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Sunday, October 24, 2010

कबीर का दार्शनिक तत्त्व-निरूपण

सीमा भाटिया

‘दर्शन’ भारतीय संस्कृति का वह अंग है जो आज भी भारत को तेजोमय किए हुए है। दार्शनिक दृष्टिकोण के समन्वित स्वरूप की नींव पर ही हमारा साहित्य प्रणीत हुआ है।

‘दार्शनिकता से अभिप्राय है जीवन और जगत् के पारमार्थिक स्वरूप तथा मानवीय जीवन के चरम लक्ष्य का चिंतन, मनन या साक्षात्कार। दर्शन का संबंध मुख्यतः किसी साधक या कलाकार की उस दृष्टि से स्वीकार किया जाता है जो प्रायः आध्यात्मिक हुआ करती है। उसका सीधा संबंध ब्रह्म, जीव, जगत्, माया आदि परोक्ष चेतनाओं के साथ हुआ करता है। उन्हीं चेतनाओं को व्यक्तिकरण उस साधक या कलाकार के सृजन में रूपयित होकर जगत्-जीवन को प्रभावित किया करता है। अतः दर्शन का संबंध प्रायः सूक्ष्म से होता है।

कबीर का दार्शनिक विचार

कबीर मूलतः दार्शनिक नहीं थे बल्कि एक संत व भक्त थे। भक्त का दर्शन किसी सम्प्रदाय या किसी विशिष्ट मतवाद का सूचक नहीं बन पाता। उसकी दृष्टि उदार होती है इसलिए कई तरह के विचारों की झलक उसकी चिंतन प्रणाली में प्राप्त हो जाती है। चूंकि भक्त के ज्ञान का अवसान भाव में होता है इसलिए वह तर्क-वितर्क की दृढ़ शृंखला से बंध नहीं पाता। कई बार परस्पर विरोधी बातों का भी उसके विचारों में सन्निवेश हो जाता है। कबीर ऐसे ही भक्त साधक है जो संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा के विरोधों के बीच समतामूलक तत्त्वों का निकालकर व्यापक धर्म की प्रतिष्ठा का संकल्प लेकर चल रहे थे। दार्शनिक चिंतन के लिए जिस प्रकार की सघन स्वानुभूतियों की आवश्यकता हुआ करती है, उनका भी कबीर के पास अभाव नहीं था। कबीर स्वयं भी इस ओर सतर्क थे कि लोग उनकी वाणी को तत्त्व या दार्शनिक-चिंतन से रहित सामान्य वाणी ही न समझ लें। तभी तो उन्होंने चेतावनी के स्वर में स्पष्ट कहा है- ‘‘तुम्ह जिनि जानौ गीत है यहु निज ब्रह्म विचार/केवल कहि समझाइया आतम साधन सार रे।’’ इसलिए श्यामसंुदर दास कबीर को ब्रह्मवादी या अद्वैतवादी मानते हैै।

परशुराम चतुर्वेदी की मान्यता है कि कबीर के मत में जो तत्त्व प्रकाशित हुआ है वह उनके स्वाधीन चिंतन का परिणाम है।

शेष भाग पत्रिका में..............

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