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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, November 15, 2008

दर्द हूँ मैं

SEEMA GUPTA

अश्कों से नहाया,
लहू से श्रृंगार हुआ,
सांसों की देहलीज पर कदम रख,
धडकनों से व्योव्हार हुआ,

लबों की कम्पन से बयाँ..
जख्म की शक्ल मे जवान हुआ..
कभी जिस्म पे उकेरा गया,
सीने मे घुटन की पहचान हुआ,
रगों मे बसा,
लम्हा लम्हा साथ चला,
करहाटों के स्वर से विस्तार हुआ,
हाँ, दर्द हूँ मै , पीडा हूँ मै...
मेरे वजूद से इंसान कितना लाचार हुआ....

1 comments:

seema gupta November 15, 2008 at 10:10 AM  

DR.Shagufta Niyaz jee thanks a lot for presenting my poem here.

Regards

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