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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Wednesday, February 25, 2009

तब और अब

नदीम अहमद नदीम




रशीद मियां नींद की आगोश में शायद गये ही होंगे कि सियाराम राधेश्याम' के उद्घोष से अचानक नींद खुल गई। घर के दूसरे लोग भी आंखें मलते हुए उठ बैठे।
माजरा समझते देर नहीं लगी। उनके पड़ौसी सीतारामजी के घर पर जागरण का कार्यक्रम शुरू हुआ है जो सुबह पांच बजे तक चलना है। डीजे स्पीकरों के मुंह अपने घर की दिशा में देखकर रशीद मियां की बीवी ने उनकी
जानिब देखा। रशीद मियां बोले, चार दिन पहले जब हमारे घर पर मिलाद का कार्यक्रम था तब सीताराम के परिवार ने भी पूरी रात जागते हुए ही काटी थी उसी तरह आज हम रात जागते हुए बितायेंगे।

3 comments:

प्रदीप मानोरिया February 25, 2009 at 9:51 AM  

सुन्दर परस्पर सहृदयता
मेरे ब्लॉग पर पधार कर "सुख" की पड़ताल को देखें पढ़ें आपका स्वागत है
http://manoria.blogspot.com

संगीता पुरी February 25, 2009 at 12:06 PM  

ऐसी कहानियों को हकीकत बनाकर ऐसे सुंदर उदाहरण समाज के सामने लाए जाने चाहिए....बहुत सुंदर।

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