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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, April 18, 2009

स्वीकार

महेंद्र भटनागर

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अकेलापन नियित है,
हर्ष से
झेलो इसे !
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अकेलापन प्रकृति है,
कामना-अनुभूति से
ले लो इसे !
.
इससे भागना-बचना —
विकृति है !
मात्र अंगीकर करना —
एक गति है !
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इसलिए स्वेच्छा वरण,
मन से नमन !
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1 comments:

Shamikh Faraz April 26, 2009 at 5:20 PM  

sach kaha aapne akelapan niyati hai.bahu khubsurat.
agar waqt mile to mera blog bhi dekhen.

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