Thursday, December 11, 2008
Wednesday, December 10, 2008
कबीर और जायसी की प्रेम व्यंजना
डॉ० आशुतोष पार्थेश्वर
कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरष्या आइ।
अंतरि भीगी आत्माँ हरी भई बनराइ॥
---------
मुहमद कवि जो प्रेम का ना तन रकत न मांसु।
जेई मुख देखा तेइ हंसा सुना तो आये आँसु॥
यदि विकास के वर्तमान मॉडल और भक्तिकाव्य को आस-पास रखें तो भक्तिकालीन कविता हमें मुँह चिढ़ाती नजर आती है, हम पर हँसती हुई मालूम होती है। उसकी हँसी में हम पर व्यंग्य है और दया भी। वह हमारी ऐतिहासिक निष्फलता को बयाँ करती है। हमारे आगे दर्पण रख देती है ताकि हम अपने को पहचान सकें। हमें मालूम हो सके कि हम जितना आगे बढ़ रहे हैं, उतना ही स्वकेन्द्रित हो रहे हैं। व्यवस्था से असहमति वाला वह साहस अब नहीं, उसकी जगह एक घुन्नापन है स्वार्थपरता है। कहना न होगा ऐसे में भक्तिकाल के चारों बड़े रचनाकार अपनी सीमाओं के बावजूद अपनी निष्कलुष मानवता, अकुंठ संवेदना और अपने प्रति संसार के साथ निरंतर प्रासंगिक होते जा रहे हैं। उनकी पूरी यात्रा संवेदना की यात्रा है। कबीर के उक्त दोहे का मर्म इसी में है।
कबीर प्रेम का बादल होना चाहते हैं, कौंध पैदा करना नहीं, बिजली चमकाना नहीं, बरसना चाहते हैं, ताकि आत्मा भींगे, हर कोई भींगे, कलुषता खत्म हो, मैल दूर हो, घृणा न रहे, ओछापन हटे, क्षुद्रता, लोभ-लालच न बचे, और हरियाली आए। नयापन आए। जीवन आए। पूरी प्रकृति प्रेम के रंग में रंग जाए। एक निष्ठुर समाज में यह कबीर की इच्छा है और यह जायसी की भी।भक्ति काव्य जागरण का काव्य है। स्मरण रहे, यहाँ भक्ति और जागरण अलग-अलग नहीं है। अपने ईश्वर की पहचान, उससे लगाव, उससे प्रेम ही उन्हें यह ताकत देती है जिससे कि वे मौजूदा संसार से अपनी असंतुष्टि दिखाते हैं और प्रतिसंसार की अपनी परिकल्पना प्रस्तुत कर पाते हैं। यह जागरण ठस्स बुद्धिवाद नहीं है। यहाँ तो सारा खेल, सारी पहचान, सभी घेरे प्रेम के हैं। हृदय के हैं।
इसलिए भी कि भक्त कवि अपने समय में सबसे उपेक्षित इसी हृदय को पाते हैं। इसी से सबसे अधिक बल प्रेम पर है। आपसदारी पर है। भक्त कवियों के अपने अंतर्विरोध हैं, पर उनके प्रतिसंसार का जो मॉडल है वह इन अंतर्विरोधों और सीमाओं से काफी बड़ा है।
कबीर जिस हरेपन की बात करते हैं, वह जिन्दगी का उल्लास है, आत्मा की तृप्ति है। स्पष्ट है कि यह गैर बराबरी के रहते संभव नहीं। कबीर इसी गैर बराबरी के खात्मे के लिए लाठी लेकर चलते हैं। यह कबीर का काल-यथार्थ है जो इतने ही तीखेपन के साथ जायसी में भी है।विजयदेव नारायण साही ने जायसी में इसका उल्लेख किया है कि पद्मावत केवल प्रेम का नहीं, युद्ध का भी ग्रन्थ है। संघर्ष, युद्ध और आतंक यह जायसी के समय का यथार्थ है। पद्मावत में जितना प्रेम है, उतना ही युद्ध है; जितना मन के भीतर दिपता हुआ सिंहल लोक है, उतना ही टूटे हुए दुर्गों की धूल उड़ाती हुई वीरानगी है, जितना अपने हाथ से सिर उतार कर जमीन पर रख देने की तड़प है, उतना ही वैभव का प्रदर्शन है; सत है, साका है। जायसी अपने समय से मुँह नहीं छिपाते। दिल्ली और शेष भारतीय समाज के बीच जो खाई है और उस खाई को युद्धों के माध्यम से, आतंक के रास्ते पाटने की जो कोशिश है; पद्मावत उसी का गवाह है और प्रतिकार भी।पद्मावती का आकर्षण ही दोनों को बाँधता है - रत्नसेन को भी और अलाउद्दीन को भी। पर दोनों विपरीत भूमिकाओं में हैं। रत्नसेन प्रेम के लिए भिखारी बनता है तो अलाउद्दीन आक्रमणकारी। चित्तौड़ की विजय तो होती है, पर पद्मावती कहाँ?
जायसी लिखते हैं - आइ साहि सब सुना अखारा। होइगा राति देवस जो बारा।/छार उठाइ लीन्हि एक मूठि। दीन्हि उड़ाइ पिरिथिमी झूठी॥/जौहर भइ सब इस्तिरी, पुरुष भए संग्राम।/बादसाह गढ़ चूरा चितउर भा इस्लाम॥पद्मावती कहाँ ? वह तो राख है। वह रूप कहाँ गया ? पद्मावती कहाँ गई? पद्मावती राख हो गई। चित्तौड़ टूटा। गढ़ टूटा। अलाउद्दीन जीता। रत्नसेन हारा। पर सच कहें तो जीतती केवल पद्मावती ही है। स्वयं को राख कर देना। यह स्वाधीनता की आकांक्षा है, अपने प्रेम की रक्षा है। हम अतिरिक्त शाबासी न दें, पर पद्मावती और पद्मावती के स्रष्टा जायसी दोनों की मनः स्थिति को समझने की कोशिश करें।अलाउद्दीन को इतनी बड़ी विजय भी व्यर्थ मालूम होती है - पृथ्वी झूठी है। बगैर प्रेम के झूठी है। जायसी इसी से कहते हैं - मानुस पेम भयउ बैकुंठी। नाहिं त काह छार एक मूठी।/पेम पंथ जौं पहुँचै पाराँ। बहुरि न आइ मिलै एहि छाराँ॥यह बैकुंठ प्रेम से अलग नहीं है, धरती से अलग नहीं है। अगर प्रेम है तब ही मनुष्य-मनुष्य है। धरती-धरती है और कहें कि तब धरती ही बैकुंठ है।प्रेम का यह जो ताना-बाना है जायसी के यहाँ, कबीर इसी प्रेम से अपनी चदरिया बनाते हैं। दुनिया वालों को केवल और केवल प्रेम पर भरोसा करने को कहते हैं - पोथि पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।/ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय॥प्रेम के अतिरिक्त सभी शास्त्रा बेकार हैं, प्रेम से शून्य सारे शास्त्रा शून्य हैं। सारा ज्ञान बोझ है, मझधार में डुबोने वाला है, पार-लगाने वाला नहीं है। यह प्रेम दुनिया के बाहर की चीज नहीं है इसे जायसी भी मानते हैं और कबीर भी।
यह प्रेम मध्य युग में भी आवश्यक था और आज भी है। बिना रक्त, माँस और तन के जायसी जब खुद का परिचय प्रेम के कवि के रूप में देते हैं और आँसू की बात करते हैं तो इसलिए कि वह कवि के काव्य का विषय मात्र नहीं है, कवि के समय का अभाव भी है।पद्मावती में रूप की कौंध जरूर है, पर महत्त्वपूर्ण रूप की गाथा का प्रेम की गाथा में अंतरण है। क्योंकि वहाँ प्रेम केवल रक्त, माँस और तन का नहीं रह जाता; वहाँ आँसू का खेल है, करूणा का संसार है, संवेदना की एक विराट दुनिया है जो शारीरिक सौन्दर्य को धता बताते हुए मन की खूबसूरती को केन्द्रत्व देता है। रूप की हिंसक तृष्णा बेकार है, जायसी पद्मावत से यही बोध कराते हैं - जौ लहि ऊपर छार न परै। तौ लहि यह तिस्ना नहिं मरै॥बेशक, कबीर और जायसी दोनों ही ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रेम की भाषा बोलते है और सुनना भी चाहते हैं।कबीर और जायसी दोनों ही में रहस्यवाद को स्वीकारा जाता है, हम इस रहस्यवाद को तत्काल स्थगित कर, कबीर और जायसी में प्रेम की ठेठ देशज और लौकिक उपस्थिति को महसूसने की कोशिश करें। यों प्रेम अध्यात्म का पेटेंट माल है भी नहीं। दोनों कवियों के यहाँ प्रेम की जितनी छवियाँ हैं वह आम जन जीवन के अनुभवों से उपलब्ध हुई हैं।प्रेम के धरातल पर खड़े होते ही दोनों कवि भारतीय नारी के पास खींचे चले आते हैं। जायसी अपनी संपूर्ण भावुकता के स्त्री जीवन के अनुभवों कष्टों का परिचय देते हैं तो कबीर स्वयं को एक स्त्री के साथ रूप में ही ढाल लेते हैं।
नामवर सिंह ने लिखा है - कबीर के लोकप्रिय पद वे हैं जहाँ वे एक भारतीय नारी की तरह अपने नैहर और ससुराल की बातें करते हैं। पिया का घर प्यारा तो लगता है, लेकिन पिता के घर का छूटना भी कम दुखद नहीं। मध्यकालीन गीत काव्य में भारतीय नारी की ऐसी जीती जागती तस्वीर शायद ही कहीं मिले। स्त्री जीवन की इस चित्रावली में स्त्री हृदय की गहरी वेदना के साथ कुछ सुहाने सपने भी हैं। वेदना अधिक सपने कम। सपनों में ऐंद्रिय सुख की तलाश है, तो यथार्थ में विरह की आन्तरिक टीस और जल्द से जल्द मिलने की उत्कट तड़प। ऐसा ही एक पद देखें - ए अँखियाँ अलसानी पिया हो सेज चलो।/खंभ पकरि पतंग अस डोलै, बोलै मधुरी बानी।/फूलन सेज बिछाइ जो राख्यौ, पिया बिना कुम्हलानी।/धीरे पाँव धरौ पलंग पर, जागत ननँद जिठानी।/कहत कबीर सुनो भई साधो, लोक-लाज बिछलानीमिलने की बेचैनी भी और लाज की ललाई भी। इच्छा और संकोच के बीच जो चीज कौंधती है-जागत ननँद जिठानी। यह समूचे पद को भारत के ग्रामीण परिवारों का एक सहज, सुलभ चित्र बना देता है। ये दृश्य कबीर से भी पहले विद्यापति में मिलते हैं। वस्तुतः एक क्लासिक कवि की यह पहचान है कि वह अपने समाज को, उसकी बनावट और बुनावट को कितने गहरे जाकर पकड़ पाता है।कबीर के काव्य का श्रेष्ठांश वही है जहाँ वह अपने प्रिय के विरह में तड़पते नजर आते हैं और बकौल नामवर सिंह जहाँ से भारतीय नारी के जीवन की अनगिनत नाजुक स्थितियों की पहचान हो जाती है। अकेली स्त्री की पीड़ा देखें - कै विरहिन को मीचु दै कै आपा दिखलाय।/आठ पहर का दाझना मोपै सहा न जाय।'
अथवा - यह तन जालौ मसि करौं लिखौं राम का नाउँ।/लेखणि करुँ करंक की, लिखि लिखि राम पठाऊँ॥कबीर के प्रेम में पूर्ण समर्पण है, अपने राम के प्रति, अपने प्रिय के प्रति; किसी दूसरे का सवाल ही कहाँ उठता है? राम में ही रमना है - कबीर रेख सिंदूर की काजल दिया न जाइ।/नैनूं रमइया रमि रइया, दूजा कहाँ समाइ॥इसे ही घनानंद ने कहा है - यहाँ एक ते दूसरो आँक नहीं।'' सर्वस्व राम का। मेरेपन का बोध और प्रेम रस का पान साथ-साथ नहीं हो सकता। राम नाम से भक्ति की जो गूज सुनाई पड़ती है। उसे सुनने से पहले हम उस प्रक्रिया को निथारें जिसके तहत कबीर उस बेचैनी, तड़प, प्रेम की उत्कटता और एकनिष्ठता को पा सके थे। निस्संदेह, यह एक भारतीय स्त्री के अनुभव हैं। कबीर पर राम से प्रेम की बेलि चढ़ गई है, और जिस पर प्रेम की बेलि चढ़ गई, जायसी के अनुसार उस पर कुछ और नहीं चढ़ सकता - प्रीति अकेली बेलि चढ़ि छावा। दूसरि बेलि न संचरै पावाप्रेम ईश्वर प्राप्ति का सबसे सुलभ और विश्वसनीय मार्ग है, पर यह एकदम आसान नहीं है। कबीर और जायसी दोनों ही इसे मानते हैं - कबीर यह घर प्रेम का खाला का घर नाँहि।/सीस उतारे हाथि करि सो पैसे घर माँहि।/पेम पहाड़ कठिन विधि गढ़ा।/सो पै चढ़ा सौ सीस चढ़ा।गौरतलब है कि प्रेम की यह उपस्थिति समाज की उपेक्षा करके नहीं है। आचार्य शुक्ल ने उचित ही पद्मावत में फारसी मसनवियों का प्रभाव और उससे कहीं अधिक भारतीयता देखी थी। फारसी परंपरा में प्रेम लगभग लोक विमुख होता है, जबकि भारतीय कहानियाँ लोकपक्ष का तिरस्कार नहीं करती हैं।
भारतीय कहानियों में प्रेम वायवीय नहीं होता, वह धरती के किसी कोने का ही होता है। वहाँ लोक-जीवन के चित्र और चेतना दोनों होते हैं। वहाँ जीवन और मर्यादा दोनों का परिपाक मिलता है। इन कहानियों में अपने समय को सँभालने वाली एक कोशिश होती है, दृष्टि होती है। प्रेम कितना भी उदात्त हो जाए, अशरीरी हो जाए, उसमें आध्यात्मिक संस्पर्श हो, पर यदि वह अपने काल-यथार्थ से कटा हो; तो भले वह प्रशंसनीय हो जाए, हमारे जीवन-संबंधो, आवेगों-संवेगों की अनुकृति नहीं हो सकता। यहाँ हम विद्यापति, बिहारी और घनानंद को देखें। विद्यापति प्रसंग में आचार्य शुक्ल ने आध्यात्मिक रंग के चश्मे की बात ही है और एक तरह से विद्यापति की पदावली की आध्यात्मिक व्याख्याओं को नकारा है। ध्यान रहे, विद्यापति के समूचे काव्य में नायकत्व कृष्ण को नहीं, राधा को प्राप्त है और यह राधा उत्तर बिहार में रहने वाली एक आम औरत से अलग नहीं है। जिसका पति रोजी-रोटी के लिए निरंतर परदेश ही रहता है। पलायन की समस्या विद्यापति के सात सौ साल बाद भी जस की तस है, अकारण नहीं कि विद्यापति आज भी मिथिला में जीवित हैं। अपने पदों में समायी वेदना और करूणा के जरिए।रीतिकाल के दो बड़े कवि घनानंद और बिहारी को लें तो आचार्य शुक्ल की दृष्टि में घनानंद का पलड़ा थोड़ा नहीं, बहुत भारी है। वहाँ प्रेम की पीड़ा, स्वाभाविकता, उदात्तता सब है जबकि बिहारी में केवल एक दर्शक है। जो मध्यवर्ग से आता है और सामंती संस्कार ओढ़ता है, जिसके पास अपूर्व सौंदर्यग्राहिणी दृष्टि है, पर जो दरबारी माँग के चित्र दिखलाने में ही थक जाती है। बावजूद हम कह सकते हैं कि घनानंद में प्रेम के तमाम स्वाभाविक और करूण चित्रों के होते हुए भी तत्कालीन समय और समाज की यथार्थ पहचान बिहारी से ही होती है। ऐसे में विद्यापति की दुर्लभता, कबीर का महत्त्व और जायसी की विशिष्टता स्पष्ट हो जाती है, जहाँ प्रेम की ऊँचाई भी है, देह का स्वीकार भी और भारतीय जन-जीवन की अभिव्यक्ति है।जायसी प्रबंधात्मक प्रतिभा के कवि हैं और उनके पास इसका पर्याप्त अवसर है कि मार्मिक प्रसंगों की व्यंजना कर सकें। नागमती का विरह वर्णन तो ख्यात ही है। आचार्य शुक्ल उचित ही उस पर मुग्ध है, वियोग का समाजीकरण उसे विश्वसनीय मार्मिक देता है। शुक्ल जी ने लिखा है - रानी नागमती विरह दशा में अपना रानीपन भूल जाती है और अपने को केवल साधारण स्त्री के रूप में देखती है।... यह आशिक माशूकों का निर्लज्ज प्रलाप नहीं है, यह हिन्दू-गृहिणी की विरह वाणी है। जायसी नागमती के पक्ष में खड़े होकर नागरता की आलोचना करते हैं - नागरि नारि काहुँ बस परा। तेइँ बिमोहि मोसौं चितु हरा।इस विरह वर्णन में ÷काम' की उपस्थिति भी है - पिउ बियोग अस बाउर जीऊ। पपिहा तस बोलै पिउ पीऊ॥/अधिक काम दगधै सो रामा। हरि जिउ लै सो गएउ पिय नामा॥तो, सुख सुविधाओं की लालसा से अलग अत्यन्त नम्र शीतल प्रेम की भी झलक है - हमहु वियाही संग ओही पीऊ। आपुहि पाई, जानु पर जीऊ॥/मोहिं भोग सौं काज न बारी। सौंह दिस्टि के चाहनहारी॥और अंत में नागमती और पद्मावती का जौहर परकीया प्रेम के उस युग में गार्हस्थिक प्रेम की मर्यादा की रक्षा के लिए है, जहाँ जायसी भावुक हो उठते हैं - गिरि समुद्र ससि मेघ रवि, सहि न सकहिं वह आगि।/मुहमद सती सराहिए, जर्रे जो अस पिउ लागि।शिव कुमार मिश्र ने उचित लिखा है कि जायसी पद्मावत लिखते नहीं, रचते हैं और जैसा कि साही ने कहा है कि पद्मावत का पूर्वार्द्ध ही नहीं उत्तरार्द्ध भी जायसी की कल्पना है, तो हम जायसी की पीड़ा को समझें कि अपनी सबसे सुंदर परिकल्पना को आग में झोंकते हुए वे क्या महसूस कर रहे होंगे ? इसे इतिहास की विडंबना कहें या समकाल का दबाव। पर सच है कि कथा का यह त्रासद अंत मध्यकाल के चेहरे को और चिथरा कर देता है।मध्यकाल के ये दोनों कवि अपनी प्रतिबद्धता सहिष्णुता और स्वतंत्राता के प्रति स्थिर करते हैं। अपने समय की चिन्ता और भविष्य के सपने दोनों ही इनके पास हैं। तिरस्कार है तो क्षुद्रता का, कृतित्रामता का। स्वीकार है मनुष्यता का, विवेक का, प्रेम का। कबीर और जायसी दोनों ही कवियों के यहाँ प्रेम दर्शन की चीज नहीं, जीवन की वस्तु है। विराट सांस्कृतिक चेतना और उदार मानवता की उपस्थिति प्रेम की जमीन पर खड़े होने से संभव हो सकी है।
Tuesday, December 9, 2008
नई सदी में कबीर
Monday, December 8, 2008
सामाजिक - सांस्कृतिक क्रांति के सम्वाहक : कबीर
डॉ० जगत सिंह बिष्ट
कबीर हिंदी के संत काव्य परंपरा के प्रतिनिधि और प्रवर्तक कवि हैं। संत काव्य धारा के सांस्कृतिक एवं दार्शनिक आधार व्यापक हैं, वे आधार है : उपनिषद्, शंकराचार्य का अद्वैत-दर्शन, नाथपंथ, इस्लाम धर्म और सूफी दर्शन। यही कारण है कि हिंदी संत काव्य परंपरा वस्तुपरकता की दृष्टि से अत्यंत व्यापक है। इसी अर्थ में संत काव्य विश्व धर्म बन जाता है। एक ऐसा विश्व धर्म, जिसमें सब प्रकार के जीवों का कल्याण विद्यमान है। वह इसलिए भी कि संत कवियों ने अपने द्वारा गृहीत सांस्कृतिक और दार्शनिक आधारों के, केवल उन पक्षों का सार ग्रहण किया है, जो मानव समेत समस्त प्राणियों के लिए उपयोगी और कल्याणकारी है। यही कारण है कि हिंदी के विद्वान एकमत से संत काव्य का महत्त्व साहित्यिक दृष्टि की अपेक्षा सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक दृष्टि से मानते हैं-संत काव्य का जो महत्त्व सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक दृष्टि से है; वह साहित्यिक दृष्टि से नहीं है।१ किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि संत काव्य का महत्त्व साहित्यिक दृष्टि से नगण्य है। इतना अवश्य है कि संत काव्य में वैचारिक क्रांति की अतिशयता से, उसका साहित्यिक पक्ष दब सा गया है फिर भी संत कवि अपनी कविताओं के द्वारा, जिस सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति को व्यक्त करते हैं; वह साहित्यिकता के बिना संभव नहीं है।
कबीर संत काव्य परंपरा के सर्वाधिक प्रभावशाली कवि हैं। वे अपने काव्य में एक साथ भक्त, कवि, विचारक एवं समाज सुधारक की भूमिका में दिखाई देते हैं। कहना यह है कि संत कबीर के काव्य में भक्ति, ज्ञान और वैचारिकता का अद्भुत सामंजस्य है। उनकी वैचारिक और समाज सुधारक की भूमिका ही, उन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति का सम्वाहक बनाती है। मूलतः एक भक्त कवि होते हुए भी; उन्हें अपने समाज की पर्याप्त चिन्ता थी। उनके काव्य के दो वर्ग हैं-इनमें से प्रथम रचनात्मक है तथा द्वितीय आलोचनात्मक। रचनात्मक विषयों के अन्तर्गत सतगुरु नाम, विश्वास, धैर्य, दया, विचार, औदार्य, क्षमा, संतोष आदि व्यावहारिक शैली में भाव व्यक्त किए गए हैं। यहाँ उनकी आलोचनात्मक प्रतिभा के दर्शन नहीं होते हैं अर्थात् यहाँ मानव की हीनताओं का दिग्दर्शन नहीं कराया गया है। प्रतिपाद्य के दूसरे विषय में कबीर की आलोचनात्मक प्रतिभा व्यक्त हुई है। यहाँ वे आलोचक, सुधारक, पथ-प्रदर्शक और समन्वय कर्ता के रूप में दृष्टिगत होते हैं - चेतावनी, भेष, कुसंग, माया, मन, कपट, कामिनी आदि।२ यद्यपि संत कबीर के रचनात्मक और आलोचनात्मक दोनों ही प्रतिपाद्य विषयों में सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति के स्वर विद्यमान हैं। फिर भी उनके रचनात्मक प्रतिपाद्य विषय उपदेश एवं नीतिपरक होने के कारण, उसमें सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रांति के स्वर दब से गए हैं। जबकि आलोचनात्मक प्रतिपाद्य विषयों में संत कबीर क्रांतिकारी दिखाई देते हैं इसलिए तो हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-फिर व्यंग्य करने में और चुटकी लेने में भी कबीर अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं जानते। पंडित और काजी, अवधू और जोगिया, मुल्ला और मौलवी - सभी उनके व्यंग्य से तिलमिला जाते हैं।३ कहने में संकोच नहीं है कि संत कबीर कालजयी कवि हैं क्योंकि उनकी साखियों, पदों एवं रमैनियों में तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विकृतियों के प्रति विरोध मुखरित हुआ है। उससे कवि की संवेदना असीम हो गई है। सब बाहरी धर्माचारों को अस्वीकार करने का अपार साहस लेकर कबीरदास साधन के क्षेत्र में अवतीर्ण हुए।...उन्होंने अटल विश्वास के साथ अपने प्रेम मार्ग का प्रतिपादन किया। रूढ़ियों और कुसंस्कारों की विशाल वाहिनी से वह आजीवन जूझते रहे।४हिंदी साहित्य जगत में जब संत कबीर का अवतरण हुआ, उस समय भारत की सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक स्थिति अच्छी नहीं थी। तब भारतीय समाज हिन्दू, मुस्लिम, जैन और बौद्ध आदि प्रमुख सम्प्रदायों में विभक्त था। समाज का प्रत्येक व्यक्ति इन सम्प्रदायों में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों, मिथ्या प्रदर्शनों, अमानवीय, अप्रासंगिक रीति-रिवाजों के मकड़जाल में बुरी तरह उलझा था। सभी सम्प्रदायों से सम्बद्ध लोग, अपने-अपने सम्प्रदायों की श्रेष्ठता के प्रतिपादन में कटिबद्ध थे। अपने मत की प्रतिष्ठा के सवाल से समूचे समाज में तनाव का माहौल बना हुआ था। संत कबीर ने ऐसे अराजक वातावरण में प्रत्येक सम्प्रदाय की अप्रासंगिक एवं अमानवीय रीति-रिवाजों का खुलकर विरोध किया था। उनके आलोचना के केन्द्र में प्रमुख रूप से हिंदू और मुस्लिम सम्प्रदाय थे। क्योंकि उस समय ये दोनों सम्प्रदाय सबसे बड़े थे और इन दोनों में ही प्रतिष्ठा के सवाल बराबर खड़े होते थे। फलतः सामाजिक समरसता को खतरा उत्पन्न हो रहा था। उस समय हिंदू समाज में भी नाना प्रकार की साधनाएँ प्रचलन में थीं। इन साधनाओं में शाक्त, शैव, वैष्णव आदि प्रमुख थे। इनमें भी परस्पर घोर अंतर्विरोध था। छोटी-छोटी बातों में खून-खराबा आम बात थी। इनकी उपासना पद्धतियों में कई प्रकार की विकृतियाँ प्रविष्ट हो चुकी थीं। फलतः संत कबीर ने विविध उपासना पद्धतियों से युक्त समाज में पारस्परिक समरसता के लिए प्रेम भक्ति की साधना का उच्चादर्श प्रस्तुत किया और हिंदू समाज में प्रचलित विविध उपासना पद्धतियों के आडम्बरों के प्रति घोर विरोध व्यक्त किया था। उनके समय में शक्ति की उपासना में मांस और मदिरा का चलन था। वे स्वयं सातात्त्विक प्रवृत्ति के थे। यही कारण है कि उन्होंने शक्ति के उपासकों को खूब फटकार लगाई थी। उन्हें शक्ति के उपासक सन की रस्सी के समान लगते थे, जो भीग कर अधिक कठोर हो जाती है-साबित सण का जेबड़ा, भीगाँ सू कठ्ठाइ। (कबीर समग्र; २८/११) संत कबीर का शाक्तों से विरोध केवल अपवित्रा एवं जीव विरोधी उपासना को लेकर था। क्योंकि उनकी उपसना में हिंसा, मदिरा एवं मांस का चलन था-पापी पूजा बैसि करि भषै मांस मद दोइ। (कबीर समग्र; २९०/१३) हिंदू समाज में प्रचलित मूर्तिपूजा, जप, तप, तीर्थस्नान और माला फेरने को ढकोसला मानते थे। उन्होंने हिन्दुओं की मूर्तिपूजा पर कई स्थलों पर खिल्ली उड़ाई है- पाहन पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहार।/तातै यह चाकी भली, पीसि खाए संसार॥(कबीर समग्र, ४४१/०१)
वस्तुतः संत कबीर का मूर्तिपूजा के प्रति विरोध अकारण नहीं था। बल्कि यह विरोध गहरे यथार्थ बोध से उपजा था, जिसमें वर्षों से परिचालित हिंदुओं की जड़ एवं अप्रासंगिक मानसिकता के खिलाफ प्रगतिशील एवं क्रांतिकारी आह्वान था। इसके अतिरिक्त उन्होंने पत्थर की मूर्ति का धंधा और समाज को दिग्भ्रमित करने वाले लोगों को भी बेनकाब किया था-मूरित धरि धंधा रचा, पाहन का जगदीश। (कबीर समग्र; ४४५/३) उन्होंने हिन्दुओं में माला फेरने की परंपरा का भी खंडन किया क्योंकि वे माला पहनने की अपेक्षा हृदय में पड़ी वासना की गाँठों को खोलना हितकर समझते थे-माला पहरयौ कुछ नहीं गाँठि, हिरदा की खोल (कबीर समग्र; २९४/९) इसी प्रकार संत कबीर ने बालों को मुड़ाकर वैष्णव भक्त बनने की आडम्बरपूर्ण प्रवृत्ति पर भी दो टूक बात की थी। वे बालों को मुड़ाने की अपेक्षा मन का संस्कार करना ठीक समझते हैं-कैसों कहा बिगाडिया, जे मूँडै सौ बार/मन कौं काहे न मूँडिए, जामै विषै विकार॥ (कबीर समग्र; २९४/१२) इतना ही नहीं, उन्होंने संन्यासी की वेश-भूषा धारण करने वाले वैष्णवों को भी नहीं छोड़ा और उन्हें आडम्बरपूर्ण वेश-भूषा के बजाय विवेकपूर्ण आचरण को आत्मसात् करने की ओर प्रेरित किया-बसनों भया तौ का भया, बूझा नहीं विवेक।/छाया तिलक बनाइ करि, दगध्या लोक अनेक॥ (कबीर समग्र; २९५/१६)कबीर पोथी ज्ञान को भी अव्यावहारिक मानते हैं, उनका मानना है कि पोथियों को पढ़ने वालों को आत्मज्ञान न होकर आत्मनाश होता है। संसार में सारे पंडित पुस्तकें पढ़-पढ़कर मर गए किंतु किसी को भी आत्मज्ञान नहीं हुआ-पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा पंडित भया न कोइ। (कबीर समग्र; २८४/४) कहने की आवश्यकता नहीं है कि कबीर का यह मन्तव्य अकारण नहीं है। यह भी उनके गहरे यथार्थ बोध से उपजा है। आज के समय में जितनी भी प्रकार की विसंगतियाँ दिखाई देती हैं। उनमें से अधिकांश पोथी पाठी विद्वानों से उत्पन्न हुई हैं। चाहे जातिवाद हो, क्षेत्रवाद या फिर भाषावाद आदि।संत कबीर के समाज में हिंदू समाज में वर्ण व्यवस्था अपनी चरम सीमा में थी। समाज में ऊँच-नीच का बोल बाला था, जिससे समाज में अनेक प्रकार की विकृतियाँ पैदा हो चुकी थीं। स्वयं संत कबीर समाज में व्याप्त ऊँच-नीच और भेदभाव के भुक्तभोगी थे। अतः उन्होंने एक समाज सुधारक के रूप में हिंदू धर्म में प्रचलित वर्णों में ऐक्य स्थापित करने का प्रयत्न किया क्योंकि उनका मानना था कि विधाता ने सभी को एक ही प्रकार की मिट्टी से बनाया है उसी प्रकार जिस प्रकार कुम्हार एक ही मिट्टी से विविध प्रकार के बर्तनों का निर्माण करता है-माटी एक एकल संसारा, बहु विधि भाँडे, घडै कुम्हारा'' (कबीर समग्र; ५४६/५३) इनके अतिरिक्त वे हिंदू धर्म में प्रचलित पिंडदान प्रथा की विडम्बना पर भी कटाक्ष करते हैं। आडम्बर पूर्ण प्रदर्शनों की अपेक्षा लोकोचार को श्रेष्ठ मानते हैं। इसीलिए वे पितरों को पिण्डदान की अपेक्षा जीवित अवस्था में सेवा करने पर बल देते हैं-ताथै कहिए लोकोचार; वेद कतेब कथैं ब्यौहार।/जारि बारि काई आवै देहा, मूवाँ पीछै प्रीति स्नेहा॥/जीवित पित्राहि मारहि डंडा, मूवाँ पित्रा ले घालै गंगा।/जीवत पित्रा कूँ अन न ख्वावैं, मूवाँ पाछे प्यंड भरावै।/जीवत पित्रा कूँ बौले अपराध, मूँवाँ पीछे देहि सराध॥ (कबीर समग्र; ६७०/३५३)
संत कबीर ने हिंदू समाज में व्याप्त आडम्बरपूर्ण लोकाचारों के साथ-साथ मुस्लिम समाज के आडम्बरपूर्ण प्रदर्शनों की भी आलोचना की है। उन्होंने निर्भीक होकर दिन में पांच बार नमाज एवं बंदगी को व्यर्थ तथा असत्य कहा है-यह सब झूटी बंदनी, वरिया पंच निवाज (कबीर समग्र; २८९/५) वे हलाल को भी अनुचित मानते हैं क्योंकि वे हलाल को पूर्णतः हिंसा ही मानते हैं। वे हज यात्रा को भी व्यर्थ मानते हैं और वे हज यात्रा की अपेक्षा मन में संतोष उत्पन्न करने के पक्षधर थे-सेष सबूरी बाहिरा, क्या हज काबै जाई (कबीर समग्र; २९०/१) उन्होंने मुस्लिम सम्प्रदाय के द्वारा मस्जिद में बांग देने की परंपरा का भी मखौल उठाया है। वे मस्जिद में चढ़कर बांग देने को आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन मानते हैं-ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाई (कबीर समग्र; ४४५/१३) क्योंकि कबीर का मत था कि मुल्ला जिसको बांग देता है वह सब जीवों के अंदर विद्यमान है- जिस कारण तू बांग दै, सो दिलहि अन्दर जोय। (कबीर समग्र; ४४५/१४) उन्होंने हिंदू एवं मुस्लिम समाज में प्रचलित हिंसा का घोर विरोध किया था। वे समान रूप से, इन दोनों सम्प्रदायों से सम्बद्ध लोगों को जीव हत्या के लिए फटकारते हैं -बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल।/जो बकरी को खात है, तिनका कौन हवाल॥ (कबीर समग्र; ४८६/१८) अथवा दिन को रोजा रहत है, रात हनत है गाय।/यह खून वह बंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय॥ (कबीर समग्र; ४८७/३३)वस्तुतः दो सम्प्रदायों में प्रचलित विविध बाह्याचारों के खिलाफ जिस प्रकार से कबीर ने लेखनी चलाई थी वह कम साहस का काम नहीं है। जबकि वह ऐसा समय था जब छोटी सी बात पर खून-खराबा होना आम बात हो गई थी। इसी अर्थ में जहाँ एक ओर कबीर प्रगतिशील कवि सिद्ध होते हैं। वहीं उनकी साखी, सबद और रमैनियाँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रांति की सम्वाहक दिखती हैं। उन्होंने एक पद में हिंदू और मुस्लिम सम्प्रदाय में प्रचलित नाना प्रकार के आडम्बरों की व्यर्थता सिद्ध करते हुए लिखा है-धरती से मिट्टी उठाकर मूर्ति बनाने और उसी मूर्ति को स्नान कराने में क्या फायदा? जप और मंजन करने और मस्जिद में सिर झुकाने से क्या? रोजा रखने, नमाज अदा करने, हज के लिए काबा जाने से क्या? ब्राह्मण चौबीस एकादशी करता है। काजी एक माह रमजान रखता है। तब ग्यारह माह प्रभु को अलग क्यों रखते हो?...अगर खुदा मस्जिद में निवास करता है तो अन्य स्थानों में कौन? तीर्थों एवं मूर्तियों में राम का निवास है यह भी ठीक नहीं है...हरि पूर्व में अल्लाह पश्चिम में रहता है। यह भी ठीक नहीं है। (कबीर समग्र; ६३०/२५९) कहने की आवश्यकता नहीं है कि इससे अधिक क्रांति के सम्वाहक स्वर और क्या हो सकते हैं? जिनको कवि एक परंपरा की तमाम प्रकार की रूढ़ियों और अंधविश्वास से जकड़े समाज में रहकर भी निर्भीकतापूर्वक ललकारता है।
एक क्रांतिधर्मी के रूप में संत कबीर ने तत्कालीन भारतीय समाज में हिंदू और मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच उत्पन्न वैमनस्य की खाई को पाटने का भारी श्रम किया था। वस्तुतः तब इन दोनों सम्प्रदायों के बीच उत्पन्न वैमनस्य, इनके परस्पर विरोधी आचार-व्यवहार से उपजा था। वे दोनों सम्प्रदायों के वैमनस्य के बीच एक मध्यस्थ के रूप में खड़े दिखते हैं। उन्होंने दोनों सम्प्रदायों के बीच ऐक्य के लिए राम, रहीम, करीम, केशव, अल्लाह आदि सभी के सत्य का प्रतिपादन किया था। इसीलिए कबीर ने घोषणा की थी कि बिस्मिल्लाह और विशम्भर एक हैं। काजी, मुल्ला, पीर, पैगम्बर, राजा, पश्चिम दिशा में नमाज पढ़ना, पूर्व में एकादशी व्रत, गंगा में दीपदान सब एक हैं। मस्जिद एवं मंदिर दोनों स्थानों में ईश्वर है। हिंदू-मुसलमानों का सृष्टिकर्त्ता एक ही प्रभु है- हमारे राम रहीम करीमा केसो अल्लाह राम सति सोई।/बिसमिल मेटि विसंभर एकै, और न दूजा कोई।.../हिंदु तुरक का करता एकै, ता गति लखि न जाई। (कबीर समग्र; ५४८/५८)
इसके लिए संत कबीर ने हिंदू-मुस्लिम के बीच द्वैत उत्पन्न करने वालों को भोंदू (मूर्ख) कहा था क्योंकि उनका मानना था कि - यौनियाँ, दो धरती और अलग-अलग धर्म ये सब बीच के काम हैं। मूलतः राम रहीम एक ही हैं बोलने वाला प्रभु न हिंदू और न मुसलमान (कबीर समग्र; ५४७/५६) संत कबीर ने उसी हिंदू एवं मुसलमान को ठीक कहा है जिसका इमान ठीक है-सो हिन्दु सो मुसलमौंन, जिसका दुरस रहे ईमान। (कबीर समग्र; ६७०/३५५)
वस्तुतः संत कबीर संत काव्य परंपरा का नहीं अपितु सम्पूर्ण हिंदी साहित्य का बेजोड़ व्यक्तित्व हैं। मूलतः वे भक्त कवि हैं फिर भी वे कम विचारक एवं चिंतक नहीं हैं। इसी अर्थ में वे सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति के सम्वाहक कवि सिद्ध होते हैं। उन्होंने भक्ति एवं चिंतक के रूप में वर्षों से विविध प्रकार के मानवता विरोधी अप्रासंगिक परंपरा से जकड़े समाज को नई दृष्टि दी। वह किसी क्रांतिकारी विद्रोही कवि से कम नहीं हैं। उन्होंने भक्ति और समाज में प्रचलित बाह्याचारों के विरोध में जिन क्रांतिकारी स्वरों को व्यक्त किया था। वह कम जोखिम का काम न था किन्तु संत कबीर ने हिंदू-मुस्लिम सम्प्रदाय की परवाह किए वगैर इनकी दोषपूर्ण भक्ति भावना और बाह्याचारों की खुलकर आलोचना की थी। संत कबीर ने प्रेम भक्ति, सादगी, अहिंसा और समदृष्टि के द्वारा उदात्त मानवीय मूल्यों की सद्भावना की थी। इसीलिए तो हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है-हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई उत्पन्न नहीं हुआ।५ अतः कहने में संकोच नहीं है कि संत कबीर के द्वितीय वर्ग का आलोचनात्मक साहित्य अपनी वस्तुपरकता में सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से क्रांति का वाहक है। ऐसी क्रांति जो आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है। आज भी जब कभी सम्प्रदाय के नाम पर फसाद होते हैं, राजनेता इन फसादों के द्वारा कुर्सी की राजनीति में सक्रिय दिखते हैं और भ्रष्ट निष्कृष्ट कार्यों में लिप्त धर्माचार्यों एवं मठाधीशों के कारनामें उजागर होते हैं। तब संत कबीर की वाणी याद आती है। इस संबंध में कबीर के साहित्य के अध्येता डॉ० नजीर मुहम्मद का कथन समीचीन जान पड़ता है-कबीर एक सफल साधक प्रभावशाली उपदेशक, महान नेता और युगद्रष्टा थे। उन्होंने कविता के सहारे अपने विचारों को युगान्तर के लिए अमरता प्रदान की।६ वस्तुतः कबीर के विचारों की युगान्तर के लिए अमरता ही, उनके काव्य की प्रासंगिकता है। ऐसी प्रासंगिकता जिसकी आज के जटिल विविध जीवन संदर्भों के साथ पूर्ण संगति है। इसके अतिरिक्त कबीर काव्य के मूर्धन्य समीक्षक डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन कि - कबीर वाणी के डिक्टेटर ७ भी कहीं न कहीं संत कबीर के काव्य की प्रासंगिकता को ही व्यक्त करता है और कबीर का वाणी डिक्टेटर होना कुछ और नहीं बल्कि पुराणपंथियों, धर्म के ठेकेदारों और धर्मोन्माद फैलाने वाले तथाकथित मठाधीशों के प्रति क्रांति के स्वरों का वाहक है, जिसका लक्ष्य समाज में समरसता, अहिंसा, भाईचारा, सुख-शांति एवं समृद्धि की स्थापना करना है
संदर्भ-ग्रन्थ
१. डॉ० नगेन्द्र, हिंदी साहित्य का इतिहास; मयूर पेपर बैक्स, नोएडा, १९९७; पृ० १२४.
२. वही; पृ० १२८
३. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, १९७१; पृ० १८५
४. वही; पृ० १५९
५. वही; पृ० १८५
६. डॉ० नजीर मुहम्मद, कबीर के काव्य रूप; भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़, १९७१; पृ० 1
७. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, कबीर; पृ० १८५
Tuesday, December 2, 2008
कबीर साहित्य का समाज-दर्शन
Sunday, November 30, 2008
कबीरकालीन समाज
उस काल में बाह्य आडम्बरों का बोलबाला था। अंधविश्वासों का आधिक्य था। परन्तु कबीर ने किसी भी र्धार्मिक विश्वास लोक तथा वेद के अंधानुकरण को स्वीकार नहीं किया, बल्कि विवेकपूर्वक उन धर्मों, विश्वासों तथा पाखण्डों को अपनी ध्वंसात्मक भूमिका से तहस-नहस करके ही दम लिया। उन्होंने हिन्दू धर्म के आचारों यथा-पूजा, उत्सव, वेदपाठ, तीर्थयात्रा, व्रत, छुआछूत, अवतारोपासना तथा कर्मकाण्डों पर कबीर ने कस-कसकर व्यंग्य किया। वे बाह्याडम्बरों को अंधकार की संज्ञा देते थे।
वस्तुतः तत्कालीन समाज साम्प्रदायिकता से परिपूर्ण था। वह काल दो धर्मों, दो संस्कृतियों एवं सभ्यताओं के संघर्ष का था। दोनों के मध्य टकराव, भेद व झगड़े के हालात थे, इसीलिए कबीर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समानता का प्रतिपादन करके उन्हें एकता के सूत्र में बाँधना चाहते थे। उनका यह समन्वयवादी दृष्टिकोण सापेक्ष नहीं निरपेक्ष है। उन्होंने अपने युग की गलत विचारधाराओं की निडरतापूर्वक आलोचना की तथा निराकार ब्रह्म की उपासना की।
डॉ० ताराचंद के अनुसार-प्रेम के ऐसे धर्म का जो सभी धर्मों और जातियों को संगठित कर दे, का प्रचार करना ही कबीर के जीवन का लक्ष्य था। उन्हें हिन्दुत्व एवं इस्लाम के उन तत्त्वों को जो कि आध्यात्मिक कल्याण के लिए नहीं थे, अस्वीकार कर दिया।
यथार्थ तो यह है कि कबीरकालीन समाज पाखण्डों से परिपूर्ण था। जप, तप, संयम, स्नान, ध्यान आदि का बोलबाला था। परन्तु कबीर की मान्यता थी कि जब तक आराध्य के प्रति भक्तिभाव नहीं है, तब तक सब कुछ व्यर्थ है। उस काल में कर्म मार्ग तथा ज्ञान मार्ग का प्रचलन था, पर कबीर भक्ति मार्ग को सर्वश्रेष्ठ मानते थे। लेकिन उनकी भक्ति-साधना में वेदशास्त्र, ज्ञान, यज्ञ, तीर्थ, व्रत तथा मूर्तिपूजा के लिए कोई स्थान नहीं था। उनका भक्ति भाव शक्ति में निहित था। वे न तो मंदिर की आवश्यकता महसूस करते थे और न ही मस्जिद की। वे तीर्थस्थानों को भी गैर-जरूरी मानते थे। पर उनके अनुसार इस हेतु गुरु की कृपा आवश्यक है। उनकी भक्ति में गुरु का स्थान सर्वोच्च था। वे कहते थे कि गुरु वह साधु है जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त है।
वस्तुतः कबीर के काल में सामाजिक विकार अपने चरम पर थे। उस काल में हिंदू समाज की जाति प्रथा, नारी वर्ग का नैतिक अवमूल्यन, परदा प्रथा, बाल-विवाह आदि का व्यापक अस्तित्व था। निम्न जातियों पर उच्च वर्ग का घोर अत्याचार शिक्षा के अभाव में जादू-टोना, शकुन-अपशकुन, जीव हिंसा, मांस-भक्षण, वेश्यागमन, अंधविश्वास आदि के कारण समाज की जड़ें खोखली हो रही थीं। इसीलिए कबीर ने तटस्थ होकर सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं को निहारा था और अपने प्रबल व्यक्तित्व से इन्हें मिटाकर एकत्व की स्थापना का निश्चय किया था।
मध्यकालीन समाज-सुधारकों में कबीर पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने समाज के आर्थिक ढांचे को समझने का प्रयास किया। कबीर धन को समाज के लिए एक सीमा तक ही जरूरी मानते थे।क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी कबीर के बारे में यह कहना पूर्णतः सही है कि उन्होंने तटस्थ होकर सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं को निहारा था और अपने प्रबल व्यक्तित्व से इन्हें मिटाकर एकत्व की स्थापना का निश्चय किया था। वास्तव में कबीरकालीन युग सामाजिक व धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक जटिलताओं का था। उस काल में धर्म, जाति, पूँजी आदि के आधार पर अनेक सम्प्रदाय थे, वे समस्त संप्रदाय एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे। कबीर का चिन्तन था कि व्यक्ति को सच्चा, ईमानदार तथा द्वेष रहित होना चाहिए। वे विचारों की पवित्रता व मन की शुद्धता को प्रधानता देते थे। उन्होंने मानवतावादी दृष्टिकोण को महत्त्व दिया।
वस्तुतः कबीर मानवतावादी विचारधारा के प्रति गहन आस्थावान् थे। वह युग अमानवीयता का था, इसीलिए कबीर ने मानवता से परिपूर्ण भावनाओं, संवेदनाओं व चेतना का प्रसार करने का प्रयास किया। हकीकत तो यही है कि कबीर वर्ग-संघर्ष के विरोधी थे। वे समाज में व्याप्त शोषक-शोषित का भेद मिटाना चाहते थे। जाति प्रथा का विरोध करके वे मानव जाति को एक-दूसरे के समीप लाना चाहते थे।वास्तव में कबीर ने युग-युग से प्रताड़ित, पीड़ित समाज के निम्न वर्ग को अपनी ओजस्वी वाणी द्वारा ऊपर उठाया तथा उनमें आत्मसम्मान जगाया। इसीलिए डॉ० ताराचंद का कथन था- कबीर के शिष्यों की संख्या उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि उनका प्रभाव। यथार्थ तो यह है कि विषम परिस्थितियों में कबीर के जन्म ने उन्हें हिन्दू-मुसलमानों की समान रूप से आलोचना करने में समर्थ बनाया था।डॉ० ताराचंद का कहना था- प्रेम के ऐसे धर्म का जो सभी धर्मों और जातियों को संगठित कर दें, का प्रचार करना ही कबीर के जीवन का लक्ष्य था। उन्होंने हिन्दुत्व एवं इस्लाम के उन तत्त्वों को जो कि आध्यात्मिक कल्याण के लिए नहीं थे, अस्वीकार कर दिया।
कबीर भावुक थे, इसीलिए उनसे समाज की दशा देखी नहीं गई। बाह्य आडम्बर, असत्य, अनाचार, व्यभिचार तथा वर्ण भेद के प्रति उनकी प्रतिक्रिया एवं क्रांति के समान थी। वे अहिंसक क्रांति की भावना द्वारा राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक सभी क्षेत्रों में एक क्रांति पैदा करना चाहते थे, उनके पास क्रांति का अस्त्र व्यंग्य था। इसीलिए डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार -हिन्दी में आज तक ऐसा जबरदस्त व्यंग्य लेखक पैदा ही नहीं हुआ। वस्तुतः कबीर ने तत्कालीन समाज में व्याप्त धर्म की अकर्मण्यता से समाज को हटाकर उसे सहज बनाकर जन साधारण के लिए ग्रास बनाया। सच्चे अर्थों में कबीर एक क्रांतिकारी समाज सुधारक व प्रखर विचारक थे।
Wednesday, November 26, 2008
लोक-वेदनाओं की उपज : कबीर
डॉ० बलदेव वंशी
लोक है क्या? किसे कहें लोक? लोक की सीमाएँ क्या हैं?हमारी दृष्टि में वह सब लोक हैं, जो पर-लोक नहीं हैं। हमारे यहाँ दो ही विभाजन हैं-एक लोक हैं इहलोक और दूसरा परलोक है। लोक के परे पर-लोक है। अतः जो कुछ इस धरा पर है, ब्राह्मण में है, वह सब लोक है। पेड़-पौधे, पत्थर-पहाड़, नदियाँ-झरनें, आकाश-नक्षत्र, धरती-सागर, पशु-पक्षी, जीवन-जन्तु और मनुष्य-ये सब मिल कर बनता है हमारा लोक। इस सब में प्राण चेतना का प्रसार है। कहीं कम, कहीं अधिक। जब इन में सोयी हुई चेतना जगा दी जाती है तब ये सब अपनी मृत्तिका-धर्म भूल कर, ऊर्जस्वित होकर चैतन्य-धर्म में जाग उठते हैं और हल्के बन जाते हैं। मृत्तिका-भार तिरोहित हो जाता है। पत्थर तक चैतन्य हो जाने पर हल्के हो समुद्र पर तैरने लगते हैं। लंका जाने हेतु समुद्र पर बनाया गया पुल-उसके पत्थरों का पानी पर तैरना इसी से संभव हुआ क्योंकि राम ने उनके चैतन्य को जगा दिया। इन्हीं अर्थों में चैतन्य होकर गिलहरी भी राम-काज में जुट गयी। राम के प्रेम-सिक्त स्पर्श-उसकी पीठ पर हाथ फिरा देने से उंगलियों से पड़ी धारियाँ आज तक उस याद को बनाये हुए हैं। यह बात कितनी भी अयथार्थ लगे, किन्तु है कितनी भावनापूर्ण! लोक-विश्वास में पगी। भालू, वानर, पेड़, पौधे-सब चैतन्य हो वनवासियों, आदिवासियों के साथ रामकाज में जुट गये! तो यह है हमारा लोक। लोक की जाग्रत चेतना ही आलोक है!
वर्तमान समाज को लोक तथा उसकी चेतना से जुड़ना होगा : आज मनुष्यों के समाज अपने सम्पूर्ण परिवेश से कटे-अपने प्राकृतिक दाय की पहचान व चेतना से प्रायः शून्य हैं। मनुष्यों ने अपने विकास, जो मात्र भौतिक सुख-सुविधा के विकास हैं, के क्रम में अपने पूरक तत्त्वों और घटकों को भुला दिया है। नतीजा सामने है। मनुष्यों की सभ्यताओं का विकास अलग है और पर्यावरणों का विकास अब जाकर बीसवीं शती के उत्तर में चिंता का विषय बना है। वह भी अधूरे सोच और अधूरे मन से। भारत तो और भी फिसड्डी दशा में है। यहाँ बडे-बड़े बाँध बनाने के लिए समूचा परिवेश उजाड़ा जा रहा है। पर्यावरण शब्द पुनः अधूरे सोच का शब्द है। इससे भी पहले वातावरण शब्द चलता था। भारतीय सोच का वास्तविक शब्द परिवेश है। यह मात्र आवरण नहीं, जो हमें चारों ओर से ढके है। परिवेश हमारा अभिन्न है। जैसे आत्मिक-मानसिक अस्तित्वों को दैहिक अस्तित्व आवेष्टित किए हुए है, ऐसे ही हमारे सामूहिक अस्तित्व को आवेष्टित किये है हमारा परिवेश।
आधुनिकता अपनी ज्ञान-विज्ञान की सारी उपलब्धियों, सुविधाओं के रहते जिन समाजों का निर्माण कर पायी है, वे सब अपने आप में अधूरे, अपूर्ण, एकायामी, खोखले साबित हो रहे हैं। इसीलिए सारी विचारधाराएँ भी चरमरा कर गिर गयी हैं। वे अपने आशयों में कितनी ही मानव-हितैषी हों, पर हैं अधूरी। मनुष्य के बाहर की चिंता से जुड़ी। ये विचारधाराएँ ऐसे मॉडल प्रस्तुत करती हैं, जो मूलतः प्रायोगिक हैं। कारखानों में बने उत्पाद की तरह मनुष्य को लेती हैं। कारखानों में किसी उत्पाद के अलग-अलग अंगों की र्निर्मिति और भिन्न-स्थान पर उन अंगों का एकत्रीकरण होता है। अलग-अलग पुर्जे। अलग-अलग बनाने वाले। यानी सारे कौशल पृथक-पृथक विशेषीकृत। परस्परता के बोध से वंचित। भिन्न पुर्जे तक की कोई जानकारी नहीं दूसरे को। समूचापन कहीं नहीं। उत्पाद बनकर तैयार हो गया। उपभोक्ता-मूल्य चुकाने वाले के अधिकार की वस्तु बन गया उत्पाद। बनाने वाले की कहीं झलक नहीं। पहचान नहीं। छुअन नहीं। सब मशीनी, यांत्रिक। यों द्वन्द्व, दौड़, दुराव जहाँ पहुँचाता है, वहीं खड़ा मिलता है-समाज। लोक नहीं। लोक अपनी निर्मितियों में, अपने संघर्षों में, संकल्पों में, अभियानों में जुड़ी निम्नतम् इकाई तक सदैव अपनी पहचान, स्पर्श, झलक पाता है। एक स्थान पर कबीर ने कहा भी है कि मैं साधारण लौकिक और वैदिक मान्यताओं के अनुसार अन्य जनों की भाँति चल रहा था उन मान्यताओं के पीछे घूम रहा था -पीछै लागा जाए था, लोक वेद के साथि।/आगै थैं सतगुरु मिल्या, दीपक दीया हाथि॥
लोक वेद की सामान्य परिपाटी और विश्वासों के साथ चलने का अभिप्राय प्रायः परम्परा के विश्वासों को निभाना है। चलने में सम्मिलित होना है। जरूरी नहीं कि इससे सत्य की अनुभूति भी उपलब्ध हो। यह कार्य सतगुरु ने किया। मर्म समझा दिया। प्रकाशित दीपक हथेली पर रख दिया। चैतन्य की प्रकाश की अनुभूति करा दी। अज्ञान-अंधकारभरी भटकन समाप्त हो गई। सब कुछ साफ-साफ दीखने लग गया। लोक में प्रचलित वैदिक परम्पराएँ, जो वैदिक-सत्यों से मेल नहीं खाती थीं, उन का ज्ञान भी कबीर को हुआ। वह लोक की सत्य, सहज की मूल अनुभूतियों को भी पहचान पाये। पशु-बलि, शूद्र-घृणा की प्रचलित अवधारणाओं से कटे और कहा-संतों पाण्डे निपुण कसाई। अतः बाद में कबीरपंथियों ने पृथक वेद-स्वसंवेद की अवधारणा को अपनाया।
लोक में ही चैतन्य-संभावनाएँ निहित रहती हैं। प्राकृत संभावनाएँ। शेष तो धीरे-धीरे मिट्टी के, बनावटी अ-प्राकृत हाथों बने संसार में खो जाता है। लोक की चेतना से दूर हो जाता है। लोक की चेतना में दूर हो जाता है। विस्मृति के गर्त्त में चला जाता है।तो इस लोक में बड़ी संभावनाएँ लुकी-छिपी-धरी हैं। यह प्राकृत खजाना है शक्तियों का। सभी प्रकार की शक्तियों का। शक्ति के सारे आयाम सुरक्षित पड़े रहते हैं यहाँ। अक्षय। आखुट। लोकनायक कभी बाहर से नहीं आया करते। भीतर से ही उत्पन्न होते हैं सदा। हुए हैं। प्राकृत शक्तियों को जानने-समझने वाले। इन के गर्भ से ही वे उत्पन्न होते हैं। नाभिनाल बद्ध। कबीर भी कोई अलग नहीं थे। वह लोक चेतना के ही संवाहक थे। लोकचेतस थे। लोक को चेतना देने वाले लोक वेदनाओं की उपज। विद धातु से बना वेद शब्द ज्ञान का अर्थवाह है। इसी वेद से वेदना शब्द का विकास है। अर्थ हुआ वह ज्ञान जो लोक की पीड़ाओं की पहचान हो-पीड़ाओं के गर्भ से जन्मा हो : वेदना है। समूची भाव सत्ता का वाचक। लोकनायक इसी भाव-सत्ता-वेदना की वैध संतान होते हैं। इसी सोचे हुए महाकार वेदना-भाव और कंस की भी। दोनों पक्ष अपनी-अपनी वेदना के सच्चे होने का दावा करते हैं। तब, किस की वेदना सच्ची है? प्रकृत है? लोकमयी है? या सत्तामयी, स्वार्थसनी है? वेदना के अन्तः-सत्ता स्वरूप-प्रकृति को जानने के उपाय हैं। हमारे यहाँ जितने भी मूल्यधर्मी शब्द हैं, वे लोकधर्मी शब्द भी हैं।
उनकी बनावट ही अपने में लोकधर्मिता के भी अर्थों-आशयों-आयामों को छिपाये हुए है। अतः कबीर को वैदिक मान्यताओं का विरोधी मानने का कोई कारण सामने नहीं आता। वैदिक मान्यताओं के विकृत प्रयोग और बाद में आयी व्यावहारिक विकृतियों के विरूद्ध वह जरूर थे। अन्यथा वह वेदों में उल्लिखित अध्यात्म अनुभूति, मानवीय समता, प्रकृति-सत्यों को ही आगे बढ़ाने वाले, विकृतियों को शोधित कर अधिष्ठित करने वाले मानववादी महान संत हैं।एक उपसर्ग है सम् । इस सम् उपसर्ग के द्वारा उक्त लोकधर्मी-मूल्यधर्मी अर्थ-आयाम निर्धारित होते हैं और यह उपसर्ग ही वेदना की प्रकृति, स्वरूप और सत्यता को खोलता है। सम्+वेदना=संवेदना शब्द हमें सिर्फ वेदना से नहीं, लोकधर्मी वेदना से जोड़ता है। सम् परार्थमुखी, समता वाचक सापेक्षता बोधक है, जो आत्मा, चेतना के धरातल पर हमें पर से-लोक से, समाज से जोड़ देता है; हमारी सोच, बोध, ज्ञान को, वैयक्तिकता की सीमाओं में सीमित न बनाये रखकर संवेदना अन्य पर, भिन्न, दूसरे से जोड़ देती है। लोक से जोड़ देती है। अतः सम्बन्ध, संवेग, सम्बुद्धि, संयोग, आदि अनेक शब्द हैं जो बन्ध, वेग, बुद्धि, योग आदि की एकांगिता, वैयक्तिता के सीमित, (मनमानेपन, कुछ अर्थों में लोक-समाज निरपेक्षता) के विपरीत व्यापक, प्राकृत, सत्य अर्थों से जोड़ देते हैं। अतः लोकनायक इस संवेदना से युक्त होकर लोक से स्वयं भी जुड़ता है और लोक के विभिन्न घटकों को परस्पर जोड़ कर लोक शक्ति को बढ़ाता है। बिखरी हुई लोक-शक्ति का संग्रह करके उन्हें परस्परता के सूत्रा में पिरोता, संगठित करता है। इन्हें धार्मिक अर्थों में कहें तो लोक में सोयी हुई चेतना को परस्पर के संवेदनामय ज्ञान के द्वारा जगाकर संग्रह करना, फिर संग्रहित चेतना को संगठित करके लोकहित में उसका प्रयोग कर लोक को त्राण देना है। अतः कहना न होगा कि संवेदना, चेतना, शक्ति लोक में ही निहित है।
लोकनायक उसको लक्ष्य करता, जगाता, संग्रह करके संगठित करके अन्याय, असत्य से भिड़ा देता है। अन्याय-अत्याचार को परास्त कर के त्राण दिलाता है।उक्त संदर्भों के प्रकाश में कबीर भी लोकनायक हैं। उन्होंने भी समाज की सोयी, शक्तियों को जगाया। प्रभु वर्ग द्वारा उपेक्षित-अपमानित, बिखरी शक्तियों को एकजुट किया और अपने युग की बर्बर राजसत्ता के सामने चट्टान की तरह अड़ा दिया। इस चट्टान को सल्तनत और उसकी समूची सैन्य शक्ति हिला नहीं पायी। दूसरी ओर हिंदू और मुस्लिम समाज की श्रेष्ठ-वर्गीय, प्रभुवर्गीय शक्ति-चाहे वे मुल्लाओं की हो या ब्राह्मणों की, उसके विरूद्ध भी कबीर ने एक जबरदस्त तेजस्वी मोर्चा खोल दिया। कहाँ तो पिसे-कुचले-दबे वर्ग श्रेष्ठी-वर्ग के लोगों से त्रस्त रहते थे-भयभीत और त्रिणवत काँपते हुए और फिर कबीर के संसर्ग में आकर इन श्रेष्टियों पर मुस्कुराने, इनकी मूर्खताओं पर हँसने लगे। उनकी मुस्कुराहट और हँसी के पीछे कबीर के वे तर्क होते जो पंडित मुल्ला-दोनों की हँसी उड़ाते-कहु पंडित सूचा कवन ठांउ।/जहाँ बैसि हउं भोजन खांऊ॥/मामा जूठा, पिता भी जूठा, जूठे ही फल लागे अथवा क्या अजू जप मंजन कीएं क्या मसीति सिंरू नाएँ।/दिल महिं कपट निवाज गुजारै क्या हज काबै जांए॥
कबीर ने कुचले मरे हुए लोगों में साहस, निर्भयता, आत्मविश्वास के भाव और आत्म-गौरव की भावना भर दी। लोक की पहचान और ढूँढ आरम्भ होती है उस निम्नतर इकाई की अस्मिता के स्वीकार से और उसे महत्त्व देने से, जो अपनी अस्तित्व-सत्ता से धरती पर विद्यमान है। जिससे स्वयं को लोक में स्थित उस निम्नतम इकाई के स्तर पर उतार कर जो प्राणीमात्र की पीड़ा से जो सहज उत्साह में जुड़ा हो। संतो और भक्तों के साम्य की इस दिशा को घटित किया। जिसे समाज आज खोये दे रहा है। मात्रा दैहिक-भौतिक साम्य के परिवर्तन और दावे आज जिस तरह टूट-बिखर कर निरस्त हुए जा रहे हैं, उन्हें देखते यह और भी स्पष्ट और सुनिश्चित हो गया है कि अध्यात्म की उस सार-स्थली पर घटित होने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया को अपनाया जाये। इस पुख्ता, सदियों से आजमाये हुए, सर्व सिद्ध आधार पर वास्तविक साम्य आता है, परिवर्तन घटित होता है, जिस चट्टानी मजबूती के शिखर पर कबीर ने खड़े होकर अकेले ही तत्कालीन राजशाहियों, धार्मिक रूढ़ियों, आडम्बरों, अमानवीयताओं की अंध महाशक्तियों को ललकारा था। लोकशक्ति उनके साथ जुट आयी थी। लोक-विश्वास उन्होंने अर्जित किया था। वह लोक मानस के गहरे पारखी थी। उनकी भाषा भी लोक-चेतना की गहरी पकड़ का प्रमाण देती है। उन्होंने लोक में प्रचलित प्रतीक, घटनाएँ, क्रियाएँ, दृष्टांत, रूपक और शब्दावली ग्रहण की। अपनी बात सीधे-सीधे लोक हृदय में उतारी। लोकवाणी में प्रचलित शब्दावली-सूली, चक्की, धोबी, साबुन, तलवार, म्यान, ठगिनी, चदरिया, चोला, कुम्हार, खाल, लोहार, कुंभ, ओस, प्यास, कतना, बुनना, पासा, चौपड़ आदि लोक-प्रसिद्ध मुहावरों, लोक-उक्तियों तक का प्रयोग इस तरह किया कि उनकी मार्मिक बातें अपने मूल आशय के साथ सीधे लोक-चित्त पर अपना असर करें।
वैदिक युग (कृत युग) पूर्व की प्रकृति, सत्य, प्रकाश, जो वैदिक वाङ्मय का आधार है, चैतन्य ज्योति के मूल स्रोतों को कबीर ने लक्ष्य किया और वाणी दी। बाद में आये कृत्रिाम परिवर्तनों के कारण कबीर ने कागज की लेखी को अस्वीकार किया और मूल-चैतन्य की अनुभूति से जुड़ने की राह दिखाई। इस कारण कबीर वाणी को स्वसंवेद भी कहा जाता है। वेद सत्य एवं तथ्य को समक्ष रखते हैं। उनकी अनुभूति तो व्यक्ति की अपनी क्षमताओं पर निर्भर करती है या गुरु कृपा पर। यह तथ्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है कि कबीर का सारा बल इस धरती पर विद्यमान जीवन पर और स्वसंवेद पर है। जीवन को लेकर ज्ञान की अनुभूति पर। वेद मात्रा ज्ञान ही नहीं, अध्यात्म ज्ञान है। सम्यक् अर्थ में। ज्ञान का अर्थ सांसारिक जानकारियाँ या सूचनाएँ मात्र नहीं। यह ज्ञान मानसिक धरातल से जुड़ा रहता है इसलिए मिथ्या या झूठ एवं भ्रामक होता है। कबीर या संत जिस ज्ञान की बात करते हैं वह मन के तिरोहित होने पर आंतरिक अनुभूति के साक्षात्कार से उत्पन्न होता है। मन से नहीं, स्व और अस्तित्व से जुड़ा होने से स्वानुभूत होता है। यह ज्ञान बांधता नहीं, भ्रमित नहीं करता, मुक्त करता है। भ्रमों का निवारण करता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति के तीन मार्गों के ज्ञान के अतिरिक्त कर्म और भक्ति को भी इन्हीं अर्थों में लेना होगा। वे भी तभी मुक्तिदायी बनते हैं।
युग पुरुष सदा ही अपने युग की दैहिक, मानसिक, आत्मिक-तीनों अस्तित्वों की व्याधि को पहचानता, समझता है तभी उपयुक्त निदान-उपचार भी कर पाता है। जड़ता (यथास्थिति) को गतिशीलता में बदलकर रूढ़ियों (मनोरोगों) को मिटाकर धार्मिक आडम्बरों (अमानवीय-व्यवहारों) का खण्डन करके समूचे राष्ट्र जीवन को पुनः स्वस्थ (स्व में स्थित) बनाता है। इसे ही युगीन परिवर्तन की संज्ञा दी जाती है। ये आमूल एवं समग्र परिवर्तन ही वास्तविक प्रगतिशीलता लाते हैं। कबीर भी ऐसी ही प्रगतिशीलता को लाये।कहना न होगा कि आज पुनः लोक का मार्ग अवरूद्ध है। शोषण, छद्म, अन्याय, हिंसा, हत्या की सामूहिक कार्यवाहियों से समूचे लोक का उच्छेदन, विनाश हो रहा है। लोक हत्यारी शक्तियाँ लोकविरूद्ध, लोक-विद्वेषी नीतियों से तरह-तरह की विनाश लीला रच रही है। नैसर्गिक प्रकृति से लेकर प्राणिमात्र और मानवी प्रकृति तक सब संत्रस्त है। उत्पीड़ित हैं। किन्तु बिखरे हुए। इन स्थितियों का पुनः राजनीतिक स्वार्थमय दोहन करने के लिए अनेक राजनीतिक गिद्धदृष्टि लगाये रहते हैं। इनमें कुछ हितैषी बनने-होने के मुखौटे लगाकर या टुच्ची बक्शीशनुमा रियायतें देकर युगों से उत्पीड़ित, पिसे, शोषित लोक को भ्रमित करते रहते हैं। इन बिखरी लोक शक्तियों को आज एकत्रा होना है। भारत में सबसे पहले इन बिखरी शक्तियों को एकजुट करने वाले नायक कबीर की शिक्षाओं को पुनः अपने कर्म का हिस्सा बनाना है। तरह-तरह की विभेदकारी पूजा पद्धतियों के दलदल से बाहर आना है। इन व्यर्थ के जंजालों को छोड़ना और मुक्त होकर अस्तित्व की लड़ाई लड़नी है। स्वाभिमान, न्याय और बराबरी की लड़ाई लड़नी है।
सभी वर्तमान कबीरपंथी, आचार्यों पर यही दायित्व जाता है कि वे मिलकर पूजापद्धतियों की भिन्नताओं के संकीर्ण दायरों की धुंध से कबीरपंथियों को बाहर लायें। उन्हें आज की, तेजी से बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने सोच-व्यवहार को बदलने की शिक्षाएँ दें। सच्चा कबीरी नेतृत्व प्रदान करें। अन्यथा भ्रष्ट राजनीतिक स्वार्थी नेतृत्व इन्हें कहीं का न रहने देगा। न घर का, न घाट का,। न राम का, न रहीम का। न दुनिया का न दीन का!
Saturday, November 22, 2008
साम्प्रदायिक सद्भाव के आदर्श सदगुरु कबीर साहब
देश की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान वैयक्तिक जीवन के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न संत कबीर ने किया। उन्होंने बाँह उठाकर बलपूर्वक कहा - कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ॥धार्मिक आडम्बरों और विषमताओं का उन्होंने खुलकर विरोध किया। बाह्याडम्बरों का त्याग तथा सदाचारी सत्य जीवन उनके पथ का सम्बल था वह धर्म निरपेक्षता के प्रबल समर्थक थे।आज से लगभग छः सौ साल पूर्व संत कबीर ने साम्प्रदायिकता की जिस समस्या की ओर ध्यान दिलाया था, वह आज भी प्रसुप्त ज्वालामुखी की भाँति भयंकर बनकर देश के वातावरण को विदग्ध करती रहती है।
देश का यह बड़ा दुर्भाग्य है कि यहाँ जाति, धर्म, भाषागत, ईर्ष्या, द्वेष, बैर-विरोध की भावना समय-असमय भयंकर ज्वालामुखी के रूप में भड़क उठती है। दस बीस हताहत होते हैं, लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। भय, त्रास और अशांति का प्रकोप होता है। विकास की गति अवरूद्ध हो जाती है।कबीर हिन्दू-मुसलमान में, जाति-जाति में शारीरिक दृष्टि से कोई भेद नहीं मानते। भेद केवल विचारों और भावों का है। इन विचारों और भावों के भेद को बल धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिकता से मिलता है। हृदय की चरमानुभूति की दशा में राम और रहीम में कोई अंतर नहीं। अन्तर केवल उन माध्यमों में है जिनके द्वारा वहाँ तक पहुँचने का प्रयत्न किया जाता है। इसीलिए कबीर साहब ने उन माध्यमों-पूजा-नमाज, व्रत, रोजा आदि का विरोध किया। अल्लाह, भगवान, कृष्ण, करीम, खुदा, राम आदि जन-प्रचलित ईश्वर वाचक सब शब्दों का अपनी वाणियों में प्रयोग करके सबका ईश्वर एक है, यह दिखाने का प्रयत्न किया - कहै कबीर मैं हरि गुन गाऊँ, हिन्दू तुरक दोउ समझाऊँ।/हिन्दू तुरक का करता एकै, ता गति लखी न जाई॥समाज में एकरूपता तभी संभव है जबकि जाति, वर्ण, वर्ग, भेद न्यून से न्यून हो। संतों ने मंदिर-मस्जिद, जाति-पाँति के भेद में विश्वास नहीं रखा। सदाचार ही संतों के लिए महत्त्वपूर्ण है। कबीर ने समाज में व्याप्त बाह्याडम्बरों का कड़ा विरोध किया और समाज में एकता, समानता तथा धर्म निरपेक्षता की भावनाओं का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने धर्म के नाम पर होने वाले व्यर्थ के झगड़ों और हिन्दू-मुसलमानों की परस्पर विरोधी भावनाओं का खुलकर विरोध करते हुए कहा- हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहमाना।/आपस में दोउ लरि लरि मुए, मरम न काहू जाना॥
कबीर ने सामाजिक व्यवस्था को विकृत करने वाली रूढ़ियों, पाखण्ड, रीति-रिवाजों और मिथ्याचार के विरूद्ध जनता में विद्रोह की भावना उत्पन्न कर दी। संत कबीर ने हिन्दू तुरक का करता एकै और राम-रहीम सबनु में दीठा कहकर हिन्दू- मुसलमान के भेद को मिटाने तथा दोनों को समीप लाने का प्रयास किया। कबीर ने अनेक व्यावहारिक उदाहरण समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर भजन-पूजन, नमाज, रोजा आदि साधनों की अनेकता और साध्य की एकता का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए धर्म निरपेक्षता को आधार प्रदान करते हुए कहा है - पूरब दिशा हरी को बासा, पश्चिम अल्लह मुकामा।/दिल में खोजि दिलहि मा खोजो, इहै करीमा रामा॥
कबीर विश्व-धर्म-मानवता के समर्थक थे। वे ज्ञान-भक्ति, वैराग्य, एकता तथा मानव धर्म के प्रेरक थे। अपने-अपने अहं में डूबे हुए एक-दूसरे के धर्मों को बुरा बताने वाले हिन्दू-मुसलमानों से उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा - अव्वल अलह नूर उपाया, कुदरत के सब बन्दे।/एक नूर ते सब जग उपज्या कौन भले को मन्दे॥संतों ने विविध धर्मों को ईश्वर तक पहुँचाने के विभिन्न मार्ग बताया-नारायण औ नगर के रज्जन पंथ अनेक/कोऊ आवै केहि दिसि आगे स्थल एक। सच्चा धार्मिक कभी सम्प्रदायवादी नहीं हो सकता। उसकी दृष्टि में तो विश्व विशम्भर का ही रूप है।
कबीर के काल में जितना भयंकर हिन्दू-मुसलमान का भेद था, उतना ही भयंकर ब्राह्मण और शूद्र का भी भेदभाव था। भारतवर्ष में वर्णव्यवस्था, जाति-प्रथा और ऊँच-नीच की भावना प्राचीनकाल से चली आ रही है। हिन्दू विचारों में उदार लेकिन व्यवहार में कट्टर रहे, वसुधैव कुटुम्बकम् की दुहाई देकर भी आठ कनौजिया नौ चूल्हे बनाये रहने का व्यवहार रहा। ज्यों कला के पात में पात, पात में पात, त्यों हिन्दुन की जात में जात, जात में जात का प्रचलन रहा। यह देश की बड़ी विडम्बना है कि किसी जाति में जन्म लेने से कितने भी उच्च आचरण करने वाले व्यक्ति को केवल जन्म के कारण इतना नीच समझा जाये कि उनके छूने मात्र से छूत लगने और पापी बनने का भय हो। इस घातक प्रभाव को कबीर की आँखें बड़ी करूणा और क्षोभ से देख रही थीं। उन्होंने अहंकारी ब्राह्मण को फटकारा और हीनता की भावना से पराभूत शूद्र को झकझोर कर जगाते हुए कहा - काहे को कीजै पांडे छोत विचारा।/छोत ही से उपजा सब संसारा॥/हमारे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध।/तुम कैसे ब्राह्मण पांडे हम कैसे सूद॥
संत प्रवर सद्गुरु कबीर की विवेकधारा के समक्ष तात्कालिक सम्पूर्ण ज्ञान दंभी समाज निरूत्साहित सा जान पड़ता है। उन्होंने सबकी उत्पत्ति को समान बताते हुए उसमें ईश्वरीय सत्ता का आभास कराते हुए कहा है - एक बूँद एकै मल मूतर, एक चाम एक गूदा।/एक जोति थे सब जग उतपना, को ब्राह्मन को सूदा॥तथा उच्च स्वर से उद्घोषित किया - ऊँचे कुल का जनमियाँ, करनी ऊँच न होय।/सुवरन कलस सुरा भरा, साधू निन्दा सोय॥
पहले वर्ण व्यवस्था केवल कामों का बँटवारा थी। वर्ण को लेकर आपस में छूआछूत और ऊँच-नीच का भाव न था। जबसे वर्ण व्यवस्था उत्तरोत्तर कठोर होती गयी और मोटा काम करने के प्रति तथा कथित उच्च वर्ण वालों के मन में घृणा पनपती गयी। तब से मोटा काम करने वालों के प्रति अछूत होने की भावना बढ़ती गयी। मोटा काम करने वाले कर्मकारों के कर्मफलों का समाज ने भरपूर उपयोग किया, लाभ उठाया, पर इन मोटे कामों के करने वालों को अछूत समझा, हेय माना कपड़ा, ठाठ से पहनकर कपास पैदा करने वाले किसान, रूई धुनने वाले धुना, कपड़ा बुनने वाले कोली या जुलाहा, रंगने वाले रंगरेज, सीने वाले सूजी या दर्जी, धोने वाले, धोबी सभी तो निम्न जाति जन्मा है अछूत हैं। सब्जी उगाने वाले, फल-फूल उगाने वाले, तेल तैयार करने वाले, बर्तन बनाने वाले, सफाई करने वाले, चमड़े का काम करने वाले, मकान बनाने वाले सभी निम्न जन्मा अछूत हैं। कर्मकार जिनके परिश्रम से समाज सुखी है, उन्हीं को हमने घृणा की दृष्टि से देखा। संत कबीर ने इन त्रुटियों को परखकर कर्मकारों की पक्षधरता की। कबीर ने कर्मकार ज्ञानियों की विशाल वाहिनी का सूत्रापात किया। जिनमें सदन कसाई, धना जाट, नानक खत्री, दादू धुनियाँ, रैदास, चरनदास, पीपा, सेन, गुलाल साहब आदि निर्गुणियाँ संतों की धारा ही चल पड़ी।
इन निर्गुणियाँ संतों ने अपने हाथों से अपना काम करके जीविकोपार्जन को ही श्रेष्ठ समझा। मन से वैरागी होते हुए भी उन्होंने किसी मठ-मंदिर का सहारा लेकर जीवन यापन नहीं किया। वे समाज के कांधों पर बोझा कभी नहीं बने। कपड़ा बुनने, मजदूरी करने और जूते गाँठने में भी उन्होंने बुरा नहीं माना। ईमानदारी के साथ किसी भी कार्य को करना ही उन्होंने श्रेष्ठ बताया। कबीर साहब ने कहा - कोई धंधा कीजै। चौखो काज करीजै॥कर्मों के प्रति निष्ठा एवं सामंजस्य बिठाकर कबीर ने सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति आदर और प्रेम-भाव के साथ ही व्यक्ति, समाज एवं देश में धर्म निरपेक्षता की स्रोतास्विनी प्रवाहित की। हम सभी मानव हैं और मूलतः एक हैं। मानव की केवल एक ही जाति है और परिश्रम ही उन्नति का पथ है। प्रेम ही महान धर्म है यह महामंत्र सदगुरु कबीर साहब ने समाज में फूँका। उन्होंने तत्कालीन उपेक्षित समाज, शोषित दलित जनमानस के दुःख को अपने काव्य का आलम्बन बनाया। उन्होंने प्रगतिशीलता परिवर्तन, परिवर्द्धन, विकास रिनेसाँ ही उपस्थित कर दिया। समाज में जाति-पांति की पूँछताछ अधिक होने के कारण ही उन्होंने झुँझलाकर कहा - जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजियो ग्यान।/मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान॥
संत कबीर के इस प्रयत्न से दो स्वतः संभव लाभ हुए। एक-अभिजात वर्ग का अहंकार दमित हुआ, दूसरे पतित समाज में सांस्कृतिक चेतना और क्रांति उपस्थित हुई। जिससे धार्मिक एकता का सूत्रपात हुआ। कबीर साहब ने धार्मिक और सामाजिक वैमनस्य के उस संक्रामक युग में दृढ़ता के साथ मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता की घोषणा करके एकता और भ्रातृत्व भावना का प्रसार किया।कबीर कभी किसी धर्म विशेष से बँधकर नहीं रहे। वे प्रेम का ढाई आखर पढ़ाकर मानव को मानव के सन्निकट लाना चाहते हैं। सच्चे मानव धर्म का प्रसार करना चाहते हैं।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आय का मुख्य साधन कृषि ही रहा है। यहाँ की आर्थिक विषमता का एक मुख्य कारण भूमि का असमान वितरण भी रहा है। जागीरदार और बड़े किसानों के पास अधिक भूमि रही और छोटे किसान तथा मजदूर भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर ही गुजारा करने को मजबूर रहे। बड़े किसान छोटे किसानों को हड़पने में मत्स्य न्याय चलाते रहे। भूमि वितरण की इस असमान पद्धति और उससे उत्पन्न समस्याओं की ओर आज के कुछ सच्चे समाज सेवकों का ध्यान गया। सौभाग्य से वे भी संत ही थे-संत बिनोवा भावे। इस दुर्दशा की ओर आज से लगभग छः सौ साल पहले संत कबीर का ध्यान गया। उन्होंने सशक्त शब्दों में कहा कि भूमि का वितरण व्यक्तियों की संख्या और आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए - जेते जिब तेजी भुइ दीजै।
इस प्रकार समस्त अभावों के मध्य जीवन व्यतीत करने वाले कबीर ने कार्ल मार्क्स से लगभग चार सौ साल पहले भारतवर्ष में समानता और समाजवाद के भावों की बुनियाद डालने का स्तुल्य प्रयत्न किया। जहाँ सभी धर्मावलम्बियों के पास समान साधन तथा भूमि होती तो धर्म निरपेक्षता और एकता की भावना को पर्याप्त बल मिलता। कबीर का समाजवाद वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत था। जिसमें ईश्वर में आस्था, शांति, सत्य, धर्म निरपेक्षता और सरलता का रसामृत भरा हुआ था। उनके द्वारा बताये गये कुछ आदर्श आज भारत में ही नहीं अपितु विश्व में भी अपनाये जा रहे है। कबीर साहब ने व्यावहारिक योग साधना पर बल दिया। आज योगा विश्व प्रसिद्ध हो गया है।
इस प्रकार संत कबीर दास के द्वारा स्थापित किये गये एकता, समता धर्म निरपेक्षता के आधार पर देश के भव्य भवन का निर्माण कार्य अब होने लगा है। डॉक्टर अम्बेडकर ने छूत-अछूत के भेद-भाव को मिटाकर सबको समान स्थान दिलाने का प्रयत्न किया था। हम देखते हैं कि देश में छूत-अछूत की भावना का ह्रास हुआ है। समाज में अब स्पृश्य-अस्पृश्य की भावना उतनी नहीं रहीं। संत विनोवा भावे ने भूमिहीन कृषकों को भू-वितरण कराने के लिए भू-दान यज्ञ चलाया था। उनका यह मिशन अधूरा ही रहा। महात्मा गाँधी ने धर्म निरपेक्षता और हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए जीवन उत्सर्ग कर दिया। लेकिन यह एकता कायम न हो सकी। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि यह फूट देश को बर्बाद कर रही है। बुद्धिजीवियों का परम कर्तव्य है कि एकता, समानता, धर्म निरपेक्षता और भ्रातृत्व भावना का समाज में अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करें। मौलाना रूमी ने फरमाया था - तू बराये बस्ल करदन आमदी।/ने बराये फस्द करदन आमदी॥ऐ इन्सान! तू संसार में प्रेम मुहब्बत का प्रसार करने के लिए आया है। झगड़ा और फसाद फैलाने के लिए नहीं।
धर्म निरपेक्षता के प्रतीक नजीर अकबराबादी ने हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने के लिए कहा है कि - झगड़ा न करें मिल्लतो मजहब का कोई याँ।/जिस राह में जो आन पड़े खुश रहे वो वाँ॥/जुन्नार गले या कि बगल बीच हो कुरआँ।/आशिक तो कलन्दर है न हिन्दू न मुसल्माँ॥आज मानवीय मूल्य एवं विश्व मान्यताएँ परवर्तित हो रही हैं। देश से देश की दूरियाँ कम होती जा रही हैं। और विश्व के सभी मानव एक दूसरे के अति समीप आते जा रहे हैं। आज दिल से दिल की दूरियाँ समाप्त कर मानव-धर्म अपनाने और समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में लाने की आवश्यकता है - मेरे विचार से शांति, समन्वय, सामंजस्य का, एक सुखी संसार बने।/मानव सब सदस्य हों इसके, विश्व एक परिवार बनें॥
कबीर साहब महान हैं। उनकी विचारधारा महान है। महानता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर कबीर साहब ईर्ष्या, द्वेष, निजत्व, परत्व, छूत-अछूत, ऊँच-नीच की संकीर्ण भावनाओं से दूर होकर भारतीय धर्म निरपेक्षता के प्रतीक बनकर उच्चादर्श तक पहुँच जाते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव के स्वरूप बन जाते हैं - सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।/सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्॥इसलिए वे शांत भाव से कहते हैं - कबिरा खड़ा बाजार में, सबकी माँगे खैर। ना काहू सों दोसती, ना काहू से बैर॥
Friday, November 21, 2008
कबीर-एकल संस्कृति की अमर प्रस्तावना
भूमिका के वरीयता क्रम में कबीर ने अपने समय के ठहरे हुए इतिहास को गतिशील बनाने का बीड़ा उठाया। उस समय गुरुतावाद, कर्मकांडवाद और अभिजातीय वर्ग द्वारा आम जनता को शोषित करने की बाढ़ आई थी। सृजन क्षेत्रा में भी खोटे सिक्केबाजों के बाजार गर्म थे। दुकानों पर बहुवादी मुखौटाधारियों का आधिपत्य था। सबसे बड़ी दुकान छद्म गुरुओं द्वारा संचालित की जा रही थी। इसलिए कबीर ने सदगुरु और असदगुरु की परख करने के लिए कुछ निकष तैयार किए। दोनों के चित्र बनाए। इन्हें गुरुदेव के अंग पर अलग-अलग इस प्रकार चस्पा कर दिया कि उन पर लोगों की दृष्टि पड़े और उनमें परख करने की स्वयं चेतना विकसित हो। अगर गौर किया जाये तो यह कबीर का क्रांतिकारी कबीरत्व था। उन्होंने उपदेश देने और शिष्य मूड़ने की प्रवृत्ति के बर-अक्स लोगों में आत्म चेतना जगाने और परीक्षण करने की मौलिक क्षमता विकसित करने को अधिक संगत समझा। कहै कबीर दीवाना का यही मर्म था। इसी मर्म के चलते उन्होंने पारदर्शी शैली अपनाई और कहा कहै कबीर चेतहु रे भौंदू, बोलनहारा तुरक न हिन्दू। वे भोंदू-समाज को बदल कर उत्तरदायी समाज बनाना चाह रहे थे। उत्तरदायी समाज में ही एकल-संस्कृति की कल्पना की जा सकती थी। एकल-संस्कृति के लिए सदगुरु की पहचान करना जरूरी था।
असदगुरु से बचना भी जरूरी था। कबीर ने गुरु-प्रत्यभिज्ञा के लिए विस्तृत वार्तिक लिखें। कालजयी अर्थ-ज्ञान के लिए निर्ष्णात वार्तिक लिखना कबीर के ही बूते की बात थी। मिसाल के तौर पर उन्होंने लिखा -चेतनि चौकी बैसि करि सतगुरु दीन्हाँ धीर।/निरभै होई निसंक भजि केवल कहै कबीर।यहाँ अस्पष्ट नहीं रह जाता कि मध्ययुगीन इतिहास की अदालत का फैसला केवल कबीर सुना सकते थे। उन्होंने सदगुरु के लिए कुछ नियामक तत्त्व निर्धारित किये यानी जो व्यक्ति शंकाहीन तथा निर्भीक हो, चेतना की चौकी पर बैठा हो, वही सदगुरु होने का अधिकार हो सकता था, ऐसा ही गुरु दीपक दीया तेल भरि बाती दई अघट्ट की जिम्मेदारी सँभाल सकता था। उन्होंने सद्गुरु के कृतित्व का परिचय देते हुए लिखा -कबीर गुरु गरवा मिल्या रलि गया आटैं लूण।/जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरौवो कूण॥
देखा जा सकता है कि कबीर ने दूध और पानी की तरह मिलकर एक होने के परम्परागत कथन से भिन्न रले गए आटा और नमक की तरह एक होने का दर्शन पेश किया। यह उनका नया अप्रस्तुत था। उन्होंने इस अप्रस्तुत द्वारा सांस्कृतिक सौन्दर्यशास्त्र की नयी अवधारणा अंकुरित की। यह कबीर के रसत्व-विवर्धन की सौंदर्य-चेतना थी। वे भली भाँति जानते थे कि दूध और पानी के मिलने के बाद दूध का भाव घटता है परन्तु आटा और नमक के मिलने से भाव चढ़ता है। आस्वाद में भी अंतर पड़ता है । दूध और पानी मिलकर आस्वाद का विघटन करते हैं, जबकि आटा और नमक मिलकर आस्वाद का विवर्धन। मिले हुए दूध और पानी में अलगाव की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। सूरदास ने लिखा है-हम जातहि वह उघरि परैगी दूध दूध पानी सो पानी। इसके विपरीत रलने की कला में कुशल गुरु द्वारा मिलाए हुए आटा और नमक को अलग नहीं किया जा सकता। साखी'में रलि शब्द का प्रयोग भी अनूठा है। रलन (ललन) सौन्दर्य शास्त्रीय शब्द है। कबीर द्वारा प्रस्तुत रलि शब्द का प्रयोग परवर्ती कवियों द्वारा आमोद के अर्थ में किया जाने लगा। कबीर के समकालीन सूरदास ने ही लिखा-चली पीठ दै दृष्टि फिरावत अंग आनन्द रली।
यानी जिस प्रकार किसी सुन्दर नारी के अंग और लावण्य में अद्वैत सौन्दर्य सम्बन्ध होते हैं, उसी प्रकार कबीर के आँटा-लूण के सौन्दर्य शास्त्रीय सम्बन्ध थे। कबीर की यह मौलिक एकलता थी जिसकी कल्पना सूर, तुलसी और जायसी ने नहीं की थी।कबीर के समय में सामासिक संस्कृति' जैसा समस्वित पद व्यवहार में नहीं था। अगर होता भी तो कबीर अपने समय के इतिहास के लिए नाकाफी समझते क्योंकि सामासिक संस्कृति में एकपदीयता के अद्वैत की संभावना नहीं की जा सकती थी। इसमें पूर्वपद और उत्तरपद के अस्तित्व बने रहते हैं। कबीर पूर्व और उत्तर दोनों को मिलाकर एकाकार करना चाहते थे। यह उपलब्धि एकल संस्कृति द्वारा ही संभव थी। इसलिए उन्होंने लिखा -वेद पुरान कुरान कितेवा नाना भाँति बखानी/हिन्दू तुरक जैन अरु जोगी एकल काहु न जानी।
स्पष्ट है कि वे धर्म, संस्कृति, राजनीति, समाज और उपासना के हर स्तर पर नानात्व का विखंडन करके एकलता की स्थापना करना चाहते थे। उनका रचना कर्म नानात्व को एकल बनाने का संघर्ष था। उनकी सृजन-यात्रा का अंतिम पड़ाव था, एकल-भाव की चरम उपलब्धि। अपने राह भटकते समाज को उन्होंने बार-बार समझाया- एक बूँद एकै मलमूतर एक चाम एक गुदा।/ एक जोति तै सब उपजा कौन ब्राहमन कौन सूदा।/.../एकै पवन एक ही पानी एक जोति संसारा/एक ही खाक घडे सब भाँडा एक हील सिरजन हारा।/.../इनमें आप आप सबहिन में आप आप सुखेलै/नाना भाँति गढे+ सब भाँडे रूप धरै हरि मेलै।''गौर करने पर अज्ञात नहीं रहेगा कि कबीर काल-विवेक के समुच्चय थे। उनके समुच्चय के केवल एक अंश ने ही उनकी कविता का रूप धारण किया था न कि सम्पूर्ण ने । संपूर्ण तो उनका व्यावहारिक जीवन था जो इतिहास के अज्ञात फैलाओं में ही कहीं तूर्यमान हो रहा था। परन्तु इतना सत्य है कि उनकी समुच्चयता का जितना भाग काव्य-रूप में परिणत हुआ वह मध्य काल के सभी रचनाकारों के सम्पूर्ण के बराबर था। इस रहस्य को उन्होंने बड़ी सांकेतिक शैली में व्यक्त किया था-हेरत हेरत हे सखी रहा कबीर हेराय/बूँद समानी समुद्र में सो कत हेरी जाय।
देखा जाय तो मध्यकाल के अभिजातीय इतिहास की पोथियों ने कबीर को हेरने की कोई प्रक्रिया नहीं शुरू की। यहॅां प्रश्न यह उठता है कि कबीर ने अपने को जितना हेरा जाने दिया उसको हम किन माध्यमों उपादानों और उपकरणों द्वारा ढूढें आज कबीर के व्याख्याताओं के सामने सबसे दुरूह प्रश्न यही है। अब तो केवल उन संकेत माध्यमों से ही संतोष करना पड़ेगा जो कबीर की रचनाओं में इधर-उधर बिखरे हैं।कबीर की समुद्र में बूँद के मिल कर एक हो जाने की ऐतिहासिक संवेदना का पाठ अध्यात्म और दर्शन के परिपे्रक्ष्य में ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनके जैसे रचनाकार द्वारा समुद्रवत विस्तृत समाज को आत्मसात् कर लेने के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में भी किया जाना चाहिए। आज यह जानना बहुत जरूरी हो गया है कि वे अपने समय का कितना हिस्सा ढूँढ़ पाए और कितने को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसी में खप-पच गए। इतिहास अन्वेषियों के समक्ष यह एक बड़ा सवाल खड़ा होता है जिस पर गहराई के साथ विमर्श शुरू किया जा सकता है। यदि किन्हीं स्रोतों द्वारा कबीर द्वारा अनन्वेषित रह गए कालांश पर प्रकाश डाला जा सके तो एक नये कबीर की तस्वीर तैयार की जा सकती है ।
ऐसा लगता है कि नये कबीर के मीमांसकों के सामने महत्त्वपूर्ण समस्या उपस्थित हो सकती है। (कबीर) द्वारा प्रयुक्त ÷राम' पद को ठीक-ठीक समझने की राम कबीर के अध्यात्म दर्शन, साधना, उपासना और काल चेतना सब कुछ हो सकते हैं। बार-बार राम पद का प्रयोग करते हुए उन्होंने तमाम ऐसे संकेत दिए हैं जिनसे ज्ञात होता है कि उन्होंने राम का प्रयोग अपने समय के प्रतीक रूप में किया था। जब वे पूछते हैं कि राम बड़ा कि रामहिं जानै तब ऐसा लगता है कि वे रामज्ञ ( समय के ज्ञाता) को राम (समय) से बड़ा प्रमाणित करना चाहते थे क्योंकि उनका समय (इतिहास) एक नये समय में बदल रहा था। वे समयज्ञ को ही कालजयी मानते थे। कबीर का सारा सृजन-संघर्ष राम को जान कर राम से बड़ा हो जाने के लिए था। मध्यकालीन राम-भक्ति शाखा में राम से बड़ा होने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। तुलसीदास ने रामचरितमानस के प्रारंभ में लिख दिया था -बन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामरव्यमीशं हरिम।' राम भक्ति शाखा में राम सगुण और निर्गुण दोनों दशाओं में नेति थे सारद सेस महेश विधि आगम निगम पुरान नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरन्तर गान। राम भक्ति वादियों में राम बड़ा अथवा राम को जानने वाला बड़ा का द्वन्द्व नहीं था।परन्तु कबीर का सम्पूर्ण रचना-द्वन्द्व इस रहस्य को जान लेने का था। इसलिए कबीर को लिखना पड़ा - झगरा एक निबेरो राम। वेद बड़ा कि जहाँ थे आया?
तुलसीदास की तरह कबीर राम को अपरिवर्तनशील चेतना नहीं मानते थे। वे गतिशील समय में राम के परिवर्तित होते चलने के विचार को ही संगत और प्रासंगिक समझते थे। इसी संदर्भ में उन्होंने लिखा - काबा फिर कासी भया राम भया रहीम।/मोट चून मैदा भया बैठि कबीरा जीम।यह राम का निर्गुण आस्वाद था, न ही सगुण बल्कि राम का रहीम में बदल कर मोटे अनाज के मैदा हो जाने की तरह था। कोई भी राम भक्त कबीर के इस रूपक से सहमत नहीं हो सकता। वह यह बर्दाश्त तक नहीं कर सकता कि राम मोटे अनाज की तरह थे जो काल की चक्की में पिस कर रहीम (मैदा) हो गए थे। यही कबीर की एकल संस्कृति थी यानी मैदा-संस्कृति जिसमें पूर्व पद राम और उत्तर पद रहीम दोनों मिलकर एक हो गए थे। आधार और आधेय की चरम एक रूपता ही कबीर की एकल संस्कृति थी। आज कबीर के परिवर्तनशील राम को तद्युगीन इतिहास की चेतना के निकष पर ही परखा जा सकता है। कबीर के काव्य में राम के इस रूप को अभी नहीं समझा गया है। कबीर के राम को काल-पर्याय के रूप में अन्वेषित करने के बाद ही नये कबीर की प्रतिमा खड़ी की जा सकती है। इसी क्रम में हेरत-हेरत हे सखी कबीरा गया हेराय की प्रासंगिकता भी समझी जा सकती है।
अनन्त काल के रामत्व को ढूंढ़ने का लक्ष्य लेकर वे रचना और साधना के क्षेत्र में उतरे थे। काफी कुछ कृत मनोरथ हुए थे। अन्वेषण-प्रक्रिया के दरम्यान खो जाने की नियति केवल उनकी ही नहीं थी। बहुत लोग तो उतना ही नहीं तलाश कर सके जितना उन्होंने किया था। अन्तर इतना था कि उन्होंने खो जाने का सत्य स्वीकार कर लिया था, जबकि दूसरे लोग इसे छिपा ले जाते हैं। जड़तावादी तथा परिवर्तन विरोधी वर्ग द्वारा काल-सत्य की उपेक्षा करना कबीर के लिए असह्य था। जड़ परम्परावाद की पूँछ पकड़कर सार्थक समाज की वकालत करने वालों पर उनका व्यंग्य-बाण निरन्तर चलता रहता था। वे भारतीय समाज को समुद्र की तरह विस्तृत देख रहे थे क्योंकि यहाँ अनेक धर्म, अनेक पंथ, अनेक भाषाएँ और अनेक सांस्कृतिक प्रथाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित थीं, परन्तु कबीर इन अनेकताओं में एकता का ही बोध बाँट रहे थे यानी समुद्र एक परन्तु लहरें अनेक के दर्शन का बोध। रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान और पहनावा-ओढ़ावा ऊपरी अनिवार्यताएँ थीं परन्तु सबकी अन्तरात्मा एक थी। वे इसी अन्तरात्मा की खोज कर रहे थे। इस अभेद की तलाश का लक्ष्य लेकर उन्होंने लिखा - व्यापक ब्रह्म सबनि में एकै को पंडित को जोगी/राणा रंक कवन सु कहिए कवन वैद को रोगी।/इनमें आप आप सबहिन में आप आप सु खेलै/नाना भाँति गढ़े सब भाँडे रूप धरै हरि मेलै।
कबीर के इस कथन को उनके अद्वैत ब्रह्मवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह उनका सामाजिक दर्शन भी था। दर्शन और संस्कृति दोनों धरातलों पर वे विवर्त्तवादी बोध के मध्ययुगीन साधु थे। तत्त्वज्ञान का उद्घोष करने से वे कभी नहीं थके। उन्होंने लिखा - कबीर इस संसार को समझाऊँ कै बार,/पूँछ जो पकड़ै भेद की उतर्या चाहे पार।कबीर के लिए समुद्र की तरह फैले भारतीय समाज और संस्कृति का संतरण केवल अभेद भाव द्वारा संभव था। हालांकि वे भाववादी नहीं थे, परन्तु उन्होंने अभाववादी ज्ञान को मान्यता कभी नहीं दी। चारों वेद के ज्ञानवाद में उरझि पुरझि कर मरने वालों को वे साहस पूर्वक धिक्कारते थे। उनके अनुसार जिहि घटि प्रीति न प्रेम रहा उसे वे समाज का निरर्थक अस्तित्त्व मानते थे। इसीलिए कबीर के समय में बिरले लोग ऐसे थे जो उनके दोस्त बन सके। वे अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति करते हुए कहा करते थे, भाई रे बिरले दोसत कबीरा के हालांकि वे भलीभाँति जानते थे कि उनके दोस्तों की संख्या क्यों कम थी, परन्तु उन्होंने क्यों से समझौता बिल्कुल नहीं किया। समाज को सही रास्ते पर लाने के लिए उन्हें जो जब सही सूझा, उसका प्रयोग किया। उन्होंने छद्म सिद्धान्तों की गाँठ कभी नहीं बाँधी। वे विविध होकर भी विधेय के एकत्व की खोज कर रहे थे।
सिद्धान्तवादियों को इस प्रकार का कबीरत्व चुभता था। यही कारण था कि वे उनसे दूर करना चाहते थे। सिद्धान्तवादी वेद और दर्शन द्वारा निरूपित सत्य को परम मानते थे। कबीर का सत्य काल-सापेक्ष सत्य था। काल-सापेक्ष सत्य की पक्षधरता के कारण ही उन्हें योगी और जंगम दोनों असत्य प्रतीत हुए - कहै कबीर जोगी और जंगम ए सब झूठी आसा।कबीर के सृजन का प्रत्येक क्षण लुआठी की तरह सुलगता रहता था। सुलगते रहना उनके रचनात्मक तनाव का ही प्रतीक था। वे अपने सृजन की लुआठी लेकर बीच बाजार में खड़े हो गए और पुकार-पुकार कर कहने लगे - कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुआठी हाथ,/जो घर जारै आपनो चले हमारे साथ।
कबीर द्वारा लगाई गई यह शर्त तद्युगीन समाज के लिए काफी कठोर थी। उस समय का पूरा समाज छद्म घरों और घरानों के भारी भ्रम में जी रहा था। अभिजातों के अपने घर थे जो उपयोग के केन्द्र बने हुए उपभोक्ता वर्ग की वकालत में लगे थे, धर्मावलंबियों के अपने घर थे जो लोगों में पंथगत भेद पैदा कर अंधतावाद फैलाने की भूमिका रच रहे थे, मायावादियों के भी निजी घर थे जिनमें सगुण-निगुर्ण के झगड़े मचे थे, पैगंबरवादियों के घरों में हिंसा और तांत्रिकों के घरों में नग्न मैथुनवाद का बोलबाला था। कबीर की सृजन-यात्रा इंसानपरस्ती की अभियान यात्रा थी। इस अभियान-यात्रा में उन्हें मत-मतान्तर वादियों की जरूरत नहीं थी। ये ही कारण थे कि उन्होंने जो घर जारै आपनो चले हमारे साथ' जैसी कठिन शर्त लगाई थी। उन्होंने सदगुरु के आइने में देखकर अनुभव किया था - कबीर भेष अतीत का कर तूति करै अपराध/बाहर दीसे साध गति माँहै महा असाध।कबीर को अतीतवादी वेश-भूषा के प्रचारक घरों की क्षुद्र सीमाएँ अज्ञात थीं। उन्हें बाहरी आडम्बरों से चिढ़ थी और अपराधियों से घृणा थी। ऐसे लोगों को सामाजिक मान्यता देकर एकल-संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती थी। इसलिए वे बीच बाजार में खड़े होकर मोहासक्त घरों को जला देने का ऐलान करने लगे।
यहाँ यह कहना कि कबीर का बाजार मायालीन असार संसार का रूपक था, उनकी रचनात्मक यात्रा को नजर-अंदाज करना होगा। सही तो यह कहना होगा कि उनका बाजार दलित, शोषित और अभिजातीय वर्ग द्वारा उपेक्षित जनों की अभिव्यक्ति -भूमि था। उपेक्षितों की अभिव्यक्ति-भूमि पर खड़े होकर और हाथ की लुआठी फहराकर कबीर ने उपभोक्तावादियों को खुली चेतावनी दी कि एक दिन दलित वर्ग के लोग रूई लपेटी आगि की तरह प्रज्ज्वलित होकर शोषकों की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को खाक कर देंगे। उन्होंने छद्म कुलीनतावादियों को चेतावनी दी थी ऊजल कपड़ा पहिर कर पान सुपरी खाहिं' का वर्ग जल्दी ही विनष्ट होने वाला था। उन्होंने साफ-साफ कहा - मीयां तुम सौ बोल्यां बणि नहीं आवै।/हम मसकीन खुदाई बंदे तुम्हारा जस मन भावै।/अलह अवलि दीन का साहिब जोर नहीं फुरमाया।/मुरसिद पीर तुम्हारै है को कहौ कहाँ थे आय।
कबीर ने अपने आक्रामक सवालों द्वारा उन लोगों को गहरी चोट पहुँचाई थी जो धर्म का विपणन कर रहे थे अथवा जो राजा राणा छत्रपति बने हुए अपने ऊँचे महलों के मद में ग़ाफिल थे। एक तरफ कबीर के इन सवालों ने सामन्तों और मनसबदारों को आहत किया था तो दूसरी तरफ दासों, निर्धनों और शोषितों में आत्मनिष्ठा जगाई थी, उनको अपना वजूद पहचानने की शक्ति दी थी और अवरोधों को तोड़कर आगे बढ़ने का हौसला बुलन्द किया था।
इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि कबीर आत्म प्रक्षेपण के संत कवि थे। तमाम असंतों के दबाओ के बावजूद उन्होंने अपनी संतई नहीं छोड़ी थी। उनकी संतई में विनम्रता तो थी परन्तु आत्म समर्पण नहीं था। रचना की लुआठी लेकर बाजार के बीचो बीच खड़े कबीर का झुकना कैसा! वे अपनी बनारसी अक्खड़ता को दोनों हाथों लुटा रहे थे। उन्होंने जिन दलितों-शोषितों को कबीर बना दिया था, उनको हिम्मत दिलाते हुए कहा - कबीर तू काहे डरै, सिर परि हरि का हाथ।/हस्ती चढ़ि नहीं डोलिए कूकर मुकैं लाख।यह कम आश्चर्य की बात नहीं थी कि अकेले कबीर ने अपने समय के दलित-वर्ग को स्वाभिमान के हाथी पर बैठाने की जिम्मेदारी महसूस की थी। ये ही हथिचढ़े कबीर के साधो, संतों और अवधू बने जिन्हें समझाते हुए उन्होंने कहा, संतो सो अनभै पद गहिए। शैली अपनाई द्विअर्थी। यह उनकी आवश्यक विवशता थी। पहला अर्थ अध्यात्मवादियों के लिए था जो दूसरा समाज के निम्न और मध्यवर्ग के लिए। २०वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक कबीर के दूसरे अर्थ को पर्दे के पीछे डाल देने की साजिश चलती रही, परन्तु ज्वलंत कब तक चुप बैठता।
आज कबीर के सृजन का दूसरा अर्थ लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा है।मध्यकाल में कबीर को परम्परावादी अभिजातीय वर्ग के अनेक प्रहार झेलने पड़े थे। हालांकि वे झेलने के कवच थे परन्तु जब तब चोट लग ही जाती थी, दर्द भी होता था। ऐसे ही किसी दर्द की अभिव्यक्ति करने के लिए उन्हें लिखना पड़ा था - अभिअंतरि मन रंग समाना लोग कहै कबीर बौराना,/रंग न चीन्है मूरख लोई जिहि रंग रंग रह्या सब कोई॥आखिर कौन लोग थे जो कबीर को पागल साबित करना चाहते थे? उत्तर अस्पष्ट नहीं है। कबीर को पागल कहने वालों में हिन्दू भी थे मुसलमान भी, वैष्णव भी, गोरखपंथी भी तथा ब्रह्मवादी भी यानी समय को मुट्ठियों में बंद कर अपनी-अपनी दुकान चलाने वाले सभी धर्मों-सम्प्रदायों के लोग थे। कबीर ने इन सभी को झेला और जो सत्य समझा उसे दबंगई के साथ कहा। कबीर बौराना कहने वालों को उलटकर उत्तर भी दिया, रंग न चीन्हें मूरख लोई यानी कबीर को विक्षिप्त कहने वाले वे लोग थे जो समय के रंग की परख करने में असमर्थ थे और अपनी मूर्खता को ही काल-सत्य मान रहे थे। कबीर को इसी मूर्ख समूह से लोहा लेना पड़ा था। उन्होंने देखा कि तदयुगीन मूर्खों का समूह नानात्ववादी था। उन्हें मनुष्य मात्र में विद्यमान एकत्व का अन्तः सूत्र नहीं दिखलाई पड़ रहा था।
वास्तव में तदयुगीन समाज का यह अनर्थकारी दृष्टि-रोग था। इसकी शल्यचिकित्सा जरूरी थी। इस दृष्टि-रोग के चलते लोग अन्धे होते जा रहे थे। उन्होंने देखा कि अंधै अंधा ठेलिया दून्यूं कूप पड़न्त की महामारी फैली हुई थी। आपरेशन जरूरी था। इसके लिए उन्होंने तमाम औजारों का परीक्षण किया। उन्हें जो सबसे अधिक कारगर औजार दिखलाई पड़ा, वह था राम। यह उनका सहज चिकित्सा उपकरण था। अपनी पहचान पर उन्हें खुद आश्चर्य हुआ। उन्होंने लिखा, सहज सहज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं लोग। परन्तु उन्होंने चीन्ह लिया। इसी उपकरण को लेकर उन्होंने तमाम अन्धों को आँखें दीं। देखने और पहचानने का अभ्यास कराया, समझाया - कबीर औगुंण ना गहै, गुण ही कौं ले बीति।/घट घट महु के मधुप ज्यूँ पर आतम ले चीन्हि।
उन्होंने उन्हें भी दृष्टि दान किया जो उन्हें पागल कह रहे थे। यदि वे बीनने और चीन्हने में समर्थ हुए तो उन्हें भी अपने अवधू वर्ग में सम्मिलित कर लिया। उनसे स्पष्ट रूप से कहा - सीतलता तब जाणियें समिता रहै समाइ/पष छाडै निरपष रहै, सबद न दूष्या जाय।कबीर ने दृष्टि यानी विचारों में व्याप्त जलन दूर करने के उपचार सुझाये उनका उपचार था प्रत्येक मनुष्य को समता की नजर से देखना हठवादी पक्षधरता का परित्याग करना और समता की भावना रखते हुए निष्पक्ष बने रहने का सामाजिक जीवन जीना। उन्हें लगा कि भारतीय समाज शब्दों के प्रदूषण से आक्रान्त था। सामन्तों और कुलीनतावादियों द्वारा दलितों और दासों के प्रति शब्द-न्याय तक नहीं किया जा रहा था। पादस्थ वर्ग के लिए अपमान जनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा था। तथाकथित पंडितों की भाषा कूप-जल की तरह प्रवाहहीन हो गई थी। इसलिए कबीर ने सांस्कृतिक समत्त्व की स्थापना के लिए नया सबद-धर्म चलाने का संकल्प किया। कुशब्द और सुशब्द की संहिताएँ लिखीं। भाषाई परिष्कार की जंग छेड़ी। कुशब्दों की चोट से घायल वर्ग की ओर से गवाहियाँ देते हुए भाषा के एक पक्षीय न्यायालय को ललकारा। जैसे - अणी सुहेली सेल की पंडता लेइ उसास।/चोट सहारै सबद की तास गुरु मैं दास।
मध्यकालीन इतिहास लेखकों ने शब्दों के अनुशासनहीन वर्गवाद पर ज्यादा प्रकाश नहीं डाला है। उस काल के प्रायः सभी रचनाकारों ने भाषा की उच्छृंखलता की ओर संकेत किया था। तुलसीदास तक ने लिखा-बूँद अघात सहैं गिरि कैसे, खल के वचन संत सह जैसे। यह भाषाई समतावाद की लड़ाई थी जिसके कमांडर कबीर थे।अगर आज कबीर के सम्पूर्ण रचना दर्शन की ब्योरेवार व्याख्या की जाये तो हमें एक ऐसा कबीर मिलेगा जो आगे आने वाले हजार वर्षों के समाज को जीवन जीने के नये साधन प्रस्तुत करेगा। उन्होंने महत्त्व प्रधान सामाजिक दर्शन और सार्वभौम एकल-संस्कृति के बीज बोकर रचना का एक ऐसा उद्यान तैयार किया जिसमें फल तो विभिन्न रंग के खिले परन्तु सब में प्रभाव का अभिन्नत्व था।
इसी संदर्भ में उन्होंने लिखा था, रंग न चीन्हें मूरख लोई जिहि रंग रंग रह्या सब कोई। भक्ति, उपासना, हठयोग-दर्शन, अद्वैत, निर्गुण, सगुण, माया, जीव, जगत, धर्म, कर्म, ज्ञान, विज्ञान, गुरु, शिष्य, निन्दा, स्तुति, उलटबासी, रहस्य-कथन और अपने समय के यथार्थ का उद्घाटन आदि उनके आनुषंगिक प्रसंग थे। इन सभी प्रसंगों में उनकी आधारिक चेतना थी एकल-संस्कृति। उन्होंने अपने समय को आधार बनाकर जिस अन्तः बोध का अन्वेषण किया था, उसके केन्द्र में सम्पूर्ण आदमी की तलाश थी। इसलिए संसार में जब तक आदमी का अस्तित्व रहेगा तब तक कबीर की रचना भी जीवित रहेगी। स्पष्ट है न आदमी मरेगा न ही कबीर का काव्य मरेगा।
