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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Tuesday, May 12, 2009

स्वाँग

महेंद्र भटनागर

मुझे
कृत्रिम मुसकराहट से चिढ़ है !
कुछ लोग
जब इस प्रकार मुसकराते हैं
मुझे लगता है
डसेंगे !
अपने नागफाँस में कसेंगे !
.
यही
अप्रिय मुसकराहट
शिष्टाचार का जब
अंग बन जाती है,
कितनी फीकी
नज़र आती है !
.
मुझे
इस कृत्रिम फीकी मुसकराहट से
चिढ़
बेहद चिढ़ है !
.
 

2 comments:

रंजीत May 12, 2009 at 6:47 PM  

aap sach ke saath hai, jo sachhe honge unhen aisee muskarahat se chidh hogee hee.
acchee Kavita. badhaee
Ranjit

ह्रदय पुष्प January 31, 2010 at 1:10 PM  

"मुंह में राम बगल में छुरी" आपकी चिढ़ सही और जायज है - अच्छी सोच

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