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Sunday, October 24, 2010

सर्वेश्वर के बकरी नाटक में राजनीतिक चेतना

एलोक शर्मा



सर्वेश्वर दयाल सक्सैना का रचना संसार विविध रंगों से रंगा है जिसमें प्रेम का पावन स्वर है, प्रकृति की मनोरम छटाएं है। साथ ही भूख एवं गरीबी का चित्राण है इतना ही नहीं राजनीतिक, सामाजिक स्थिति पर करारा व्यंग्य भी है। सर्वेश्वर के काव्य में युगीन परिवेश का सफल चित्राण हुआ, सर्वेश्वर जी स्वतन्त्राता पूर्व एवं पश्चात् की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों एवं घटनाओं के सक्रिय दर्शक थे। अपने चारों ओर व्याप्त विसंगतियों सत्ता पक्ष की निरकुंश प्रवृत्ति, देशवासियों की सामाजिक-राजनीतिक परिवेश के प्रति उदासीनता एवं खोखले लोकतंत्रा की त्रासदी को अपने नाट्य साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्ति दी।

सर्वेश्वर जी एक प्रयोग धर्मी नाटककार हंै। नाट्य क्षेत्रा में नये-नये प्रयोग कर उन्होंने अपनी नाट्य प्रतिभा का परिचय दिया सर्वेश्वर जी के नाटक जन-साधारणोन्मुख है एवं उनके नाटकों में स्थापित व्यवस्था का खुलकर और कहीं-कहीं विद्रोहात्मक विरोध हुआ है। उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों में जूझते एवं पिसते चरित्रों को अपने कथानक में स्थान दिया। अतः सर्वेश्वर जी जनसाधारण से जुड़े थे एवं उनके पास माक्र्सवादी जीवन दृष्टि थी यही कारण है कि उनके बकरी, लड़ाई और अब गरीबी हटाओं नाटक प्रतिबंध नाटक माने जाते है।

प्रतिमबद्ध नाटक या किसी राजनीतिक विचारधारा विशेष से प्रभावित नाटक में यह आवश्यक हो जाता है कि नाटककार राजनिति परिवेश की पूर्ण समझ हो एवं राजनीति बोध को तिलमिला देने वाले विचार तंत्रा को जोड़कर मानव-नियति के पक्ष को उजागर करें।

सर्वेश्वर जी ने स्वयं लिखा कि ‘‘जब चारों ओर के लोग इस बात पर कमर बांधे हो कि वे आपकी बात नहीं समझेंगे, तब आपके सामने दो ही रास्ते रह जाते है, या तो चुप रहे अपनी बात न कहें या फिर इस ढं़ग से कहे कि सुनने वाला तिलमिला उठे, उनकी कलाई उतर जाये।’’1

सन् 1974 में प्रकाशित सर्वेश्वर जी का ‘‘बकरी’’ नाटक सफल राजनीतिक नाटकों में से एक है। इसमें लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था एवं उनमें पनपे अमानवीय मूल्यों पर तीखा व्यंग्य है। सर्वेश्वर जी ‘‘बकरी’’ नाटक में गाँधी जी के नाम एवं सिद्धान्तों की आड़ में अपनी स्वार्थी पूर्ति करने वाले नेताओं की पोल खोलने का प्रयास किया एवं नाटक के माध्यम से समसामयिक, राजनीतिक नेता व्यवस्था राजनीति के विकृतरूप, राजनीतिक अवसर वादिता, पुलिस वर्ग मंे व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता का शोषण, समाज एवं जनता का राजनीतिक के प्रति उदासीनता एवं गांधीवादी मूल्यों में आई विकृति को व्यंग्यात्मक एवं यथार्थ रूप से अपने बकरी नाटक में प्रस्तुति दी।

इसमें सर्वेश्वर जी ने सदैव दूसरे मार्ग का अनुसरण किया। सर्वेश्वर जी ने अपने ‘‘बकरी’’ नाटक के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक समस्याओं एवं विडम्बनाओं से घिरे लाचार मानव के संकट के कारुणिक चित्रा प्रस्तुत किये।

डाॅ. गिरीश रस्तोगी के शब्दों में -‘‘बकरी’’ बदलते हुये तेवर का सीधा-सादा प्रभावशाली नाटक है जिसमें समसामयिक-राजनीतिक व्यंग्य का तीखापन भी है और सारे प्रपंच, दबाव को निरन्तर झेलती हुई आम जनता का असन्सोष, विद्रोह, खीजभरी, झुझलाहट और एक निर्णय भी है।2

बकरी नाटक में डाकू के पेशे को छोड़कर राजनीतिक में प्रवेश करने वाले दुर्जन सिंह व उसके साथी मिलकर जो पूजा गीत ‘‘तन मन धन

शेष भाग पत्रिका में..............

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