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Saturday, November 8, 2008

दलित साहित्य : अंतर्विरोधों के बीच और उनके बावजूद

डॉ० शिवकुमार मिश्र
अपने को साहित्य और साहित्य के आन्दोलनों तक ही सीमित रखें तो उनका विकास और उनके विकास का इतिहास साक्षी है कि अंतर्विरोधों से साहित्य की कोई भी धारा और साहित्य का कोई भी आन्दोलन कभी मुक्त नहीं रहा। अंतर्विरोध विकास में सहायक भी होते हैं और यदि उन्हें हल न किया गया तो विकास को अवरूद्ध भी करते हैं। आन्दोलनों को दिशाहीन, विघथित और कमजोर करते हैं।
चूँकि संप्रति हमारी चर्चा के केन्द्र में दलित साहित्य है, अतएव हम अपने को विचार और व्यवहार के स्तर पर उभरे दलित साहित्य और उसके आन्दोलन के अंतर्विरोधों तक ही सीमित रखेंगे। आज जबकि दलित साहित्य अपनी विशिष्ट पहचान के साथ भारत की अनेक भाषाओं में लगभग स्वीकृत और मान्य हो चुका है और नई सदी के साहित्यिक-विमर्श के केन्द्र में है, जरूरी है कि इस बात को रेखांकित किया जाए कि अंतर्विरोधों ने उसके विकास को कितनी गति दी है या उसके विकास को कितना अवरूद्ध किया है।आइए सबसे पहले ऐसे एक दो मुद्दों को लें, जिन पर दलित लेखकों और गैर दलित लेखकों के बीच लंबे समय से विमर्श चल रहा है और जिन पर कोई भी सहमति नहीं बन सकी है।
अपने एक आलेख में मैंने ऐसे मुद्दों को जो अपने-अपने आग्रहों के चलते विवादास्पद बने हुए हैं, गैर-जरूरी मानते हुए छोड़ देने को कहा है, ताकि विमर्श जरूरी मुद्दों पर आगे बढ़े। बावजूद इसके, जब मैं उन्हें यहाँ उठा रहा हूँ तो संक्षेप में ही सही, उनके अंतर्विरोध को देखें।बात है, कि किसी रचना की पहचान का मूलवती आधार क्या हो? उसकी अंतर्वस्तु या कि यह बात कि उसका रचने वाला कौन है? दलित लेखक बंधु आग्रह पूर्वक अपनी इस बात पर अड़े हुए हैं दलित रचना वही है जिसका रचनाकार दलित हो, जबकि गैर-दलितों में ऐसे वरिष्ठ लेखक हैं जो अपने आग्रहों के नाते इस बात को नहीं मानते। वे दलित रचना उसे मानते हैं जिसकी अंतर्वस्तु दलित जीवन संदर्भों वाली हो, और दलितों के पक्ष में हो। तर्क की जमीन पर दूसरी बात संगत है, परन्तु दलित लेखक उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। रोटी की पहचान उसकी अंतर्वस्तु और उसका स्वाद है ना कि उसे किसने बनाया है? मैंने अपने कुछ दलित लेखक मित्रों के सामने सवाल रखा कि मैं आपको दलित जीवन संदर्भों की चार रचनाएँ देता हूँ।
आप बताएँ कि उनमें से कौन-सी रचना दलित आकांक्षाओं की रचना है? मैं रचनाकारों के नाम नहीं बताऊँगा। आपके द्वारा चुनी गयी रचना यदि गैर-दलित रचनाकार की हुई तो क्या आप अपने पुराने आग्रह को छोड़ने को तैयार होंगे? उनके पास मेरी बात का कोई उत्तर नहीं था। तर्क की जमीन पर ओम प्रकाश वाल्मीकि लिखकर मुझसे स्वीकार करते हैं कि रचना की पहचान का मापदण्ड उसकी अंतर्वस्तु है, परन्तु विमर्श में फिर से अपनी मूलवती जिद पर आ जाते हैं।दलित लेखक तर्क देते हैं कि जिस स्वानुभूति में दलित गुजरता है वह गैर-दलित को हो ही नहीं सकती। जो भोगता है वही जानता है। इस तर्क में दम है। मैं मान चुका हूँ कि आपबीती का कोई विकल्प नहीं होता।
दलित जिस यातना के अनुभव से गुजरे हैं, प्रेमचन्द, जगदीश चन्द्र या दूसरे जिन गैर-दलित लेखकों ने दलितों पर लिखा है, सचमुच उस यातना का वैसा अनुभव नहीं कर सकते। परन्तु यह स्थिति अर्द्ध सत्य की ही स्थिति है। यह मानते हुए भी आपबीती का, भोगे हुए अनुभव, कोई विकल्प नहीं, रचना की एकमात्रा शर्त वह नहीं हो सकती। साहित्य को, रचना को, भोगे हुए तक ही सीमित मान लेने के हश्र हम पहले भी देख चुके हैं। भोगे हुए तक साहित्य को सीमित करना उसकी शक्ति, व्याप्ति और संभावनाओं, सबको समाप्त मान लेना है। ऐसा मानने पर संसार के बहुत उत्कृष्ट साहित्य से हमें वंचित होना पड़ेगा। तोल्सतोय काउण्ट थे परन्तु जारशाही के समय के रूस के गाँवों और किसानों के जीवन के यथार्थ को उन्होंने जिस तरह अपनी रचनाओं में उतारा लेनिन को कहना पड़ा कि रूस के गाँवों के जीवन के बारे में उन्हें सबसे प्रामाणिक जानकारी तोल्सतोय की रचनाओं से मिलती। लेनिन समाज का रूपान्तरण करना चाह रहे थे, क्रांति की अगुवाई कर रहे थे।
प्रेमचन्द ने कभी किसानी नहीं की परन्तु किसानों और गाँवों के बारे में उन्होंने जो कुछ लिखा आज भी मिसाल के तौर पर मान्य है। भोगे हुए को ही रचना की शर्त मान लेने पर दलित लेखन भी सीमित होगा। तब जिस जाति को जो दलित लेखक है वह दलित मात्रा के लिए लिखने का अधिकारी न माना जाकर मात्र अपनी जाति के अनुभव ही लिख पाएगा। रचनाकार अपने को... करके संवेदनात्मक स्तर पर जब दूसरे वर्ग से एकात्म कर लेता है वह प्रामाणिक लिख पाता है। अतएव दलित लेखक बन्धु स्वयं अपने अनुभवों के तहत रचना की सही पहचान का मापदण्ड तय करेंगे हम इसकी आशा करते हैं। चूँकि इस मुद्दे पर होने वाले विमर्श ने बहुत समय लिया है और आज भी वह विमर्श के केन्द्र में हैं इसी नाते मैंने उसे गैर जरूरी मानते हुए जरूरी मद्दों पर संवाद की गुजारिश की है। इससे कुछ बनता बिगड़ता भी नहीं है कि कौन लेखक दलित लेखक है या कौन सी रचना दलित रचना है, पाठक जब भी रचना से मुखातिब होंगे, वे उसकी अंतर्वस्तु से उपजे प्रभाव के तहत ही रचना या रचनाकार पर अपना निर्णय देंगे।बहुत विवादास्पद मुद्दा है वर्ण और वर्ग का, जिसे लेकर लंबे समय से विमर्श चल रहा है।
दलित लेखक वर्ण के यथार्थ के आगे सोचना ही नहीं चाहते, जबकि वर्ण की हकीकत को मानते हुए भी कम से कम, हमारा उनसे यही आग्रह रहा है कि वे वर्ग का बड़ी वास्तविकता को भी स्वीकार करें। स्वाभाविक है कि अपने वर्ण पर दृढ़ आग्रह के चलते लेखक मार्क्स, मार्क्सवाद और उनसे जुड़े लेखकों, विचारकों पर जो उनकी ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई में उनके साथ हैं, न केवल शक करते हैं, उन्हें अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में भी विज्ञापित करते हैं। यह स्थिति अहेतुक है। हमने बराबर कहा है कि वर्ण का सवाल मुख्यतः भारत का अपना सवाल है, कारण वर्ण व्यवस्था, भारतीय सामाजिक संरचना की अपनी विशिष्टता है। मार्क्स का चिन्तन अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का चिन्तन है जिसके तहत समाज के इतिहास को वर्ग समाजों के इतिहास के रूप में देखा और व्याख्यायित किया गया है और उसी आधार पर उसके तहत मूलतः दो वर्गों की बात की गयी है-उत्पादन के साधनों का स्वामी वर्ग, और उन साधनों पर श्रम करने वालों का वर्ग, जिन्हें अलग तौर से शोषक और शोषित वर्गों के रूप में विज्ञापित किया जाता है। मार्क्सवाद की स्थापना है कि समाज का आर्थिक आधार बदलने के साथ सर्वहारा मुक्ति के संदर्भ में ही समाज में वर्गों का वैषम्य समाप्त होगा और शोषित वर्ग, श्रमिक वर्ग, अपने स्वत्व को पा सकेंगे। भारत की बात करें तो शोषित वर्गों की इस मुक्ति में दलितों की मुक्ति भी शामिल होगी कारण वर्ग विहीन समाज में न कोई शोषक होगा और न ही शोषित।
दलित लेखक विचारक मार्क्स की इस स्थापना को अपने संघर्ष में अप्रासंगिक और एक तरह की बाधा मानते हुए मात्रा वर्ण व्यवस्था से उपजे अन्याय तक ही अपने संघर्ष को सीमित रखना चाहते हैं। उनके लिए बाबा साहेब अम्बेडकर के चिन्तन के अलावा प्रेरणा स्रोत के रूप में दूसरा कोई विचार कोई मायने नहीं रखता। परन्तु दलित लेखक, विचारकों में भी ऐसे लोग हैं, मसलन बाबू राव बागुल, नारायन सुर्वे आदि जो मार्क्सवादी दर्शन के महत्त्व को उसकी पूरी स्वीकृति देते हुए बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों को उसके साथ जोड़कर चलने के हिमायती हैं। खुद बाबा साहेब अम्बेडकर ने भी मार्क्स के चिन्तन को नहीं नकारा, अपना संघर्ष जरूर उन्होंने वर्ण वैषम्य के मुद्दे पर चलाया जो तात्कालिक परिस्थितियों में जरूरी था। हम भी चाहते हैं कि मार्क्सवाद से जुड़े लेखक, विचारक जो दलितों के साथ हैं मार्क्स के दर्शन की पूरी अहमियत के साथ भारत की अपनी विशिष्ट सामाजिक वास्तविकता के मद्देनजर वर्ण की हकीकत को भी अहम्‌ मानते हुए वर्ग और वर्ण दोनों को अपनी निगाह के दायरे में रखें।
यह जरूरी है कारण वर्ग वैषम्य के साथ वर्ण वैषम्य भारत की अपनी खासियत है। सदियों सहस्राब्दियों से मनुष्यता का एक बड़ा हिस्सा वर्ग और वर्ण वैषम्य दोनों की सम्मिलित यातना का शिकार रहा है। दलित लेखकों के वर्ण सम्बन्धी आग्रह को भी हमें यथार्थ परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए और यदि वर्ण और वर्ग सम्बन्धी मुद्दों को लेकर दलित लेखकों में अंतर्विरोध भी है तो उन्हें समझने की कोशिश करना चाहिए।इस मुद्दे पर विचार करते हुए मेरा ध्यान कबीर की ओर गया और कबीर के यहाँ मुझे इस मुद्दे को उसकी वास्तविकता से समझने का आधार मिला। विलक्षण लगता है कि जो कबीर सामाजिक वैषम्य पर इतने कठोर प्रहार करते है आर्थिक वैषम्य को लेकर लगभग चुप हैं। चुप ही नहीं, और भी विलक्षण तब लगता है जब वे यह कहते हैं कि भगवान के यहाँ से सब एक समान आते हैं, एक ही मिट्टी से बने हैं, समाज में आकर वे स्पृश्य-अस्पृश्य बनते हैं, परन्तु जहाँ तक अमीर और गरीब का सवाल है उन्हें राम जी या प्रभु ही बनाकर भेजते हैं - 'निरधन सरधन दोनों भाई, प्रभु की लीला कहीं न जाई।' यह कबीर का अंतर्विरोध है परन्तु हमें इसे समझना चाहिए। कबीर आखिर ऐसा क्यों करते हैं कि सामाजिक वैषम्य पर प्रहार आर्थिक वैषम्य पर चुप्पी। वे गरीबों को यह भी समझाते हैं कि वे अपनी गरीबी को लेकर परेशान न हों। भौतिक सम्पन्नता, सम्पन्नता नहीं है असली धन राम धन है।
वे रामधन पाने का प्रयास करें। वस्तुतः कबीर या आज के दलित जिस एक बात पर सारा जोर देते हैं वह उनके जिए भोगे का सच है। जिए भोगे अनुभवों के अलावा वे अन्य किसी भी अनुभव को प्रामाणिक नहीं मानते। वर्ण और वर्ग के सवाल की गुत्थी यही पर सुलझती है।आदमी को सबसे अधिक दंश तब होता है जब उसके साथ भेदभाव किया जाए। सारे संत्रास का कारण यह भेदभाव है। कबीर जानते थे कि भूख, बीमारी और दरिद्रता भेदभाव नहीं करती। भूख सबको त्रास देती है, समान त्रास, बीमारी भी सबको लगती है और अमीर-गरीब कोई भी हो सकता है। कबीर स्वतः अपने समय के तमाम सवर्णों, ब्राह्मणों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न थे, कारण वे मेहनत करते थे, मेहनत की कमाई खाते थे। उन्होंने ऊँचे वर्ण के लोगों को गरीबी की मार झेलते हुए न देखा होगा और अमीरी का ठाठ करते हुए भी। उन्होंने नीचे वर्णों को भी गरीबी झेलते देखा होगा और अपेक्षाकृत सम्पन्न दलित भी उनकी निगाह में होंगे। जैसा हमने कहा उन्हें इस बिन्दु पर सवर्ण असवर्ण में कोई बुनियादी भेद नहीं दिखाई दिया जो सच भी है। परन्तु कबीर के अनुभवों में यह भी आया होगा कि दरिद्र होते हुए भी ब्राह्मण समाज में पूज्य है, सम्मानित है और सम्पन्न होते हुए भी दलित समाज में सामाजिक भेदभाव का शिकार है। जहाँ भेद है दंश वहाँ है। कबीर इस भेदभाव के खिलाफ ही उठे थे और आज के दलित लेखकों की दुखती राग यही सामाजिक भेदभाव और ऊँच-नीच का भाव है। ऊँचे से ऊँचे ओहदे पर पहुँच जाने के बावजूद दलित दलित ही रहता है सामाजिक भेदभाव का शिकार रहता है और दरिद्र से दरिद्र ब्राह्मण समाज में, भले ही भीख माँगे ब्राह्मण देवता ही माना जाता है।
दलित लेखक इसी नाते वर्ण को भी अहमियत देते हैं वर्ग को नहीं।परन्तु जैसा हमने कहा है कि वर्ग की बड़ी हकीकत को भी वे कभी न कभी समझेंगे। जिस तरह दलितों में एक नया क्लास बड़ी तेजी से उभरकर भौतिक सुविधाएँ एकत्र कर अपने मूल से कटता हुआ आम मध्यवर्गीयों की जिन्दगी जी रहा है, अपनी जाति और अपने वर्ण को छिपाकर सवर्ण जातियों से एकमेल हो रहा है, यदि इस तरह का अंतर्विरोध तीव्र हुआ जैसा कि उसके होने की संभावनाएँ हैं, (अनेक दलित लेखकों ने अपनी कहानियों में इस स्थिति को चित्रित किया है और वे इसके प्रति जागरूक भी हैं) तो वह दिन दूर नहीं जब दलित समझेंगे कि वर्ण से ज्यादा बड़ी हकीकत वर्ग है। वर्ग-स्वार्थ सवर्ण-असर्वण दोनों को एक ही कहेंगे सम्पन्नों को भी और दरिद्रों को भी, तभी सही-वर्ग चेतना का रूप सामने आयेगा, जिसकी चर्चा मार्क्स ने की है।कहना न होगा कि दलित लेखक, ब्राह्मणवाद, मनुवाद या वर्गगत भेदभाव के खिलाफ कितनी भी आवाज क्यों न उठायें, मनुवादी-ब्राह्मणवादी, वर्णवादी सोच ने किस तरह उनके अपने मानस को जकड़ रखा है, क्लेश होता है यह कहते कि उनके अपने लेखन, सामाजिक व्यवहार और विचारों में इसके साक्ष्य हैं। आज तो दलित लेखक खुलकर एक दूसरे के विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
हम इस स्थिति को अहेतुक मानते हैं। दलित चेतन और दलित साहित्य का जो आन्दोलन वर्णगत तथा सामाजिक भेदभाव को लेकर चला, जिसकी प्रेरणा के स्रोत ज्योतिबा फुले तथा बाबा साहेब अम्बेडकर का अपना सामाजिक चिन्तन है, जिन्होंने आजीवन भेदभाव और सामाजिक विसंगतियों पर चोट की, वह चेतना और वह आन्दोलन यदि अपने ही लक्ष्य से भटकने लगें, व्यवहार तथा लेखन में उसी भेदभाव का शिकार हो जाए, जिसके खिलाफ वह सामने आया, तो हमे क्लेशप्रद और अहेतुक और अवांछित ही माना जाएगा। अपने कुछ एक पहले के आलेखों में मैंने दलित मानस और दलित लेखन के इस अंतर्विरोध की ओर संकेत किया है परन्तु किसी भी दलित लेखक ने इस सवाल से टकराने की जरूरत नहीं समझी। दलित चेतना और दलित साहित्य के लक्ष्यों से अपनी एकात्मता के नाते मैं यह प्रश्न पुनः इस नाते उठा रहा हूँ कि दलित लेखक उसे अपनी चिन्ता के दायरे में लाएं और अपने लक्ष्यों को विपथित होने से बचाएँ। यह वह अंतर्विरोध है जो उनके लेखन और उससे जुडे उनके संकल्पों को हर स्तर पर क्षतिग्रस्त करने वाला है।कभी सूरजपाल चौहान की आत्मकथा के कुछ अंश पढ़े थे। अब तो वह आत्मकथा प्रकाशित हो चुकी है। पहली बार पता चला था कि दलित लेखकों के अपने मानस में किस तरह वर्णवाद के घातक प्रभाव मौजूद हैं। सूरजपाल चौहान दलितों में भी दलित (भंगी) जाति से सम्बन्ध रखते हैं। उन्होंने लिखा है कि जब तक उनके दूसरे दलित लेखक मित्रों को उनकी वास्तविक जाति का भान नहीं था। वे उनके साथ उठते बैठते थे खाते-पीते थे, परन्तु जिस क्षण उन्हें पता चला कि सूरजपाल चौहान का सम्बन्ध भंगी जाति से है वे उनके साथ उठने-बैठने, खाने-पीने से परहेज करने लगे। सूरजपाल चौहान ने स्वतः दलित लेखकों पर मनुवादी होने का आरोप लगाया है, खासतौर पर भंगी जाति के प्रति उन दलित लेखकों के व्यवहार पर तीखी टिप्पणियां की हैं जो दलितों में जाटव या चमार कही जाने वाली जाति से सम्बन्ध रखते हैं और अपने को भंगी जाति से ऊँचा मानते हैं और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जो सवर्णों का व्यवहार है और तो और ऊँच-नीच का उनका भाव यहाँ तक है कि खटिक कही जाने वाली जाति में बकर खटिक अपने को सुअर खटीक से ऊँचा मानता है। बहुत ही कष्टदायक है यह सब लिखना और इस अहसास के साथ लिखना कि जो लोग मनुवाद के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाए हैं वे किस कदर इस मनुवाद की गिरफ्त में हैं।
अभी समय माजरा पत्रिका में किन्हीं रतन कुमार सांभरिया का आलेख छपा है। उसमें विस्तार से दलितों के इस मनुवाद पर और उनकी चेतना पर इस अंतर्विरोध पर प्रकाश डाला गया है। इस लेखक के अनुसार हिन्दी का सारा दलित साहित्य आन्दोलन वस्तुतः दो दलित जातियों के बीच होने वाली अंतर्कलह के चलते विपथित हो रहा है। एक तरफ जाटव हैं दूसरी ओर भंगी कहे जाने वाले दलित लेखक पहले वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं - मोहनदास नैमिशराय, डॉ० जय प्रकाश कर्दम, श्यौराज सिंह बेचैन और डॉ० एन० सिंह और दूसरे वर्ग के प्रतिनिधि हैं ओम प्रकाश वाल्मीकि, सूरजपाल चौहान, महेन्द्र बेनीवाल। ये सब दलित साहित्य के जाने माने लेखक हैं जिनकी रचनाओं और विचारों ने दलित आन्दोलन को हिन्दी में अपनी पहचान दी है। अब जब इन्हीं लोगों के बीच में इस तरह की खेमे बंदी हो तो दलित साहित्य के भविष्य के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। जो सवर्ण मानसिकता आरम्भ से ही न तो दलित चेतना के उभार के साथ और ना ही दलित साहित्य की विकासशील दिशाओं से अपना सामंजस्य बिठा पाई है उसके लिए तो दलित लेखकों के बीच का यह संघर्ष और उनके अपने कथन और कर्म का यह अंतर्विरोध एक ऐसा हथियार है जो वह चाह ही रही थी और विडंबना यह कि यह हथियार उसे स्वतः दलित लेखकों ने ही दिया हैं।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि दलित लेखकों के बीच विस्तार के और आचरण के स्तर पर ही नहीं रचनात्मक स्तर पर भी यह युद्ध चल रहा है। ओम प्रकाश वाल्मीकि की 'शवयात्रा' कहानी के जवाब में दलित लेखकों की ओर से ही दूसरी कहानी आती है, उनकी 'खानाबदोश' कहानी का जवाब 'और वह पढ़ गई' जैसी कहानी में कुसुम वियोगी की ओर से दिया जाता है। एक पर चमार जाति को अपमानित और गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया जाता है तो दूसरे पर भंगी जाति को बेआबरू करने का। एक की आत्मकथा से आए प्रसंगों का जवाब दूसरा अपनी आत्मकथा में देता है। महाराष्ट्र के दलित साहित्य में भी ये असंगतियां रही हैं। महारों और मातंगों के अपने-अपने जीवन संदर्भों को लेकर जहां महार अपने को मातंगों से ऊँचा मानते हुए उनके साथ वही व्यवहार करते हैं जो सवर्ण दलित के साथ करते हैं। डॉ० सूर्य नारायन रणसुंभे ने भी इस स्थिति को अहेतुक मानते हुए लिखा है कि दलितों में अपनी ऊँची अस्मिता का मोह इस कदर व्याप्त हो रहा है कि वे दलित युवतियों से विवाह न कर ब्राह्मण कन्याओं से विवाह करने की कोशिश में रहते हैं। उनके अनुसार महाराष्ट्र में ऐसे ही लोगों को दलित ब्राह्मण कहकर याद किया जाता है।मैं वस्तुस्थिति को अतिरंजित करके पेश नहीं करना चाहता, परन्तु वस्तुतः वह जैसी है वह नितांत अहेतुक और क्लेशप्रद है।
दलित लेखकों को जो सामाजिक समता की लड़ाई लड़ रहे हैं विचार, व्यवहार और रचना के स्तर से जागरूक हों इस मानसिकता से मुक्त हो, यह उम्मीद तो उनसे की ही जा सकती है अन्यथा उनके अपने लेखन और आन्दोलन की ऊर्जा का क्षय निश्चित है।एक ओर तो यह वस्तुस्थिति है दूसरी ओर दलित साहित्य के अपने सौन्दर्यशास्त्र की बात भी जोरों से उठ रही है। मराठी में शरण कुमार निम्बाले की दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है जिसका अनुवाद दलित साहित्य के प्रति समर्पित श्रीमती रमणिका गुप्ता ने किया है। हिन्दी में ओम प्रकाश वाल्मीकि अपनी इसी शीर्षक की पुस्तक के साथ सामने आए हैं। मैंने शरण कुमार निम्बाले की पुस्तक नहीं देखी है परन्तु जो कुछ उसके बारे में जाना है वह यह कि प्रगतिशील विचारों के होने के नाते निम्बाले ने बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों को प्रमुखता देते हुए भी मार्क्स के दर्शन को भी अपनी निगाह के दायरे में रखा है और उससे भी आवश्यक संबंध लेने की बात कही है। उन्होंने पश्चिम के अश्वेत साहित्य के संदर्भ में लिए हैं। उनके लेखन और विचारों का पाठ व्यापक और विस्तृत प्रतीत होता है और लगता है कि वे बहुत सुविचारित रूप से दलित साहित्य के सौन्दर्य शास्त्र का प्रारूप लेकर सामने आए हैं। ओम प्रकाश वाल्मीकि की पुस्तक मैंने पढ़ी है। वे समर्थ दलित रचनाकार हैं जिन्होंने अपने 'सलाम' कहानी संकलन तथा दूसरी कहानियों के जरिए अपने कहानीकार की बड़ी भावनापूर्ण छवि पेश की है। वे समय-समय पर दलित साहित्य से जुड़े मुद्दों पर लेख भी लिखते रहे हैं और उनके लेखों में एक संजीदा दलित विचारक के रूप में पहचान भी हमें मिलती रही है। उनकी 'दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र' पुस्तक वस्तुतः दलित लेखन से जुड़े मुद्दों का समय-समय पर उनके द्वारा लिखे गये आलेखों का संकलन है जिनमें उन्होंने दलित साहित्य की अवधारण से लेकर उसकी प्रासंगिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, उसके स्वरूप, उसकी वैचारिक अंतर्वस्तु और उसकी भाषा तथा रचना शैली आदि पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। पुस्तक का एक निबन्ध दलित साहित्य के सौन्दर्य शास्त्र पर भी हैं जिसके आधार पर पुस्तक का शीर्षक रखा गया है। परन्तु निम्बाले के विपरीत ओम प्रकाश वाल्मीकि पूरी तरह से अम्बेडकर जी के विचारों पर ही आधारित हैं और महज नामवर सिंह के कभी दलित साहित्य पर व्यक्त विचारों को लेकर उन्होंने पूरी मार्क्सवादी दर्शन को खारिज करने की कोशिश की है, इस शीर्षक के साथ कि क्या मार्क्सवाद कभी इन सवालों से टकराएगा? इस प्रकार के निष्कर्ष और विचार जाहिर हैं कि हड़बड़ी में व्यक्त किये गये विचार हैं जिनसे बचने की जरूरत हैं। मार्क्सवाद को खाजिर करने के लिए उन्हें समग्रता में मार्क्सवादी दर्शन पर गौर करना चाहिए था ना कि किसी प्रसंग में किसी मार्क्सवादी लेखक के विचारों को मुद्दा बनाकर पूरे के पूरे मार्क्सवादी दर्शन को खारिज करना। बहरहाल, जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि सौन्दर्यशास्त्र जैसे मुद्दे पर बात गंभीरता से होनी चाहिए। प्रतिक्रिया मृतक आवेश के तहत नहीं।जो भी सौन्दर्यशास्त्र आना चाहिए वह दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र हो, ना कि हिन्दी या मराठी या किसी अन्य भाषा के दलित साहित्य का। इसके लिए दलित लेखकों को आम सहमति बनानी चाहिए। अन्यथा अराजकता की स्थिति ही उत्पन्न होगी। जब दलित लेखकों ने शास्त्र के अनुशासन को मान ही लिया है तो जो भी शास्त्र आए वह शास्त्र के अनुशासन का पालन करने वाला हो। सौन्दर्यशास्त्र रचना के सौन्दर्य का शास्त्र होता है उसका तर्क शास्त्र नहीं। अर्थात्‌ ये मुद्दे कि दलित साहित्य क्या है, उसकी प्रासंगिकता क्या है, आदि सौन्दर्यशास्त्र के मुद्दे नहीं हैं। सौन्दर्य शास्त्र रचना की निर्मिति, ग्रहण और उसे मूल्य देने का शास्त्र होता है। उसके लिए एकाग्रता, सुविचारित तथ्य जरूरी होते हैं।
वह जीवन की, साहित्य की समग्रता को समेटने वाला शास्त्र होता है। उसके पीछे जो सर्जना होती है उसमें इतना वैविध्य होना चाहिए कि वह एक समग्र और संश्लिष्ट सौन्दर्यशास्त्र का आधार बन सके। मराठी की तुलना में अभी हिन्दी का दलित साहित्य बहुत समृद्ध नहीं है। कुछ आत्म कथाएँ हैं जो मराठी दलित आत्मकथाओं की तरह का सघन प्रभाव नहीं छोड़ती। कहानियाँ हैं और निश्चय ही उनमें उत्कृष्ट कहानियां भी हैं। कविता भी बहुत कम है और वह भी बहुत स्तरीय नहीं हैं। आवेशजन्य प्रतिक्रियाएँ कविता नहीं बनातीं। प्रगतिशील आन्दोलन के आरम्भिक दौर में ऐसी तमाम रचनाएँ सामने आयीं थीं जिनमें तत्त्व कम था झाग बहुत। शब्दों के जरिए पूँजीवाद को ध्वस्त कर दिया गया था, क्रांति भी सम्पन्न कर ली गई थी परन्तु वास्तविक जीवन में सब कुछ पहले जैसा ही विद्यमान था। ऐसी रचनाओं का क्या हश्र हुआ हम जानते हैं। वहीं रचनाएँ प्रगतिशील सर्जना का मानक बनीं जिनमें सामाजिक यथार्थ के मद्देनजर जिन्दगी को देखा था, हार गया था, जनता के जीवन के सजीव बिम्ब थे और जिन्दगी की विषमताओं विसंगतियों की खरी पहचान। दलित लेखकों को प्रगतिशील आन्दोलन के इतिहास से सीखना चाहिए। अपनी रचना में दलित जीवन के यथार्थ को वस्तुगत यथार्थ को उभारना चाहिए मनोकांक्षाओं को नहीं। दलितों के अपने स्वप्न तथा संघर्ष उनकी मनोकांक्षाओं के बिम्ब आने चाहिए।इस नाते की कविता बयान या वक्तव्य नहीं होती। अभी दलित साहित्य अतीत के समाजेतिहास से ही जुड़ा हुआ है। अतीत का यह 'हैंग ओवर' शनैः शनैः समाप्त होना चाहिए और दलित लेखकों की अपने वर्तमान और भविष्य की उन सम्भवनाओं को देखना चाहिए जो उनके वर्तमान का तार्किक प्रतिफल होंगी। बहुआयामी बहुविध रचनाशीलता के बिना जो भी सौन्दर्यशास्त्र आएगा वह अधूरा होगा।दलित लेखन में संभावनाएं हैं, प्रतिभाएं हैं, जीते-जागते अनुभव हैं, स्वानुभूति की बंधक पूँजी है। उसका उपयोग भी दलित लेखकों ने किया है।
जरूरत पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर, प्रतिक्रियामूलक आवेश से बचते हुए, इस पूँजी का ऐसा उपयोग करने की है कि दलित सर्जना चली आ रही परंपरित सर्जना से अलग अपने वैशिष्ट्य में पहचानी जा सके। पारम्परिक रागद्वेष, अंतर्कलह और अंतर्विरोध, कोरी प्रतिक्रिया और रोमानी जोश किसी भी सर्जना को क्षतिग्रस्त करता है। दलित लेखक समझें कि उनका लेखन उदीयमान संभावनाओं वाला लेखन है। इसके पहले कि वह अपने चरम वैशिष्ट्य पर पहुँचे, उसे क्षरित नहीं होना चाहिए। ये नसीहतें नहीं हैं, सच्चे मन से किया जाने वाला अनुरोध है, जिसे निश्छल मन से स्वीकार करने की जरूरत है। जो भी गैर-दलित अपने गहरे मानवीय सरोकारों के तहत दलित लेखन से विचारगत और रागात्मक संबंध रखते हैं, उन्हें मित्र-लेखक मानते हुए उनके कर्तृत्व को देखा जाए, पूर्वाग्रह पूर्ण मानसिकता से नहीं। हम पहले भी कह चुके हैं कि व्यवस्था बड़ी जटिल है, हजार बाहों वाली है। उससे अकेले नहीं लड़ा जा सकता। हजारों सालों की सामाजिक संरचना को आनन-फानन नहीं बदला जा सकता। कहानियों, कविताओं और उपन्यासों में क्रांति कर लेने से वास्तविक जीवन में क्रांति नहीं हो जाएगी। जिन्दगी की वास्तविकता को ही आधार बनाकर सोच को आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि दलित लेखक अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ना चाहते हों, तो यह और बात है। हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं परन्तु मैंने पहले भी कहा है कि यदि वे अपनी लड़ाई जीतना चाहते हैं तो उन्हें समान सरोकारों के अपने उन साथियों को लेकर चलना होगा जो भले ही गैर दलित हों, उनकी लड़ाई में उनके साथ हैं।ऊपर हमने जो कुछ लिखा है, दलित साहित्य के लक्ष्यों से अपने लगाव के नाते, उसकी सर्जनात्मक और विचारगत उपलब्धियों के प्रति पूरी तरह सजग रहते हुए, नकारात्मक या कुछ अप्रिय टिप्पणियाँ यदि हमने की हैं तो इसी नाते कि हम चाहते हैं कि दलित लेखन अपनी संभावनाओं के साथ आए, साहित्य की चली आ रही परम्परा में कुछ नया और विशिष्ट जोडे, अपनी पहचान को गाढ़ा करें। हिन्दी में दलित साहित्य का आन्दोलन बहुत पुराना नहीं है, और अल्प अवधि में भी उसने अपनी छाप बड़े पाठक वर्ग के बीच छोड़ी है। आत्मकथाएं मराठी की तुलना में कम हैं और अभी दया पवार या लक्ष्मण माने जैसे लेखकों की अपनी आत्मकथाओं की तुलना में प्रभाव सघनता की दृष्टि से भले ही कुछ कमतर लगती हो, परन्तु जो है उनमें व्यक्त अनुभव जीते जागते अनुभव हैं। एक तल्ख सच्चाई को उजागर करने वाले हैं, जिसे अनदेखा किया जाता रहा है। पहली बार वे अनुभव हमारे सामने भोक्ताओं के जिए भोगे के साक्ष्य के रूप में सामने आए हैं। कहानियाँ हम कह चुके हैं, दलित लेखकों की बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आएं हैं। अछूते अनुभवों वाली ये कहानियां इस नाते मार्मिक हैं कि उनमें भी रचनाकारों ने अपनी जी हुई और भोगी हुई वास्तविकता को ही अभिव्यक्त किया है, बिना किसी छद्म के। कविताएं भी बहुत लिखी गयी हैं परन्तु उनमें अभी वैसी परिपक्वता नहीं है जैसे कहानियों में। कविता बहुत महीन विधा है। परन्तु दलित रचनाकार कविता की प्रकृति और वैशिष्ट्य को पहचानेंगे और कविता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियों के साथ सामने आयेंगे। जो कविताएं आई हैं उनमें ऐसी कविताएं भी हैं जो हमारी इस आशा को बल देती हैं। जहां तक विचार प्रधान गद्य की बात है, दलित लेखकों में ऐसे विचारक समीक्षक हैं जिनके पास दृष्टि भी है और विचार भी। थोड़े समय में ही दलित विचारकों की एक पंक्ति की पंक्ति सामने आई है। छिटपुट अपवादों को छोड़ दें और आग्रहों-पूर्वाग्रहों के चलते जो कुछ विसंगतियां आई हैं उन्हें छोड़ दें, तो अधिकांशतः दलित विचारकों ने अपनी बातें तर्क और तथ्य की जमीन पर ही की है। उनके आलेखों ने चल रहे विमर्श को पैना किया है उसे गतिशील बनाया है। सहज ही कहा जा सकता है कि दलित साहित्य अभी उठान पर है और उसकी संभावनाओं के प्रति हम आश्वस्त हैं।

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Friday, November 7, 2008

सुकून

शकील
मुश्ताक की शादी के तीसरे दिन सुबह नाश्ते के दौरान क़ारी रशीद अहमद बोल पड़े थे, ''सोचता हूँ कि अब हज के फ़रीजे से भी सुबुकदोश हो लूँ।''
पानी लाती गुलशन को लगा कि जग उसके हाथ से छूटकर गिर पडेगा। मुश्किल से उसने फिसलते जग को संभाला।''पैसे हैं इतने तो जरूर जाओ! ''
गुलशन के ससुर अजीज मियाँ उनकी आँखों में घूरते हुऐ बोले। दरअसल वे अनुमान लगा रहे थे कि चार बीघे की खेती और मदरसे की मुअल्लिमी (अध्यापकी) से रशीद मियाँ ने कितनी कमाई कर रखी है कि वे हज का इरादा भी करने लगे हैं।''
शुरू से ही हज के इरादे से पैसे जोड़ रहा था। पैसे कोई ज्यादा नहीं हैं मेरे पास। बस, हज के खर्च के बराबर ही हैं, पर मेरा इरादा शुरू से ही था। गुलशन और मुश्ताक की शादियों का इंतजार कर रहा था। गुलशन को तो माशाअल्लाह खुदा ने एक खूबसूरत सा बेटा भी नवाज दिया और अब मुश्ताक की शादी भी हो गई तो लगता है अपने इरादे को अमली जामा पहनाने का वक्त आ गया है।''
रशीद मियाँ मानो अपने आप से बातें करने लगे थे।''आप ने अब्बू, मुझे हज के इरादे के बारे में पहले कभी नहीं बताया?'' गुलशन ने नाराजगी भरे स्वर में क़ारी रशीद अहमद से सवाल किया।''
पहले तो किसी को भी नहीं बताया बेटा, आज ही बता रहा हूँ। वक्त से पहले बताकर क्या मिलता?!''
कारी रशीद अहमद सफाई देते से लगे। जानते थे गुलशन को उनका उससे अपने हज के इरादे को छुपा कर रखना नागवार लगा है। वह अपना अधिकार समझती है कि वे अपने सुख-दुख की हर बात उसे बताएँ। उसका अधिकार जताना वाजिब भी है। उन पर जान छिड़कती है वह। उन्होंने भी उसे नाजों से पाला है। कुरैशा जब गुलशन को जन्म देने के फ़ौरन बाद गुजर गई थी तभी उन्होंने संकल्प कर लिया था कि वे दूसरी शादी नहीं करेंगे। मदरसे के कुछ मुअल्लिम और गांव के कुछ लोग उन्हें बार-बार दूसरे निकाह की सलाह देने लगे थे। लेकिन अपने पिता जैसे ससुर और माँ जैसी सास को और सबसे बढ़कर कुरैशा की रूह को तकलीफ पहुंचाने का साहस उनमें नहीं था। कुरैशा को वे चाहते थे। ज्यादा लोगों को उन्होंने इतना नहीं चाहा था। माँ-बाप को टूटकर चाहते थे तो खुदा ने उनके बचपन में ही उन्हें अपने पास बुला लिया। उन्हें अपने माँ-बाप की बहुत धुंधली सी याद थी। गया जिले के उत्तरी हिस्से के एक अन्दुरूनी गाँव के रहने वाले थे। सात-आठ साल की उम्र रही होगी उनकी जब उनके वालिद ने उन्हें गया के एक मदरसे में हिफ्ज के लिए भेज दिया था। लेकिन मदरसा आने के बाद दुबारा वे अपने माँ-बाप से नहीं मिल सके। जिस वर्श उनका मदरसा में दाखिला हुआ था उसी साल एक दिन मदरसा के प्रबन्धक ने उन्हें बताया था कि उनके गाँव में साम्प्रदायिक दंगे भड़क गए हैं और कई लोगों के मारे जाने की खबर है।
दंगे थमने के बाद मदरसा के प्रबन्धक ने मदरसा के वरिष्ट मुअल्लिम कारी जमील अहमद को उन्हें साथ लेकर उनके गाँव जाने के लिए कहा था। गाँव में कुछ भी नहीं बचा था। उनके सभी परिजनों को दंगाईयों ने मार दिया था-माँ-बाप, छोटे-छोटे भाई-बहनों सभी को। उनके घर जमीन-जायदाद पर भी कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया था। रोने-धोने और चीखने-चिल्लाने के अलावा वे और कुछ नहीं कर सकते थे। कारी जमील अहमद ने उन्हें सीने से लगा लिया था। वे उन्हें वापस मदरसा ले आये थे। वे उस दिन के बाद से उन्हें बहुत अजीज रखने लगे थे। मदरसे में ही तालीम हासिल करते हुए, खुदा की इबादत में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताते हुए वे बेहद अन्तर्मुखी होते गए। मदरसे के किसी भी दूसरे तालिब इल्म से वे दोस्ती नहीं बढ़ा सके। कोई उन्हें बहुत अच्छा नहीं लगता। लेकिन कुरैशा उन्हें अच्छी लगने लगी थी। छुट्टियों में कारी जमील अहमद नवादा जिला स्थित अपने गाँव मरूई जब भी जाते उन्हें भी अवश्य साथ ले जाते। वहां कारी साहब की बीवी उन्हें माँ जैसा प्यार देतीं और कारी साहब की उनकी हमउम्र इकलौती बेटी कुरैशा उनसे बेवजह शर्माती।
वे जब मदरसा लौट जाते तो उन्हें कुरैशा की यादें सताने लगती। वे शिद्दत से अगली छुट्टी का इंतजार करने लगते। इधर वे मदरसे की तालीम मुकम्मल करते हुए पूर्ण युवा में परिवर्तित हो गए उधर मरूई में कुरैशा भी एक खूबसूरत शर्मीली जवान लड़की में तब्दील हो गई थी। तालीम पूरी कर वे गया के मदरसे में ही पढ़ाने लगे थे पर गया में उनके दिल को सुकून नहीं था। उनका दिल नवादा शहर से लगभग बीस किलोमीटर भीतर के कारी साहब के गांव मरूई में लगा हुआ था। वे कारी साहब से अपने दिल की हालत बयान कर देना चाहते थे पर साहस नहीं जुटा पा रहे थे। यह साहस उन्हें दिखाना भी नहीं पड़ा। मरूई से लौटकर एक बार कारी साहब ने उनके सामने दो प्रस्ताव रखे। पहला प्रस्ताव तो कुरैशा से विवाह का था, दूसरा मरूई में खुल रहे मदरसे में मुअल्लिम की हैसियत से काम करने का था। उन्हें तो जैसे मुंह मांगी मुरादें मिल गई थीं। उन्होंने तुरन्त हामी भर दी। इस तरह उनसे शर्माने वाली कुरैशा उनकी बीवी बनी और विवाह के वर्श भर बाद उसने मुश्ताक को जन्म दिया। मुश्ताक के जन्म के बाद उन्होंने दुनियादारी में भी दिलचस्पी लेने की कोशिश की।
मदरसे की मुअल्लिम से वक्त निकाल कर वे कारी साहब की खेती-गृहस्थी के काम को समझने का प्रयास करने लगे। आखिर वे उनके घर जवांई ही तो थे। पर नियति को शायद यह सब स्वीकार नहीं था। गुलशन के जन्म के तुरन्त बाद सब लोगों को गहरा सदमा पहुंचाते हुए कुरैशा ने आँखे मूँद लीं। कारी साहब और उनकी बीवी ने अपने बुढ़ापे में इकलौती संतान की मौत का दुख झेलते हुए नाती और नातिनी को कुछेक वर्श पाला फिर बारी-बारी इस दुनिया से कूच कर गए। वे स्वयं भी अन्दर से हिल गये थे। वे खुदा से जानना चाहते थे कि जिसे भी वे बेहद चाहते हैं क्यों खुदा उसे उनसे छीन लेता है? पर उन्होंने खुदा से यह सवाल नहीं पूछा। वे खुदा से डरते थे। वे अपने बच्चों से प्यार करते थे। इसलिए नमाजों में खुदा से दुआ करते, ''परवरदिगार, मैं अपने बच्चों को बेहद चाहता हूँ। उन्हें पूरी जिन्दगी जीने देना, उन्हें बेवक्त की मौत न दे देना।
मौत ही देनी हो तो मुझे देना, मेरे बच्चों को बख्श देना।''वे इबादत में पूरी तरह डूबते चले गये और उन्होंने खुदा से हज का वादा किया। उन्होंने वादा किया कि वे दोनों बच्चों की शादी के बाद हज करेंगे। किस्मत से गुलशन की शादी मरूई में ही कारी साहब के दूर के रिश्तेदार अजीज मियां के बेटे सिराज से हो गई। और अब जबकि मुश्ताक की भी शादी हो गई तो उन्हें लगा कि अब अपने दिल की बात उन्हें जाहिर कर देनी चाहिए।गुलशन ने याद किया कि बस्ती में उसके होश में जिन तीन-चार लोगों ने हज किया वे हज के बाद ज्यादा दिन जीवित नहीं रहें। हज के बाद मानो लोग सिर्फ मौत के दिन गिनते रहते हैं। वह अब्बू की मौत नहीं देख सकती थी। वह बेचैन हो गई, ''अब इतनी जल्दी क्या है अब्बू? कभी जाइएगा ना!''''अब बेटा हज का इरादा तो खुदा दिल में पैदा करते हैं और जो तुम्हारे अब्बा जाना चाहते हैं अगर अगले ही बरस तो उन्हें हो आ लेने दो!'' जवाब उसके अब्बा की बजाए उसके ससुर अजीज मियां ने दिया था। गुलशन को बाप-बेटी के बीच ससुर का खुद को घसीट लेना अच्छा तो नहीं लगा पर वह उनका भी बहुत लिहाज करती थी। इसलिए खामोश हो गई। लेकिन उसके दिल में मानो कहीं कोई चीज चुभ गई थी। शादी-ब्याह का हंसी खुशी से भरा माहौल अचानक अनाकर्शक लगने लगा था। वह सबों को नाश्ते और बातचीत में व्यस्त छोड़कर उस कमरे में चली आई जिसमें उसका छः मास का बेटा मेराज बिस्तर पर सोया हुआ था।
वह गुमसुम सी उसके पास ही बैठ गई। उसे अपना दिल डूबता हुआ सा लग रहा था। बेचैनी से उसके पेट में हल्की मरोड़-सी होने लगी थी।बेटे मेराज को सुला लेने के बाद भी गुलशन जब सिराज से असंपृक्त-सी खामोशी के साथ बिस्तर पर पड़ी रही तो उसने खुद पहल करते हुए उसे सम्बोधित किया, ''गुलशन''!गुलशन ने सिराज की ओर करवट बदल ली और खामोशी से उसकी आँखों में देखा। सिराज उसकी सूनी आँखें देखकर व्यथित हुआ। वह जानता था गुलशन की जिन्दगी में उसके अब्बू का क्या महत्व है। वह उसके नर्म और नाजुक स्वभाव से भी परिचित था बल्कि इसी वजह से उसने उससे शादी की। उसे तेज आवाज में बातें करने लगी, गालियां बकने और कोसने देने में माहिर लड़कियाँ पसंद नहीं थीं। वह बचपन से उसके संजीदा स्वभाव से परिचित था और सच तो यह था कि वह उससे प्यार करता था।''गुलशन, अब्बू लगभग महीने भर के लिए ही तो हम से दूर जाएंगे। इतना परेशान मत हो।'' सिराज ने गुलशन को समझाने की कोशिश की।
''नहीं, मैं नहीं चाहती कि वे हज को जाएँ!'' गुलशन ने कुछ इस अंदाज से सिराज से कहा मानो वह अब्बू को हज पर जाने से रोक लेगा। सिराज जानता था कि उसके वश में वास्तव में कुछ नहीं था। पर गुलशन का तनाव कम करने के लिए उसे झूठी तसल्ली तो दे सकता था। उसने कहा, ''अभी अब्बू ने एक राय जाहिर की है। हज के लिए जाने में बहुत झमेले हैं। कौन जाने बाद में उनकी राय बदल जाए।''गुलशन को सिराज की बातें अच्छी लगीं। उसके चेहरे का फीकापन गायब होने लगा और शरीर पर उसके हाथों का स्पर्श भी बुरा नहीं लगा।इस घटना को दिन गुजरे, फिर हफ्ते, फिर महीने। शुरू में गुलशन कारी रशीद अहमद के हाव-भाव और चेहरे-मोहरे से जायजा लेती रही कि हज के उनके इरादे का क्या हुआ। पर उन्होंने इस बारे में फिर कभी कोई बात नहीं की तो उसे विश्वास-सा हो गया कि उन्होंने हज का अपना इरादा तर्क कर दिया है। पर एक दिन सुबह-सुबह जब अब्बू उसके घर खुद चले आए तो उसका माथा ठनका। वह खुद हर रोज नाश्ता बना कर, सास-ससुर और सिराज को खिला-पिलाकर थोड़ी देर के लिए अब्बू के घर चली जाया करती थी। और अब्बू का घर था भी कितनी दूर। अपने घर के सामने के घरों की कतार के पीछे जमीन का एक खुला छोटा-सा हिस्सा था। उस खुले-हिस्से से पश्चिम की तरफ घरों की जो क़तार थी उसमें उत्तर की तरफ का आखिरी घर। पर आज वहाँ उसके पहुंचने के पहले ही खुद अब्बू उसके यहाँ चले आए थे। क्या वजह हो सकती थी। उसके अन्दर की जिज्ञासा ने उसे बेचैनी से भर दिया। शिकन भरे माथे के साथ उसने सवाल किया, ''क्या बात है अब्बू, सब खैरियत तो? मुश्ताक और दुल्हन ठीक है ना?''''
हाँ, सब ठीक है। सोचा आज गुल्लू के यहाँ नाश्ता करूँ।'' रशीद अहमद मुस्कुराते हुए बोले।''अल्ला! अब्बू आज ही क्यों? हम चाहेंगे आप रोज ही यहाँ नाश्ता करें, खाना खाएँ।'' कहती हुई गुलशन ने बैठक में चले आए अजीज मियाँ को सम्बोधित किया, ''क्यों अब्बा?!''''हाँ, बिल्कुल! यह भी कोई पूछने की बात है!!'' अजीज मियां ने गुलशन का समर्थन किया। इस बीच सिराज भी वहाँ आ गया।गुलशन खाट पर बिछावन डालकर ऊपर चादर डालने लगी। ऐसा करते हुए उसके अन्दर सवाल-दर-सवाल पैदा होते रहे। नाश्ते की बात तो अब्बू ने यूं ही कह दी। मुश्ताक और दुल्हन की जब कोई बात नहीं तो....तो क्या अब्बू? उसे अपने दिमाग के अन्दर की कोई गांठ ढीली होती सी लगी।
''बात यह है बेटा कि कल हज कमीटी के दफ्तर से दरखास्त आ गई है। मैं दरखास्त भरकर एक-दो रोज में भेजूंगा। सोचा, तुम्हें बता दूँ।''गुलशन ने अपने हृदय पर एक आघात सा महसूस किया। तो अब्बू हज के इरादे पर न सिर्फ क़ायम हैं बल्कि उसकी तैयारी भी शुरू कर दी है। उसे घबराहट भरी बेचैनी महसूस होने लगी। कुछ देर वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी अपनी जगह खड़ी रही। फिर अचानक बोली, ''तो अब्बू आप अपनी ही जि+द पूरी करना चाहते हैं?''''देखो बेटा, हज की मेरी दिली ख्वाहिश है, मैं हज नहीं करूँगा तो मुझे सुकून नहीं मिलेगा। मैंने खुदा से बहुत पहले हज का वादा कर दिया था।.....'' रशीद अहमद गुलशन को समझाते-समझाते मानो अपने आप से बाते करने लगे।''
तो अब्बू आप हज की अपनी जिद पूरी कीजिए परे मैं आज से आपके न घर आऊंगी और न आप से बात करूंगी।'' गुलशन ने गहरे रोश से कहा।''गुलशन, तुम ऐसा जुल्म करोगी अपने अब्बू पर?''
रशीद अहमद दुखी स्वर में बोले पर गुलशन ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अन्दर के कमरे में गई और बेटे मेराज को लाकर रशीद मियां की गोद में बिना कुछ बोले दे दिया। रशीद अहमद ने थोड़ी देर नाती को प्यार किया फिर उसे गुलशन को वापस दे दिया। जब रशीद अहमद वापस जाने लगे तो गुलशन ने उन्हें सलाम भी नहीं किया, आँखों में आँसू भरकर उन्हें जाते हुए देखती रही।गुलशन ने सच में रशीद के घर जाना और उनसे बातचीत करना बंद कर दिया। नासमझ गुलशन की जिद से रशीद अहमद दुखी तो थे पर खुदा से किये वादे को तोड़ देने का साहस उनमें नहीं था। समधी-समधन, दामाद, बेटे और बहू के माध्यम से उसे समझाने- मनाने की कोशिशें करके जब वे थक गये तो यह सोच कर दिल को तसल्ली दे ली कि उसका उनसे बातचीत बंद कर देना उसके उनसे बेइन्तहा प्यार के इजहार का ही एक तरीका था।पर एक दिन जब घर में प्रवेश करते हुए हज कमीटी की तरफ से अब्बू की दरखास्त की मंजूरी मिल जाने की खबर सिराज ने गुलशन को दी तो कुछ देर तो निर्विकार सी वह अपने काम में लगी रही फिर अचानक ही सिराज से बोली, ''सिराज, मैं अब्बू से मिलूंगी।''''ठीक है तो मिल आओ!''
सिराज ने जल्दी से कहा। उसे अपने अंदर अनकही सी खुशी महसूस हुई। जब से गुलशन ने अब्बू से मिलना-जुलना बंद कर रखा था, वह खुद बहुत पीड़ित-सा महसूस करता था। अब गुलशन के ऐसा कहने पर उसे लगा कि अब्बू से उसका मिलना-जुलना और बातचीत बंद कर देना शायद उन्हें हज का इरादा तर्क कर देने के लिए दबाव बनाने का उसका एक तरीका भर था पर अब जबकि अब्बू की दरखास्त की मंजूरी आ गई है तो वह हार मान चुकी है।''तुम भी साथ चलो, मैं अकेली नहीं जा पाऊंगी।''
गुलशन ने कहा।''ठीक है मैं भी साथ चलता हूँ।'' सिराज को लगा, इतने दिन अब्बू से मिलना-जुलना और बातचीत बंद रखने की जिद की वजह से गुलशन शर्मिन्दा है।रशीद अहमद उस वक्त घर की बैठक में ही थे जिस वक्त मुश्ताक ने अन्दर आकर गुलशन के आने की सूचना उन्हें दी। रशीद अहमद हर्शातिरेक में उठ खडे हुए और कमरे से बाहर निकल कर दरवाजे के सामने खड़े हो गए। उनके साथ गाँव के दो लोग और भी थे। वे भी उनका अनुसरण करते हुए बाहर चले आए। रशीद मियां ने देखा, सामने के मैदान के बीच की पगडंडी पर आगे-आगे सिराज और उसके पीछे मेराज को गोद में लिए गुलशन चले आ रहे थे। वे जब नजदीक आ गए तो सबसे पहले उन्होंने लगभग वर्श भर के मेराज को गुलशन से ले लिया और उसे चूमने लगे। गुलशन उनके पैर पकड़ते हुए बैठ गई, ''माफ़ कर दीजिए अब्बू!''
झुककर एक हाथ से उसे उठाते हुए रशीद अहमद बोले, ''नहीं'', मैं जानता हूँ, हज की मेरी जिद के बावजूद तुम मुझे माफ करने आई हो। मेरी गुल्लू का दिल कितना बड़ा है।''रशीद अहमद के सीने से लगकर गुलशन रो पड़ी। उनकी आँखों में पहले ही आँसू आ गए थे। पास खड़े सिराज, मुश्ताक और दूसरे लोगों की आँखें भी भीग गईं।गुलशन एक बार और रोई थी। जब वह अब्बू को कोलकाता के लिए विदा करने सिराज और मुश्ताक के साथ गया रेलवे स्टेशन गई थी। उसके बाद वह फिर कभी नहीं रोई। गया से नवादा और नवादा से अपने गाँव मुरूई लौटते हुए भी वह बिल्कुल नहीं रोई और न बकरीद के दूसरे दिन जब घबराहट से भरे हुए मुश्ताक ने अलसुबह आकर वह मन्हूस खबर सुनाई कि हज के दौरान मीना में भगदड़ में कुचल कर कई हज यात्रिायों के मरने की खबर है जिनमें भारतीय हज यात्री भी शामिल हैं। और गुलशन तब भी नहीं रोई जब अगले दिन सऊदी से हज कमीटी की तरफ से मदरसे में फोन से खबर आ गई कि मरने वालों में कारी रशीद अहमद भी थे और उन्हें वहीं दफना दिया गया है।
अगले दिन अलस्सुबह नींद टूटने पर सिराज ने देखा कि गुलशन मेराज को स्तनपान कराते हुए लगातार कुछ बड़बड़ाए जा रही है। पहले उसने समझा कि वह मेराज से लाड में बातें कर रही है पर मेराज जब दूध पीकर सो गया और वह तब भी उसी तरह बड़बड़ाती रही तो सिराज डर गया। उसके मन में एक आशंका रेंग आई। वह पूछ बैठा, ''यह क्या बड़बड़ा रही हो तुम गुलशन?'
'''मैं अब्बू के पास जाना चाहती हूँ!'' गुलशन ने कुछ अजीब सी नजरों से उसे घूरते हुए कहा। इससे पहले कि वह कुछ और बोलता गुलशन बाहर के दर की ओर निकलती हुई बोली, ''मैं अब्बू से मिलने जा रही हूँ।
''सिराज हड़बड़ा कर उठा और गुलशन का पीछा करते हुए बाहर आया तो देखा कि गली में बदहवास सी वह भाग रही है। वह भी उसके पीछे भागा। जब वह पकड़ में आई तो वह परेशान से स्वर में बोला, ''यह सब क्या कर रही हो गुलशन?''''मैं अब्बू के पास जा रही हूँ।'' फटी-फटी आँखों से सिराज को घूरते हुए उसने कहा।''अब्बू तो गुलशन अब.....'' कहते-कहते सिराज रूक गया फिर बात बदल कर बोला, ''गुलशन, चलो, घर चलो!''गुलशन ने कोई जवाब नहीं दिया। फटी आँखों से वह उसे घूरती रही। मैं तुम्हारा सिराज हूँ, सिराज की आँख में आँसू आ गए। वह रूंधे गले से बोला, ''घर चलो गुलशन, मेराज रो रहा होगा।
''मेराज का नाम सुनकर वह कुछ सोचने लगी और प्रकृतिस्थ होती सी लगी। तब हाथ पकड़कर सिराज उसे घर तक ले आया।गुलशन की झाड़-फूंक शुरू हुई। पहले गाँव में, फिर नवादा में फिर गया के खानकाहों में पर उसकी हालत बिगड़ती ही गई। तब कुछ लोगों ने इलाज की राय दी। उसे नवादा के जिस डॉक्टर से दिखाया गया उसने उसे पड़ोसी प्रान्त झारखण्ड की राजधानी रांची के एक प्रसिद्ध डॉक्टर के यहाँ रैफर कर दिया। सिराज और मुश्ताक ने उसे रांची ले जाने की जिम्मेदारी संभाली।लोगों के अजीब से शोर से बस में ऊँघ रहे सिराज और मुश्ताक जग पड़े और अपने बीच गुलशन को न पाकर अपने हृदय की धड़कनों को रूकती हुई महसूस किया। शोर बस के बाहर ज्यादा था। अन्दर कुछ यात्री बस के ड्राइवर, कंडक्टर और खलासी को भला बुरा कह रहे थे। मेराज सिराज की गोद में अब भी सो रहा था। वे दोनों कुछ याद करते हुए हड़बड़ा कर उठे। बस हजारीबाग बस स्टैण्ड के बाहर नेशनल हाईवे पर रूकी हुई थी। रांची में गुलशन को डॉक्टर से दिखाकर वे घर लौट रहे थे। रातभर जगते रहने के कारण वे नींद से बेहद भरे हुए थे और रांची से बस खुलने के समय से ही वे झपकियाँ लेने लगे थे।''इन झपकियों ने कहीं कोई अनर्थ न कर दिया हो।'' सिराज ने सोचा और बस से नीचे उतरा।
पीछे-पीछे मुश्ताक भी।नीचे दोनों ने पाया कि बस का कंडक्टर, खलासी और कुछ दूसरे लोग बस के किनारे जमीन पर पड़ी गुलशन को उठाने का प्रयास करते हुए कह रहे थे, ''अरे यह औरत है किसके साथ?''''हम लोगों के साथ।'' सिराज और मुश्ताक दोनों लगभग एक साथ घबराई हुई आवाज में बोलते हुए आगे बढ़े। गुलशन बेहोश थी और उसका चेहरा लहूलुहान था। नाक और बाएँ कान से भी खून रिस रहा था। कुछ लोगों ने बताया कि रूकी हुई बस से गुलशन अचानक नीचे उतर आई थी और ड्राइवर ने उसी समय गाड़ी आगे बढ़ा दी थी और बस के पिछले खुले दरवाजे से गुलशन टकरा गयी थी। लोगों ने उसे तुरन्त किसी डॉक्टर के पास ले जाने की राय दी। कुछ लोगों ने एक रिक्शा रूकवा कर गुलशन को उस पर सवार करने में मदद की और रिक्शे वाले को एक प्राइवेट नर्सिंग होम का पता बताते हुए उन्हें वहां ले जाने को कहा।हजारीबाग के उस प्राइवेट नर्सिंग होम में मरहम पट्टी के बाद गुलशन को दिनभर कई तरह के इंजेक्शन पड़ते रहे पर उसे होश नहीं आया। देर शाम को डॉक्टर ने कहा कि बेहतर होगा कि वे मरीज को रांची ले जाएं, उसकी स्थिति गंभीर है।
रात लगभग दस बजे एक रिक्शे पर गुलशन को लेकर सिराज और मुश्ताक बस स्टैण्ड पहुंचे। अंधेरे में बस स्टैण्ड के हाते के बाहर ही नेशनल हाईवे के किनारे एक बस खड़ी थी और उसका खलासी चिल्ला रहा था, ''राँची, राँची....राँची, राँची।''बहुत मुश्किल से बेहोश गुलशन को सिराज और मुश्ताक बस में चढ़ा पाए और ड्राइवर के ठीक पीछे वाली सीट पर मुश्ताक उसे संभाल कर बैठ गया। सिराज मेराज को गोद में लेकर बगल में बैठा। थोड़ी देर में बस खुल गई और बस कंडक्टर भाड़ा लेने उनके पास आ पहुंचा। भाड़े के हिसाब बताते हुए उसने कहा, ''डेढ़ सौ रुपये।''''भाई साहब कुछ कम कर दीजिए। हम लोग मरीज को ले जा रहे हैं, ऊपर से इसके साथ आज यहां हादसा हो गया और यहाँ हमारा घर भी नहीं है।'' सिराज निवेदन कर रहा था।''तो हम क्या करें?!'' कंडक्टर असंपृक्तता से बोला।
''हम लोग बहुत परेशानी में हैं। पहले ही हमारे काफी पैसे खर्च हो गए हैं।''
सिराज गिड़गिड़ाने लगा था।''अच्छा सौ रुपये दे दो।'' कंडक्टर ने दया दिखाते हुए कहा। सिराज खड़ा होकर जेब से एक हाथ से पैसे निकालने लगा। दूसरे हाथ से उसने मेराज को थाम रखा। नन्हा मेराज जगा हुआ था। सुबह के हादसे के वक्त से नन्हा मेराज आश्चर्यजनक रूप से शांत था। बगल की सीट पर एक यात्री दुख और करूणा से गुलशन के सिर पर बंधी पट्टियों को देख रहा था। नन्हा मेराज उसे देखकर मुस्कुरा पड़ा। शायद वह उसे बताना चाहता था कि उसे पता है कि उसकी अम्मी उस सफर पर आगे बढ़ गई हैं जो उसे अपने अब्बू के पास ले जायेगा और वह गहरे सुकून में है।

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Wednesday, November 5, 2008

सब साजिन्दे

मुशर्रफ़ आलम जौक़ी
अरशद पाशा उलझन में थे।
थापड़ ने उसे गन्दी सी गाली बकी...तेरे सिकुलरिज्म की माँ की...अरशद पाशा उसकी तरफ़ घूमे...थापड़ के होंठों पर मुस्कुराहट बरस रही थी...खैर छोड़ो...जिस मीडिया में हम तुम हैं...वहाँ अधिकतर ख़ामोश रहना ही पड़ता है...इस मीडिया में आने का पहला नियम है...होंठ सी लो...कान बन्द कर लो...और आँखों पर हाथ रख लो...वह हँस रहा था...अरशद पाशा के माथे पर बल पड़ गये...तुम भी वही भाशा बोल रहे थे थापड़...थापड़ ने फिर गंदी से गाली बकी...होश में आ...तेरा सिकुलरिज्म
इस देश में बच्चों की मूत भरी जांघिया बदलने के भी काम नहीं आ सकता-इन वर्शों में जो कुछ हुआ है, वह तुमने भी देखा और हमने भी...और ऐसे किसी भी मामले पर न दलीलें काम आती हैं न तर्क, न दिमाग...एक आदमी चोरी करता है...चोरी करते हुए पकड़ा जाता है...देखने वाले गवाह मौजूद होते हैं मगर? क्या होता है अरशद पाशा...चोर की पहुँच ऊपर तक होती है तो सब को ख़रीद लेता है, देखते ही देखते मीडियाज का हीरो बन जाता है। अदालत में वह ख़रीदे गये वकील की भाशा और आँखों के इशारे समझता है और कुछ भी नहीं किया' कहकर भोला-भाला मासूम बन जाता है।
मुकदमा ख़ारिज...प्रधानमंत्री को करोड़ों के ब्रीफकेस पहुँचाये जाते हैं और सारा मामला साफ़-तांत्रिक और रंडियों के दलाल जैसे साधू-संत, राजनीति का बिछौना बिछाते है मंत्री उनके पाँव चूमते हैं...यहाँ औरत को टुकड़ों में काटकर मक्खन और क्रीम लगाकर तन्दूर में डाल दिया जाता है...और सारे मामले हाजमे की गोलियों की तरह हम पचा लेते हैं...फिर कोई नया स्केण्डल...नया मामला...कोई मथुरा, काशी, पाबसाई बाठ कोई ढाँचा या मस्जिद...यहाँ एक खिलाड़ी जूते पर अंजाने में अपने हस्ताक्षर किसी कम्पनी को बेचता है तो तुम्हारे चार दाढ़ी वाले मुल्ला इसे पब्लिक इशू बना लेते हैं...झट से अल्लाह, भगवान और ईश्वर के अनादर पर तो तेवर चढ़ जाते हैं परन्तु तब...जब ढाँचे के तन्दूर में कोई औरत जलाई जाती है..., कोई देवदासी, जैन, ऋषि, मुनियों के आश्रम में प्रतिदिन ही बलात्कार का शिकार होती रहती है...मन्दिरों के साधु और तन्त्र-मन्त्र का नाटक रचने वाले तांत्रिक इस देश के भाग्य विधाता बन जाते हैं...किस्से एक नहीं है पाशा, हजारों लाखों में हैं...परन्तु। सोचना नहीं है।
बोलना तो है...सुनना नहीं है...एक कान से सुनना है और उड़ा देना है...क्योंकि यही अब तक होता रहा है...बोफोर्स से बसाई बाघ तक...प्राइम मनिस्टर की बतियाओं से तन्दूर की आग तक...उन्हें बचाने वाली हाजमे की गोलियाँ नहीं बनतीं तो देश में एक आदमी नहीं होता...थोड़ा सा भी दिल, जिगर या एहसास होता ना, तो किसी न किसी इशू या पहलू को उठाकर हम में से अधिकतर लोग या तो हत्यारे बन चुके होते या आत्महत्या कर चुके होते...या देश खत्म हो चुका होता या देश का नक्शा बदल गया होता या प्रतिदिन ही इस तरह की घटनाएँ सामने आतीं कि संसद भवन में लाशों के ढेर लग गय-यहाँ पकड़ा...वहाँ मारा...कहीं जिन्दा जलाया और तुम्हारी व्यवस्था में चली आ रही बीमारी का एक पल में सफाया। परन्तु नहीं दोस्त, ऐसा संभव ही नहीं है, जानते हो क्यों?थापड़ हँसा-क्योंकि वास्तव में मानने न मानने के बावजूद एक मजहबी चुडैल अपने मुड़े पंजों के साथ अन्दर बैठी है।
चुडैल है ना, वह प्रति क्षण कोई न कोई रूप बदल कर सामने आती रहती है-अरशद पाशा के होंठ कंपकपाएँ। तुम्हारे अन्दर का फस्ट्रेशन बोल रहा है। चिढ़ गये हो तुम...इसलिये कि केवल मीडिया मैन बनकर रह गये हैं...प्रिंट मीडिया के दफ्तर का एक गुलाम आदमी-अपने आठ घंटे की ड्यूटी के बाद घर, घराने और बच्चों के बारे में सोचता हुआ...डर गये हो तुम...।क्यों? नहीं डरना चाहिए मुझे...?थापड़ हँस रहा था -घर जाओ तो वही एक उदास पत्नी, मैले कपड़ों की गठरी में सूखे होंठ वाले बेरस बच्चे-मुझे नहीं डरना चाहिए अरशद पाशा...फिर इस भाशण का मतलब?मतलब कि हम अभी कमीने नहीं हुए-होना भी नहीं चाहते-आठ घण्टों की मजदूरी के बाद हम में से अधिकतर लोग हैं, जो अपना हक़ चाहते हैं या मांगते हैं- और ये एहसास के फाहे जो तुम्हें किसी जवान लड़की के, कूड़े के ढेर पर फेंके गये माहवारी के टुकडे की तरह चुभते हैं ये एहसास भी उनके रवैयों, उनके बर्बरता के नतीजे हैं...ये...उनके क्रप्शन...ढके-छिपे नहीं...साफ़-साफ़ दिखाई देने वाला क्रप्शन...ग्लास में कीड़ा, मक्खी या पिल्लू पड़ जायें तो हमें उबकाई आने लगती है... हम पीना नहीं चाहते...परन्तु यहाँ सारा कचरा, अल्लम-ग़ल्लम, सड़ा-गला, न चाहते हुए भी गले से नीचे उतारना पड़ता है...और कहना पड़ता है स्वयं को, कि तुम पढ़-लिख गये हो तो यहाँ तुमसे भी ज्यादा जलील लोग और कोई दूसरा नहीं-परन्तु इसके बावजूद भी एक फ़र्क है हम में और उनमें। हमने अभी रण्डियों के भड़वों से यारी नहीं की है...इसलिए कि हम उनके तौर-तरीके नहीं जानते हमने ये पढ़ा है कि तुम अरशद पाशा हो और मैं थापड़... तो हम दोनों में कोई फ़र्क नहीं है..., मगर अब अन्दर बैठी चुडैल इस एहसास को भी कमजोर करने लगी है...थापड़ हँसा...वह कैसे?' अरशद पाशा की आँखों में भय सा उत्पन्न हुआ।अच्छा तुम बताओ, तुमने उस शराबी औरत और उसके मर्द को क्यों निकाला-तुमने? तुमने अशरद पाशा-फ़साद और दंगे के बारे में तो अच्छी तरह जानते थे
तुम... फिर क्यों निकाला...क्योंकि...वह हिन्दू थे इसलिए...?थापड़ जोर से हँसा...वह हिन्दू थे, इसलिये तुमने आसानी से हटा दिया उन्हें-इसलिए कि तुम यही कर सकते थे...अपने ढंग से बदले की एक छोटी सी कार्यवाही...और तुमने देखा...वह औरत कितनी बहादुर थी, या नहीं जानते हुए भी सेकूलर थी...आख़ थू...मुझे कमबख्त सोशलिस्ट सेकूलर, लिबरल जैसे हरामी और दोगले शब्दों से चिढ़ हो गयी है...खैर छोड़ो अरशद पाशा। वह गई और साथ में तुम्हारे उस मुसलमान छोड़े को भी ले गई, जो अंजाने में उसका बेटा बन गया था...फ़साद में चारों ओर मुसलमान मारे जा रहे थे...तुम भला कैसे गवारा करते कि तुम्हारे यहाँ...।थापड़!अरशद पाशा, चीखना चाहते थे परन्तु चीख़ न सके...वह सन्नाटे की पकड़ में थे...नहीं...आवाजों की-नहीं...शोर का एक समुंद्र था और...उनका दम घुटता जा रहा था।थापड़ की आवाज उभरी...कहाँ खो गये पाशा-आज तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूँ...आज...आज रात..,आज रात...हाँ क्यों? चलोगे तो सारी जिन्दगी याद करोगे...परन्तु कहाँ...?'एक बहुत ही कान्फिडेन्शियल क़िस्म की मीटिंग है...नहीं घबराओ मत...मेरे पास, पास है...नहीं पास नहीं। वहाँ कुछ और चलता है।
इंटरनेशनल बैंक का एक विशेष प्रकार का कार्ड। कार्ड मुझे मिला है...तुम चल सकते हो-और मैं चाहता हूँ कि तुम चलो-क्योंकि-उसके बाद-वह हँस रहा था...तुम्हारे पास आँखें होंगी परन्तु तुम कुछ देख नहीं रहे होगे-लिखने के लिये भी जो एक खुशदिल और जज्बाती चिड़िया पंख कटा कर भी तुम्हारे अन्दर बसती है ना, वह बे पंख के भी उड़ जायेगी...फिर तुम कुछ भी लिख सकोगे...इमामों की बात, साधु-सन्तों और तांत्रिकों की बात, मंत्रिायों की आज्ञापालन के किस्से...ऊँचे से ऊँचे मसनद पर बैठा हुआ कोई भी व्यक्ति तुम्हें गंदा या दोषी नजर नहीं आयेगा और सच तो ये है कि उसके बाद तुम पाप, पुण्य, जुर्म, परदा जैसी तमाम चीजों को जान जाओगे...सब चीजें तुम्हें एक जैसी लगेंगी...अर्थात्‌ इतनी मिलती-जुलती कि तुम फ़र्क़ नहीं कर पाओगे अच्छे-बुरे में, बुरे-अच्छे में...और तुम्हें कोई भी सौदेबाजी, सौदेबाजी नजर नहीं आयेगी...तुम उन खरी खोटी और अच्छी बुरी कल्पनाओं से बहुत ऊपर उठ जाओगे-फिर भूल जाओगे कि कोई एक मुल्क भी है, जहाँ इमाम पेशावरी बसते हैं, जहाँ हलवाई और नानबाई बसते हैं। जहाँ की क़िस्मत का फैसला एक तांत्रिक करता है...जहाँ बच्चा ठाकुर जैसा कार्टूनिस्ट या जोकर गिद्ध सेना बनाता है...जहाँ कोई बसाई बाठ मस्जिद होती है...जिसकी आड़ में ये सारे के सारे सौदागर अपनी-अपनी दुकान सजाकर, अपने-अपने क़ौम के अंधे बन्दों से दे अल्लाह और दे भगवान करने लगते हैं-बुरा मत मानना अरशद पाशा-मगर तुम देखोगे...तुम चलोगे...।
मैं...अरशद पाशा के होश उड़ गये थे...थापड़ के शब्द नहीं थे...प्रत्येक शब्द अपनी जगह बारूद था...वह जैसे बारूदी सुरंग के मुहाने पर खड़ा था और बस जलती हुई माचिस की तीली...वह उड़ रहा है...नहीं...उसके चीथडे उड़ गये हैं...ऐसे कितने दृश्य...क्या उन दृश्यों को भूल करके वह जी सकता है...उसकी आँखों में गिद्ध नाच रहे थे। नहीं गिद्ध सेना वाले...बच्चा ठाकुर...बसई बाघ मस्जिद के कार्यकर्ता...इमाम पेशावरी, अहमद साहब...गिलानी साहब...ये कछुए की चाल चलने वाले मौलवी या कुकुरमुत्ते की तरह राजनीति की मुर्गी से निकलने वाले गन्दे अण्डे की तरह दाढ़ी और टोपी पहने मुल्लाओं की वह फ़ौज, जो उनमें इस्लाम के ठेकेदार या दलाल बन जाते हैं-आपस में टकराव और लम्बे-लम्बे भाषण...गोश्त के क़ोरमे में डूबी हाथ की अंगुलियाँ, दाढ़ियाँ और दिमाग बिल्डिंग्स पर बिल्डिंग्स खड़ी करने वाले, दंगों के हवाले से अरब देशों से...डॉलर्स का कारोबार करने वाले...अपनी-अपनी दुकान चलवाने वाले और दाढ़ियों में खतरनाक तिनके पालने वाले...उसने कदम-कदम पर ऐसे तमाम दाढ़ी वालों को देखा था...जो ऐसे मौकों पर अपने कौम के अन्धे बन्दों को राइफ़लों की नोंक पर आगे करके, एयरकंडीशन कमरों में बंद होकर डॉलर्स गिना करते थे...सैयद वहाबुद्दीन से लेकर नाइब इमाम पेशावरी तक...ये तो बुलडोजर हैं...कच्ची रेत पर इमारतें खड़ी करने वाले...टके में फतवे बेचने वाले...टके में कुरान और हदीस का सौदा करने वाले...आमतौर पर छोटे शहरों में यही नाबीना (अंधे), काला चश्मा लगाये माहिर रूहानियात' क़ौम के हीरो कहलाते हैं...परन्तु...।
उसने तो क़रीब से देखा था, उन लोगों को...बहुत करीब से...उनसे मिला था...उन्हें जाँचा था, परखा था, देखा था...उनकी बातें भी सुनी थीं...और उनकी कहानियाँ भी सुनी थीं...।कहानियाँ...इमर्जेन्सी का समय...शाही मस्जिद के हुजरे में बैठा इमाम पेशावरी....नसबंदी के सरकारी आन्दोलन को लेकर जनता में जबर्दस्त गुस्से की लहर चल पड़ी है...प्राइम मनिस्टर हाऊस से एक आदमी आता है...हुजरे में बैठा इमाम किसी नई बिल्डिंग, सोसाइटी या इमारत की ठेकेदारी के दाम तै कर रहा है....वह ताली बजा कर कमरे खाली करवाता है...काला चश्मा आँख पर बराबर करता है...प्राइम मनिस्टर हाऊस से आये बन्दे के लिये सम्मान में उठता है?...क़रीब बैठाता है...और पूछता है...हुक्म...हम तो हुक्म के पत्ते हैं साहब?दो टूक सवाल उधर से होता है...काम आप करेंगे...रकम जो चाहे आप तै करें।काले चश्मे के अन्दर की आँखें सामने वाले व्यक्ति को टटोलती हैं...जो वही कुछ है। जो कुर्बानी से दो-चार रोज पहले जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर, या ऐसी तमाम जगहों पर जहाँ कुर्बानी के जानवर बेचे और खरीदे जा रहे हों..., ये दृश्य आप आसानी से देख सकते हैं, एक कसाई है...और एक ग्राहक...और एक कुर्बानी का जानवर है....जिसका सौदा हो रहा है...काले चश्मे के अन्दर की आँखें कुचलती हैं...करना क्या होगा?मुसलमानों को नसबंदी के लाभ बताने हैं-आवाज ठहर-ठहर कर उठती है...रेत की तरह...शीत लहर की तरह...समझ रहे हैं ना आप...कुरान और हदीस की रौशनी में...समझ रहे हैं ना आप...मुस्कुराहट आपकी क़ौम वाले आप ही की आवाज समझते हैं...तो मैं प्राइम मनिस्टर को यहाँ बुला दूं...काम आपको करना है और दाम आप तै करेंगे...आदमी चला जाता है...।आदमी आता है...जाता है...।और फतवे बेचने में खर्च ही क्या होता है...ये इमाम के पीछे अंधे होकर नमाज पढ़ने वाली लाखों, करोड़ों की जमाअतें...भला इंकार का दम किस में है...ये सब हलाल होने वाले जानवर ही तो हैं...आदमी आता है और जाता है...सरकारें आती हैं और जाती हैं...फ़तवों का क्या है...ये तो पैसों के अनुसार बनाये और बेचे जाते हैं...।
ऐसी कितनी ही घटनाएँ...कितनी ही कहानियाँ...उस हम्माम में कौन है, जिसे वह नहीं जानता, नहीं पहचानता...सब एक ही थाली के चट्टे-पिट्टे...वह सब की नब्ज-नब्ज से परिचित है...इसलिए वह जन से नफ़रत करता है कि उसका वार चल जाये तो वह उन्हें पागल कुत्तों की तरह शूट कर दे--धाईं!परन्तु नहीं...वह कुत्तों को शूट कर सकता है...सिर्फ सैयद वहाबुद्दीन और इमाम पेशावरी तो नहीं है...यहाँ, यहाँ बच्चा ठाकुर जैसे जोकर हैं, करतब बाज हैं, धक्के हैं, वहीं कछुओं की चालों वाले और गीलानियों की भी एक बड़ी जमाअत है...सब सौदेबाज और अपने-अपने मकरो फरेब की मुँह माँगी कीमत वसूल करते हुए...हलवाई, नानबाई और बाँसुरई बिगुल रौशनी जैसे लोग, आलोक सिंघल जैसे तिलकधारी...जो एक शब्द ढंग से बोलना नहीं जानते-परन्तु बेचते रहते हैं...दो टके में मन्दिर और मस्जिद-नानबाई जैसे लोग, जो हलवाई की रथयात्राओं पर चुप्पी साधे रहते हैं, कविताएँ लिखते हैं...और दोनों ओर से लड्डू बटोरने के उस्ताद हैं। बुराई भी करो और अच्छे भी बने रहो...प्राइम मनिस्टर तक जिन की कविताओं के संग्रह का संचालन करते हैं और अपना गुरु मानते हैं परन्तु...अन्दर की बात है...लोग बताते हैं कि उनकी जांघियाओं के रंग भगवा हैं...नानबाई...प्रकट में मासूम दिखने वाला ये कोई राजनीतिज्ञ उसे इस शताब्दी का सबसे बड़ा जालसाज नजर आया था। ऐसे लोग..., उसका मानना था कि जो अन्दर से कुछ और बाहर से कुछ होते हैं, उनसे ज्यादा खतरनाक तो दो मुँहा साँप भी नहीं होते-वास्तव में नानबाई का मासूम बने रहना उसे कभी पंसद नहीं आया-जिस पार्टी की नींव भी भोले-भाले इंसानों के कत्लों खून पर रखी गई हो, उस पार्टी से किसी भी तौर पर, जुड़े हुए लोग इसकी नजर में हमेशा से नापसंदीदा द्यरहे...ये नानबाई तो ख़ास तौर पर-उसे लगता, कविताएँ लिखकर ये व्यक्ति अन्दर के अपराधी व्यक्ति को छुपाने का असफल प्रयास करता है...कम से कम अपनी नजर में...कोई सी भी कविता लिखकर ये व्यक्ति आइना में अपना चेहर अवश्य देखता होगा...कि सफेद पोशी की कोशिश में वह कितना सफल हुआ और अपने आप पर परदा डालने की प्रक्रिया में उसे कितनी सफलता मिली-हलवाई, बाँसुरी बिगुल रौशनी और आलोक सिंघल जैसे लोगों से उसे उसी तरह कोई ज्यादा शिकायतें नहीं थीं, जैसे किसी बच्चे से शरारती बच्चे से, जिसके बारे में अन्दाजा हो कि उसकी उछल कूद कोई न कोई रंग तो दिखाएगी ही-ये लोग उनकी बातें उसे बच्चों से ज्यादा कभी नहीं लगी...हाँ ये सच है कि बचकानी होने के बावजूद उन में सांप की फुंकार भी शामिल रही-परन्तु नानबाई की तरह नहीं कि अन्दर कुछ और बाहर कुछ वाला मामला रहा हो-ये ग़लत रहे तो उन्होंने कभी स्वयं को ढकने या छुपाने का प्रयास भी नहीं किया-जैसे उस कार्टूनिस्ट जोकर बच्चा ठाकुर ने, जो प्रायः गिद्ध सेना के हवाले से बार-बार उल्टे सीधे बयान देकर अपने दुबले -पतले शरीर में उनकी प्रक्रिया के तौर पर पम्प से हवा भरने का काम करता था...और हमेशा ही बचकाने फ़तवे लागू किया करता था-ये सब लोग...यानी देश के हाशिये पर जमा जोकरों की ये चौकड़ी अधिकतर उसके अन्दर सोये राक्षस को जगा देती...देखते क्या हो मार डालो...इन सबको...।
इन दो मुंह वाले साँपों को...।ये जो आये दिन रथ-यात्राएँ निकालते हैं...।और इनकी खूनी रथ-यात्राएँ मासूम इंसान बदन से होकर गुजरती हैं...।और ग़जब तो ये...कि ये इन यात्राओं का कारण भी प्रस्तुत करते हैं...ये...जो बचपन से जहर में डूबे शब्द पढ़ने के आदी रहे हैं...फिर चाहे वह पवन लाल फिराना बन जायें, या कुश्मा बनराज, नील गाव भाखडे हों, या जलियान सिंह, शंकर आचार्य हो या बदसूरत लाल हटुवा, नलकानी हों या गाजगरे विंधिया, माधुरी साधवी हों या चिम्मा भारती, विनोद महाजन हों या गुण्डा नाथ मण्डे...या वेद प्रकाश मोहली हों या ख़ाली-ख़ाली तख्त हों...।शायद ये सब इस सेकूलर देश में ही चलता है जहाँ क़ातिल नेता कहलाते हैं...साँपों को दूध पिलाकर पाला जाता है...जहाँ साम्प्रदायिकता की कोख से जन्मी पार्टी, जनता की पार्टी कहलाती है, हुकूमत बनाती है...ओ ताश के बावन पत्तों को छितरा कर जोकर अपनी मनमानी और कार्यों पर खुश होता रहता है...।शायद इस गणतन्त्र देश का यही नसीब है...।कहाँ खो गये...? थापड़ उससे पूछ रहा है?नहीं...कहीं नहीं-थापड़ के चेहरे पर अर्थपूर्ण हँसी है। सोचने के लिये इस समय ने और इस समय के नेताओं ने अब मौका ही कहाँ छोंड़ा है। अरशद पाशा- देश की बरबादी के बारे में सोचोगे तो फिर उन कुत्तों के बारे में भी गौर करना होगा, जिनके शरीर में पिल्लू (कीड़े) लग गये हैं...या जो अस्वस्थ बन कर सड़कों-चौराहों पर घूम रहे हों...इस देश का नसीब सुधारने का बस एक रास्ता है...इन तमाम पिल्लू लगे नेताओं को किसी खुले सड़क पर जमा करो और शूट कर दो।वह हँसा-ज्यादा सोचे मत...आज रात याद है ना, उसने ठहाका लगाया...मेरे जज्बाती दोस्त...वे रात तुम भूल नहीं पाओगे...ये उन्हीं दिनों की घटना है, जब देश में सूर्य ग्रहण की घटना में खलबली मचा दी थी।

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Saturday, November 1, 2008

एक दोयम दर्जे का प्रेम-पत्र

मौ० आरिफ
प्रिय.....समीरा।लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझनामरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना ।हँसो मत समीरा पूरा खत पढ़ लो फिर चाहे जो करना। उस शेर का बुरा मत मानना। तुम सोच रही हो कि क्या आज भी मेरे पास इस सस्ते सड़क छाप शेर के अलावा कुछ लिखने को नहीं है। मुँह का स्वाद अगर खराब हो गया है तो माफी चाहता हूँ...पर क्या करूँ, मैं हूँ ही ऐसा और इसे तुमसे बेहतर कौन समझ सकता है?हुआ यूँ कि अपने एक साहित्यकार मित्र की एक पुस्तक वह जो यथार्थ था पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा था - बचपन के अनुभवों की स्मृति स्त्री-पुरुष के पहले-पहले प्यार की तरह है जो अद्वितीय और अविस्मरणीय होती है। बस तुम याद आ गईं। जीवन का एक काल-खण्ड सजीव हो गया जो सिर्फ मेरा और तुम्हारा है। वह एक साल-हमारा एक साल-तुम्हारे पति और मेरी पत्नी से अनछुआ....प्रेमपत्र।अन्दर क्या-क्या घट रहा है कैसे बताऊँ। आँखों के सामने बमुश्किल ही कौंध पाता है वह सब। पर सच तो यह है कि तुमसे कभी भी मुक्त नहीं हो सका पूरी तरह....तुम्हें प्यार करना बन्द कर दिया तब भी। तुम यही कहीं रही हो...सदा...लेकिन जिन अनगिनत कोणों से तुम्हें कभी देखा था...देखता था, वे कोण अब नहीं बनते। वे लकीरें अब आपस में नहीं मिलती। मिलकर नये चित्र नहीं रचतीं।जिस दिन मित्र की पुस्तक में वे पंक्तियाँ पढ़कर तुम्हारे बारे में सोचने लगा, उसी रात सपने में तुम आईं। अपनी माँ के साथ तुम छत पर बैठी थीं। शायद उनका पैर दबा रही थीं। जाने कहाँ से मैं पहुँच गया। मैं भी नीचे ही बैठ गया। मुझे अचरज हुआ कि तुम्हारी मम्मी मुझसे अच्छी-अच्छी बातें कर रही हैं। उन दिनों...किन दिनों....याद करो...बहुत दिनों पहले....बहुत-बहुत दिनों पहले...युगों पहले....जब छोटे शहरों की सड़कें इतनी भरी-भरी नहीं होती थीं...जब जाड़े की इतवारों को सबकुछ कितना शांत और सुलझा हुआ रहता था....तब तो तुम्हारी मम्मी मुझे तुम्हारी ओर ताकने भी नहीं देती थीं।हम लोग उन दिनों कितने बड़े थे? बहुत छोटे थे क्या? इतने छोटे भी नहीं थे कि लोग हमें बेहिचक एक दूसरे से मिलने-जुलने की खुली छूट देते। कब देखा था तुम्हें पहली बार? कौन सा जुमला था जो पहली बार मैंने तुमसे बोला था? कौन सा दिन था वह? शायद किसी त्योहार का दिन था जब मैंने तुमसे पूछा था - किस क्लास में पढ़ती हो तुम? तुम्हें तो जैसे इसी का इंतजार था। बस शुरू हो गई थी तुम। कृष्णजन्माष्टमी के बहाने एक दिन में तीन बार डे्रस चेंज किया था तुमने। हर बार मुझे और अच्छी लगी थीं तुम।हो सकता है तुम्हें लगे मैं एक जजबाती और रूमानी मनचले किशोर में तब्दील हो गया हूँ। आई डोंट केयर। मैं देख रहा हूँ एक लड़की को...गाती, गुनगुनाती....कभी छत की रेलिंग से लटकी....कभी यों ही घूमती टहलती...कुछ तलाशती। और देख रहा हूँ तुम्हें मुस्कुराते, हँसते खिलखिलाते। .....चलते हुए, रिक्शे पर बैठे हुए...बैग लेकर स्कूल से आते हुए.....छत पर खड़ी होकर कंघी करते हुए। कभी एक चोटी में तो कभी दो चोटी में तो कभी खुले बालों में मेरे कमरे के सामने से गुजरते हुए।जिस दिन तुम्हें छत पर बैठकर अपनी माँ का पैर दबाते हुए सपने में देखा उसके दूसरे ही दिन बाजार गया। दिलो-दिमाग पर तो तुम छायी ही थी। एक दुकान पर खड़ी दो महिलाओं को ऊन के लच्छों पर हाथ फेरते देखा। उनमें से एक वाकई सुन्दर थी। दूसरी बस ठीक-ठाक। मोटी कुछ चौड़ी-चौड़ी.....बेतरतीबी से साड़ी पहने हुए...बड़ा सा पर्स टांगे। वह तुम्हारे जैसी लग रही थी। मैं उसे गौर से देखने लगा। वह तुम्हारे जैसी ही थी। बिल्कुल तुम। क्या वह तुम थी समीरा? जब वह महिला दुकान से बाहर आई तो मैंने उसकी चाल पर गौर किया। मैंने सोचा बड़ी होकर तुम इसी महिला की तरह हो गई होगी। उसकी चाल तुम्हारी चाल से कितना मेल खाती थी। उसका बच्चा उसे तंग कर रहा था और उसे डाँटने के लिए वह मुड़ी तो मैंने देखा कि सुन्दर होते हुए भी वह आकर्षक नहीं लग रही थी। सचमुच मुझे बहुत निराशा हुई। कितनी आकर्षक हुआ करती थीं तुम! कितना खिचाव होता था तुम्हारे चेहरे में! गौर से देखा तो उसकी चाल बड़ी बदनुमा लगी। पहले तो तुम ऐसे नहीं चलती थीं समीरा। पर शायद अब ऐसे ही चलने लगी हो। कितनी तीखी और बेसुरी आवाज में उसने डाँटा था अपने बच्चे को। और डाँटे ही जा रही थी....बिना इस बात की परवाह किये कि अगल-बगल के लोग भी देखने लगे हैं।घर लौटा तो तुम्हारे बारे में सोचता रहा। जाने क्यों एक तरह की वितृष्णा से भर गया। मुझे लगा मैं तुम्हें इस रूप में नहीं देख सकता। सपने में कितनी सुन्दर, कितनी भोली-भाली लगीं थीं तुम। बिन-ब्याही रह गई थीं तुम मेरी प्रतीक्षा करते। पर सामने से देखने पर कैसी हो गई थी। अपने बड़े, विवाहित रूप में तुम ऐसी हो जाओगी मैंने कल्पना में भी नहीं सोचा था।पर मुझे इन चीजों से क्या लेना देना। तुम्हारा वर्तमान मेरा सरोकार नहीं है समीरा। मेरा संबंध तो तुम्हारे भूतकाल से है। तुम्हारे बीते जीवन के उस साल से जब तुम बसंत में पुष्प की तरह खिली थीं। तुम्हारे उस कालखण्ड पर तुम्हारे बाद मेरा अधिकार है। केवल मेरा।तुम्हें खत लिखने की एक वजह यह भी है। मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम कभी मेरी थीं। बस मुझे जिद सवार हो गई है कि तुम्हें बताऊँ कि हम दोनों ही कभी एक दूसरे को कितना चाहते थे। मरते थे एक-दूसरे पर। किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है। कितने ही लोगों के साथ ऐसा हो चुका है। हमारे तुम्हारे साथ भी ऐसा हुआ।खत लिखने के दो कारण और हैं। उतने ही मजबूत जितने बाकी जो मैंने गिनाये। एक तो यह कि मैं मन ही मन अपनी पत्नी को जताना चाहता हूँ कि उसके अलावा भी मुझे चाहने वाला कोई गुजर चुका है। ऐसी चाहत का हकदार मैं रह चुका हूँ जिसे लफ्जों में बयान नहीं किया जा सकता।साथ ही तुम्हारे पति से न जाने क्यों मुझे ईर्श्या हो रही है। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि जनाब जो स्त्री आप पर जान छिड़कती है, आपको रोज रिझाती है, आपके लिए रोज खाना पकाती है, आपके बच्चे पाल पोश रही है, आपके साथ हम-बिस्तर होती है, आपके घर की मालकिन है, वह कभी मेरी थी। पूरी की पूरी मेरी। प्रेम का पहला अंकुर जब उसके दिल में फूटा तो उसने मुझे अपने सामने पाया। मोहब्बत से लबरेज थी वह.... और पूरा का पूरा प्रेम उसने मुझ पर उडेल दिया था-आखिरी बूँद तक। उसका निश्छल प्रथम प्रेम और अपनी पूरी तीव्रता और वेग के साथ मेरे नसीब में बदा था और मुझे हासिल हुआ। आप जो पा रहे हैं वह अगर आपको नहीं मिलता तो किसी और को मिलता-या फिर किसी और को....। मुझे जो मिला वह प्रकृति का दिया हुआ प्रथम पुष्प था-पहली बहार की खुशबू समेटे-जो मेरी प्रेयसी ने मुझ पर लुटा दिया।नेचर ने जब उसके बदन को गमकाया तो वह मेरे सामने प्रस्तुत हुई। मैंने उसे सूंघा, सराहा। उसके कुँआरे शरीर की गंध मस्त कर देने वाली थी। जिस गंध को आप जानते होंगे। वह. वह नहीं थी। तब वह परफ्यूम और शैम्पू और मेकअप नहीं लगाती थी। उसके बदन की सच्ची खुशबू से सिर्फ मैं वाकिफ हूँ। आप नहीं। जब वह जवान हो रही थी उस दौर को मैंने जाना है, देखा है। मैं गवाही देता हूँ कि एक अजीब दौर था। अजीब समय था।.....शब्दों से परे है आवारा हवाओं का वह खूबसूरत मौसम। वह बयार अब क्यों नहीं बहती....।कच्ची उमर का आकषर्ण समझकर आप इसे दरकिनार न कर दीजिएगा। यह एक सच्चाई है, फैक्ट है हम दोनों के जीवन का। इसने आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा है.... और शायद आपकी वाइफ का भी। पता नहीं आप उसे किस उमर में मिले...मेरी उससे भेंट तब हुई जब वह सोलह की थी और मैं उससे एक साल बड़ा। पहली ही नजर में मर मिटी थी वह मुझ पर वह मुझे एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं होने देना चाहती थी....रोती थी मेरे लिए....हँसती थी मेरे लिए.....पूजती थी मुझे। राह तकते छत पर छुपी खड़ी रहती थी। पागल दिवाने थे हम दोनों एक दूसरे के लिए। मैं हिम्मत दिखाता तो वह मेरे साथ भाग सकती थी....मैं उकसाता तो वह आत्महत्या तक कर लेती।बाढ़ आई नदी को देखा है आपने? बौराये पेड़ पर नजर डाली है? बिना लगाम के घोड़े से पाला पड़ा है? कुछ ऐसा था उसके प्यार का आवेग-ऐसी थी उसके प्यार की लज्जत। बिना किसी से डरे, बिना किसी की परवाह किये वह मुझे प्रेम करती थी। भाई बुरा नहीं मानना, आपके पास तो वह एक नधी हुई घोड़ी बनकर गई है। आप उसके अंगों की गोपनीयता से परिचित होंगे। आपका सबकुछ.....पर मेरा वह पहला चुम्बन, वह बोसा, जो उसे चकित कर गया था... आपकी सभी क्रीड़ाओं पर भारी है। नहीं भूल सकती वह कभी उसे। फिर असीमित, अनगिनत चुंबनों की उसकी चाह....मैं कैसे भूल सकता हूँ।आप उससे कैसे मिले? आपको उससे जन्मपत्री ने मिलाया होगा, या किसी बिचौलिये ने या फिर आप लोगों के परिवार वालों ने। हमें हमारी उम्र ने मिलाया था हमारे नसीब ने मिलाया था। हमें मौसमों ने मिलाया था, बादलों, बिजलियों, नदियों, तालों, पहाड़ों और सागरों ने मिलाया था। सड़कों और रेल की पटरियों ने मिलाया था। जाड़े-पाले, धूप-लू और सर्द हवाओं ने मिली भगत की थी हमें मिलाने के लिए। चाँद, सूरज, तारों, सितारों ने शडयंत्र किया था मुझे और उसे एक-दूसरे के करीब लाने के लिए।अपनी माँ से जब उसने कुछ पकाना सीखा तो सबसे पहले मुझे खिलाया था। उसके हाथ का बुना हुआ पहला स्वेटर और पहला मफलर मेरे हिस्से में आया। मैं उसे प्यार से बिल्ली कहता था....पता नहीं क्यों। क्या आपने भी उसे कोई प्यार का नाम दिया है? मुझे पता है आप किस उम्र में उसे मिले हैं ऐसे में आपका शब्दकोश इन शरारतों के लिए नाकाफी है। आज वह आपके बच्चों को स्कूल भेजती है, उनका होमवर्क पूरा कराती है अच्छे रिजल्ट के लिए दिन-रात एक कर देती है। उसे स्वयं पढ़ते-लिखते मैंने नहीं देखा था....फेल होते-होते बची थी वह...कितनी बार स्कूल का नागा किया था उसने मेरी खातिर। अगर मैं कभी नाराज हो जाता....उससे एक-दो दिन बात नहीं करता तो बस डबडबाई आँख लेकर छत के मुंडेरी से लगकर खड़ी रहती-दूसरी दिशा में ताकते।कभी चिट्ठी लिखती है आपको? यही न....बच्चों की तबीयत....उनकी पढ़ाई, घर का खर्च, आपके माता-पिता का समाचार... उनकी दवा दारू...। मुझे अपने खतों में बताया करती थी हवा कैसी बही... कौन सा गाना सुनकर उदास हो गई..... कहाँ थे दो दिन से देखा नहीं.....नीला स्वेटर क्यों नहीं पहने.....कि मैं खम्भे के पास क्यों नहीं खड़ा था....कि वह वही वाला लव-इन-टोकियो लग गई थी मैंने क्यों नहीं देखा...कि अबकी गर्मियों में मामा के यहाँ जायेगी....मन नहीं है तब भी।पर मेरे भाई, क्या कर दिया तुमने उसकी मासूमियत और चंचलता को। उसकी खूबसूरत सादगी को...। तुम्हारे साथ रहते-रहते कितनी बेडौल हो गई है। कहाँ गई उसकी मनभावन काया, क्यूँ नजर लगा दिया तुमने उसकी कोयल जैसी आवाज को। उस दिन कैसे डाँट रही थी अपने बच्चे को बाजार में....कितना कर्कश स्वर था उसका। साड़ी और गहने में लदी फंदी रखते हो उसको। कितना ढेर सारा पाउडर लीपती है चेहरे पर अब। क्या से क्या कर दिया तुमने मेरी जान को। उसकी बेलाग हँसी भी खा गये....कहाँ फेंक आये मेरी रानी के पुराने कपड़ो को.... वो फ्रॉकें....वो स्कर्ट ब्लाउज....वो शर्ट और बेलबॉटम।समीरा, देख रही हो मैं कितना बहक गया हूँ। तुम्हें खत लिखने बैठा था, तुम्हारे पति से दो-दो हाथ करने लगा। खत इतना लम्बा हो गया है कि डर है तुम आधे पर ही मोड़कर रख दोगी। ऊपर से वह शेर...जो मैंने खत के शुरू में लिखा है....मूड तो तुम्हारा खराब होगा ही। लेकिन पेन बन्द करने से पहले एक बात बताता चलूँ समीरा। मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हारी एक विचित्र सी इमेज मेरे मस्तिष्क में बनी थी। मैं किनारे वाले कमरे में बैठा था...जिसकी खिड़की सड़क पर खुलती थी। हाथ में किताब लिए तुम किसी लड़की से बात कर रही थीं। कुछ ऊँची सी....टाइट सी फ्रॉक पहन रखी थी तुमने। तुम्हारी टाँगों का ज्यादा हिस्सा तुम्हारी फ्रॉक से बाहर था। मुझे याद पड़ रहा है कि मुझे सब कुछ बहुत अच्छा लगा था। मैंने साथ वाले लड़के से पूछा कौन है ये। समीरा, इस मुहल्ले में बस अकेली है.....उसने कहा था। जैसे ही तुम किताब हाथ में झुलाते खिड़की के सामने से गुजरी, वह बोला-क्या चीज है! तुम सहसा धीरे हुई....पहले कनखियों से...फिर लगभग घूरते हुए तुमने खिड़की के अन्दर देखा और फिर बढ़ गईं। अगर मैं सीधे शब्दों में कहूं तो तुम्हारे अन्दर मुझे आत्म-विश्वास और स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ दिखाई पड़ा। याद पड़ रहा है कि मैंने मन ही मन कहा था बोल्ड एण्ड ब्युटीफुल। लड़कियों की एक डरपोक और शर्मीली इमेज मेरे दिमाग में थी। जो मैंने देखा वह उससे मेल नहीं खाया। सच मानो समीरा...मैं कुछ डर सा गया। सोचने लगा...तुम इसी मुहल्ले में रहती हो....कहीं अकेले न टकरा जाओ....मेरी किसी बात को कमेंट न समझ बैठो।पर पहली ही नज+र में तुम मुझ पर मर मिटी थीं। तुम्हारा आत्मविश्वास, तुम्हारा स्वाभिमान, तुम्हारा वह खिड़की में घूरना, तुम्हारी बोल्डनेस....कहाँ चली गई थी जब तुमने मुझे देखा। देखती ही रहती थी....देखने के कितने बहाने....कितनी जगहें खोज लेती थीं तुम। कैसे-कैसे पत्र लिखती थी तुम...लगता नहीं था मेरी बोल्ड एवं ब्युटीफुल इतनी रोमांटिक है अन्दर से।और समीरा....जब आखिरी बार तुम कमरे में आई थीं....जब मैं जा रहा था...जब हम अलग हो रहे थे....तुम मुझसे लगकर कितना-कितना रोई थीं। हिचकियाँ बंध गई थीं तुम्हें...कोई सुन न ले...इसलिए धीरे-धीरे रो रही थीं तुम। जिस तरह से तुम मुझसे लगी थीं...मालूम पड़ता था। जैसे तुम्हारे अन्दर कोई वजन ही नहीं है...एकदम हल्की गुड़िया जैसे था तुम्हारा स्पर्श और तुम्हारा आलिंगन। भिगो दिया था तुमने मेरी शर्ट के ऊपरी हिस्से को।नहीं मालूम कि जिस समय में हम लोग जी रहे हैं....जिन स्थितियों से घिरे हुए हैं....जो हमारे सरोकार हैं....जो एक आदर्श स्थिति की मांग होती है...उसमें प्रेम और प्रेमपत्र का कोई स्थान होना भी चाहिए या नहीं। पर यकीन मानो, मेरी बोल्ड एण्ड ब्युटीफुल मेरा यकीन करो, तुम्हारे आँसुओं से आज तक धुल रहा हूँ......मेरा पूरा सीना जहाँ तुमने सर रखकर आँसू बहाया था तर-बतर है। वह दृश्य मुझे हल्का और बेदाग बना रहा है।बस । तुम्हारा मानिक।अंत में एक शेर और...समीरा डोंट माइंड। जानती हो.... मैं हूँ ही ऐसा। तुम्हारा प्रेमी रहा हूँ.....मेरे इस पहलू को तुमसे बेहतर कौन जान सकता है।तुम मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर कहीं नाराज न होनाअपने खूसट पति से डरकर कहीं फाड़ न देना।यह सब लिखने के बाद कुछ अजीब सी कैफियत हो रही है मेरी। ऐसी जजबाती, बचकानी बातें कलमबन्द करके सच पूछो तो मैं खुद को काफी कमतर पा रहा हूँ। अंग्रेजी में एक शब्द है एम्ब्रेस्ड... बस ऐसा ही फील कर रहा हूँ...कुछ-कुछ शर्मिन्दा सा। कैसी ओछी बातें मैंने लिख दी हैं। कुछ पागलपन जैसा नहीं लगता.....हाँ। तुम सोच रही होगी आखिर इस आदमी को कितनी फुर्सत है...कोई काम धाम नहीं जो प्यार मुहब्बत की बातें लेकर बैठ गया। कब की.....कौन सी बात...अब याद करता फिर रहा है। बनावटी मजनूँ।इस तरह की रूमानियत भरी चाइल्डिश बातें एक विवाहित महिला के बारे में लिखने की जुर्रत कैसे की इसने। जिन तारों को झनझनाने की कोशिश मैंने किया है उनका संगीत कब का अर्थहीन हो चुका है। मुझे महसूस हो रहा है तुम मेरा खत पढ़कर मेरा मजाक उड़ाओगी। अपने धीर गंभीर पति को हँस-हँसकर पढ़ाओगी। यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी मेरा पत्र दिखाओगी। कहोगी उनसे कि तुम्हारे पड़ोस में एक पागल बेहूदा लड़का रहता था जो वक्त के साथ मेच्योर नहीं हुआ। कैसी अधकचरी अभिव्यक्ति है उसकी। कैसा भौंडा प्रदर्शन किया है उसने अपनी दबी हुई कामेच्छा का.. अपनी कुंठा का। भद्र शालीन महिलाओं से कैसे पेश आते हैं नहीं सीख सका यह मजनूँ। क्या उसकी पत्नी किसी और को चाहती है। क्या उसके बच्चे बड़े नहीं हुए । क्या वह इतना कमजोर रह गया कि सोलह-सत्तरह साल की उम्र में देखा-देखी को इतने सालों बाद प्रेम और विछोह का जामा पहनाकर सहानुभूति हासिल करना चाहता हैं। कैसा घटिया रूमानी, दोयम दर्जे का प्रेमपत्र लिखा है इस आदमी ने।सचमुच मैं यही सोचकर शर्मिन्दगी और बेचारगी से सराबोर हूँ। तुम मेरी खिल्ली उड़ा रही हो....और मुझे इसी बात का डर था। और सच यह भी है कि इस पल मैं स्वयं को सत्तरह साल के एक लड़के के रूप में ही देख पा रहा हूँ। और तुम्हें चालीस पार एक सभ्य सुसंस्कृत नारी के रूप में। और मैं साफ देख रहा हूँ कि काला चश्मा लगाये कार की अगली सीट पर तुम बैठी हो। बच्चे पिछली सीट पर बैठे कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं। तुम्हारे पति सामने दुकान से फल खरीद रहे हैं। मैं देख रहा हूँ तुम्हें और तुम्हारे दमकते स्त्रीत्व को। कितनी सुन्दर है तुम्हारी साड़ी, तुम्हारा ब्लाउज और तुम्हारी शाल। तुमने चश्मे को सर पर चढ़ा लिया है और हंस-हँस कर मेरा पत्र पढ़ रही हो। फिर हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाती हो। फिर पत्र अपने पति को थमा देती हो। वे भी हँस रहे हैं....हँस-हँसकर लोट-पोट हो रहे हैं। तुम दोनों लोट-पोट हो रहे हो। तुम्हारे बच्चे भी लोट-पोट हो रहे हैं। तुम पत्र के कुछ खास पंक्तियों पर ऊँगली रखती हो और अपने पति को दिखाती हो और फिर हँसते-हँसते अपना सर उनके कंधे पर रख देती हो।अब अपने पति को तुम फिर कुछ दिखा रही हो। वे फिर लोट-पोट हो रहे हैं। तुम्हारे हाथों में एक छोटा कागज का टुकड़ा है...जिस पर तुमने जल्दी-जल्दी कुछ लिखा है। वही टुकड़ा तुम्हारी गाड़ी में सबको लोट-पोट कर रहा है। तुम्हारी गाड़ी मेरे बगल से सरकती है। तुमने वही कागज का टुकड़ा मेरी ओर फेंक दिया। तुम्हारी गाड़ी आगे बढ़ जाती है और फिर तुम्हें लेकर ओझल हो जाती है। क्या खूब लिखा है तुमने, मेरी बोल्ड एवं ब्युटीफुल।डियर मानिक,लिखते हो खत खून से क्या शर्म नहीं आती।जलते हो मेरे उनसे क्या अपनी नहीं भाती।थूका है तुम्हें देखकर कुल्ली न समझना।मरती हूँ सोनू के पापा पे अपनी न समझना।हो सके तो इसे भाभी जी को भी पढ़ा देना।श्रीमती समीरा भगत।बगुला भगत! शायद मेरे मुँह से यही निकला। बगुला भगत!

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