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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Friday, November 28, 2008

डैमोक्रैसी

अशोक चक्रधर


एकाएक मंत्री जी
कोई बात सोचकर
मुस्कुराए,
कुछ नए से
भाव उनके चेहरे पर आए।
उन्होंने अपने पी.ए. से पूछा—
क्यों भई,
ये डैमोक्रैसी
क्या होती है ?
पी.ए. कुछ झिझका सकुचाया, शर्माया।
-बोलो, बोलो
डैमोक्रैसी क्या होती है ?
-सर, जहां
जनता के लिए
जनता के द्वारा
जनता की
ऐसी-तैसी होती है,
वहीं डैमोक्रैसी होती है।

1 comments:

Vijay Kumar Sappatti November 29, 2008 at 11:29 AM  

kya sahi kavita hai

ekdum aaj ke haalat par likhi gayi hai ..

shukriya

vijay

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