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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Friday, April 17, 2009

दिशा-बोध

महेंद्र भटनागर
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निरीहों को
हृदय में स्थान दो:
सूनापन-अकेलापन मिटेगा !
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जिनको ज़रूरत है तुम्हारी —
जाओ वहाँ,
मुसकान दो उनको
अकेलापन बँटेगा !
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अनजान प्राणी
जोकि
चुप गुमसुम उदास-हताश बैठे हैं
उन्हें बस, थपथपाओ प्यार से
मनहूस सन्नाटा छँटेगा !
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ज़िन्दगी में यदि
अँधेरा-ही अँधेरा है,
न राहें हैं, न डेरा है,
रह-रह गुनगुनाओ
गीत को साथी बनाओ
यह क्षणिक वातावरण ग़म का
हटेगा !
ऊब से बोझिल
अकेलापन कटेगा
.

1 comments:

Lokendra April 17, 2009 at 2:07 PM  

बहुत अच्छी लाईने लिखी है आपने...........
बधाई.......

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