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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Sunday, May 17, 2009

आत्म-बोध

महेंद्र भटनागर

हम मनुज हैं —
मृत्तिका की सृष्टि
सर्वोत्तम
सुभूषित,
प्राणवत्ता चिद्द
सर्वाधिक प्रखर,
अन्तःकरण
परिशुद्ध ;
प्रज्ञा
वृद्ध !
.
लघुता —
प्रिय हमें हो,
रजकणों की
अर्थ-गरिमा से
सुपरिचित हों,
परीक्षित हों।
.
मरण-धर्मा
मृत्यु से भयभीत क्यों हो ?
चेतना हतवेग क्यों हो ?
दुर्मना हम क्यों बनें ?
सदसत् विवेचक
मूढ़ग्राही क्यों बनें ?

2 comments:

महफूज़ अली June 17, 2009 at 9:43 PM  

klisht hindi mein yeh bahut achchi kavita hai....

Lekin zara yeh batayen ki yeh apki hai ya phir Mahendra Bhatnagar ji ki......? Slight confused.....????


Regards.......

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