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Saturday, October 30, 2010

स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप

वेद प्रकाश
नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘ठीकरे की मंगनी’ दो दशक पहले प्रकाशित हुआ था। यह सुखद आश्चर्य है कि आज भी इस उपन्यास में स्त्री-विमर्श का एक विश्वसनीय एवं सार्थक रूप मिलता है। यह उपन्यास स्त्रीवाद के समक्ष कुछ चुनौतीपूर्ण सवाल भी व्यंजित करता है। इसीलिए बहुत से स्त्रीवादी इसके निंदक आलोचक हो सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि नासिरा शर्मा स्त्री की यातना, उसके जीवन की विसंगतियों-विडंबनाओं पर सशक्त ढंग से विचार करती है। वे सामान्य अर्थों में स्त्राीवादी लेखिका नहीं है। वे नारीवाद की एकांगिता, आवेगिता, आवेगात्मकता को पहचानती हैं। नारीवाद की पश्चिमी परंपरा का प्रभाव तथा उसकी सीमाएं नासिरा शर्मा की दृष्टि में हैं, इसलिए बहुत हद तक वे इन सीमाओं से मुक्त होकर लिखती हैं, उनकी स्त्राी संबंधी दृष्टि कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं की दृष्टि के अधिक निकट ठहरती है। ये लेखिकाएं मौलिक, यथार्थवादी ढंग से स्त्राी समस्याओं पर विचार करती हैं। इस संदर्भ में इन लेखिकाओं की रचनाएं द्वंद्वात्मकता से युक्त हैं।
जीवन की अंतःसंबद्धता की उपेक्षा किसी भी प्रकार के लेखन की बहुत बड़ी सीमा हो सकती है। स्त्राीवादी और दलितवादी लेखन को लेकर यह आशंका कम नहीं, अधिक ही है। प्रभावशाली स्त्रीवादी और दलित लेखन वह है जिसमें जीवन की जटिलता और परस्पर संबद्धता की अभिव्यक्ति होती है। बुद्धिजीवी या लेखक, सक्रिय राजनीति के नकारात्मक पहलुओं का चाहे जितना उल्लेख करें लेकिन सक्रिय राजनीति की बड़ी शक्ति यह है कि वह अधिक समावेशी - सबको साथ लेकर चलने वाली होती है। आज की दलित राजनीति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस समावेशिता से लेखन को समृद्ध होना चाहिए। स्त्रीवादी एवं दलित लेखन को भी।
नासिरा शर्मा ने ‘ठीकरे की मंगनी’ के माध्यम से हिन्दी साहित्य को महरुख़ जैसा अद्वितीय एवं मौलिक पात्रा दिया है। महरुख़ का जीवन उन स्त्रिायों के जीवन का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी मुक्ति को अकेले में न ढूँढकर समाज के उपेक्षित, निम्नवर्गीय, संघर्षरत, शोषितों पात्रों की मुक्ति से जोड़कर मुक्ति के प्रश्न को व्यापक बना देती है। वह ‘मुक्ति अकेले में नहीं मिलती’ पंक्ति को चरितार्थ करती है। बहुत बाद में लिखे गए चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आवाँ’ की नमिता पाण्डे, महरुख़ की वंशज पात्रा है। यह स्त्री-विमर्श का व्यापक, समावेशी रूप है इसीलिए अनुकरणीय भी। ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास के फ्लैप में ठीक ही लिखा गया है कि ‘‘औरत को जैसा होना चाहिए, उसी की कहानी यह उपन्यास कहता है।’’ यह वाक्य औरत को परंपरागत आदर्शवाद की ओर न ले जाकर उसके व्यावहारिक एवं सशक्त रूप की ओर संकेत करता है। उसका स्वयं को समाज की सापेक्षता में देखने का समर्थन करता है। साथ ही पुरुष को जैसा होना चाहिए वैसा होने की माँग भी करता है क्योंकि औरत भी तभी वैसी होगी जैसी उसे होना चाहिए। इन्हीं सब बातों को लेकर चलने वाली महरुख़ की जीवन-यात्रा है। वह जहाँ से आरंभ करती है वह बिन्दु अंत में बहुत व्यापक बन जाता है। जैसे किसी नदी का उद्गम तो सीमित हो लेकिन समुद्र में मिलने से पहले उसका संघर्ष भी है, अनुकूल को मिलाने और प्रतिकूल को मिटाने की प्रक्रिया भी।
समृद्ध और जन-संकुल जै़दी खानदान एक विशाल घर में रहता है। जिसके द्वार ऐसे खुलते हैं मानो जहाज़ के दरवाजे खुल रहे हों। चार पुश्तों से इस खानदान में कोई लड़की पैदा नहीं हुई। जब हुई तो सबके दिल खुशी से झूम उठे। उसका नाम रखा गया महरुख़ - ‘चाँद-से चेहरे वाली। सबकी लाड़ली। दादा तो रोज़ सुबह महरुख़ का मुंह देखकर बिस्तर छोड़ते थे। जै़दी खानदान में बाइस बच्चे थे, जिनकी सिपहसालार महरुख़ थी। उसका बचपन कमोबेश ऐसे ही बीता। उसी महरुख़ की मंगनी बचपन में शाहिदा खाला के बेटे रफ़त के साथ कर दी गई, ठीकरे की मंगनी। शाहिदा खाला ने महरुख़ को गोद ले लिया ताकि वह जी जाए। रफ़त, परंपरागत परिवार में पली-बढ़ी, नाजुक महरुख़ को अपनी तरह से ढालना चाहता है। क्रांति और संघर्ष की बड़ी-बड़ी बातें करता है। पुस्तकें लाकर देता है। महरुख़ अपने को बदलती तो है लेकिन उसकी बदलने की राह और उद्देश्य अलग है। वह क्रांति और आधुनिकता की बातें करने वाले लोगों के जीवन में झाँकती है तो काँप उठती है। वहाँ ये मूल्य फैशन अवसरवाद एवं कुण्ठाग्रस्त हैं। रफ़त दिखने को तो रूस का समर्थक है लेकिन पी-एच.डी. करने अमेरिका जाता है। उसका और उसके दोस्तों का अपना तर्क है, ‘‘पूंजीवादी व्यवस्था देखकर आओ, फिर इन साम्राज्यवादियों की ऐसी-तैसी करेंगे।’’
खुलेपन और प्रगतिशीलता के नाम पर रवि जो माँग एकांत में महरुख़ से करता है, उसे वह स्वीकार नहीं कर पाती। वह रवि की दृष्टि में पिछड़ेपन का प्रतीक बनती है लेकिन महरुख़ का तर्क है, ‘‘उसे हैरत होती है कि इस विश्वविद्यालय में भी औरत को देखने वाली नज़रों का वही पुराना दृष्टिकोण है, तो फिर यह किस अर्थ में अपने को स्वतंत्रा, प्रगतिशील और शिक्षित कहते हैं?’’
नासिरा शर्मा कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाले कुछ लोगों की सीमाओं और उपभोक्तावाद के दोगलेपन की आलोचना करती है लेकिन वे कम्युनिस्ट विचारधारा की विरोधी नहीं समर्थक हैं क्यांेकि महरुख़ ने अपने सकर्मक जीवन के माध्यम से इसी विचारधारा को सार्थक बनाया। यह भी कह सकते हैं कि वह इस विचारधारा पर चलकर सार्थक पात्रा बनी। इसके साथ ही लेखिका इस बात की भी अभिव्यक्ति करती है कि परंपरागत, संस्कारी, धर्म को मानने वाले सभी गैरप्रगतिशील तथा जड़ नहीं होते। इस स्तर पर नासिरा शर्मा अनेक रचनाकारों की तरह अग्नीभक्षी या अराजकतावादी नहीं हैं। न ही वे पुराने माने जाने वाले मानवीय मूल्यों की विरोधी लेखिका है। बल्कि वे.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

1 comments:

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) October 6, 2011 at 8:56 PM  

बिलकुल सटीक विश्लेषण किया है आपने नासिरा जी का.....बहुत-बहुत साधुवाद आपको....

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