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उन तमाम गुरूओं को समर्पित जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया.

Sunday, December 14, 2008

धूप का टुकड़ा

अमृता प्रीतम

मुझे वह समय याद है-
जब धूप का एक टुकड़ा
सूरज की उँगली थाम कर
अँधेरे का मेला देखता
उस भीड़ में कहीं खो गया...

सोचती हूँ-सहम का
और सूनेपन का एक नाता है
मैं इसकी कुछ नहीं लगती
पर इस खोये बच्चे ने
मेरा हाथ थाम लिया

तुम कहीं नहीं मिलते
हाथ को छू रहा है
एक नन्हा-सा गर्म साँस
न हाथ से बहलता है,
न हाछ को छोड़ता है

अँधेरे का कोई पार नहीं
मेले के शोर में भी
एक खामोशी का आलम है
और तुम्हारी याद इस तरह
जैसे धूप का एक टुकड़ा....

1 comments:

Vijay Kumar Sappatti December 15, 2008 at 11:03 AM  

amruta jaisa koi kya likhenga

unko naman

aapko bahut badhai ,jo ye rachna chaapi ..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

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