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Sunday, October 24, 2010

राजनीतिक धरातल पर कदम बढ़ाती मैत्रेयी पुष्पा की नायिकाएँ

सरिता बिश्नोई

राजनीति और समाज का अन्योनाश्रित सम्बन्ध है। समाज और राजनीति की प्रत्येक गतिविधि एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। यदि यह कहा जाए कि स्वच्छ एवं सुचारू रूप से होने वाली राजनीतिक गतिविधियाँ उन्नत और प्रगतिशील समाज का निर्माण करती हैं और दूषित तथा भ्रष्टाचार में लिप्त गलत राजनीतिक गतिविधियाँ सम्पन्न समाज को भी संकट में डाल देती हैं, तो कदाचित् गलत नहीं होगा। इसी प्रकार समाज में प्रतिदिन घटने वाली घटनाएँ राजनीतिक मुद्दा बनकर समूची शासन-व्यवस्था को हिला कर रख देती हैं। चूँकि साहित्य समाज की युगीन परिस्थितियों और परिवेश का जीवंत चित्राण होता है, तो उसमें तत्कालीन राजनीतिक परिवेश व परिस्थितियों का उल्लेख होना स्वाभाविक ही है। समाज के विविध क्षेत्रों के समान राजनीतिक क्षेत्रा भी साहित्यकार की चेतना को झकझोरने का काम करता है और साहित्यकार युग और इतिहास में घटित राजनीतिक घटनाओं, दुर्घटनाओं, आंदोलनों व समस्याओं के प्रति सजग दृष्टिकोण अपनाते हुए उनके कारणों, स्रोतों और प्रभावों को अपने साहित्य में सचेतन अभिव्यक्ति देता है। इस प्रकार साहित्यकार तत्कालीन परिवेश तथा विविध क्रियाकलापों को तटस्थ भाव से देखते हुए अपने साहित्य में निष्पक्ष रूप से उनका चित्रांकन करता हुआ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वर्तमान में विविध सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं से लोगों को अवगत कराने और जागरूक करने के लिए कथा-साहित्य अत्यंत प्रभावी माध्यम के रूप में सामने आया है। जनसामान्य की समस्याओं को जनसामान्य की भाषा में अधिक सरलता से समझाया जा सकता है। इसलिए राजनीतिक समस्याओं को अपने कथा-साहित्य का विषय बनाकर कथाकारों ने लोगों में राजनीतिक जागरूकता लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। पुरुष कथा-लेखकों के समान ही महिला लेखिकाओं ने भी राजनीति को केन्द्र में रखकर साहित्य की रचना द्वारा राजनीतिक-क्षेत्रा से जुड़ी समस्याओं और उपलब्धियों को समाज के सामने प्रस्तुत किया है। महिला-कथाकारों ने भारतीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं को अपने कथा-साहित्य में उजागर किया है। अपराधियों का राजनीतिकरण, सांप्रदायिकता पर आधारित राजनीति, जनसामान्य पर अनुचित राजनीतिक निर्णयों के दुष्प्रभाव, नारी की राजनीतिक सहभागिता इत्यादि विविध मुद्दों को उन्होंने लेखन का विषय बनाया। समकालीन लेखिकाओं में मैत्रोयी पुष्पा का नाम विशेष रूप से राजनीतिक विषयों पर कथा-लेखन के लिए लिया जाता है। इसमें भी उन्होंने नारी की राजनीति में भागीदारी और उसके लिए राजनीतिक क्षेत्रा में व्याप्त चुनौतियों को अपने उपन्यासों और कहानियों का वण्र्य-विषय बनाया है। मैत्रोयी पुष्पा के कथा-साहित्य में राजनीति के विविध कार्यक्षेत्रों में चुनौतियों का सामना करती हुईं नायिकाएँ अपनी संकल्प दृढ़ता का परिचय देती हैं। उनकी यह संकल्प दृढ़ता तथा राजनीति के क्षेत्रा में बार-बार पुरुष वर्ग द्वारा पीछे धकेले जाने के बावजूद अपनी पहचान बना लेना ही उनकी संघर्ष-गाथा को सार्थकता प्रदान करती है। लेखिका की यह विशेषता है कि उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों की विषय-वस्तु कहीं बाहर से नहीं जुटाई है और न ही काल्पनिक है, बल्कि उन्होंने अपने आस-पास के ग्रामीण परिवेश की ज़मीन पर कदम-दर-कदम चलते हुए यथार्थ को अनुभव करते हुए एकत्रित की है। नारी-विमर्श के अंतर्गत राजनीतिक संदर्भों को उजागर करने की दृष्टि से उनके ‘चाक’ व ‘इदन्नमम्’ उपन्यास अत्यंत चर्चित

शेष भाग पत्रिका में..............

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