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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Friday, December 12, 2008

ग़ज़ल

महताब हैदर नक़वी

सुबह की पहली किरन पर रात ने हमला किया
और मैं बैठा हुआ सारा समां देखा किया

ऐ हवा ! दुनिया में बस तू है बुलन्द इक़बाल1 है
तूने सारे शहर पे आसेब2 का साया किया

इक सदा ऐसी कि सारा शहर सन्नाटे में गुम
एक चिनगारी ने सारे शहर को ठंण्डा किया

कोई आँशू आँख की दहलीज़ पर रुक-सा गया
कोई मंज़र अपने ऊपर देर तक रोया किया

वस्ल3 की शब को दयार-ए-हिज्र4 तक सब छोड़ आए
काम अपने रतजगों ने ये बहुत अच्छा किया

सबको इस मंजर में अपनी बेहिसी पर फ़ख़ है
किसने तेरा सामना पागल हवा कितना किया

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1. तेजस्वी 2. प्रेत-बाधा 3. मिलन 4. विरह-स्थल

3 comments:

Shashwat Shekhar December 12, 2008 at 10:36 PM  

"वस्ल3 की शब को दयार-ए-हिज्र4 तक सब छोड़ आए"

'इक सदा ऐसी कि सारा शहर सन्नाटे में गुम
एक चिनगारी ने सारे शहर को ठंण्डा किया"
बहुत पसंद आया ,आशा है ऐसी ही शानदार ग़जलें लिखते रहेंगे|
Aapke blog ko aaaj se follow kiya karunga.

"अर्श" December 12, 2008 at 10:37 PM  

कोई आँशू आँख की दहलीज़ पर रुक-सा गया
कोई मंज़र अपने ऊपर देर तक रोया किया

bahot khub rahi ye bhi bahot umda ghazal ,,, bahot khub .. dhero badhai aapko...

arsh

amitabhpriyadarshi December 13, 2008 at 1:14 AM  

कोई आँशू आँख की दहलीज़ पर रुक-सा गया
कोई मंज़र अपने ऊपर देर तक रोया किया.

baat dil ko chhootee see lagee.
khaalee panne.

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