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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Friday, January 2, 2009

कैसे तुम्हे भुलाऊ

SEEMA GUPTA

गर ऐसे याद करोगी मुझको,

कैसे मै जी पाउँगा ? ??


ये शब्द तुम्हारे ....


बाँध तोड़ संयम के सारे ,

बीते लम्हों के कालीन बिछाएं ,


मौन स्वरों के गलियारे मे ,


यादो के घाव पग धरते जायें,


सान्निध्य का एहसास तुम्हारा


विचलित कर मन को भरमाये ,


संकल्प तुम्हारे नर्त्य करे और ,


बोल गूंज कर प्रणय गीत सुनाये


"कैसे तुम्हे भुलाऊ "

5 comments:

seema gupta January 2, 2009 at 4:21 PM  

शगुफ्ता नियाज़ jee,
thanks a lot for presenting my poem over here.

regards

dr. ashok priyaranjan January 3, 2009 at 1:52 AM  

प्रभावशाली साथॆक अभिव्य्क्ति ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

अविनाश वाचस्पति January 3, 2009 at 5:59 AM  

भुलाने की जरूरत ही कहां है
ब्‍लॉग पर छप ही इतना रहा है
खुद ब खुद भूल जाएगा
सिर्फ सीमा जी का नाम और
हिन्‍दी वांग्‍मय हिन्दी वाडमय
जो भी ठीक है, वह जरूर
याद रह जायेगा।

इसे अन्‍यथा न लें
वैसे चाहे कुछ भी भूलें
चाहे कुछ भी याद करें
इस कविता को
मैं कभी भुला न पाऊंगा।

seema gupta January 6, 2009 at 4:06 PM  

@dr. ashok priyaranjan je thanks for your encouragement.
@ अविनाश वाचस्पति ji, aapke comment ka or is poem ko na bhulane ka bhut bhut shukriya.."

regards

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" January 11, 2009 at 7:46 AM  

बेहद सुंदर मनमोहनी
बधाइयां

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