझता हूँ कि मुझसे ज्यादा हिन्दी के क्षेत्र में किसी के पास शायद नहीं है क्योंकि पत्राकारिता पर पी.एच.डी. करते समय यह सामग्री जुटा ली थी।

हिन्दी की अपेक्षा दूसरी अन्य भाषाओं पर विशेषकर तेलुगू भाषा में बहुत कम काम हुआ। इन भाषाओं की अनुवाद पर क्या स्थिति है?
दलितों का स्वतंत्र मंच अनुवाद के लिये नहीं है, लेकिन गैर दलित जो अनुवाद करा रहे हैं, उसमें पूरा न्याय नहीं हो रहा है। जब अनुवादक दलित होते हैं, लेखक दलित होते हैं लेकिन प्रकाशकों के अभाव में दलितों का शोषण होता है। उन्हें अनुवाद का पैसा नहीं मिलता। यहाँ तक पंजाबी दलित साहित्य का अनुवाद हुआ, तेलुगू का भी कुछ कविताओं का अनुवाद हुआ। यहाँ की एक फाउण्डेशन ने लेखकों को किराया तक नहीं दिया, संकट बहुत है। कविता, कहानियाँ जो भी इस दौर में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज मानी है उसके लिए कुर्बानी दे रहे हैं लोग, लेकिन अभी अच्छे अनुवादकों की समस्या है। गैर दलितों में ही लोग अभी मिल रहे हैं। चूँकि हमारे देश में जो सारी क्षेत्रीय भाषाएँ हैं उसमें चार-पांच भाषाएँ सीखने का न वक्त है न सामर्थ्य है। जो रोजगार की कैरियर दृष्टि से भाषा आकर्षित करती है वह अंग्रेजी भाषा है। इसलिए अपनी मातृ भाषा के अलावा जो लोग दूसरी भाषा को सीखते हैं वह अंग्रेजी ही है तो अंग्रेजी में जो भाषा आ जाती है वह दूसरी भाषाओं में आसानी से आ जाती है।

श्योराज जी आप खुद भी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं अभी हाल में आपके मित्र चन्द्रभान का एक कालम दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ जिसमें मीडिया के सालाना २२५ अरब के कारोबार में तथा लगभग ६ लाख नौकरियों में उन्होंने दलितों की संख्या नगण्य बताई और उनका कहना है कि जरा गहराई से देखें तो १७ करोड़ दलित के बीच में १७ दलित के नाम भी मुख्य धारा में नहीं हैं। ये दोनों ही प्रश्न इस कॉलम में अनुत्तरित ही रह गए हैं। उनके उत्तर में आपसे जानना चाहूँगा कि इन दो तथ्यों के बीच क्या प्रमुख कारण है ?
देखिए, गौहर साहब मैं और चन्द्रभान जी बहुत पहले पिछले १०-१५ साल से मीडिया वाले प्रश्नों पर सोचते रहे हैं, वे मेरे मित्र हैं, हम लोगों ने मीडिया पर पेपर आज से १० साल पहले जारी किया था उसमें हम सब लोगों ने... की थी आप को जानकर हैरानी होगी कांशीराम जी का मीडिया के साथ विवाद हुआ था और मीडिया एक तरफा तस्वीरें दे रहा था, खबरें दे रहा था। उस समय एक विदेशी पत्रिका ने आकर कोशिश की थी कि वह दलित पत्रकारों का भी पक्ष जाने तो उसमें उसने सारे संस्थान छान मारे, सारी रिपोर्ट देखी, सारे सूचना केन्द्र तलाश किये लेकिन उन्हें कहीं दलित पत्रकार नहीं मिला। मैं उन दिनों एक कॉलम लिखा करता था - दलित विवाद। यह सहारा में आया करता था। हमारे मित्र चन्द्रभान जी के अलावा कोई दूसरा स्थाई स्तम्भकार नहीं है। वे अंग्रेजी में लिखते हैं। उनका कॉलम नियमित आ रहा है। मैं अस्थाई लिख रहा हूँ। हिन्दुस्तान भी छाप रहा है और भी अखबार छाप रहे हैं लेकिन कोई अखबार इस तरह से कॉलम देने के लिये तैयार नहीं है जो दलितों के लिए हो, दूसरे लोगों का एक सप्ताह में अगर आना है तो आयेगा ही। पन्त जी का कॉलम आना है या कमलेश्वर का कॉलम आना है या किसी और का कॉलम आना है तो आयेगा ही, चाहे वे कुछ भी लिखें। भारद्वाज का कॉलम छपना है हंस में तो वे छपेगा चाहे वे कुछ भी लिख दें। ऐसी स्थिति दलितों के लिये अभी नहीं है और इसीलिए हम कहते हैं कि मीडिया में अभी लोकतांत्रिक भागीदारी की बहुत सख्त जरूरत है और अब ये निर्भर इस बात पर करता है, इनके स्वामी सम्पादक उन्हें जगह देंगे या नहीं देंगे। दलितों के पक्ष बहुत कट-छट के, बहुत आंशिक तौर पर और वे कई बार समय गुजर जाने के बाद आता है। उसका सीधा-सा कारण यह है कि अगर बाबा साहब अम्बेडकर उस समय जब आजादी की लड़ाई के समय ही निजी क्षेत्रों में अगर आरक्षण की बात स्थापित कर जाते और कानून बना जाते तो आज मीडिया में भी लोग होते। लेकिन उन्होंने सरकारी क्षेत्रों के लिए आरक्षण की लम्बी लड़ाई लड़ी और बहुत सारा विरोध हुआ। आज निजी क्षेत्रा में जो २५ प्रतिशत आरक्षण देने की जो बात हो रही है तो अब देखते हैं कि निजी क्षेत्रा कौन से होंगे, मीडिया में कितना होगा, सिनेमा का क्षेत्र कितना होगा, उद्योग का क्षेत्रा कितना होगा, केवल स्कूल ही होंगे या कुछ और भी होगा ये देखना होगा। अब दबाव है चूँकि सारे क्षेत्रा लोकतंत्रीकरण हो रहा है। अब भूमण्डलीयकरण का दौर है सारी दुनिया एक हो रही है। सारी दुनिया आधुनिक हो रही है तो कोई संस्थान अकेले विचार को लेकर एक जाति, एक ही धर्म का बोल बाला लेकर डेमोक्रेटिक नहीं हो सकता। ये बात तो जाहिर हो गयी है और अब कोई आदमी लोकतांत्रिाक नैतिकता का दावा तभी कर सकता है जब उसके पास प्रतिस्पर्धा के लिये स्थान है। प्रतिनिधित्व लोगों का है तभी विभिन्न तरीके के विचार आ सकते हैं, विविधता की कमी के कारण आप समझिए कि हिन्दुस्तान का मीडिया पिस रहा है, हिन्दुस्तान का साहित्य दो कौड़ी का हो गया है, हिन्दुस्तान की शिक्षा को कोई नहीं पूछ रहा है क्योंकि स्पर्धा है ही नहीं। लोग मूल्यांकन करते हैं अपने एक पक्ष को लेकर करते हैं इसलिए हम पिछड़ते चले जा रहे हैं। अमेरिका, इंग्लैण्ड की तरफ हमारी प्रतिभा भाग रही है, ये क्यों भाग रही है? इसलिए कि हमारे यहाँ स्तर बहुत ही निम्न है और वो इसलिए है कि कोई कम्पटीशन नहीं है। कुछ लोग शुरू से ही कोशिश करते हैं शिक्षा के क्षेत्र में आए ही नहीं, ज्ञान के क्षेत्रा में ही नहीं, मीडिया के क्षेत्रा में न आएँ चूँकि मीडिया का क्षेत्र सीखने नहीं देंगे तो वे कैसे आप के जमाने में पत्रकार बनेगा। ये तो सुविधा उन्हीं लोगों को थी जो मालिक थे, सम्पन्न थे, बड़े घरानों से आये और खुद ही अखबार निकालना शुरू कर दिया। आजादी के आन्दोलन का फायदा लेते हुए सम्पादक बन गए, मालिक बन गए, आज के युग में तो पूरा प्रशिक्षित पत्रकार चाहिए, पूरा सीखा हुआ पढ़ा-लिखा पत्रकार चाहिए और दलित को तो अतिरिक्त योग्यता का पत्रकार होना चाहिए, लेखक होना चाहिए क्योंकि उसको ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए तुरन्त ये कहना कि मीडिया में बहुत जल्दी कुछ सुधार हो जाएगा ये संभव नहीं है। हम लोगों ने उस समय कहा था जो आदमी कहीं चपरासी बनने योग्य नहीं होता वो ब्राह्मण होने के नाते किसी भी अखबार का सम्पादक बन गया। आप देखिए कि ये बात नहीं है कि पत्रिका नहीं है, वाइस चांसलर कितने है, प्रो. कितने हैं, आपको हीरो कितने दिखाई पड़ते हैं, अभिनेता कितने, नेता कितने हैं, फिल्म इण्डस्ट्री में कितने लोग हैं, उद्योगपति कितने हैं, क्षेत्र तो सारे खाली पड़े हैं। आरक्षण से कुछ आई०पी०एस० और पी०सी०एस० बनकर गए। इतने से २५ करोड़ जनता का बदलाव होता है? कुछ लाख दो लाख नौकरियों से करोड़ों लोगों का भला हुआ है? जमीन उनसे छीन ली, मकान उनके पास नहीं है। उद्योग में कुछ नहीं करने दिया जाता है तो ये जो अत्याचार के उत्पीड़न का सिलसिला है अब आप कल्पना कीजिए कि आजादी के बाद ये हो रहा है तो आजादी के पहले क्या होता होगा। इसलिए ये कहना कि मीडिया में लोग नहीं हैं, क्यों नहीं है तो सवाल ये उठता है। इसका सीधा-सीधा कारण है जब दूसरी जगह शिक्षा नहीं मिली, साहित्य में नहीं तो मीडिया में कहाँ से हो, आप देख रहे हैं कि पब्लिक स्कूल का जो हाल है जिस तरह से सरकारी संस्थाएँ कार्य कर रही है उनमें तो पढ़ाई-लिखाई बंद सी हो गयी है। गांव-गांव तक स्कूल खोल दिए गये प्राइवेट और उनमें लूट मचा दी गयी पैसों की और उसमें कोई गरीब या मजदूर दलित का बच्चा पढ़ सकता है और पढ़ाई कर भी ली हो कोई या एम.ए. तक पढ़ाई कर ले, मगर उसमें … तो उसको और ज्यादा मार दिया जाता है। ये लोग तो कोशिश करते हैं कि दलितों को खूब पढ़ाओ लेकिन अच्छी शिक्षा न दो। वह एम.ए. पास भी पाँचवी से पिट जाएगा ऐसे करने की कोशिश करते हैं। वे तो अतिरिक्त श्रम करने के कारण उसकी बौद्धिक क्षमता अधिक होने के कारण चूँकि उसने हमेशा श्रम किया है, मेहनत करता है तो उस चीजों को पकड़ लेता है। हमारे जैसे लोगों को कब का मसलकर रख दिया होता। इसलिए जो व्यवस्था है उसको बदलना पड़ेगा और वे दबाव से बदलेंगी, शिक्षा से नहीं बदलेंगी।

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