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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Thursday, May 7, 2009

दृष्टिकोण

महेंद्र भटनागर

अतीत का मोह मत करो,
अतीत —
मृत है !
उसे भस्म होने दो,
उसका बोझ मत ढोओ
शव-शिविका मत बनो !
शवता के उपासक
वर्तमान में ही
एक दिन
स्वयं निश्चेष्ट हो रहेंगे
अनुपयोगी
अवांछित
अरुचिकर —
जो व्यतीत है
अस्तित्वहीन है !
वह वर्तमान का नियंत्रक क्यों हो ?
वह वर्तमान पर आवेष्टित क्यों हो ?
वर्तमान को
अतीत से मुक्त करो,
उसे सम्पूर्ण भावना से
जियो,
भोगो !
वास्तविकता के
इस बोध से —
कि हर अनागत
वर्तमान में ढलेगा !
अनागत —
असीम है !
.

3 comments:

विनय May 7, 2009 at 2:37 PM  

सुन्दर कविता, किन्तु पॉप-अप विज्ञापन हटायें।

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चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें

डॉ. मनोज मिश्र May 7, 2009 at 4:27 PM  

सत्य वचन -अतीत -मृत है !

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