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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Sunday, September 6, 2009

नरक में लोग नहीं मरते

प्रताप दीक्षित

आधी रात में अचानक आशुतोष के पेट में तेज दर्द उठा। पहले तो वह चुपचाप लेटा रहा परन्तु जब पीड़ा असह्‌य हो गई तो उसकी कराहटों से पत्नी जाग गई। एकदम जाग उठने के कारण, सावित्राी कुछ समझ न सकी। गृहस्थी के अनेक खटरागों में खटने के बाद पहली नींद थी। संज्ञान होने में कुछ देर लगी। जब तक वह कुछ समझ सके और लाइट जलाए उसकी कराहटें बढ़ गई थी। पति ने बड़ी मुश्किल से पेट पर हाथ रखकर बताया। उसने तुरन्त फोरी उपचार हेतु सुन रखे, घरेलू नुस्खे अपनाए। सिकाई के लिए पानी गर्म करने के लिए स्टोव जलाने लगी।
प्रतिदिन की तरह पिछली रात भी आशुतोष फैक्ट्री से आने के बाद चाय पीकर पुत्रा रवि से बतियाता रहा, उसकी किताबें देखता रहा था। रात के खाने में रोटी और सब्जी ही थी। खाने के दौरान, किस्तों में लिए गए पार्टेबिल टी.वी. पर, वे फिल्मी गीतों का कार्यक्रम भी देखते जा रहे थे। उसने सोचा कहीं कोई बदपरहेजी तो नहीं हुई? पर उसे, इस हालात में भी हंसी आ गई, बदपरहेजी के लिए, उनकी सामर्थ्य ही कहाँ है। पहले तो वह कभी-कभार दोस्तों के साथ ÷शौक' भी कर लेता था, परन्तु अब तो पूरी तरह सुधर गया था। हाथ भी नहीं लगाता। रोलिंग मिल की टेम्परेरी नौकरी सही, किसी तरह गुजर-बसर हो ही जाती। यह तो आई.टी.आई. से किया फिटर का डिप्लोमा काम आया, नहीं तो यह भी मुश्किल था। काफी संघर्षों के बाद, कहीं कुछ ठहराव आया था। उसने पति के पेट को सेंक दी। उसे मजबूरी में ऊपर की मंजिल पर रहने वाली, मकान मालकिन के यहाँ जाना पड़ा। हाल बताते, वह घबरा गई थी। उन्होंने सांत्वना देते हुए ÷बेलारगन' की दो टेबलेट दी। उसने एक गोली खिला दी। थोड़ी देर के बाद, उसके दर्द में कुछ कमी महसूस हुई। सावित्राी भी उसके पाँवों के पास लेट गई। सुबह उसकी नींद देर से खुली। उसने देखा, आशुतोष जागा हुआ था, उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव थे। शरीर शिथिल-सा लग रहा था। उसे अपने देर से उठने पर ग्लानि हुई। उसने जल्दी उठकर, पति का माथा छुआ। कुछ गर्म लगा। उसकी समझ में बीमारी का पहला निदान माथे की गर्माहट से ही होता था। उसने सोचा गर्म चाय से कुछ आराम मिलेगा। उसने स्टोव जलाकर, चाय बढ़ा दी। आशुतोष उठकर, बैठ गया। उसकी हिम्मत फैक्ट्री जाने की नहीं पड़ रही थी। उसने सोचा किसी प्रकार काम पर पहुँच जाए अन्यथा साढे बयालिस रुपये कट जायेंगे साथ ही अगले दिन फोरमैन, बिना सूचना बैठ जाने के लिए चार बातें ऊपर से सुनाएगा। सावित्राी ने, उसके हाथ में चाय का गिलास दे दिया। वह चाय पी भी नहीं सका था कि उसे जोर से उबकाई आ गई। दर्द की लहर सी उठी। गिलास रख, वह दोहरा हो गया। सावित्राी बेहद घबरा गई। उसे समझ में नहीं आया वह क्या करे? वह फिर ऊपर चल दी। उसकी सहज पहुँच में यही एक स्थल था। मकान मालिक अकेले दम्पत्ति थे। पति रिटायर्ड। नीचे गली की तरफ एक कोठरी नुमा कमरा किराए पर देखा था। उन्हें मौखिक सहानुभूति में, कोई एतराज न होता। पत्नी कुछ अधिक सहृदय थी। गली-मौहल्ले में, आज भी इतनी सदाशयता तो थी कि लोग एक-दूसरे की तकलीफ में खड़े हो जाते। मकान मालकिन उसके साथ ही नीचे आई। हालात देख के परेशान हो गई। आखिर उसे अस्पताल ले जाना तय हुआ। उसने पति को आश्वस्त किया, ÷÷घबराओ मत, रवि बापू। अस्पताल चलते हैं। डाक्टर सुई लगा देगा। न हो एक-दो दिन के लिए भरती हो जाना। सब ठीक हो जाएगा।''
वह कपड़े बदलने लगी। स्त्राी के लिए बाहर जाने के पूर्व कपड़े बदलने का अर्थ-कदाचित्‌ परिस्थिति, अभी इतनी गंभीर नहीं है कि वह जैसी की तैसी उठ कर चल दे। उसने ताख पर रखा डब्बा खोला, रेजगारी छोड़, एक से दस तक मुडे+-तुड़े कुल साठ रुपए थे। उसने, सब रूमाल में बाँधे ब्लाउज में रख लिए। मौहल्ले के ही प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाला ११-१२ वर्षीय, रवि इन्हीं सब परेशानियों के कारण स्कूल नहीं जा सका था। रवि को साथ ले पति को सहारा देकर बाहर आई।
÷÷जे.पी.एम. ÷÷अस्पताल'', उसने रिक्शे वाले से पूछा।
÷छः रुपए'
लाठी मोहाल से बिरहाना रोड दूर ही कितना है, पर मजबूरी में वह बैठ गई। अस्पताल का विशाल गेट, आस-पास बन गई गुमटियों, चाय की दुकानों और लाटरी के स्टालों के कारण अपेक्षाकृत छोटा लग रहा था।
अस्पताल की लॉबी में मरीज और तीमारदार जिनके चेहरों में अंतर करना, कठिन था बैठे थे। पीली मटमैली दीवालों के कोने, पान की पीकों से रंगे और छत मकड़ी के जालों से अटी थी। हवा में व्याप्त, दवा, टिंचर, स्प्रिट और बीमार शरीरों की मिली जुली गंध से, एक दमघोटू वातावरण की सृष्टि हो रही थी। बेंचों के नीचे तथा कोनों में, प्रयोग में लाई गई रुई, पट्टियाँ-खून-मवाद से भरी पड़ी थीं। इन सबके मध्य सार्थक, सामने की दीवार पर ठीक ऊपर टंगा एक नया-सा बोर्ड ही लग रहा था। बोर्ड पर ÷हम दो, हमारे दो' का पोस्टर लगा था। उसमें, एक दम्पत्ति और उनके दो बच्चों के चित्रा के साथ ही, परिवार को नियोजित करने के उपाय भी बताए गए थे। और कोई समय होता तो वह पति को, उस और इंगित कर, मजाक अवश्य करती। क्षण के लिए, उसके मुख पर लाज के भाव, उभरने के पहले ही तिरोहित हो गए। उसने पति को, एक बेंच पर थोड़ी-सी जगह में बैठा दिया। वहाँ बैठे अन्य लोगों ने, उसकी कराहटें सुनकर सहानुभूतिपूर्वक, उसकी ओर देख अनचाहे मन से उठकर जगह दी। वह लेट-सा गया। रवि को, पति के पास छोड़, वह डाक्टर की तलाश में इधर-उधर देखते, गैलरी की ओर बढ़ी। सामने दरवाजे पर ÷आकस्मिक चिकित्सा' पढ़ उसने अन्दर झाँक कर देखा। कुर्सी पर एक डाक्टर जैसा लग रहा व्यक्ति, सफेद कोट पहने बैठा था। उसने पास जाकर पति का हाल बताते हुए व्यग्रता से कहा, ÷÷उन्हें यहीं ले आऊ या?...''
÷÷क्या कोई, एक्सीडेन्ट या चाकू-वाकू लगने का केस है?'' उसने बात काटी। ÷जी ऐसा कुछ नही हैं। वह घबरा गई।
÷÷तो फिर सामने काउण्टर से पर्चा बनवाकर, ड्यूटी वाले डाक्टर को दिखाओ।'' बिना सिर उठाये कहा। वह लौट आई। पर्चे वाले काउण्टर पर भीड़ थी। बाबू अभी तक आया नहीं था। वह औरतों वाली लाइन में खड़ी हो गई। तभी पर्चेवाला बाबू पान खाकर आ गया था। वह जल्दी से आगे बढ़ी लेकिन आगे खड़ी औरतों ने उसे झिड़क कर धकेल-सा दिया। वह सहम कर पुनः अपने स्थान पर आ गई। अपेक्षाकृत कुछ जल्दी ही, उसका नम्बर आ गया।
÷दो रुपए' बाबू ने कहा। काउण्टर पर एक तख्ती पर ÷एक रुपया' लिखा टंगा हुआ था। उसने बिना किसी एतराज के दो रुपए काउण्टर पर रख दिए। ÷नाम, उम्र, तकलीफ' पूछ, बारह नम्बर कमरा कहकर पर्चा उसे दे दिया। उसने पर्चा रवि को पकड़ा दिया। कमरों के नम्बर देखते हुए बारह नम्बर कमरे के बाहर रुक गई। कमरे के बाहर ÷बाह्य चिकित्सा विभाग' की पट्टिका और ड्यूटी पर उपस्थित चिकित्सक का नाम एक तख्ती पर लटक रहा था। दरवाजे पर नीला पर्दा था। दरवाजे पर खड़ा आदमी मरीजों के पर्चे जमा कर रहा था। वह बीच-बीच में अन्दर जाता और नाम पुकार कर उन्हें अन्दर भेजता।
बाहर बेंचों पर जगह नहीं थी। उसने आशुतोष को जमीन पर ही बिठा दिया और पर्चा रवि से लेकर दरवाजे वाले आदमी की ओर बढ़ा दिया। इस बीच रवि ने पर्चे को खेल-खेल में ही गोल-मोल कर सिगरेट की तरह मुंह से लगा रखा था। दरवाजे वाले ने, पर्चा देखकर उसे सीधा करता हुआ बोला, ÷÷इसकी क्या बत्ती बना कर....'' फिर उसकी ओर देखकर बात अधूरी छोड़ दी।
÷÷काफी देर बाद पति का नाम पुकारा गया। मेज के पीछे एप्रेन पहने डाक्टर साहब बैठे थे। पास ही एक कम्पाउण्डर नुमा व्यक्ति मरीज को टेबिल पर लिटाने में सहायता कम, झुँझला अधिक रहा था। आशुतोष टेबिल पर लेट गया। ÷÷चलो कपड़े उतारो।'' कम्पाउण्डर ने उसे घूरते हुए कहा? वह सकपका गई। ÷÷अरे! इसके, कपड़े ढीले करो।'' कहते हुए उसने पति के कपड़े नोच-खोंच दिए थे। डाक्टर ने, उसका पेट दबाते हुए देखा, ÷यह तो सर्जरी केस है।'
मरीज को आठ नम्बर कमरे में ले जाओ। सर्जरी वाले डाक्टर देखेंगे। कम्पाउण्डर ने पर्चा वापस करते हुए कहा। आठ नम्बर कमरे के बाहर काफी गिड़गिड़ाने के बाद ही गेट मैन ने भुनभुनाते हुए पर्चा जमा किया। वह थककर पति के पास ही बैठ गई। रवि का चेहरा भी कुम्हला गया था। जब तक, उसका नम्बर आया डाक्टर जाने के लिए उठ गया। शायद आज मरीज ज्यादा थे। डाक्टर के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट वाले भाव थे। उसने जल्दी जल्दी में पति का निरीक्षण किया। वह असमंजस में था।
एक्सरे और बाकी टेस्ट करवाने के बाद दिखाना उसने पर्चे पर कुछ लाइनें घसीट दीं। डाक्टर के जाने के बाद दरवाजे पर खड़े मूँछों वाले आदमी ने उसे सलाह दी, ÷÷शाम को डाक्टर साहब को घर पर दिखा लो। जरूरत होने पर वे भर्ती भी करवा देंगे।''
शाम को वह पति को लेकर डॉ० वर्मा के आवास पर गई। कल से ही उसने पति के संरक्षण का भार उसने ऊपर ले लिया था। डॉ० वर्मा का आवास अस्पताल प्रांगण में ही था। बरामदे में मरीज बैठे थे। यहाँ भी वहीं मूंछों वाला व्यक्ति मौजूद था। फीस लेकर वह मरीजों के नाम एक पर्ची में नोट कर रहा था। सावित्राी ने मकान मालकिन से रुपए उधार लिए थे। साठ रुपए देकर उसने पति का नाम लिखा दिया। नम्बर आने पर वे अन्दर गए। ÷÷आइए इधर बैठें''। प्रवेश करते देख डाक्टर ने बड़ी नम्रता से कहा। डाक्टर के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान थी। इस समय वे अस्पताल की औपचारिक पोशाक एप्रेन में न होकर सामान्य वेशभूषा में थे। उसने सामने, अस्पताल का पर्चा रख दिया।
÷÷कहिए आशुतोष जी''। अब पेट दर्द कैसा है? उन्हें याद आ रहा था। ÷÷क्या, दावतें वगैरह ज्यादा खा लीं?'' उन्होंने मजाक किया। इस समय, वे बड़ी ही खुशमिजाज लग रहे थे। अस्पताल का तनाव जो यहाँ नहीं था। वह उसे लेटाकर, खड़ा करके बड़ी देर तक परीक्षण करते रहे।
÷÷इस समय, यही दवा लें। सुबह आ जाइए, भर्ती कर लेंगे। चिन्ता न करें।'' उन्होंने आश्वस्त किया।
चलते समय उन्होंने फिर कहा, पाँच सौ रुपये, करीम के पास, अरे वहीं मूछों वाले साहब, जमा करा देना। उसे सारी रात पाँच सौ की चिन्ता रही। सुबह उसने मकान मालकिन के पास, एक पतली-सी चेन, जिसे पति ने पिछले वर्ष बोनस मिलने पर दिलाया था, रखकर सात सौ रुपए लिए। वह अस्पताल जल्दी आ गई। डॉ० वर्मा अभी तक आए नहीं थे। आशुतोष श्लथ-सा पीछे घिसट रहा था। तभी डॉ० वर्मा आते दिखाई दिए। वह लपकती-सी उनके पास गई। सौ-सौ के पाँच नोट उनकी ओर बढ़ा दिए। डॉ० वर्मा ने इधर-उधर देख, बिना गिने जेब में रख लिए। वह कुछ उखड़े से लग रहे थे। रूखे स्वर में, करीम से संपर्क करने को, कह आगे बढ़ गए। करीम काफी देर बाद आया। वह पर्चा लेकर उन्हें रुकने को कह, एक ओर चला गया। कुछ देर बाद, आकर बोला, प्रबन्ध हो गया है। वार्ड नम्बर ५ बेड नम्बर १७ पर चलो।
वह पति और रवि के साथ अन्दर की ओर चल दी। चौड़ी से गैलरी में, एक हालनुमा वार्ड के बाहर उसने एक नर्स से पूछा। करीम का नाम और बेड नम्बर १७ बताने पर वह अपने साथ आने का इशारा कर अन्दर चली गई। आगे जाकर वह एक बेड के पास रुकी। पीछे दीवाल पर १७ लिखा था बेड पर सर से कम्बल ओढ़े कोई लेटा था। दो-तीन औरतें उसे घेरे धीमी आवाज में रो रही थीं।
÷÷अरे अभी तक मुर्दा यहीं है।''
उसने औरतों को सम्बोधित किया।
÷नया मरीज आ गया, बेड खाली करो।'
रोते-रोते सिर उठाकर एक औरत बोली, ÷÷घर के आदमी इंतजाम करने गए हैं।''
÷तब तक, क्या यह इसके ऊपर लेटेगा, ÷÷वार्ड ब्वाय डेड बॉडी बाहर करो।'' नर्स चिल्लाई।
पत्नी ने कहना चाहा, वे प्रतीक्षा कर लेंगे परन्तु तभी दो वार्ड ब्वायों ने एक स्ट्रेचर लाकर लाश लाद दी थी। कम्बल वापस, बेड पर रख दिया।
पति ने उसकी ओर बेबस भाव से देखा फिर चुपचाप लेटकर कम्बल घसीट लिया। पत्नी ने गहरी सांस खींची। वार्ड में नजर दौड़ाई। दीवार से सटे कतार में, मरीजों के पलंग। अधिकांश पर चादरें थीं नहीं, जो थीं, वे भी रक्त और पेशाब के धब्बों से युक्त। पराजित योद्धाओं के उदास शिविरों की भाँति। वातावरण में घुली, एक अव्यक्त-सी मृत्यु गंध पूरे वार्ड में समाई हुई थी।
तभी करीम भर्ती का टिकट लेकर आ गया। वह पहले तो प्रश्नवाचक मुद्रा में खड़ा रहा, फिर बोला, ÷अब मेरा भी हिसाब कर दो।''
पत्नी ने उसकी ओर देखा फिर मतलब समझती बोली, ÷÷मैंने डाक्टर साहब को....।''
वह बिगड़ उठा, ÷÷जाने कितने लोग पीछे पड़े थे। बिना नम्बर के भर्ती करा दिया। काम निकल जाने पर अब रास्ता दिखाया जा रहा है।'' पत्नी ने ब्लाउज से, रुमाल निकाल कर एक दस का नोट बढ़ा दिया।
÷यह क्या?' उसने नोट फेंक दिया। ÷÷मुझे कोई स्वीपर समझ लिया है, जो चूतड़ों के नीचे पाट लगवाने का दे रही हो।''
वह सकपका गई। एक और दस का नोट बढ़ाती बोली, ÷मेरे पास इस समय यही है।'
करीम बीस रुपया लेकर बड़बड़ाता हुआ चला गया। वह बेंच पर दुबक गई, कहीं, नर्स की नजरें फिर न उस पर पड़ जाए। सावित्राी को अपनी उपस्थिति पति के लिए कवच प्रतीत हो रही थी। कुछ देर बार डॉ० वर्मा आते दिखाई दिए। पति के बेड के पास रुके। नर्स आ गई थी। उन्होंने पति का पेट थपथपाया जीभ, नब्ज, आँखें और रक्तचाप देखा।
सिरहाने टंगे टिकट पर उपचार लिखते, हुए नर्स को हिदायतें दी। थोड़ी देर बाद वार्ड ब्वाय पहियों वाला नीला पर्दा घसीट लाए। उससे बाहर जाने को कह पर्दा डाल दिया। लगभग एक घण्टे बाद, उसके वापस आने पर पति का गात और भी शिथिल लग रहा था। यद्यपि दर्द में कुछ राहत थी।
शाम को अस्पताल में गहमा-गहमी हो गई थी। मिलने वालों की भीड़। बेंचें कम पड़ गई थीं। साथ आए बच्चे दौड़ लगा रहे थे। नर्सें, जिनके चेहरों से तनाव की बर्फ पिघलती लग रही थी, बीच-बीच में, कृत्रिाम गुस्से बच्चों को डॉंट देती थीं। बच्चे कुछ पल को सहम, फिर उनकी आँखों में झाँक अपने में मस्त हो जाते। यह रवि को घर में छोड़ आई थी। उसे लगा, रवि यहाँ होता तो हंस खेल लेता। दो-तीन दिनों में, जैसे उस पर तनाव का संक्रमण हो गया था।
मरीजों के इर्द-गिर्द सहानुभूति, आन्तरिक पीड़ा को छुपाती मुस्कानें, हँसी मजाक और चिन्ताओं को टालने वाले, सुने-सुनाए लतीफे, संचारित हो रहे थे। कुछ देर के लिए, व्याधियाँ और तनाव कहीं दुबक गए थे। मौका मिलते ही घात में तत्पर।
अगले दिन, मुँह अँधेरे ही उसकी हालत फिर गंभीर हो गई। अस्पताल में, यह सब तो लगा ही रहता था। फिर यह वक्त तो ड्यूटी में परिवर्तन का था। रात की पाली वाली नर्सें घर जाने की हड़बड़ी में थी। दिन की पाली की अभी आ नहीं सकी थीं। इस समय फुर्सत किसे थी? वह बदहवास सी, इधर-उधर दौड़ रही थी। सबका एक ही उत्तर था, ÷÷जिसका केस है, वही आकर देखेंगे।'' कह आगे बढ़ जाते थे। काफी देर बाद डाक्टर वर्मा, कॉरीडोर में अपने कमरे के बाहर दिखे। वह हाल बताती-बताती रो पड़ी। डाक्टर वर्मा निस्पृह स्वर में बोले, ÷इलाज तो चल ही रहा है। यहाँ से उठने पर देख लूँगा। हाँ कुछ पाँच सौ रुपए की और जरूरत होगी।'
वह हतप्रभ रह गई। उसके पास मुश्किल से तीस एक रुपए बचे होंगे। वह हिचकती हुई बोली, ÷÷वह पहले पाँच सौ डाक्टर वर्मा जैसे इसी की प्रतीक्षा कर रहे थे'', पाँच सौ में क्या अस्पताल खरीद लिया है? एण्डोस्कोपी हुई, पेट से पानी निकाला गया। हुंह? और करीम शिकायत कर रहा था। उन्होंने नाराजगी प्रकट की। ÷डाक्टर साहब हम लोग बड़ी परेशानी में है।' वह गिड़गिड़ाई।
÷÷अरे, यहाँ राजी खुशी कौन आता है। आज के समय में, सभी बड़ी परेशानी में हैं। वे इस बार कुछ नर्मी से बोले।'' अर्जित अनुभव से उन्हें मालूम था कि सामने वाले को जेब से पैसा किस तरह निकलवाया जा सकता है। वह लौट आई। वार्ड में पति के सहकर्मी लालमणि, जगन, दौलतराम आदि पाँच-छह व्यक्ति उपस्थित थे। यूनियन के आगामी चुनावों में, दौलतराम प्रत्याशी था। चार दिनों से गैर हाजिर आशुतोष के घर प्रचार हेतु आने पर उन्हें खबर लगी।
उपयुक्त अवसर जान कर, वे सभी अस्पताल आ गए। डॉ० वर्मा के संबंध में सुनकर उनमें आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक ही था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में अस्तित्व की सार्थकता का इससे अच्छा मौका फिर न जाने कब मिलता? राजनीतिक दल से संबद्धता एवं समूह में होने के कारण, उनका मनोबल ऊँचा था। अस्पताल की अव्यवस्था और डॉ० वर्मा के विरोध में नारे लगाते वे मुख्य चिकित्सा अधिकारी कक्ष के बाहर एकत्रिात हो गए थे। शोर गुल सुन चिकित्सक स्वयं बाहर निकल उन्हें अन्दर ले गए। उन्होंने डॉ० वर्मा को बुलाया, वे परन्तु वे नहीं मिल सके। बेड नम्बर सत्राह की फाइल मंगवाई गई और आगे इलाज की डॉ० सक्सैना को सौंप दी गई। बेड नम्बर १७ अस्पताल भर में चर्चित हो गया। सभी आश्वासन दे, चिन्ता न करने को कह, चले गए। अस्पताल वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। बहुधा ऐसा होता रहता था। दो-तीन दिन बाद, अस्पताल में हलचल सी थी। शायद किसी बड़े अधिकारी अथवा किसी मंत्राी का दौरा होना था। फर्श को फिनायल से धो-पौंछ कर चमकाने का प्रयास किया जा रहा था। बिस्तरों पर धुली सफेद चादरें और लाल कम्बल सजाए से जा रहे थे। ठीक जैसे, रामलीला में पात्राों के सिर पर, गोदाम से निकालकर, मुकुट। पुरानी चिलमची आदि गायब कर दिए गए थे। कोनों में, चूना छिड़क दिया गया। मुख्य अधीक्षक, जिनके पीछे अन्य डाक्टर नर्सें आदि थीं, तैयारियों के पूर्वावलोकन हेतु, वार्डों का दौरा कर रहे थे। सत्राह नम्बर बेड के पास, वे रुके। नर्स से, मरीज की फाइल माँगी। ÷यह तो पैरिटोनाइटिस एबडॉमिनल का केस है। एडमिट करने की क्या जरूरत थी? बेकार में मरीज को परेशानी होगी। दवा प्रेस्क्राइब कर डिस्चार्ज करो।'
आशुतोष के मुख पर तीव्र वेदना के लक्षण विद्यमान थे। सावित्राी और रवि अन्य लोगों के साथ पहले ही वार्ड के बाहर कर दिए गए थे। मरीज के पास डाक्टरो की भीड़ देख, वह आशंकित हो अन्दर चली आई। पीछे-पीछे रवि भी। उसने देखा कि आशुतोष की हिचकियों की आवृत्ति बढ़ गई थी। अचानक उसे दर्द के तेज लहर के साथ उल्टी आई। मुँह से ढेर सारा खून गिरा। उसके कपडे+, नई धुली चादर सब भीग गए। रक्त के छींटे डाक्टरों के सफेद एप्रेन पर भी पड़े थे। सभी स्तब्ध रह गए। डॉ० वर्मा ने फुर्ती से उसी नब्ज, आँखें और स्टेथेस्कोप से दिल की जाँच की। उन्होंने निराशा से सिर हिलाया, ÷यह तो मर गया।'
यह सुनकर सावित्राी पथरा सी गई। यद्यपि पाँच-छह दिनों से पति की जो दशा थी, खुद को झूठी तसल्ली के बाद भी उसने चरम सत्य की कल्पना शायद कर रखी थी। फिर भी जब तक साँस जब तक आस का सहारा तो था ही। परन्तु रवि के लिए तो यह शब्द न केवल अप्रत्याशित बल्कि अविश्वसनीय भी थे। बारह वर्षीय शर्मीले से बालक के एक मात्रा सखा मित्रा उसे इस तरह छोड़ कर कैसे जा सकते थे? अभी तो उनके किए जाने कितने वायदे पूरे करने बाकी थे? डाक्टर के शब्दों ने उसे वयस्क बना दिया था।
÷नहीं'....वह चीख कर पलंग पर औंधा हो गया। सावित्राी स्वयं को सम्हालती या रवि को। बेड के आस-पास भीड़ सिमट आई थी। चिर निस्तब्धता। स्वर थे तो केवल रवि की हिचकियों के। सावित्री ने किसी तरह उसे उठाने का प्रयास किया।
÷÷आह...'' कहीं गहरे तल से जैसे आवाज आई थी। लोगों का आश्चर्य अथवा विश्वास होता कि यह स्वर आशुतोष के कण्ठ से फूटा था। रवि आंसुओं से भीगा, चेहरा उठाकर चीख-सा उठा था।
÷÷बापू अभी जिन्दा है।''

1 comments:

Vivek Rastogi September 6, 2009 at 8:36 AM  

बाँध कर रख दिया आपकी कहानी ने। बहुत ही भावनात्मक और समाज का विकृत चेहरा और मानसिकता उजागर करती है आपकी कहानी। बस बीच कहानी का बिना पैराग्राफ़ के होना तल्लीनता कम करता है, कृपया पैराग्राग का प्रयोग करें।

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