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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Sunday, January 4, 2009

अदब से ही रिश्ता बाकी रहा : जाबिर हुसेन

रामधारी सिंह दिवाकर
आपके रचनाकर्म पर मरगंगा में दूब किताब लिखते समय मुख्यतः आपकी कृतियां ही मेरे सामने थीं। आपके परिवार या आपकी वंश-परंपरा के विषय में जानने की कोशिश मैंने नहीं की। अब चाहता हूं कि आपकी जिंदगी के कुछ अनजाने पक्ष भी हमारे सामने आयें। क्या आप अपने और अपने परिवार के विषय में कुछ बताना चाहेंगे?
मैंने अपने बारे में बहुत कम लिखा या कहा है, बल्कि नहीं के बराबर। इस मामले में अपने को औरों से थोड़ा अलग महसूस करता हूँ। जरूरत हो तो भी अपने रिश्तेदारों का जिक्र करने से परहेज करता हूँ। मैं उनमें नहीं, जो अपनी कारगुजारियाँ बयान करते वक्त अपने बाप-दादों की सिफतों का सहारा लेते हैं। बस इतना ही काफी है जानना कि मेरा खानदान कई पीढ़ियों से इल्म-व-अदब की ख़िदमत करता रहा है। कई अहम्‌ शायर-अदीब हुए हैं, अपने खानदान में। वालिद, चचा, फूफा, भाई-बहन, सब शायरी, अफसानानिगारी में अच्छी-खासी शोहरत के मालिक रहे हैं। बहार हुसैनाबादी, परवीन शाकिर, अख्तर पयामी, शीन अख्तर, महदी अली, जीशान फातमी, इनमें से कुछ हैं। बहार हुसैनाबादी ने तो अपनी उर्दू-फारसी शायरी से अपने समकालीन गजलगो शायरों को हैरत में डाल दिया था।
अपना रिश्ता सूफी परंपरा से रहा है। सात-आठ सौ वर्षों की अपनी तारीख़ लिखी मिलती है। मनेरशरीफ के सूफियों से अपना सिलसिला जुड़ा है। शाह शुएब अपने पुरखों में हैं। कइयों को बादशाहों और अंग्रेज शासकों के हाथ जाम-ए-शहादत पीने की नौबत आई है। उसूलपसंदी, ईमानदारी, इल्म-दोस्ती विरासत में मिली है। कोई अनर्गल आरोप लगाता है तो मन में आरोप लगाने वाले के प्रति दया का भाव जागता है। जो हमारी जड़ों से वाकिफ नहीं और जो अपनी जड़ों को ही हमारी जड़ समझने की भूल करता है, वही आरोप लगाने की कोशिश करता है। मुझे ऐसे लोगों पर तरस आता है।
मुझे नहीं मालूम इल्म-व-अदब की हमारी परंपरा और कितना आगे जायेगी। हमारे बाद की नस्लें इसे आगे बढ़ा सकेंगी, तभी तो हमारी विरासत महफूज रह पायेगी। कभी-कभी हालात मुझे मायूस कर देते हैं। लोगों में इल्म हासिल करने के लिए कोई बेचैनी नहीं रह गई है। आसानी से सब कुछ मिल जाए, यही जिंदगी का मकसद हो गया है।
कुछ अपनी अदबी तालीम, औपचारिक शिक्षा के बारे में बतायेंगे।
अदब की तालीम तो बस घर के माहौल ने दी है। सोचने-समझने की सलाहियत हुई तो देखा कि खानदान में अपने बड़े भाई अख्तर पयामी की जेहानत और शायरी की धूम मची है। सबकी जबान पर उनकी नज्में हैं, अशआर हैं। फिर शीन अख्तर की कहानियों का दौर आया। दोनों भाइयों की सियासी सरगर्मियों ने भी दिल-व-दिमाग़ में हरकत पैदा कर दी। स्कूल के दिनों से ही बीड़ी मजदूरों के संगठन से जुड़ गया। उनके सम्मेलनों, सभाओं में सक्रिय भागीदारी होने लगी। वालदैन को भाइयों की तरह मेरे बिगड़ने का भी अंदेशा हुआ तो सख्तियां बढ़ गयीं। पढ़ाई में अव्वल आते रहने की वजह से शिकायत का कोई मौक़ा उन्हें कभी नहीं मिला। अपनी ख्वाहिश राजनीति विज्ञान पढ़ने की थी, लेकिन वालिद ने अंग्रेजी साहित्य की डोर हाथों में थमा दी। फिर तो बस अदब से ही रिश्ता रह गया, बाकी चीजें पीछे छूट गईं। केन्द्रीय सेवाओं के इम्तेहान में बैठा, कामयाबी मिली, लेकिन किस्मत कहीं और ले जाना चाहती थी। फिर कालेज की नौकरी में आ गया। रिद्म ऑफ विजन इन हार्ट क्रेन्स पोयटरी शीर्षक से शोध-निबंध लिखा। आपातकाल के दौरान पुलिस कार्रवाई में शोध-निबंध की सारी पांडुलिपि नष्ट हो गई। किताबों का बड़ा सरमाया भी जाता रहा। आज भी इसकी याद आने पर गहरी टीस महसूस होती है।
आप हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखते हैं। क्या कभी आपके सामने अभिव्यक्ति की माध्यम-भाषा को लेकर कोई आंतरिक संकट महसूस हुआ? आपके आरंभिक लेखन के पीछे कौन-सी प्रेरणाएं थीं।
स्कूल-कालेज के दिनों से ही लिखने-पढ़ने का शौक गहराया। घर का माहौल ही ऐसा था कि अपनी पहचान बनाने के लिए कुछ न कुछ लिखना लाजिमी था। आरंभ में नज्में लिखीं, कविताएं लिखीं। पत्रिाकाओं में छपीं। आरंभिक रचनाएं सज्जाद जहीर की पत्रिका में प्रकाशित हुईं। बड़े प्यार से बीड़ी मजदूरों की तहरीक से जुड़ी मेरी रिपोर्टें और नज्में छापते थे। उन दिनों मैं आठवीं-नवीं कक्षा में था। नज्में छपने लगीं तो वालदैन की वहशत बढ़ी। वो दरअसल मुझे अफ़सर बनाना चाहते थे। लेकिन अपनी मिट्टी में ही सरकारी तंत्र से तनावपूर्ण दूरी रखने की ख़ासियत छिपी थी। भाषा को लेकर मुझे कोई समस्या नहीं रही। हिंदी-उर्दू दोनों भाषाओं में लिखता रहा। मेरे लिए बता पाना मुश्किल है कि कौन-सी रचना पहले किस भाषा में लिखी गई। ज्यादातर रचनाएं एक साथ दोनों भाषाओं में लिखी गईं। शुरू के दिनों में संस्कृत और फारसी का प्रभाव अधिक रहा। यह प्रभाव दरअसल मेरे शिक्षकों की देन थी। आहिस्ता-आहिस्ता, शायद कालेज के दिनों में, मैंने इस प्रभाव पर काबू पाने की कोशिश की। बाद के अनुभवों ने अभिव्यक्ति के लिए अपनी भाषा खुद गढ़ ली। आगे चलकर यह भाषा मेरी नहीं रह गई, मेरे सरोकारों और अनुभवों की भाषा हो गई। मेरे कितने काम की बन पाई यह भाषा, मैं नहीं जानता। लेकिन अपने सरोकारों की तल्ख़ सच्चाई बयान करने के लिए इससे अलग किसी भाषा का इस्तेमाल मेरे लिए मुमकिन नहीं था। उर्दू के कुछ अहम्‌ लोगों को मेरी तहरीरों में हिंदी-उर्दू के मिले-जुले अलफ़ाज की मौजूदगी पर एतराज है। इस एतराज को लेकर संजीदगी से गौर करने पर मुझे महसूस होता है कि वो मुझसे ख़ालिस क्लासीकी जबान लिखने की उम्मीद रखते हैं। मैं इसका अहल नहीं हूं। मेरे लिए अपने सरोकारों और अनुभवों से हटकर कोई रचना-माध्यम तैयार करना संभव नहीं है। आगे भी शायद यह संभव नहीं हो।
आपकी कथा-डायरियों को पढ़ते हुए महसूस होता है कि तमाम घटनाएं सच्चाई की दस्तावेज हैं। एक कथाकार के रूप में सोचते हुए मुझे लगता है, इस कच्चे माल को लेकर कलात्मक रचनाएं भी लिखी जा सकती थीं लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। क्या लेखन के यथार्थ को लेकर आपकी कुछ निजी मान्यताएं या प्रतिबद्धताएं हैं? अपनी कथा-डायरियों के वस्तुगत यथार्थ के विषय में साफ-साफ कुछ बताना चाहेंगे।
मैंने बहुत सोचकर, योजना बनाकर, गहरा परिश्रम करके अपनी कथा-डायरियों की दुनिया नहीं रची है। यह दुनिया दरअसल मेरे सामाजिक सरोकारों और संघर्षों की कोख से अपने आप जन्मी है। इसमें रचनाकार की हैसियत से मेरा कोई विशेष योगदान नहीं। मैंने सिर्फ इतना किया कि जो तजुर्बे मेरे सामने आये, जो घटनाएं मेरी आंखों ने खुद देखीं, और जिनसे होकर मैं खुद गुजरा, उनको शब्दों का जामा पहनाया और उन्हें एक कथावरण दिया। कथावरण देते समय भी मैंने यह सावधानी जरूर बरती कि मूल कथा-सामग्री पर कला की कृत्रिम परतें नहीं पड़ें। मेरे लिए कला के उस रूप को स्वीकारना कठिन हो जाता है, जो समाज को, पाठकों को जीवन के यथार्थों से कट जाने के लिए प्रेरित करता है। मुझे कला का वही रूप स्वीकार है जो उपेक्षित समाज को न सिर्फ आत्मबल प्रदान करे, बल्कि उसे हालात से जूझने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी करे।
मैं किसी शाम पड़ोस के किसी गांव में जाता हूँ, अपनी आंखों से गांव के शोहदों की दरिंदगी की शिकार शांतीया की लाश देखता हूँ, प्रतिरोध के लिए दस-बीस गांव के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को तैयार करता हूँ। स्वयं पुलिस बल की ज्यादतियों का मुकाबला करता हूँ। आख़िरकार शोहदों को सजा दिलाने में कामयाब होता हूं। अब यह एक तजुर्बा मेरी कथा-डायरी का आधार बनता है। इतना जरूर है कि डायरी लिखते वक्त मैं घटना के प्रतिरोध में अपनी भूमिका को बिल्कुल गौण कर देता हूँ। ऐसा नहीं होने पर मेरी हस्तक्षेप-कार्रवाई ही डायरी के केंद्र में आ जाती और जो स्थान बलात्कार की शिकार उस दलित महिला को मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता। यह उदाहरण मेरी कथा-डायरी के तमाम संदर्भों को परिभाषित करता है। डायरी में बस कहीं-कहीं एक नैरेटर के रूप में मेरी मौजूदगी दर्ज होती है, वो भी बिल्कुल हाशिए पर।
मैं अपनी कथा-डायरी के अधिकांश पात्रों से गहरे तौर पर जुड़ा होता हूँ। आज भी सैकड़ों ऐसे पात्र जिंदा हैं, मेरे आसपास हैं, जिनकी यातनाओं को मैंने अपनी डायरी में दर्ज किया है। लेकिन उन्हें उनकी यातनाओं से निजात दिलाने की ख़ातिर मैंने जो लड़ाइयां लड़ीं उनका जिक्र मैंने अपनी डायरी में करना जरूरी समझा। मेरा मक़सद हालात के प्रति व्यापक समाज में तेजी से क्षीण हो रही संवेदनशीलता के तंतुओं को दोबारा जिंदा या बहाल करना था। मैं इस मक़सद में बड़ी हद तक सफल रहा हूँ। बिहार में नई सामाजिक शक्तियों के उभार तथा उनकी व्यापक गोलबंदी के पीछे इन प्रयासों की अच्छी-खासी भूमिका रही है। मैंने इस काम में अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा लगाया है। मैं सुख और समृद्धि के पीछे कभी नहीं भागा। मैंने, एक सामान्य, मध्यम वर्ग के परिवार को जो सुविधायें मिल सकती हैं, उनसे भी अपने आप को बचाने की कोशिश की। अपने लिए कांटों का यह रास्ता मैंने अपनी मजरी से चुना है, किसी और को इसका कुसूरवार नहीं ठहरा सकता। मेरी रचनाओं की मिट्टी इन्हीं सच्चाइयों से गूंधी गई है।
आपने कविताएं भी लिखी हैं। ज्यादा सहज आप कहां होते हैं, डायरी में या कविताओं में? ये दो भिन्न विधाएं क्या जाबिर हुसेन के अंतर्जगत के अलग-अलग प्रतिरूप हैं?
कथा-डायरी का रिश्ता मेरे सामाजिक सरोकारों से है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। ये मेरे खुद से बाहर के सफर को रेखांकित करती है, मुझको व्यापक समाज से जोड़ती है। लेकिन कविता मेरे भीतर जो कैफ़ियत है, उसको व्यक्त करने का माध्यम बनती है। कविताओं में अपने आपसे बातें करने का अवसर मिलता है। कभी-कभी अपने आपसे बातें करना जिंदा रहने के बराबर है। यह सिलसिला रुक जाये तो शायद जिंदा रहना भी मुश्किल हो। कविताओं में अपने आपको पूरी तरह खोलने का सुख है, जो आपका होकर भी सिर्फ आप तक सीमित नहीं रहता उसकी हदें व्यापक हो जाती हैं, विस्तारित भी। कविता मेरी रचनाशीलता को जिंदा रखती है। इसलिए बार-बार इसकी शरण में आता हूँ।
इन सबके बावजूद आप सच्ची बात पूछेंगे तो कहूंगा कि मैं न तो कविताएं लिखता हूँ, न कथा-डायरियां। ये दोनों मुझसे खुद को लिखवाती हैं और मेरे लिए मुश्किलें पैदा करती हैं। मुझे इन मुश्किलों से निबटने की कला नहीं मालूम। मैं करूँ भी तो क्या!
इधर क्या कुछ लिख रहे हैं?
तीन अहम्‌ काम अपने हाथ में ले रखें हैं। एक तो विधान परिषद् में अपने बारह साल के अनुभवों पर आधारित पुस्तक है। काफ़ी हिस्सा इस पुस्तक का लिखा जा चुका है। शीघ्र प्रकाश में आ जाए, ऐसी इच्छा है। दूसरा काम कबीर आज पर अपनी अधूरी पुस्तक का है। इसमें इधर थोड़ी प्रगति हुई है। लेकिन सबसे अहम्‌ काम उपन्यास कैनवस पर लिखी जा रही लंबी कथा-डायरी दोआबा है। ज्यादा समय इसी पर दे रहा हूं। दोस्तों और मेहरबानों ने जिंदा रहने दिया, तो जल्द ही ये सारे काम मुकम्मल हो जायेंगे।
आप लंबे समय से राजनीति में हैं। क्या हिंदू बहुल दलीय राजनीति में आपको मुस्लिम होने या इस नाते अकेले पड़ जाने का भी एहसास हुआ है?
मैं राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूँ। अब भी मेरे रिश्ते राजनीति से हैं। मैं वर्षों राजनीतिक ओहदों पर रहा हूं। एसेम्बली काउंसिल में रहा हूं। एक दशक से ज्यादा मैंने सदन चलाया है। अब कुछ महीनों से संसद में हूँ। मेरे लिए ये ओहदे हमेशा व्यापक सामाजिक जवाबदेही निभाने का माध्यम रहे हैं। मैं अपने फैसलों से कई निहित स्वार्थी राजनेताओं और अपराधी सरगनाओं को नाराज करता रहा हूं। जो तत्त्व जनता के बुनियादी सवालों पर अपने स्वार्थों को तरजीह देने के आदी हैं, उनसे हमेशा मेरा संघर्ष रहा है। ऐसे तत्त्व न सिर्फ मेरी मुखाल्फ़त करते हैं, बल्कि मेरे खून के प्यासे भी हैं। मैं इन तत्त्वों के इरादे जानता हूं, लेकिन इससे घबराता नहीं। समय-समय पर ये तत्त्व मुझे विवादों में ढकेलने की कोशिश करते रहते हैं। मैं उनके नाम गिनाना नहीं चाहता। सामाजिक संदर्भों में मेरी निरंतर क्रियाशीलता के कारण ही ये तत्त्व मुझे निशाना बनाते हैं। ये दरअसल नस्लवाद में यक़ीन रखने वाले लोग हैं। ये अपनी सोच और नजरिए से घोर जातिवादी और सांप्रदायिक हैं। मैं उन्हें तमाम पसमांदा बिरादरियों का हिमायती नजर आता हूँ। ये हमेशा लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि मेरा जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ है और राजनीति में मेरे अधिकार सीमित हैं। दलितों के प्रति भी इनके विचार कुछ इसी प्रकार के हैं। ये स्वस्थ एवं प्रगतिशील विचारों के दुश्मन हैं। इससे ज्यादा मैं इस वक्त उनके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता।

1 comments:

Raviratlami January 4, 2009 at 12:38 PM  

अच्छी पठनीयता के लिए श्वेत श्याम विकल्प मेरे विचार मे उचित नहीं है. निवेदन है कि आंखों को सुकून देने वाले रंगों का प्रयोगकरें.पृष्ठभूमि हल्के रंग के हों तो उत्तम.साथ ही पैरा ग्राफ के बीच एक पंक्ति का अंतर रखें. प्रश्न और उत्तर के फ़ॉन्ट अलग रखें - यधा प्रश्नके बोल्ड या इटैलिक

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