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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Saturday, November 8, 2008

"शीशा-ऐ-दिल"

Seema gupta


ये माना शीशा-ऐ-दिल ,
रौनके-बाज़ारे- उलफ़त है !
मगर जब टूट जाता है,
तो क़ीमत और होती है !!

6 comments:

मोहिन्दर कुमार November 11, 2008 at 10:30 AM  

खूब लिखा आपने... और तोडने वाला भी कोई करीबी ही होता है..या खुद

मेरा अजम इतना बुलंद है कि पराये शोलों का डर नहीं
मुझे खौफ़ आतिशे-गुल से है कहीं ये चमन को जला न दे

मोहिन्दर कुमार November 11, 2008 at 10:36 AM  

शगुफ़्ता जी,
मुझे यही शेर थोडा आगे जाने पर यहां http://bikhreyseafsaney.blogspot.com/2008/11/blog-post_11.html मिला... यह शेर किसका है कुछ रोशनी डालेंगी

seema gupta November 11, 2008 at 10:53 AM  

"aap sbhee ka bhut bhut shukriya, apne preceious comments ke liye, mohinder jee is sher pr upeer Dr. shaguftaa jee ne name maira hee likha hai....Dr shagufta jee aapne blog pr muje jgeh daine ka bhut bhut shukriya...

http://bikhreyseafsaney.blogspot.com/

regards

seema gupta

Udan Tashtari November 11, 2008 at 8:44 PM  

बहुत बढ़िया.

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