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Sunday, October 24, 2010

स्त्री मुक्ति का भारतीय सन्दर्भ और महादेवी वर्मा

कुलभूषण मौर्य

भारत में स्त्री मुक्ति का आन्दोलन एक लम्बी यात्रा के बाद ऐसे मुकाम पर पहुच गया है, जहाँ एक ओर उसकी सफलता के गीत गाये जा रहे हैं, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों की बात की जा रही है, तो दूसरी ओर उस पर एक आयामी एवं पश्चिम आयातित होने का आरोप लगाया जा रहा है। परन्तु भारतीय चिन्तन परम्परा पर एक दृष्टि डालने पर यह सिद्ध हो जाता है कि यह पश्चिम की देन नहीं है। नारीवादी आन्दोलन को महत्त्वपूर्ण दिशा देने वाली सीमोन द बोउवार की पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ (1949 ई.) के पहले ही महादेवी वर्मा की ‘शृंखला की कड़ियाँ’ (1942 ई.), नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तक आ चुकी थी, जो ‘नारी मुक्ति के उपायों की ओर गहन चिन्तन और विद्रोही तेवर’1 के कारण ध्यान आकर्षित करती है। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ के पहले भी ‘थेरी-गाथा’, ‘सीमन्तनी उपदेश’, ‘स्त्री-पुरुष’ संज्ञान में है। स्त्री दृष्टि के कारण चर्चा में भी। भले ही उनकी लेखिकाओं के नाम ज्ञात हो या अज्ञात।’’2

व्यक्तित्व के स्तर पर स्त्री-मुक्ति के नये आख्यान रचने वाली महादेवी वर्मा का नारी सम्बन्धी चिन्तन भारतीय सन्दर्भ में स्त्री-मुक्ति का मार्ग तलाशने का सशक्त एवं सार्थक प्रयास है। भारत में पाश्चात्य नारी चिन्तन के माध्यम से उठे नारी आन्दोलन के कई दशक पहले महादेवी ने भारतीय नारी की समस्याओं को न केवल सशक्त ढंग से उठाया, बल्कि स्त्री एवं समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए सामंजस्यपूर्ण समाधान देने का भी प्रयास किया। ‘‘महादेवी पश्चिमी-नारीवादियों की तरह न तो कभी पुरुष-जाति का विरोध करती हैं और न ही पुरुष-प्रवृत्तियों को अपनाने की होड़ में यकीन करती हैं।’’3 उनका नारी विषयक चिन्तन बड़े ही शालीन ढंग से पुरुष वर्चस्ववादी समाज व्यवस्था पर अनेक सवाल खड़ा करता है। ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में ‘‘उनकी नारी संवेदना के बौद्धिक एवं सामाजिक पक्ष का उद्घाटन हुआ है। रूढ़िवादी समाज और पुरुष प्रधान परम्परावादी दृष्टिकोण का एक तेजस्वी नारी द्वारा सांस्कृतिक सार पर तीव्र प्रतिवाद किया गया है।’’4

महादेवी पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हुए भी ‘‘नारी के जीवन की कठिनाइयों के लिए न केवल पुरुष को दोष देती है, बल्कि इसके लिए वे नारी को भी समान रूप से दोष देती हैं।’’5 वे नारी में चेतना के अभाव को ही उसकी सारी समस्याओं की जड़ में देखती हैं। तभी तो वे कहती हैं, ‘‘वास्तव में अन्धकार स्वयं कुछ न होकर आलोक का अभाव है।’’6

महादेवी स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक बनावट को ध्यान में रखते हुए उसे पुरुष का पूरक मानती हैं जिनके अन्र्तसम्बन्धों पर समाज की पूर्णता निर्भर है। उनका कहना है, ‘‘नारी का मानसिक विकास पुरुषों के मानसिक विकास से भिन्न परन्तु अधिक द्रुत, स्वभाव अधिक कोमल और प्रेम-घृणादि भाव अधिक तीव्र तथा स्थायी होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के अनुसार उसका व्यक्तित्व विकास पाकर समाज के उन अभावों की पूर्ति करता रहता है, जिनकी पूर्ति पुरुष स्वभाव द्वारा सम्भव नहीं।’’7 वे नारी को पुरुष की ‘सहधर्मचारिणी’ और ‘सहभागिनी’ के रूप में देखती हैं, जिसका कार्य है, ‘‘अपने सहयोगी की प्रत्येक त्राुटि को पूर्ण कर उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना।’’8 इसको प्रमाणित करने के लिए वे मैत्रोयी, गार्गी, गोपा, सीता, यशोधरा आदि का उदाहरण भी देती हैं। परन्तु उल्लेखनीय है कि उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। वास्तविकता यह है कि स्त्री ‘स्वतंत्रा व्यक्तित्व से रहित पति की छाया मात्रा’ रही।

शेष भाग पत्रिका में..............



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हिन्दी की बाल एकांकियों में बाल मनोविज्ञान

डा. कृष्णा हुड्डा

निस्सन्देह, बालक किसी भी देश के भविष्य- निर्माता होते हैं। सर्वांगीण विकास का भविष्य बालकों पर ही निर्भर करता है। इसलिए विकासकामी देश बालकों के विकास पर सर्वाधिक ध्यान देते हैं। यह विकास सर्वतोन्मुखी होता है तथा विकास की सारी योजना बाल मन से सम्बद्ध होती है। बालमन किसी भी चीज़ को जल्दी समझता है, जल्दी पकड़ता है और जल्दी अनुकरण करता है। शीघ्रता और चंचलता उनकी सहज प्रवृत्ति होती है। साहित्य की अनेक विधाओं में बालकांे का मन या तो कहानियों में रमता है या लघु एकांकियों में। एकांकियों या बाल एकांकियों से बालक शीघ्रता से किसी चीज़ का अधिगम करता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि हिन्दी में एकांकियों की एक लंबी परम्परा है।

जैसा कि नाम से ही राष्ट्र है कि बाल एकांकी बच्चों- बालकों के लिए लिखा जाता है और यह एक अंक का होता है। बाल एकांकियों का उद्देश्य होता है। बालकों का परिष्कार करना, उन्हें नैतिकता की शिक्षा प्रदान करना। बाल एकांकी अपने उद्देश्य में तभी सफल होते हैं, जब उनकी रचना बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर की जाती है।

जहां तक बाल एकांकियों के स्वरूप का प्रश्न है, उस बारे में ज्ञातव्य है कि अनेक विद्वान एवं लेखकों ने बाल एकांकियों पर प्रकाश डाला है। कुछ विद्वानों के मत यहां प्रस्तुत किये जा रहे हैं-

1. पंडित सीताराम चतुर्वेदी के अनुसार- बाल नाटकों से बच्चों को आचरण की सीख मिलती है। साथ ही बच्चों में सही ढंग से प्रस्तुतीकरण की क्षमता भी विकसित होती है।1

2. जयप्रकाश भारती के अनुसार- शिशु हो या बालक- अभिव्यक्त करना उसके स्वभाव में होता है। कह सकते हैं कि बच्चों द्वारा नाटक करना है, बड़ों ने उसे बाद में अपना लिया। अभिनय करने पर बालक में विश्वास जागता है। अपनी बात साफ-साफ कहने की क्षमता बढ़ती है। मनोरंजन तो होता है। यों तो पूरा जीवन ही रंगमंच पर अभिनय जैसा है।2

उक्त विद्वानों के विचारों से स्पष्ट हो जाता है कि बाल एकांकियों का साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। बाल एकांकियों का स्वरूप ऐसा होना चाहिए कि बालमन उससे सहज रूप से आकृष्ट हो जाये। उसकी भाषा सुबोध तथा संवाद छोटे और सारगर्भित होने चाहिए।

हिन्दी साहित्य में बाल एकांकियों का विकास और शुरूआत नया नहीं है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय से ही बाल एकांकियों की रचना का दौर शुरू हो गया था। स्वयं भारतेन्दु ने सत्य हरिश्चन्द्र और अंधेर नगरी चैपट राजा लिखकर बाल एकांकियों के क्षेत्रा में पदार्पण किया था। डा. हरिकृष्ण देवसरे ने इसकी पुष्टि करते हुए लिखा है कि हिन्दी में बाल नाटकों का आरम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से ही माना जा सकता है।...भारतेन्दु युग में बच्चों के नाटकों के लिए प्रेरणादायी सृजन कार्य हुआ है।3

बाल एकांकियों की रचना के क्षेत्रा में द्विवेदी युग में भी पर्याप्त प्रयास हुए। 1917 ई. नर्मदाप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित सरल नाटक माला (इसमें 44 बाल नाटक हैं) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसके बाद केशवचन्द्र वर्मा (बच्चों की कचहरी) कुदासिया जैदी (चाचा छक्कन के ड्रामे) की चर्चा आवश्यक है।

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हिंदी और मराठी दलित आत्मकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन

डा. अशोक व. मर्डे

दलित साहित्य भारत के उन सभी शोषित, पीडित, अधिकार वंचित लोगों की दास्तान है। सदियों से अपने अधिकारों से वंचित एवं सदैव दुख दर्दे में छाये दासता का बोझ ढोते भारतवासियों की कहानी दलित साहित्य है। दलित शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘दल’ धातु से हुई है। शब्द कोशों में दल शब्द के अनेक अर्थ देखे जा सकते है। जैसे - फटना, खंडित होना, द्विधा होना, दबाया, कुचला हुआ, खण्डित आदि। दलित शब्द के आशय के संदर्भ में डा. नरसिंहदास वणकर के अनुसार, ‘दलित शब्द से हिंदू जाति व्यवस्था तथा हिंदू जाति व्यवस्था द्वारा मान्य किये गये लोगों के समूह का अर्थ बोध होता है। उसी प्रकार दलित शब्द विशिष्ट वर्ग का वाचक है। इससे उपेक्षित जातियों का परिचय मिलता है। दलित शब्द समाज व्यवस्था-जाति व्यवस्था की ओर ले जाता है। दलित शब्द कल और आज के दलित को दिखाता है।दलित शब्द से विद्रोह, आक्रोश, क्रांतिकारी का अर्थ - बोध होता है।1

दलित साहित्य के बारे में कहा जाता है कि दलितों द्वारा, दलितों के लिए लिखा साहित्य ही दलित साहित्य है। तो कुछ लोगों का मानना है कि जिस साहित्य में शोषितों की जीवन कहानी है वह दलित साहित्य है। ‘दलित साहित्य, मानव मुक्ति का साहित्य है ही साथ ही यह शास्त्रों से मुक्ति की चेतना का साहित्य है। इस साहित्य में दलितोत्थान की मूल चेतना के साथ-साथ आम आदमी के दुख दर्द, उसके सामाजिक सरोकार आदि को नए सिरे से अभिव्यक्त करने का आग्रह है।2 इसमें दलित व्यक्ति के द्वारा ही लिखे होने का कोई सम्बन्ध नहीं। दलित साहित्य लेखक कोई भी, किसी भी जाति का हो सकता है जिसने यातानाओं को सहा है, किसी के शोषण को सहा है, जाति के नाम पर यातनाआं को झेला है।

हिंदी और मराठी साहित्य में दलित साहित्य ने अपनी अलग पहचान कायम की है। कबीर, रविदास, नामदेव, तुकाराम, चोखामेला, सोयराबाई आदि संत कवियों ने भी दलितों, शोषितों पीड़ितों के लिए पदों की रचनाएं कर दलित जीवन की त्रासदी को रेखांकित किया है।

हिंदी में दलित आत्मकथा की लेखन परंपरा मराठी के बाद की है। क्योंकि मराठी आत्मकथा की शुरूआत साठ के दशक से तो हिंदी में आत्मकथा की शुरूआत आठवें-नौवे दशक से मानी जा सकती है। डा. भगवानदास की ‘मैं भंगी हूं’ से हिंदी आत्मकथा की शुरूआत है तो मराठी में दलित आत्मकथा की कहानी कुछ निराली है। मराठी में दलित लेखक की परंपरा हिंदी दलित आत्मकथा की अपेक्षा बड़ी लंबी मानी जाती है। आधुनिक भाारत में हिंदी दलित साहित्य को मराठी की देन स्वीकार किया जाता है। अनेक भाषाओं में भी इस प्रकार का साहित्य लिखा गया लेकिन मराठी भाषा के समान यह साहित्य विकसित नहीं हुआ। मराठी भाषा में दलित साहित्य ने एक प्रकार से क्रांतिकारी विचारों को बड़े पटल पर और प्रचुर साहित्यकारों के माध्यम से वाणी दिलाने के प्रयास किए। औरंगाबाद से 1960 में अस्मिता और अस्मितादर्श पत्रिकाओं के माध्यम से दलित साहित्य ने अपनी पहचान कायम की। इसी पत्रिकाओं के माध्यम से पहली बार मराठी के केशव मेश्राम, बंधु माधव, राजा ढाले, नामदेव ढसाल, योगिराज वाघमारे, बाबुराव बागुल आदि लेखकों की संक्षिप्त आत्मकथा प्रकाशित हुई और तब से मराठी के अनेक बुजुर्ग लेखकों, युवकों ने अपनी आत्मकथाओं का लेखन कार्य शुरू किया। हर एक आत्मकथा लेखन

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राजनीतिक धरातल पर कदम बढ़ाती मैत्रेयी पुष्पा की नायिकाएँ

सरिता बिश्नोई

राजनीति और समाज का अन्योनाश्रित सम्बन्ध है। समाज और राजनीति की प्रत्येक गतिविधि एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। यदि यह कहा जाए कि स्वच्छ एवं सुचारू रूप से होने वाली राजनीतिक गतिविधियाँ उन्नत और प्रगतिशील समाज का निर्माण करती हैं और दूषित तथा भ्रष्टाचार में लिप्त गलत राजनीतिक गतिविधियाँ सम्पन्न समाज को भी संकट में डाल देती हैं, तो कदाचित् गलत नहीं होगा। इसी प्रकार समाज में प्रतिदिन घटने वाली घटनाएँ राजनीतिक मुद्दा बनकर समूची शासन-व्यवस्था को हिला कर रख देती हैं। चूँकि साहित्य समाज की युगीन परिस्थितियों और परिवेश का जीवंत चित्राण होता है, तो उसमें तत्कालीन राजनीतिक परिवेश व परिस्थितियों का उल्लेख होना स्वाभाविक ही है। समाज के विविध क्षेत्रों के समान राजनीतिक क्षेत्रा भी साहित्यकार की चेतना को झकझोरने का काम करता है और साहित्यकार युग और इतिहास में घटित राजनीतिक घटनाओं, दुर्घटनाओं, आंदोलनों व समस्याओं के प्रति सजग दृष्टिकोण अपनाते हुए उनके कारणों, स्रोतों और प्रभावों को अपने साहित्य में सचेतन अभिव्यक्ति देता है। इस प्रकार साहित्यकार तत्कालीन परिवेश तथा विविध क्रियाकलापों को तटस्थ भाव से देखते हुए अपने साहित्य में निष्पक्ष रूप से उनका चित्रांकन करता हुआ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वर्तमान में विविध सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से लोगों को अवगत कराने और जागरूक करने के लिए कथा-साहित्य अत्यंत प्रभावी माध्यम के रूप में सामने आया है। जनसामान्य की समस्याओं को जनसामान्य की भाषा में अधिक सरलता से समझाया जा सकता है। इसलिए राजनीतिक समस्याओं को अपने कथा-साहित्य का विषय बनाकर कथाकारों ने लोगों में राजनीतिक जागरूकता लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। पुरुष कथा-लेखकों के समान ही महिला लेखिकाओं ने भी राजनीति को केन्द्र में रखकर साहित्य की रचना द्वारा राजनीतिक-क्षेत्रा से जुड़ी समस्याओं और उपलब्धियों को समाज के सामने प्रस्तुत किया है। महिला-कथाकारों ने भारतीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं को अपने कथा-साहित्य में उजागर किया है। अपराधियों का राजनीतिकरण, सांप्रदायिकता पर आधारित राजनीति, जनसामान्य पर अनुचित राजनीतिक निर्णयों के दुष्प्रभाव, नारी की राजनीतिक सहभागिता इत्यादि विविध मुद्दों को उन्होंने लेखन का विषय बनाया। समकालीन लेखिकाओं में मैत्रोयी पुष्पा का नाम विशेष रूप से राजनीतिक विषयों पर कथा-लेखन के लिए लिया जाता है। इसमें भी उन्होंने नारी की राजनीति में भागीदारी और उसके लिए राजनीतिक क्षेत्रा में व्याप्त चुनौतियों को अपने उपन्यासों और कहानियों का वण्र्य-विषय बनाया है। मैत्रोयी पुष्पा के कथा-साहित्य में राजनीति के विविध कार्यक्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करती हुईं नायिकाएँ अपनी संकल्प दृढ़ता का परिचय देती हैं। उनकी यह संकल्प दृढ़ता तथा राजनीति के क्षेत्रा में बार-बार पुरुष वर्ग द्वारा पीछे धकेले जाने के बावजूद अपनी पहचान बना लेना ही उनकी संघर्ष-गाथा को सार्थकता प्रदान करती है। लेखिका की यह विशेषता है कि उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों की विषय-वस्तु कहीं बाहर से नहीं जुटाई है और न ही काल्पनिक है, बल्कि उन्होंने अपने आस-पास के ग्रामीण परिवेश की ज़मीन पर कदम-दर-कदम चलते हुए यथार्थ को अनुभव करते हुए एकत्रित की है। नारी-विमर्श के अंतर्गत राजनीतिक संदर्भों को उजागर करने की दृष्टि से उनके ‘चाक’ व ‘इदन्नमम्’ उपन्यास अत्यंत चर्चित

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महानगरीय निम्न वर्ग की जीवन त्रासदी: ‘मुर्दाघर’

लवली शर्मा

वैभव के परिचायक महानगरों में जहां एक ओर गगनचुम्बी अट्टालिकायों व इमारतों में रहने वाले उच्चवर्गीय लोगों की दुनिया बसती है वहीं दूसरी ओर इसी दुनिया के समांतर कुत्तों, कौवों और रेंगते हुए कीड़ों से भी बदतर ज़िन्दगी व्यतीत करने वाले लाखों लोग फुटपाथों पर रहते हैं जिन्हें महानगर का सभ्य समाज जूठन और ग़न्दगी के अलावा और कुछ नहीं मानता। लेकिन फिर भी नैतिक मूल्यों से विहीन मानी जाने वाली यही दुनिया महानगरों का अभिन्न अंग है।

औद्योगिकरण के प्रसार के साथ-साथ महानगरों में रोज़गार अवसरों की संभावना भी बढ़ने लगी। उद्योगों की स्थापना के फलस्वरूप महानगर पहले से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गये। उच्चस्तरीय शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार, राजनीति एवं साहित्य आदि के केन्द्र होने के कारण महानगर लगभग सभी वर्ग के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतों, पुलों, सड़कों के निर्माण एवं अन्य कार्य हेतु छोटे व बड़े कारीगर तथा मज़दूर वर्ग गांव और कस्बों से पलायन कर महानगरों में आकर बसने लगते हैं। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि इन नगरों में सभी को जीविका कमाने के समान अवसर प्राप्त हों। इसी कारण अधिकांशतः नवागन्तुक यहां आकर मोहभंग का शिकार होते हैं। जनसंख्या बढ़ने के कारण महानगरीय समस्याएं भी बढ़ने लगती हैं जिनमें से आवास की समस्या सबसे अधिक विकट रूप धारण कर रही है। इसी समस्या के कारण महानगर के भीतर व बाहरी किनारों पर झुग्गी-झोपड़ियों एवं मलिन बस्तियों के रूप में अति निम्न वर्ग की दुनिया अस्तित्व में आयी है। भले ही महानगरीय जटिलताएं मध्य वर्ग के लिए भी पीड़ादायक प्रतीत होती हैं लेकिन ये जटिलताएं निम्न वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करती रही हैं।

इन मलिन बस्तियों में रहने वाले भिखारी, अपाहिज, कोढ़ी, रेड़ी लगाने वाले व्यक्ति, मज़दूर एवं अन्य छोटे-मोटे काम करने वाला यह गरीब वर्ग ज़िन्दगी की जद्दोजहद व लड़ाई में निरन्तर हार रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं यदि यह वर्ग ‘मूल्य’ जैसे शब्दों को समझने व पहचानने का सामथ्र्य न रखता हो। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने ऐसे ही वर्ग के विघटित सामाजिक व उनकी ‘इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों आशाओं-निराशाओं, अच्छाइयों, बुराइयों को उनकी अभागी-अपाहिज ज़िन्दगी की अभिशप्त नियति को, उनकी सड़ांध से घिरी धूल और कीच में बखस औंधी पड़ी, फुटपाथ पर एकदम सपाट गिरी-लेटी मजबूर ज़िन्दगियों के आँसू-रीते दर्द को’’1 को अपने उपन्यास ‘मुर्दाघर’ में प्रस्तुत किया है। उनका यह उपन्यास महानगरीय परिवेश की सशक्त अभिव्यक्ति है जिसका कथ्य बम्बई महानगर की झोपड़ियों, फुटपाथों, पाइपों या खुले आसमान के नीचे बिना किसी छत के रह रहे बेघर निम्न वर्ग एवं वेश्याओं के जीवन के मार्मिक पक्षों का उद्घाटन करता है। इस उपन्यास के केन्द्र में ‘‘रंडियाँ हैं जो पूरी ज़िन्दगी घरबार और पति!’’ जोड़ने की अनथक कोशिशों में टूट रही हैं और स्वप्न पाल रही हैं (मैना)। ये उगती हुई नस्ल (राजू) के अंधकारमय भविष्य की चिन्ता से आक्रान्त हैं। शरीर पर सभ्यता के दिये हुए अमानवीय अघातों को झेलती हुई और शरीर को माँस की दुकान में बदलती हुई इन रंडियों की सारी ज़िन्दगी की कमाई कुल जमा पूँजी एक या दो रुपये की है जो किसी दुर्घटना से जूझते हुए बस के भाड़े या मुरदा ठिकाने लगाने वाले भंगी की सेवाओं के प्रतिमान में निकल जाती है

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शृंखला का द्वन्द्व घोष, कोई उधार न हो

डा. श्रीमती दया दीक्षित



जो सकार के अर्थां को प्राप्त करने के लिए क्रांतिदृष्टा, क्रांतिचेता और क्रांतिकर्ता होते हैं यही अर्थां में वे क्रांतिकारी, विचारक, प्रबुद्ध चिंतक कहे जाने अधिकारी हैं। ये विभूषण ऐसे ही लोगों पर फबते हैं, अपने पूरे वास्तविक और सही अर्थां में। जिसका खून माक्र्स के विचारों के रंग से रंगा हो, अगर वह मुक्तिबोध या निराला के तेवरों पर दिलोजान से फिदा न हो, तो क्या रीति की नीतियों पर फिदा होगा? सो अपने जोश और होश में इन विभूषणों को पैबस्त करने वाली कात्यायनी ने अपनी माक्र्सवादी रौ में माक्र्स और उसके समकालीन तद्देशीय और अन्य अंतर्राष्ट्रीय विचारकों ने विचार घोंट कर आत्मस्थ कर डाले। माक्र्स, हर्जन, ट्रोबोल्युबोब, टाल्स्टाय, मक्सिम गोर्की, लूशून, लोर्का, फेहिन, पाब्लोनेरूदा, नाजिम हिकमत, गोएठे...इन सबके सार को घटित करने की जद्दोजहद से जूझती हुई काव्य वस्तुओं का चित्राण करती हैं, विज्ञान उनका ज्ञान प्रदान करता है। आज के युग की मांग है जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसे वास्तविक जीवन में मूर्त किया जाये।1 अपने जीवन को प्राप्त ज्ञान से परिचालित करने वाली कात्यायनी के तीन चिंतन ग्रंथ बेहद महत्त्वपूर्ण हैं- दुर्ग द्वार पर दस्तक, कुछ जीवंत कुछ ज्वलंत और षड्यन्त्ररत मृतात्माओं के बीच। उनके काव्य संकलनों में महत्त्वपूर्ण काव्य संकलन है- सात भाइयों में चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में और फुटपाथ पर कुर्सी, जादू नहीं कविता।

इनमें वे राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक सामाजिक क्षेत्रों में व्याप्त समस्याओं, असमानताओं का विश्लेषण कहते हुए ग्लोब्लाइजेशन एवं विश्व बैंक की करतूतों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों का उसकी आर्थिक नीतियों षड्यंत्रों का पर्दाफाश करती हैं। किस तरह पूंजीवादी विश्व बैंक की वैश्विक षड्यंत्राकारी कुव्यवस्था अपना घर भरने के लिए हमारे देश की अर्थनीति को तहस नहस करने में लगी है। किस तरह से हमारी भूमि क्रय करके अधिग्रहीत कर रही है। किस तरह से कम दामों में हमारे देशी खून पसीने, श्रम को खरीद कर उसे निचोड़ चूस रही है। उन्हें बर्बाद कर रही है, किस तरह कच्चा माल और श्रम आयातित करके ले जा रही है, इस पूरी षड्यंत्राकारी कवायद को और इसे सफल बनाने वाली स्वदेशी गंदी घृणित राजनीति को बेनकाब भी कर रही है और उसके विरूद्ध लड़ाई भी लड़ रही है। उनकी यह लड़ाई पूंजीवाद से है, सांप्रदायिकता और वर्ग भेद से है। हर उस धिनौनी ताकत से है जो उनकी यह निर्बलों, दलितों, स्त्रिायों, बच्चों, श्रमिकों, सर्वहारा वर्ग को लगातार अपने शोषण के मकड़जाल में कसती फंसाती जा रही है। वे एक साथ ही माक्र्सवादी धारा से जुड़ी सक्रिय क्रांतिनेत्री हैं, प्रखर विचारक हैं, नारीवादी चिंतक हैं। उनके नारीवादी रूप पर मंगलेश डबराल के शब्द याद आ रहे हैं।

शेष भाग पत्रिका में..............

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Thursday, December 31, 2009

NEW

HAPPY NEW YEAR 2010

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