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Friday, December 19, 2008

कलकत्ता का प्रेम

-तसलीमा नसरीन



तुम सिर्फ़ तीस के लगते हो, वैसे तुम हो तिरसठ के !
बहरहाल, तिरसठ के हो या तीस के, किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
तुम, तुम हो; तुम जैसे; ठीक वैसे, जैसा तुम्हें फबता है।
जब-जब झाँकती हूँ, तुम्हारी युगल आँखों में
लगता है, पहचानती हूँ उन आँखों को दो हज़ार वर्षों से !
होठ या चिबुक, हाथ या उँगलियाँ,
जिस पर भी पड़ती है निगाह, लगता है पहचानती हूँ इन्हें।
हो हज़ार क्यों, इससे भी काफ़ी पहले से पहचान है मेरी,
इतनी गहरी है पहचान कि लगता है, जब चाहूँ छू सकती हूँ उन्हें,
किसी भी वक़्त,
रात या दोपहर, यहाँ तक कि आधी-आधी रात को भी !
यह भी लगता है जैसे चाहूँ, उनमें पुलक जगा सकती हूँ,
रात जगा सकती हूँ,
चिमटी काट सकती हूँ, चूम सकती हूँ, मानो वे सब मेरे कुछ लगते हैं।
तीस-तीस साल के लगनेवाले मेरे अहसासों की तरफ तुमने,
देखा है कई-कई बार,
लेकिन कुछ कहा नहीं !
जब मैं फुर्र हो रही थी, सिर्फ़ तभी
तुमने मेरे दोनों हाथों में भर दिए गुलाब ही गुलाब !
अब कैसे लगाऊँ गुलाबों का कोई अलग अर्थ ?
गुलाब तो आजकल, महज रस्म के तौर पर नज़र करता है,
हर कोई किसी को भी !
लेकिन मुझे तो तुम्हारे कुछ कहने का इन्तज़ार था,

लेकिन कुछ नहीं कहा तुमने,
मैं परखती रही, शायद मन ही मन कुछ कहो,
लेकिन नहीं, तुमने कुछ भी नहीं कहा !
क्यों ?
उम्र गुज़र जाए, तो क्या प्यार नहीं किया जाता ?

1 comments:

P.N. Subramanian December 19, 2008 at 9:25 AM  

बड़ी सुंदर रचना है. अंत में जो कहा "उम्र गुज़र जाए, तो क्या प्यार नहीं किया जाता" इसने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया. आभार.
http://mallar.wordpress.com

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